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Thursday 23 Nov 2017

मास्टर जी कित्ती बजी है?...


यादवेन्द्र शर्मा 'चन्द्र'
गली में गहरा अंधकार था। अंधेरा और भी डरावना लगता यदि तारों का उजास उसकी गहनता को नहीं चीरता। मास्टर मनडिय़ा अपने पुश्तैनी मकान के दानखाने में लेटा हुआ था। सदा की तरह शिव मंदिर जाने वाले टीकमिये ने जय शिवशंकर करके पूछा कि माटर जी कित्ती बजी है?
मनडिय़ा मानो उसका इंतजार ही किया रहा था। तुरंत कहा ''महाराज! चार बजकर पन्द्रह मिनट।ÓÓ
''अच्छा माटर जी, जय शिवशंकर।ÓÓ टीकमिया आगे बढ़ गया। यह रोज का क्रम था। केवल टीकमिया ही नहीं, अनेक आते-जाते लोग मनडिय़ा को टाइम पूछते रहते थे। आज से नहीं। बरसों से। जब मनडिय़ा घर से बाहर निकलता तो इन वाक्यों की झड़ी लग जाती- ''माटर जी कित्ती बजी है, मास्टर जी कितने बजे हैं?ÓÓ मास्टर सबको बताता रहता था। बिना घड़ी के।
आप सबको यह साधारण बात न लगे पर यह एकदम सच्ची बात है कि मनडिय़ा पिछले तीस-चालीस सालों में बिना घड़ी के लोगों को टाइम बताता आ रहा है। सबको यह मालूम था कि मास्टर रेल्वे के पर्सनल विभाग में नौकरी करता था और वहीं से सेवानिवृत्त हुआ था, लेकिन मैं इस बिना घड़ी के वक्त बताने के रहस्य को जानना चाहता था पर मनडिय़ा बार-बार कन्नी का काट जाता था।
आखिर एक दिन मैं सफल हो गया। नत्थू सर की ढाल के नुक्कड़ पर 'हरोलई हनुमान मंदिरÓ पर मास्टर मेरी पकड़ में आ गया। एक बात बता दूं कि वह भाट जाति का था। सामान्य कद काठी। बिच्छू सी गोल-गोल आंखें, चेहरे पर मामूली चेचक के दाग। मैंने उससे कई सवाल किये और उसने उस दिन अत्यंत ही सहजता से उत्तर दिए। वस्तुत: जब उसका जन्म हुआ तब उसके बाप का देहांत हो गया। मां ने मांग मूंग कर कर उसका पालन-पोषण किया। आठवीं तक पढ़ाया-सिखाया जो उस समय अच्छी शिक्षा थी मगर उसने समझ आने के बाद पाया कि उसके घर में गरीबी और अभावों ने डेरा जमा रखा है। जाति-समाज में कोई मान-सम्मान नहीं। मां सुबह उठकर यजमानों के घरों से आटा मांग कर लाती। कुछ यजमान अनाज देते, कुछ बाजरी-मोंठ। वह दोपहर तक लौटती थी। फिर रोटी-बाटी बना कर मनडि़ए को जीमा कर किसी यजमान के घर चली जाती- घरेलू काम कराने के लिए। लौटती है तो श्रांत-क्लांत। श्रम के पसीने की बूंदें टपकाती। मनडिय़ा उसके चेहरे को निहारता। एक अव्यक्त पीड़ा का दंश उसे चुभने लगता। पांचवीं कक्षा के पास करते-करते उसने मां के हाथ से थैलियां छीन कर अपने हाथ में ले लीं। सुबह जल्दी नहा-धो कर नजदीक के मंदिर से तिलक करके वह यजमानों से आटा-अन्न मांगने चला जाता था।
वह पढऩे में तेज था। उसकी ग्रहण शक्ति बहुत ही अच्छी थी। हर बात को वह जल्दी ही समझ लेता था। गणित में तो वह सौ में से सौ नंबर लाता था। आठवीं पास करते-करते वह 'फकीरा' मारजा (मास्टर) की पौशाला (शाला) में मास्टर लग गया जिसके संचालक एक सेठ थे। तब लड़कियों को पढ़ाने का रिवाज नहीं था लगभग।
फकीरा मारजा कुंवारे थेे। वे बच्चों के साथ कई बार गलत हरकतें कर लेते थे। मनडिय़े को यह कतई पसंद नहीं था। उसने तीन माह बाद नौकरी छोड़ दी। गणित में होशियार और आठवीं पास। तब ऊंची शिक्षा कहां थी। मां ने पूछा तो बता दिया कि मारजा गंदे हैं। पापी हैं। ़़़़़़़़़़उसने गंगा शहर जो शहर से कोस दूर था, दूसरी स्कूल में नौकरी कर ली। रोज पांच किलोमीटर आना और जाना होता था। पर चंद माह में बदलने वाले मौसमों को झेलने की यहां के आदमी में आदत है। मनडिय़ा भी झेल गया। वेतन था अठारह रुपये। बहुत होते थे तब। यजमानी तो करता ही था। जीवन जरा खुशनुमा हो गया। मां-बेटे एक-दूसरे की भावनाओं को समझ कर जी रहे थे।
