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Saturday 18 Nov 2017

वीरेन डंगवाल

संबंधों की रील और झाड़ी में दुबका खरगोश

दिमाग पर खासा जोर डालने पर भी झाड़ी में दुबके संबंधों के पाखी को ठीक जगह पर ठकठकाकर बाहर निकालना मुश्किल है। इस शुरूआत की कोई याद मुझे नहीं है। आसपास की कुछ घटनाओं को याद करके उसका एक अंदाजा भर लगाया जा सकता है। बरेली कॉलेज के हिन्दी विभाग में वीरेन डंगवाल की नियुक्ति मैनेजर पांडेय के जोधपुर विश्वविद्यालय में चले जाने के बाद संभवत: उनकी जगह पर ही हुई थी। इसके पहले जुलाई 1970 में मैं बदायूं चला गया था। उसके बाद भी पांडेय जी एक वर्ष और बरेली में रहे। तब वे कॉलेज के पास, रोडवेज बस स्टैंड के पीछे रहे थे। पांडेय जी के सामने वीरेन से कभी मिलना नहीं हुआ। 71 में किसी समय नियुक्ति के बाद भी जोधपुर विश्वविद्यालय में ज्वाइन पांडेय जी ने 72 में किया। सन् 69 में जब बरेली में शैलेष मटियानी मेरे यहां आए, 'विकल्प' का सजिल्द कथा-साहित्य विशेषांक लेकर, वे बरेली होटल में ठहरे थे। कवि लोगों को यह जानकारी होगी कि कवि के रूप में प्रतिष्ठित होने से पूर्व मंगलेश डबराल और वीरेन डंगवाल कहानियां लिखकर अपनी पहचान बना रहे थे। 'विकल्प' के उस वृहदकाय विशेषांक के पहले के किसी अंक में वीरेन की कहानी 'खरगोश' छप चुकी थी और मंगलेश डबराल की 'सारिका' में छपी कहानी 'आया हुआ आदमी' की चर्चा तो मैंने तब विस्तारपूर्वक अपने लेख में की थी।

उसी दौर में वीरेन डंगवाल ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से हिन्दी में एम.ए. किया और इलाहाबाद के उस साहित्यिक परिवेश की उनके निर्माण में एक नियामक भूमिका थी। नीलाभ और ज्ञानरंजन से उनकी दोस्ती की जड़ें उस दौर के इलाहाबाद में ही कहीं जमी और पौंड़ी है।

बरेली में मेरे पिता का निधन मई सन् 73 में हुआ। यह सुनिश्चित है कि तब तक वीरेन बरेली कॉलेज में आ चुके थे। उनसे न सिर्फ मेरा परिचय हो चुका था, वह संबंध गहरी आत्मीयता में बदल चुका था। रिटायरमेंट के बाद कचहरी में कातिब-गीरी करते मेरे पिता का एक खाता कचहरी परिसर वाले डाकखाते में था। उसमें वक्त-जरूरत के लिए वे कुछ राशि रखते थे। अपने जीवन का बड़ा हिस्सा उन्होंने वहीं रजिस्ट्री दफ्तर में बिताया था। उनके निधन के समय कोई चार सौ रुपए उनके खाते में थे। डाक विभाग वाले किसी परिचित की गवाही चाहते थे जो पिता को जानता हो। वीरेन के पिताजी तब बरेली में ही सहायक या संयुक्त आयुक्त थे। अपनी समस्या जब मैंने वीरेन को बताई उन्होंने एक प्रार्थनापत्र संबद्घ पोस्टमास्टर के नाम लिखवाकर न सिर्फ अपने पिता जी से उस पर हस्ताक्षर करवा दिए थे, मेरे साथ वे डाक खाते तक गए थे। बहुत सुविधा और सम्मानपूर्ण ढंग से वह काम हो गया था। इस सबसे यह निष्कर्ष निकालना गलत नहीं होगा कि सन् 72 में वे कभी बरेली कॉलेज में आए होंगे और उसके बाद ही कभी मेरा उनसे मिलना हुआ होगा। सन् 73 में वह संबंध खूब सघन हो चुका था। इस तरह इसकी जडें़ चालीस साल गहरी धरती तक पहुंचती हैं।

लंबे समय तक हमारे मिलने का स्थायी ठौर कचहरी परिसर के पास वाला उनके पिता को अलाटमेंट में मिला वही मकान था जिसमें वे अपने पूरे परिवार के साथ अरसे तक रहे। फिर पिता की सेवानिवृत्ति के बाद उसी के निकट उन लोगों ने अपना मकान बनवा लिया। बरेली मेरा आना जब-तब होता था क्योंकि पिता के निधन के बाद भी मां यहीं रहती थीं। मेरी अधिकतर किताबें भी यहीं रहती थीं। जिनकी प्राय: ही जरूरत पड़ती थी। रूहेलखंड विश्वविद्यालय बन जाने के बाद शुरू में उसका अस्थायी कार्यालय भी वीरेन के घर के पास ही था- उस रेस्टोरेंट से एकदम सटा जहां हम लोग बैठकर चाय पीते थे। पहले दौर की उनकी इलाहाबाद-परिक्रमा में भले ही उनकी एम.ए. की पढ़ाई पूरी हो चुकी थी, लेकिन इलाहाबाद उनके खून में नमक की तरह शामिल था। वे यायावर और खिलंदड़ी प्रकृति के व्यक्ति थे जो बरेली में नौकरी करके भी बरेली में कम रहते थे। जब भी रस्सी थोड़ी ढीली होती वे बाहर भागते- खासतौर से इलाहाबाद या फिर दिल्ली। या फिर कहीं भी। इलाहाबाद हमें करीब लाने और जोडऩे का काम करता था गो कि तब तक मैं कभी इलाहाबाद गया नहीं था। मेरे अनेक मित्र और आत्मीय वहां थे और वहां से निकलने वाली अनेक पत्रिकाओं से मैं रचनात्मक रूप से जुड़ा था। सीधे नहीं तो मेरे संस्कारों और निर्माण में इलाहाबाद कहीं बहुत गहरे था।

