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Thursday 18 Jan 2018

अक्षरपर्व का सितम्बर अंक पढ़ा, आत्मिक आभार। पत्रिका अपने आरंभिक काल से आज तक अपनी सारस्वत पहचान को बनाए रखने में कामयाब है।

डा.मधुर नज्मी

गोहना मुहम्मदाबाद, जिला मऊ 276403

अक्षरपर्व का सितम्बर अंक पढ़ा, आत्मिक आभार। पत्रिका अपने आरंभिक काल से आज तक अपनी सारस्वत पहचान को बनाए रखने में कामयाब है। प्रस्तावना के अंतर्गत आपने समकालीन कविता के महत्वपूर्ण शीर्षक भगवत रावत की कविता पर अपनी बात बहुत ही करीने और सलीके से कही है। भगवत रावत ने कहन की एक बहुआयामी शैली को कविता में कल्टीवेट किया है। मेरा अपना खयाल है कि इस पैटर्न को अपना कर समकालीन कविता के कवि काफी कुछ नया दे सकते हैं। उपसंहार के अतंर्गत सर्वमित्राजी ने एक वाजिब मुद्दा उठाया है। कुमार रवीन्द्र के नवगीत, विराट के मुक्तक मर्मस्पर्शी है। नरेन्द्र दीपक की गज़़लों के अधिसंख्य शेर गज़़ल के व्याकरण में नहींहैं। काफिए तक की गलती अखरती है। वरिष्ठ साहित्यकार नरेन्द्र दीपक से ऐसी गलती कैसे संभव हो सकती है, सोच कर तकलीफ होती है।