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Wednesday 22 Nov 2017

जुलाई का अक्षरपर्व डाक विभाग की अव्यवस्था से मुझ तक नहींपहुंचा, न पढ़ पाने की महरूमिय-मायूसी बन दिल-दिमाग पर छाई रही।

गफूर तायर

दमोह, मप्र

जुलाई का अक्षरपर्व डाक विभाग की अव्यवस्था से मुझ तक नहींपहुंचा, न पढ़ पाने की महरूमिय-मायूसी बन दिल-दिमाग पर छाई रही। पर अगस्त अंक समय से मिला। प्रस्तावना में आपने यह सौ टंच बात कही कि अपने समय की राजनैतिक हलचलों से रचनाकार स्वयं को काटकर नहींरख सकता। उसका प्रभाव तो किसी न किसी रूप में रचनाकार पर पड़ता है। ललित भैया मैं समझता हूं कि आज भी शहर, कस्बों और किंचित महानगरों की मुहल्ला गोष्ठियों में अपने समय को उसकी धारा को और दिक्कतों को रेखांकित करने की समझ अभी नहींआई है। इसके कई कारण हो सकते हैं, जो स्वयं में एक बड़ी बहस और चर्चा को आमंत्रित करने वाला मुद्दा है। इतना ही नहींयही वे कारण भी हैं, जो हमारी पाठकीय संख्या और हिंदी के पाठकों को प्रभावित करते हैं। श्याम कश्यप का भीष्म साहनी पर संस्मरण बहुत जीवंत और मनमौजीपन से लिखा गया एक ऐसा संस्मरण है जो वास्तव में यथार्थ के नजदीक ही नहीं,तत्कालीन समय की प्रलेस की गतिविधियों, रूझानों, संघर्षों और चाहतों का भी खुलासा करता है। खास बात यह है कि कश्यपजी ने परिवार में भीष्मजी की श्रीमतीजी व परिवार को भी स्पर्श कर संस्मरण को अधिक रोचक ही नहीं, उस वक्त के अहसासों को भी रेखांकित किया है। उन्हें मुबारकेें। डा.वेदप्रकाश अमिताभ का भीष्मजी की कहानी पर लेख उम्दा है। लगे हाथ एक बात और कि अब वे साहित्य के पीछे लट्ठ लेकर पड़ गए हैं। निराला अगर हिंदूवादी थे तो फिर ऐसी सोच वाले साहित्यिक समझ वालों से कहना होगा-क्या कहूं-कछु कहि नहींआवै।
कुशेश्वर की मां कविता अंक की प्रतिनिधि कविता है। प्रभाकर चौबे जी का व्यंग्य बहुत दिनों अक्षरपर्व में देखने मिला। व्यंग्य शैली का लास्य और चुटीलापन मन मोहता है। अनुपम मिश्र का संस्मरण लेख नेमिचंद के व्यक्तित्व, कृतित्व को अधिक रूप से जानने में मदद करता है। हरिशंकर परसाई एक कालजयी रचनाकार तो थे ही, उनकी रचनाओं की प्रासंगिकता हमेशा बनी रहेगी। भोलाराम का जीव पर पुन:पाठ और चर्चा अक्षरपर्व के महत्त्व और गरिमा को बढ़ाता है। सर्वमित्रा जी ने उपसंहार में बेटी को केेंद्र में रखकर समाज के बेटी के प्रति दृष्टिकोण को धार दी है। लेकिन विकलांगता को सेल्फी अभियान से जोडऩे की उनकी पहल को साधुवाद।
अक्षरपर्व अपने समय के प्रश्नों की टकराहट को साहित्य और लेखों के माध्यम से पहचानने, समझने और उन पर सार्थक पहल हेतु कटिबद्ध है। अपने समय की यह एक जरूरी पत्रिका है।