इलाहाबाद के मेरे अनेक मित्र शैलेश मटियानी, ज्ञानरंजन, रवीन्द्र कालिया, सतीश जमाली आदि वीरेन से भी जुड़े हुए थे। अश्क जी से मेरा जो पत्राचार सन् 63 से शुरू हुआ, वह प्राय: उनके जीवन भर बना रहा। नीलाभ वीरेन के दोस्त थे। नीलाभ के नाते वे स्वयं भी अश्क जी को 'पापा' कहते और मानते थे। अश्क जी के साथ पत्राचार के दौरान जब-तब कौशल्या जी और नीलाभ की ओर से भी उत्तर मिलता था। स्वयं व्यस्त या बाहर होने पर अपनी कोई नई किताब वे कौशल्या जी या नीलाभ के द्वारा ही भिजवाते रहते थे। अश्क जी नीलाभ को प्यार से 'गुड्डा' कहते थे और उसी के नाम पर उन्होंने अपने प्रकाशन का नाम नीलाभ प्रकाशन रखा था।

अश्क जी मुझे प्राय: इलाहाबाद आने और कुछ समय अपने पास ठहरने के लिए लिखते रहते थे। इसके लिए वे राजकमल चौधरी और से.रा. यात्री का उदाहरण  भी देते थे। वीरेन हमारे बीच एक मध्यस्थ की तरह थे। यशपाल के प्रति मेरा झुकाव और लगाव अश्क जी के मन में सदैव एक 'गांठ' की तरह बना रहा और जब-तब अपनी इस खीझ को वे व्यक्त भी करते थे। शुरू में उनकी उम्र के लिहा•ा के बाद फिर मैं भी उनकी ही भाषा में उन्हें जवाब देने लगा था। मध्यस्थ की भूमिका में संवाद लाने-ले-जाने में मुझे लगता है वीरेन को भी मजा आने लगा था। हो सकता है कभी-कभी मुझे उकसाने और चेताने के लिए ही अश्क के संदेश में अपनी ओर से कुछ नमक-मिर्च लगाकर मुझ तक पहुंचाते हों। एकाध बार मैंने उनके माध्यम से ही यह कोशिश भी की कि मुझे लिखे अश्क के पत्रों का संकलन मेरी लंबी भूमिका के साथ नीलाभ प्रकाशक से ही छपे जैसे कभी मैकमिलन, नई दिल्ली से 'यशपाल के पत्र' छपी थी। लेकिन अश्क जी की दिलचस्पी उन पत्रों के प्रकाशन से अधिक उनके लंबे साक्षात्कार या फिर उन पर आलोचनात्मक पुस्तक में अधिक थी। उसके लिए भी उनके अपने सुझाव और दबाव को बहुत बाद में जब मेरी 'अश्क के पत्र' प्रकाशित हुई, इसी पृष्ठभूमि में मैंने उसे वीरेन डंगवाल को समर्पित किया।

एक पत्रकार के रूप में यह बुनियादी समझ वीरेन डंगवाल में थी कि पत्रकारिता केवल राजनीति तक ही सीमित नहीं होती, उसके व्यापक सामाजिक-सांस्कृतिक सरोकार होते हैं। तब सनसनी वाली इलेक्ट्रानिक पत्रकारिता का न इतना जोर था, न ही उसके सामाजिक सरोकारों का ऐसा क्षरण हुआ था। अस्सी के दशक की बात है जब वे 'अमर उजाला' के बरेली संस्करण के संपादक थे उन्होंने मेरे आगे प्रस्ताव रखा कि मैं विस्तार से दो किस्तों में अपने बचपन के बारे में लिखूं। बीच में मेरा चित्र देकर दो खण्डों में ही उसे उन्होंने छापा। उसमें मैंने मुहल्ले के अपने परिवेश के तौर पर पतंगबाजी और कबूतरबाजी की चर्चा भी की थी। बाद में कभी मिलने पर उस पर उन्होंने उत्साहवद्र्घक प्रतिक्रिया की। इसी प्रसंग में, बचपन के दौर में गली-मुहल्ले में घूमने वाले फेरीवाले और खोमचे वाले उनकी आवाजें तथा लब्बा-सांट, गेंदतड़ी, सपोलिया और चकई जैसे लुप्त हो चुके खेलों का जिक्र भी आया। मैंने अपने बचपन में उन बहुत से पेशों का जिक्र भी किया जो विकास की इस दौड़ में आज पूरी तरह विलुप्त हो चुके हैं- लकड़हारे, कुआं उघाने वाले और कुएं में गिरे कलसा-बाल्टी जैसे बर्तनों को निकालने वाले, खटबुना, गधों-बैलगाडिय़ों पर उपले बेचने वाले आदि या फिर इसी तरह के और धंधों में लगे लोग। वे ध्यान से मेरी बात सुनते रहे और फिर बोले 'भाई साहब, आप कुछ करें... मेरी इच्छा है कि दस-बारह किस्तों में आप इन सारी बातों को समेटें और अपने उस दौर के मुहल्ले की जिंदगी को सामने लाएं।' मैंने हामी भी भर ली। बाद में कई बार इस पर काम की योजना भी बनी, लेकिन हुआ कुछ नहीं। बरेली में जब 'हिन्दुस्तान' दैनिक लांच हुआ, उसके स्थानीय संपादक ने कुछ ऐसा ही प्रस्ताव उसके प्रवेशांक के लिए किया। उसे मैंने लिखा भी जिसे बाद में कुछ विस्तार देकर मैंने 'आलोचक का आकाश' वाले अपने संस्मरणों में शामिल भी किया। लोकजीवन में ऐसी सघन रुचि के कारण ही 1978 में इलाहाबाद से निकलने वाले अखबार में लंबे समय तक उन्होंने 'घूमता आईना' जैसा स्तंभ लिखा। घुमक्कड़ी और मेला-तमाशा, खाना-पीना, स्वाद और गंध इन सबके प्रति उनमें जबरर्दस्त आकर्षण था। उनकी नई कविताएं जलेबी, समोसा जैसे व्यंजनों पर केन्द्रित हैं। उनके मस्तमौला और खिलंदड़े स्वभाव में कोरमकोर पहाड़ी रुचियों का अद्भुत सामंजस्य था।

