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Friday 24 Nov 2017

कहानी और इंसान


सर्वमित्रा सुरजन
कहानी वह छोटी आख्यानात्मक रचना है, जिसे एक बैठक में पढ़ा जा सके, जो पाठक पर एक समन्वित प्रभाव उत्पन्न करने के लिये लिखी गई हो, जिसमें उस प्रभाव को उत्पन्न करने में सहायक तत्वों के अतिरिक्त और कुछ न हो और जो अपने आप में पूर्ण हो। कहानी की यह परिभाषा अमेरिका के कवि-आलोचक-कथाकार एडगर एलिन पो ने दी है। वहीं हिंदी के कथा सम्राट प्रेमचन्द ने कहानी की परिभाषा इस प्रकार से की है: कहानी वह ध्रुपद की तान है, जिसमें गायक महफिल शुरू होते ही अपनी संपूर्ण प्रतिभा दिखा देता है, एक क्षण में चित्त को इतने माधुर्य से परिपूर्ण कर देता है, जितना रात भर गाना सुनने से भी नहीं हो सकता। कहानियों की इन परिभाषाओं का जिक्र इसलिए कि इस बार उत्सव अंक कहानी विशेषांक के रूप में आपके सामने प्रस्तुत है।
जीवन कितना नीरस होता, अगर उसमें कहानियां न होतीं। सभ्यता की शुरुआत से कहानियां इंसानों के साथ चलती रही हैं। मनुष्य जो देखता है, महसूस करता है, कल्पना करता है उसे कहानी में बुन लेता है। जिंदगी के जितने रंग, कहानियों के उतने ढंग। इंसानी प्रकृति और प्रवृत्ति का कोई पहलू कहानियों से अछूता नहींरहा। धर्म, पुराण, रहस्य, रोमांच, मित्रता, शत्रुता न जाने कितने तरह की कहानियां लिखी गई हैं और अनवरत लिखी जा रही हैं। इंसान सांस लेना नहींछोड़ सकता और कहानियां कहना भी नहींछोड़ सकता। हर रोज किसी न किसी तरह की किस्सागोई होती ही है। एक था राजा, एक थी रानी या उसके बाद वे सुखपूर्वक रहने लगे, इन छोटे-छोटे वाक्यों में कहानी की महागाथा समाई हुई है। जहां कोई यह बोलना शुरु करता है कि एक बार की बात है, उत्सुकता का चक्र प्रारंभ हो जाता है कि उसके बाद क्या हुआ होगा? जिज्ञासा, उत्सुकता, अनुभव, कल्पना इन सबका अनूठा सम्मिश्रण कहानी में होता है और इसका यही अनूठापन इंसान को बांधे रखता है। प्रेमचंद बनना कठिन है, लेकिन इस बात से कैसे इंकार किया जा सकता है कि हर इंसान अपने-अपने तरीके से कहानी कहता ही है। जैसे इस बार के आवरण चित्र में एक सशक्त कहानी के कितने ही तत्व छिपे हुए हैं।
अपने परिवार के साथ बेफिक्री के कुछ क्षण बिताती एक बंजारन। इस तस्वीर के बारे में छायाकार रशीदा भगत का कहना है कि कुछ समय पहले राजस्थान के अलवर जिले में रोटरी इंडिया वाटर कन्सर्वेशन ट्रस्ट की एक चेक डैम परियोजना को देखने जाने के दौरान रास्ते में यह बंजारा परिवार नजर आया। तस्वीर में नजर आ रही महिला जिस उन्मुक्तता, बेफिक्री से हंस रही है, औजार सुधारते अपने पति को छेड़ रही है, ऐसा खुशनुमा मिजाज मिलना अब दुर्लभ हो गया है। हम जानते हैं कि बंजारों का एक जगह कोई ठिकाना नहींहोता। रोजी-रोटी की तलाश में वे एकजगह से दूसरी जगह भटकते हैं और संपत्ति के नाम पर कुछ बर्तन, औजार और ऐसी ही मामूली चीजें उनके पास रहती हैं। इस महिला के सिर पर छत के नाम पर आसमान है और वह जानती है कि उसी के साए में सारी जिंदगी बसर करनी है। फिर भी वह मुस्कुराती है, खिलखिलाती है, नाचती है और अपने पति से चुहलबाजी भी करती है। हम सब जो छोटी-छोटी बाधाओं से व्यथित हो जाते हैं, परेशानियों का रोना रोते रहते हैं, उन्हें इस अनाम महिला की हंसी बहुत कुछ सिखा सकती है।
बहरहाल, इस कहानी विशेषांक को निकालते हुए हमारी कोशिश यही रही कि पाठक ध्रुपद की तान की तरह इसे महसूस करेंगे और इसके माधुर्य में खो जाएंगे। आपकी प्रतिक्रियाओं की प्रतीक्षा रहेगी, हमेशा की तरह।