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Monday 17 Dec 2018

एक लंबे अर्से के बाद अक्षरपर्व पढऩे मिला। ये पहले भी ओजपूर्ण था और आज भी प्रभावशाली लगा। सितंबर अंक पढ़ा, रचनाएं सभी अच्छी लगीं।

माला वर्मा,

हाजीनगर, प.बंगाल 743135

एक लंबे अर्से के बाद अक्षरपर्व पढऩे मिला। ये पहले भी ओजपूर्ण था और आज भी प्रभावशाली लगा। सितंबर अंक पढ़ा, रचनाएं सभी अच्छी लगीं। खासकर कविताओं की बात करूं तो हेतु भारद्वाज की जिंदगी, पहेली आदि और हीरालाल जी की जलन और ताप कविताएं बहुत पसंद आईं। पूनम मिश्रा की कहानी कस्तूरी भी मन को भा गई। और हां उपसंहार में यौन शोषण के शिकार बच्चों पर आपने लिखा है। ये विडंबना नहींतो और क्या है। बच्चे हर मजहब में ईश्वर के दूत समझे गए हैं और इसी ईश्वर से पल-पल छल हो रहे हैं। क्या मनुष्यता कहने भर की रह गई है?