जब अनुराग ने अर्थशास्त्र में एम.ए. किया, किसी ढंग की नौकरी की तलाश में मैंने वीरेन डंगवाल के आगे यह प्रस्ताव रखा कि जब तक कुछ नहीं होता उसे किसी रूप में 'अमर उजाला' से जोड़ लें। ज्यादा कुछ न बताते हुए उन्होंने सि$र्फ इतना कहा- उसे आप मेरे पास भेजें। जल्दी ही वह बरेली आकर उनसे मिला। शाम को जब वह वापस बदायूं पहुंचा उसके पास डंगवाल की दी हुई हिन्दी-अंग्रेजी की कई पत्रिकाएं थीं। उसने बताया कि उन्होंने उसे आदिवासी समाज और जनजातियों पर कुछ करके देने को कहा है- खासतौर से मुंडा और थारू जनजातियों पर। उसने यह भी बताया कि अगले आठ दिनों में उन पत्रिकाओं के आधार पर ऐसे दो-तीन लेख तैयार करके उन्होंने फिर आने को कहा है। मिलने पर अलग से वीरेन ने बताया कि संवाददाता या किसी और रूप में अखबार से जुडऩे पर बंधन और समय की बर्बादी ज्यादा है। उन पत्रिकाओं से ही जरूरी चित्र लगाकर उसके वे लेख उन्होंने पूरे साल छापे। इस काम ने उसे सार्थक रूप से न सिर्फ व्यस्त रखा, इस समाज के प्रति उसकी रुचि और दृष्टि भी विकसित की। तब एक किस्त का मानदेय वे साठ रुपए दिलवाते थे। बाद में विश्व बैंक वाली उसकी नौकरी में उसके इस काम को पर्याप्त महत्व दिया गया और आगे उत्तरप्रदेश सरकार के जनजाति विकास निगम लखनऊ वाली नौकरी में भी उसका लाभ उसे मिला। उत्तराखंड सरकार में राजपत्रित अधिकारी के रूप में भी उसकी वह दिशा छूटी नहीं है।

स्वाद और गंध के प्रति एक गहरा आकर्षण जैसे, वीरेन के स्वभाव का हिस्सा था। जलेबी और समोसा उनके लिए सिर्फ कविता के विषय ही नहीं थे, उनकी पैठ उनके जीवन में भी थी। जीवन से चलकर ही वे उनकी कविता में पहुंचे थे। वीरेन के साथ कई बार बाहर भी जाना हुआ- ट्रेन या फिर गाड़ी से। एक बार विश्वविद्यालय के केन्द्रीय मूल्यांकन में भी कई दिन उनका साथ रहा। स्वाद और गंध के प्रति उनका यह लगाव उनके खिलंदड़े और फक्कड़ स्वभाव से मिलकर पान पर जैसे कत्था-चूना का युग्म रचता था। शैलेश मटियानी की बरसी के सिलसिले में हम लोग गाड़ी से नैनीताल जा रहे थे। शैलेश मटियानी पर केन्द्रित 'पहाड़' के अंक का विमोचन  भी होना था। राजेन्द्र यादव, असगर वजाहत और गिरिराज किशोर के पहुंचने की बात थी। गाड़ी से चलने का सुझाव मेरा ही था क्योंकि पत्नी की अस्वस्थता के कारण मुझे रात में ही वापस आना था। सुधीर विद्यार्थी और प्रियदर्शन मालवीय भी साथ थे। गर्मी के दिन थे, घर से सुबह जल्दी ही निकल लिए थे ताकि दस बजे तक नैनीताल पहुंच सकें। कार्यक्रम दोपहर में था और पांच बजे के आसपास वापसी का इरादा था। बहेड़ी से कुछ पहले सड़क किनारे एक खोखा दिखाई दिया जिस पर चाय की संभावना थी। मालिक एक परात में पकौड़ों के लिए आलू और प्याज काट रहा था। वीरेन मेरी बगल में ही बैठे थे, खिड़की की ओर। खोखे पर सबसे पहले नजर उन्हीं की पड़ी। मुझसे बोले, 'भाई साहब, बहुत खामोश बैठे हैं... क्या चाय और पकौड़े की गंध आप तक नहीं पहुंच रही है?' इस बीच गाड़ी थोड़ा आगे निकल चुकी थी... हम पीछे लौटे। खोखे के मालिक को कहकर फिर जल्दी से पकौड़े बनवाकर और कड़क चाय के बाद ही फिर हम आगे बढ़े थे।

युनिवर्सिटी के मूल्यांकन में नैनीताल की डॉ. नीरजा टंडन भी हमारे साथ थीं। वीरेन ने ही उनसे परिचय करवाया था। एक-डेढ़ घंटे बाद कलम कापियों पर रखकर अंगड़ाई लेते हुए वीरेन पूछते थे... 'भाई साहब, आप थकते और ऊबते नहीं है?' फिर वे मुझे लेकर बाहर आते थे। कैंटीन में समोसा, पकोड़े या पसंद का कुछ खाकर हम वापस लौटते थे। जो हम लोग वहां खाते थे, उसे नीरजा के लिए भी लेकर आते थे।

हमारे मुहल्ले बमनपुरी में रामलीला होली पर होती है- मुख्य सड़क को घेरकर। होली से एक दिन पहले धनुषयज्ञ होता है। होली वाले दिन राम की रंगारंग बारात जुलूस की शक्ल में पूरे शहर में निकलती है। उसके बाद जैसे रामलीला जवान हो जाती है। धनिये के आलू के छोटे-छोटे खोमचे, आलू की टिक्की-समोसे और पानी वाले बताशों के ठेले पूरी सड़क पर खड़े हो जाते हैं। अब तो जमाने के हिसाब से छोला-भटूरा, डोसा-इडली और चाऊमीन जैसी चीजें भी होती हैं। मेला कुल मिलाकर कोई बीसेक दिन चलता है। करीब दो फर्लांग लंबी सड़क उन दिनों ठसाठस भरी रहती है। उसी पर बाजों-गाजों के साथ सरूपों के फेरे लगते हैं और खरदूषण वध से शुरू होकर दशहरा वाले दिन रावण वध तक युद्घ के ये फेरे जारी रहते हैं। इन बाद के दिनों एक-दो बार वीरेन मेरी ओर ज़रूर आते थे। खोमचे, ठेले या दुकान पर खड़े होकर खाने में उन्हें मजा आता था। सामान लेकर घर बैठकर खाने-पीने वाली मेरी बात उन्होंने कभी नहीं मानी, अरे भाई साहब, घर में बैठकर खाने में क्या मजा है।

एक बार वे ऐसे ही अचानक चले आए थे। दोपहर का समय था। शायद प्रियदर्शन भी साथ थे। देर तक हम लोग गप-शप करते रहे फिर बोले, चलिए भाई साहब, कहीं बाहर घूमते हैं निकलकर उनका मन बना कि उन गलियों में घूमा जाए जिनका उल्लेख मैंने गुरुवर पंडित भोलानाथ शर्मा पर लिखित अपने संस्मरण में किया है। यह भी कि पंडित जी के घर के सामने से निकला जाए जो अभी भी लगभग उसी रूप में मौजूद है, जब पंडित जी थे। बिहारीपुर और खत्रियान की उन गलियों में घूमकर पंडित जी का घर दिखाते हुए हम देर तक पंडित जी के बारे में बातें करते रहे। फिर आगे कुतुबखाने की ओर निकलने पर जब उन्हें घी में सिंकती हुई आलू की टिक्की और बताशे का एक साफ-सुथरा ठेला दिखा तो वे कुछ ठिठके। उसकी चाट मशहूर थी और तब ज्यादा भीड़ भी नहीं थी। फिर हम लोगों ने पानी के बताशे खाए थे- मैंने सोंठ भरवाकर और वीरेन ने सोंठ वाले भी और बिना सोंठ के भी। फिर थोड़ा सा जीरे का पानी पिया भी था।

अश्क जी के प्रसंग ने हमारे बीच और कुछ किया हो या न, चुहल और परिहास का एक रिश्ता जरूर पैदा किया। उसने हमें अपने मन की बात अपेक्षाकृत अधिक सहजभाव से कहने की छूट दी थी। कभी-कभी हमारी इस चुहल को देखकर राजेश कहता भी था- यह आप लोग क्या ननद-भौजाई की तरह लड़ते रहते हैं। वीरेन का संपर्क संजाल बड़ा और व्यापक था। बरेली कॉलेज में कभी मेरे अध्यापक और स्टुडेंट फेडरेशन में काम करते रशाद साहब और साहनी साहब के भाई और भतीजे से उनके बहुत घनिष्ठ और आत्मीय संबंध थे। इलाहाबाद के उनके कुछ मित्रों की जानकारी मुझे थी। फिर भी मैं उन्हें छेड़ता, 'आप पूरमपुर पहाड़ी हो, पहाडिय़ों के इस घेरे को तोड़कर बाहर आओ...' बाद के दिनों में शैलेश मटियानी बरेली आते पर उन्हीं के यहां रुकते थे। मंगलेश डबराल ने तो उन्हीं के साथ रहकर बरेली से ही बी.ए. की परीक्षा दी थी। बटरोही के हस्ताक्षर वाली उन्हीं दी गई कई पुस्तकें मैंने उनके पास देखी थीं। इन और ऐसे ही दूसरे उदाहरणों को मैं अपने समर्थन में इस्तेमाल करता था।

अनुराग जब दो वर्ष जोशीमठ में रहा मेरा गर्मी का एक बड़ा हिस्सा वहीं बीतता था। वहीं सड़क पर 'डंगवाल फोटो स्टेट और लेमिनेशन सेंटर' नामक एक छोटी-सी दुकान थी। उन्हें छेड़ते हुए एक दिन मैंने उस दुकान को देखकर उनकी याद आने की बात कही। मेरी चुहल की ओर ध्यान न देते हुए उन्होंने गंभीरता से कहा, 'हो सकता है वे लोग मेरे संबंधी और सगोती ही हैं...' शैलेश मटियानी की बरसी पर नैनीताल में मैंने उन्हें जिस तरह वहां के स्थानीय मित्रों एवं प्रशंसकों से घिरा देखा, उससे लोगों का उनके प्रति प्यार का अनुमान लगा पाना मुश्किल नहीं था। शेखर पाठक के 'पहाड़' का शैलेश मटियानी पर केन्द्रित अंक का लोकार्पण भी उसी दिन हुआ था। उसके अतिथि संपादक के रूप में वीरेन डंगवाल का ही नाम था। मेरा लेख भी उन्होंने ही लिया था। मेरी पुस्तक 'नयी कहानी : पुनर्विचार' का शैलेश मटियानी से संबंधित अध्याय ही उसमें जाना था। उसकी फोटो प्रतिलिपि में से एक पन्ना उनसे इधर-उधर हो जाने पर वे फिर दोबारा उसे लेने आए थे। लेकिन खुद वीरेन ने ही बताया कि संपादक का अधिकतर काम शेखर पाठक ने ही किया था।

सेवानिवृत्ति के बाद बरेली आने पर सुकेश साहनी ने कथा-आलोचना से इतर मेरे लेखों का एक संग्रह 'और भी कुछ' शीर्षक से छापा था बहुत सुरुचिपूर्ण ढंग से। एक दिन गिरिराज किशोर का एक कार्ड मिला- 'अकार' में उस किताब की समीक्षा के लिए उन्होंने वीरेन डंगवाल का नाम सुझाया था। संकोचवश वीरेन से स्वयं कुछ न कहकर गिरिराज किशोर का वह कार्ड ही मैंने उन्हें दिखाया था। मुझसे सि$र्फ उन्होंने इतना ही कहा, 'भाई साहब, मेरी आपकी तो काम की लाइन ही अलग है...' मैंने उनसे कहा भी कि इस किताब में तो अधिकतर सामग्री कवियों के ही गद्य पर है- शमशेर, त्रिलोचन, मलयज आदि की डायरियों और अन्य रचनाओं पर या फिर ऐसी किताबों पर जो कथा-साहित्य से बाहर की हैं। इसके बाद उन्होंने कुछ कहा नहीं, लेकिन वह कार्ड मुझे न लौटाकर मोड़कर अपनी जेब में रख लिया था।

वीरेन का अंतर्विरोधी व्यवहार जब-तब चकित करता था। एक ओर वे बहुत छोटी-छोटी चीजों का ख्याल रखते थे, लगता था कि उन्हें लेकर वे बहुत सजग और चौकन्ने हैं, दूसरी ओर बड़ी से बड़ी चीजों के प्रति भी उनमें हद दर्जे की लापरवाही दिखाई देती थीं। इसे वे प्राय: ही भूलने की अपनी आदत के पर्दे में ढांकने-तोपने की कोशिश करते थे। कुछ इसी तरह के स्वभाव का अनुभव मुझे शिवप्रसाद सिंह के प्रसंग में हुआ था। अपने पत्रों में वे बहुत आत्मीयता से पेश आते थे। आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी की षष्टिपूर्ति पर प्रकाशित 'शांति निकेतन से शिवालिक' के लिए तब मुझ पर दबाव बनाकर मुझसे लिखवाया था। जब आलोचना में मेरे कुल जमा दो-तीन लेख और चंदेक समीक्षाएं ही छपी थीं। पटना से एक सेमीनार से लौटते हुए वाराणसी रुकने पर सुबह आठ बजे के करीब जब मैं उनके घर पहुंचा, उनकी नौकरानी कमरे में झाड़ू लगा रही थी। उसी से पता चला कि वे सो रहे हैं। ग्यारह बजे बरेली के लिए मेरी गाड़ी थी। सारी बात उसे बताकर अपना संदेश मैंने उन्हें पहुंचाने को कहा। वाचस्पति का छोटा भाई प्रभाकर मेरे साथ था। पहले वह उन्हें जगाने को ही तैयार नहीं थी। फिर जैसे-तैसे वह गई और दो मिनट बाद शिवप्रसाद सिंह बाहर आए भी- आधी बांह की बनियान और धोती में। अपना परिचय देते हुए अचानक इस तरह पहुंचने के लिए मैंने क्षमा मांगी। समय कम था और मिलना चाहता था, इसलिए अपने को रोक नहीं सका। पहली बार जब बनारस गया था, वे पांडीचेरी गए हुए थे। देर तक वे अपनी लाल हुई आंखों को मलते रहे। मेरी बात पर न उन्होंने कोई प्रतिक्रिया की न ही पहचान का कोई चिन्ह वहां था। बहुत हतप्रभ और अपमानित-सा मैं कुछ देर वहां खड़ा रहा और फिर 'नमस्कार' कहकर चला आया। मैं मैनेजर पांडेय के साथ पटना से लौटा था और हम लोग त्रिभुवन सिंह के यहां ठहरे थे। सारी बात मुझसे सुनकर पांडेय जी बोले, 'भाई साहब, इसी कारण मैं आपके साथ गया ही नहीं...' त्रिभुवन सिंह ने बताया, 'वे ट्रांस में रहते हैं... जब-तब लोग उनके इस व्यवहार की चर्चा करते हैं...'फिर मैं देर तक उन लोगों से शिवप्रसाद सिंह के पत्रों की चर्चा करता रहा था।

एक दिन वीरेन का फोन आया। उन्होंने अपने बेटे के विवाह की सूचना दी। विवाह हरिद्वार में होना था और फोन पर ही उन्होंने हरिद्वार चलने को कहा। उन्होंने विवाह की तारीख बताई और औपचारिक निमंत्रण-पत्र लेकर आने की बात भी कही। मैंने उसके लिए मना किया- जब आपने कह दिया, यही काफी है। क्वांर के दिन थे। विवाह दशहरा के आसपास होता था। अनुराग तब हरिद्वार में ही था। दशहरे पर हमारा भी वहां जाने का कार्यक्रम था। मूल योजना से कुछ दिन पहले पहुंचने पर विवाह के इस आयोजन में भी शामिल हुआ जा सकता था। मैंने वीरेन से हामी भर दी। कार्ड के लिए मैंने मना भले ही कर दिया हो, उसकी प्रतीक्षा तो रही ही। इसके बाद अपने कार्यक्रम में फेरबदल करके मैं इसी हिसाब से हरिद्वार गया कि उनके आयोजन में शामिल हुआ जा सके। विवाह का जो दिन उन्होंने मुझे बताया था, उस पूरे दिन उनके फोन का इंतजार रहा। पोतियां भी बार-बार पूछती थीं। दोपहर में खाना खाने आए अनुराग में भी पूछा। उसी हिसाब से उसे सब कुछ करता था। कुल मिलाकर इससे मुझे हरिद्वार में पांच-सात दिन ज्यादा रुकना पड़ा।

बाद में बरेली लौटकर जब फोन पर मैंने उन्हें बधाई दी और शिकायत की तो सिर पीटते हुए उन्होंने अपनी भुलक्कड़ी के लिए क्षमा मांगी। उन्हें याद ही नहीं था कि कभी उन्होंने मुझे वह सब कहा था और विवाह के लिए मुझे आमंत्रित किया था। इसके आगे-पीछे के वे प्रसंग मेरे दिमाग में कौंधे जब करने का कोई संकेत दिए बिना ही उन्होंने जो कुछ मेरे लिए किया था। शैलेश मटियानी वाले आयोजन में सुधीर विद्यार्थी के साथ मैं श्रोताओं एवं दर्शकों के साथ आगे की कतार में बैठा था। शुरू में मंच से संक्षिप्त वक्तव्य स्वयं वीरेन ने दिया था। मंच हाल में बनी बॉलकनी पर था जिस पर सीढिय़ों से जाना होता था। मंच पर राजेन्द्र यादव, गिरिराज किशोर आदि बैठे थे, स्थानीय संयोजकों के साथ। असगर वजाहत को भी आना था, लेकिन वे आए नहीं थे। मंच पर बोलने से भरसक अपने बचने के स्वभाव के कारण ही मै श्रोताओं में बैठा था। बोलने से पहले मंच पर चढ़ते हुए किसी से उन्होंने कुछ कहा। इसके बाद एक सज्जन मेरे पास आए और कहा, 'आप कृपया मंच पर चलें।' मेरे मना करने पर भी वे माने नहीं। फिर अपना बैग सुधीर विद्यार्थी को ही थमाते हुए मुझे मंच पर जाना पड़ा था। मेरे बैठ जाने के बाद ही वीरेन ने अपना वक्तव्य शुरू किया। इसी तरह जब बरेली कॉलेज में जसम का कोई आयोजन था। दिल्ली से मैनेजर पांडेय भी आए थे और मेरे साथ ही ठहरे थे। डंगवाल ने किसी को गाड़ी लेकर उन्हें लेने भेजा था। फोन पर मुझसे आने का अनुरोध किया था। लेने आए हुए सज्जन ने भी उनका संदेश दिया था। सारी दिनचर्या बिगड़ जाने के डर से मैं बचना चाह रहा था। फिर मैं गया। बोलना वहां भी पांडेय जी को ही था। लेकिन मुझे जबरदस्ती आयोजकों ने मंच पर बैठाया। बाद में बोलने के लिए मुझसे पूछा भी।

आयोजन के बाद सहयोगियों ने मुझे विभाग में आमंत्रित किया और पांडेय जी के साथ एक लिफाफा मुझे भी दिया। मैंने लेने से इनकार किया। पांडेय जी अतिथि और वक्ता थे। मेरे लिए उस लिफाफे का क्या औचित्य था? वीरेन होकर भी कहीं सामने नहीं थे। लेकिन सारा किया-धरा उन्हीं का था और फिर अंतत: वह लिफाफा मुझे लेना पड़ा। आगे कभी विभाग में आने का आश्वासन भी मुझे देना पड़ा था।

वीरेन की पहचान के लिए 'लापरवाही' से बेहतर शब्द शायद 'बेपरवाही' है जिसमें चीजों को अपने ढंग से चलने और होने देना एक बुनियादी शर्त होती है। 'प्रतिरोध' और 'निषेध' जैसे शब्द उनकी प्रकृति से अधिक मेल नहीं खाते थे। उनका यह स्वभाव ही उनकी यारबाश और स्वच्छंद प्रकृति से मेल खाता था। एक बार बदायूं में अचानक उन्होंने किसी के हाथ मेरे पास दो किताबें भिजवाईं- विष्णुचंद्र शर्मा लिखित काजी नजरुल इस्लाम की जीवनी 'अग्निसेतु' और हेकरवाल की 'प्रेमचंद'। वे किसी नए शुरू हुए प्रकाशन द्वारा प्रकाशित थीं। बरेली आने पर जब मैंने उन पुस्तकों के मूल्य या सहयोग राशि आदि के बारे में पूछा तो बड़ी निरपेक्षता से दिया गया उनका उत्तर था, 'अरे भाई साहब, आप क्यों हलाकान होते हैं, जब कोई मांगेगा तो दे दिया जाएगा...' इसके बाद न उन्होंने अपनी ओर से कुछ मांगा और न ही फिर मैंने कोई जिक्र किया ।

तब वे अपने शोध के सिलसिले में लंबे अवकाश पर इलाहाबाद में थे। अश्क जी के नीलाभ प्रकाशन से इन्द्रनाथ मदान के संपादन में 'गोदान' पर एक पुस्तक 'गोदान : मूल्यांकन और मूल्यांकत' आई थी। वीरेन से मैंने उसकी एक प्रति लाने को कहा। कुछ दिनों बाद बदायूं में ही वह किताब मुझे मिली। पता नहीं वीरेन ने उसे खरीदा था या नीलाभ से लाए थे। उस पर वीरेन ने लिखा था- 'भाई साहब को उन्हीं के योग्य...' और फिर 'सादर' लिखकर वीरेन के हस्ताक्षर थे। शोध की इस अवधि में ही बरेली आने पर एक दिन वे अचानक जावेद के साथ बदायूं पहुंचे। जावेद उनके मित्र थे जो बरेली कॉलेज में फिजिक्स विभाग में थे। मैंने उन्हें सात-आठ वर्ष की उम्र में देखा था। वे मेरे मित्र, कामरेड और अध्यापक रशाद अब्दुल वाजिद के सबसे छोटे भाई थे। उनकी बहन नजमा इंटर और बी.ए. में मेरे साथ थी। जावेद की शादी बदायूं में ही हुई थी। वामपंथी सोच और विचार के लिए मुश्किल दौर में भी वह परिवार वैसा ही बना रहा। उसके जीन्स जावेद में भी पूरी तरह सुरक्षित और सक्रिय थे। पूरी दोपहरी वे लोग मेरे साथ ही रहे। रैकों और अलमारी में लगी किताबों को वे दोनों ही गहरी दिलचस्पी से देखते रहे। जावेद को अपने बचपन में, मेरे रशाद साहब के पास जाने की खूब याद थी जब मैं उनके बंगले के सामने वाले मैदान मेें उनके और उनके दोस्तों के साथ खेले जाने वाले क्रिकेट में शामिल हो जाता था।

एक रैक के ऊपर किनारे पर किताबों की बाड़ के तौर पर जो मोटी-मोटी पत्रिकाओं की सजिल्द फाइलें रखी थीं उन्हें भी वीरेन ने खोलकर देखा। हाल में ही उनकी जिल्दबंदी करवाई गई थी। वीरेन ने 'कल्पना' की एक फाइल निकालकर कहा, 'भाई साहब, इसके लिए तो मैं बहुत दिनों से परेशान था... यह मेरे शोध की दृष्टि से बहुत जरूरी है। काम के बाद आपको लौटा दूंगा। उसमें दिनकर की 'उर्वशी' पर भगवतशरण उपाध्याय की मूल समीक्षा के साथ बाद में उस पर विवादस्वरूप एक पूरा अंक प्रकाशित हुआ था। वह सारी सामग्री इस फाइल में थी। वह फाइल ले गए। बाद में उनका शोध भी पूरा हो गया और उन्हें डिग्री भी मिल गई, लेकिन वह फाइल मुझे कभी वापस नहीं मिली। शैलेश मटियानी और बटरोही की कई पुस्तकें जो उन्हें भेंट की गई थीं, मैं उनसे पढऩे को ले आया था। वे किताबें उन्होंने कभी मुझसे वापस नहीं मांगीं। कौसम्बी की 'प्राचीन भारत का इतिहास और संस्कृति' का पहला नेमिचन्द्र जैन द्वारा अनूदित संस्करण में मेरे पास उन्हीं की प्रति थी। बाद में जब राजकमल प्रकाशन से ही गुणाकर मुले के संशोधित और बेहतर अनुवाद में उसका नया संस्करण आया तो उसे भी मैंने खरीदा था।

वर्ष 2004 में, सितम्बर में, वीरेन डंगवाल ने अपने अकेले के दम पर एक बड़ा आयोजन किया। बरेली और बरेली कॉलेज के इतिहास में यह एक ऐतिहासिक पहल थी। हिन्दी के कुछ वरिष्ठ कवियों के काव्य-पाठ के साथ नामवर सिंह का व्याख्यान भी हुआ। जब वे कार्ड देने आए, देर तक उनसे चर्चा हुई। मेरे बधाई देने पर उन्होंने कहा, 'भाई साहब, कर तो लिया है डर बहुत लग रहा है। फिर सारे कार्यक्रम की संक्षिप्त रूपरेखा बताते हुए कहा, 'लोगों को ठहराने की व्यवस्था होटल ओबेराय में की है... आप साथ रहेंगे और थोड़ा समय देंगे तो मुझे बल मिलेगा।...'आयोजन वाले दिन शाम को पांच बजे से पहले ही मैं बरेली कॉलेज पहुंच गया था। शाहजहांपुर से हृदयेश भी आये थे। वे मेरे साथ थे। काम की जैसी वीरेन की अपनी शैली थी, कहीं सामने आए बिना सब कुछ बहुत व्यवस्थित ढंग से चला। आयोजन के बाद मैं लौट आया था। लेकिन रात्रिभोज में कवियों के भयंकर रसरंजन और उनके बीच अकेली कवयित्री अनामिका के संकोच और सांसत की अनेक कहानियां बाद में हवा में तैरती रहीं। इसके बाद ही कभी मिलने पर सुधीर विद्यार्थी ने कहा था, 'आप देख लें, इस वर्ष का साहित्य अकादमी पुरस्कर वीरेन डंगवाल को मिल रहा है...' तब कोई टिप्पणी न करके मैंने सुधीर विद्यार्थी की ओर देखा था। 2004 के अकादमी पुरस्कारों की घोषणा मैंने 'अमर उजाला' में पढ़ी। शायद 'विस्मित' कहना गलत होगा। मैं सचमुच हतप्रभ था। रह-रहकर कई महीने पूर्व सुधीर विद्यार्थी की, की गई घोषणा मेरे कानों में बज रही थी- उनके चेहरे और समूची देह-भाषा के साथ। मैंने वीरेन को फोन पर बधाई दी थी। कई फोनों पर बधाइयों का इतना शोर था कि आवाजे एक-दूसरी से कट रही थीं। उसी दिन या शायद अगले दिन अखबार में ही नामवर जी की यह टिप्पणी भी पढ़ी कि साहित्य अकादेमी पुरस्कार अब दिल्ली और इलाहाबाद जैसे बड़े शहरों से ही नहीं बंधा है- वह बरेली तक पहुंचा है। अकादेमी पुरस्कार की घोषणा के बाद दिल्ली से साधना अग्रवाल का फोन आया। 'राष्ट्रीय सहारा' या किसी अन्य अखबार के लिए वे मेरी  प्रतिक्रिया चाहती थीं। इधर पुरस्कारों की जो साख और छवि रही-बनी है, अकादेमी के पुरस्कारों का जो इतिहास रहा है और सबसे अधिक वीरेन डंगवाल के प्रसंग में चार महीने पहले बरेली में ही की गई सुधीर विद्याथी की घोषणा- सब चीजें शायद कहींजुड़ गईं। ऐसा नहीं है कि वीरेन की कविता और उनके द्वारा किए गए पाब्लो नेरूदा ब्रेख्त, वास्कोपोपा, मीरोस्लाब होलब, नाजिम हिकमत आदि के अनुवादों से अपरिचित रहा होऊं। उनका पहला संग्रह 'इसी दुनिया में' (1990) मैंने अनुराग के तब इलाहाबाद रहते, नीलाभ के पास भेजकर मंगवाया था। मेरा नाम बताने के बाद नीलाभ ने उसका मूल्य भी नहीं लिया था। बाद में 'दुष्चक्र में स्रष्टा' (2002) और 'स्याही ताल'(2009) भी मैंने मंगवाए थे। कायदे से उनका पहला संग्रह ही उनका संपूर्ण और सर्वश्रेष्ठ संग्रह है- प्रतिनिधि भी। उसके पीछे, कविताओं के चयन और व्यवस्था में, नीलाभ के श्रम और विवेक की बात भी सुनने में आई है। लेकिन बहुत कम लिखकर और बहुत कम अवधि में ही जिस तरह उनका अधिमूल्यन हुआ- रघुवीर सहाय पुरस्कार, श्रीकांत वर्मा सम्मान, शमशेर सम्मान के बाद अब साहित्य अकादेमी पुरस्कार वही मुझे कहीं न कहीं अन्य दूसरों के प्रति अन्याय जैसा लगा। संभव है कुछ अविचारित रही हो, साधना अग्रवाल के प्रश्न के उत्तर में मेरी त्वरित प्रतिक्रिया थी- 'यह तो सीधे ठगई और बटमारी का उदाहरण है... किसी लाचार गरीब बुढिय़ा ने जैसे-तैसे बेटी के विवाह के लिए जो सामान जुटाया, कोई जैसे उसे उस गठरी को ही उठा ले गया हो...' स्वाभाविक था इसके बाद संबंधों को वैसा नहीं रहना था जैसे वे बरसों से रहे आए थे। जब 'पहल' में भारतीय ऐतिहासिक उपन्यासकार वाली श्रृंखला का मेरा पहला लेख बंकिमचंद्र पर छपा, संपादक के रूप में उस पर ज्ञानरंजन की एक बहुत संक्षिप्त टिप्पणी भी थी। उसमें उन्होंने लिखा था- वाचालों की दुनिया में मधुरेश बहुत मौन आलोचक हैं...'

इसी के बाद दिल्ली से एक दिन गोपेश्वर सिंह युनिवर्सिटी में कोई वायवा लेने आए। शाम को वीरेन डंगवाल के साथ वे मेरे यहां भी आए। संयोग से मेरे मोबाइल पर ज्ञानरंजन का फोन उनके सामने ही आया। मैंने ज्ञान को भी बताया कि वीरेन आए हुए हैं। फिर मोबाइल मैंने वीरेन को दे दिया। वीरेन का पहला वाक्य यही था... 'यह सब आपने क्या लिख दिया?' हो सकता है यह उनके प्रसंग में मेरी टिप्पणी की प्रतिक्रिया हो जो उनकी कटुता के रूप में मेरे सामने व्यक्त हुई थी। मेरे उपस्थित न होने पर शायद वे उसका जिक्र भी न करते।

मिलना-जुलना, राह-रस्म इसके बाद भी बना रहा था। ऊपरी तौर पर हमारे संबंधों में कहीं कोई शिकन दिखाई नहीं देती थी। लेकिन कुछ था जो उन्हीं की कहानी के खरगोश की तरह दुबक कर झाड़ी के अंदर भी जा बैठा था। वह खरगोश उस झाड़ी के बाहर फिर कभी नहीं निकला। उस दिन उनके पोर्च में रखी उनकी देह पर फूल चढ़ाते हुए एक क्षण में जैसे चालीस साल लंबे संबंधों की रील मेरे आगे खुल गई थी। तब लगा था कि यह देह उनकी ही नहीं, मेरी भी है।