ज्हां मनडिय़े का घर था, वहां शहर की चारदीवारी समाप्त होती थी। प्राय: निम्न मध्यवर्ग के लोग रहते थे जो मजदूरी करते थे। इस क्षेत्र में जगह-जगह छोटे-छोटे झाड़-झंखाड़, बेर की झाडिय़ां, कैर के पल्लवहीन पेड़ खेजड़े के वृक्ष थेे। रात होते ही सन्नाटा अपने पांव पसारने लगता था। बिजली थी नहीं, इसलिए सन्नाटा बहुत गहरा हो जाता था। यदि कुत्ते नहीं भौंकते तो मालूम होता कि यह इलाका निर्जन है। कई बार जंगली सूअर गंदगी खाने हुं-हुं करके आ जाते थे। शेष श्मशानी शून्यता।
दिन में कभी-कभी सांप निकल आता था जिसे मारा नहीं जाता था। उस पर संघातिक प्रहार भी नहीं किया जाता था। उसे सांप पकडऩे वाले को बुलाकर जंगल में दूर छोड़ दिया जाता था।
मनडिय़े ने बताया था कि जब वह छोटा था तब उसके दूर के रिश्ते के मामा ने उसे खिलौना घड़ी लाकर दी थी। उसकी चाबी घुमाने पर सूइयां घूमती थी। वह दूसरों के सामने गर्व करता था। लगाए रहता था चौबीसों घंटे। दूसरे बच्चों को पांच-सात-दस-बीस अनुमान से टाइम बताया करता था।
एक दिन वह घड़ी चोरी हो गई। वह हाथ-पांव पटक-पटक कर खूब रोया था। वह दूसरी घड़ी के लिए जिद्द करने लगा। तब उसका मन रखने के लिए उसकी मां ने कहा कि जब तू कमाएगा तो एक असली घड़ी मोल ले आना। यह इच्छा उसके जेहन में जब-तब उभरती रहती थी। और घड़ी खरीदने की इच्छा उसके भीतर कुंडली मारे सांप की तरह बैठ गयी। जब वह अठारह रूपये माहवार कमाने लगा तो उसने घड़ी के लिए थोड़ा-थोड़ा रूपया बचाना शुरू कर दिया। जब तीस रूपये जमा हो गये तो वह घड़ी खरीद लाया। उसे उसका मार्का आज भी याद है- वेस्ट एंड वॉच। वह भी वाटर प्रूफ। वह घड़ी पहन कर अपने को अपने निचले तबके में कुछ बड़ा समझने लगा। तब घडिय़ां पैसे वाले ही लगाते थे।
घर से निकलते ही उसे पूछने वालों का तांता लग जाता था। '' माटर जी कित्ती बजी? मास्टर जी कितने बजे हैं? मनडिय़ा क्या टाइम हुआ है?ÓÓ वह घड़ी देखकर सबको समय बताते रहता था। वह अपने मित्रों को गर्व से कहता था कि उनमें घड़ी खरीदने वालों में वह पहला आदमी है। एक बार तो उसने अपनी मां को पानी में घड़ी डुबोकर भी बताई। तालाब में तो वह घड़ी पहनकर नहाता भी था और फिर गर्व से दोस्तों को घड़ी दिखा कर कहता- देखा, घड़ी चल रही है। जब वह घर से निकलता था तो घड़ी को लगभग कान से चिपकाए रहता था मानों घड़ी उसके जेहन का हिस्सा हो गई हो, मानो उसके अहम् से जुड़ गयी हो, । मगर उसकी मां घड़ी से परेशान सी थी। उसे लगने लगा कि घड़ी को लेकर वह एक अलग ही दुनिया रचा बैठा है। वह काफी केन्द्रित सा हो गया था- घड़ी पर। जब गली-मुहल्ले की लड़कियां उसे टाइम पूछने लगी तो उसकी मां को चोखा नहीं लगा। विशेषत: युवा होती 'बंतलीÓ के बारे मेंंजब भी उसकी मां सुनती तो नाराज हो जाती थी। अन्य स्त्रियां जब आकर कहतीं कि तेरा लाडेसर उस छोरी से हंस-हंस कर बोल रहा था, उसका हाथ पकड़ रहा था। छोरी उससे चिपक रही थी तो मां गंदे विचार के तालाब में डूब जाती थी।
बंतली भी उससे काफी खुल गयी थी। बातों ही बातों में उपालम्भ देती- ''यदि तेरी घड़ी इतनी ही चोखी है तो तू इससे ब्याह क्यों नहीं कर लेता।
''घड़ी से ब्याह होता है पगली? इस मोहल्ले में केवल मेरे पास घड़ी है।ÓÓ उसके शरीर में अकड़ाव आ जाता। पर उसकी मां को घड़ी की वजह से ज्यादा बाहर रहना पसंद नहीं था। और बंतली के लिए जैसे घड़ी का टाइम पूछना उसके सन्निकट आने का माध्यम हो गया था। उसे देखते ही लपक कर आती। पूछती-''माटर जी कित्ती बजी है? सही-सही बताइएगा।ÓÓ
वह उसे एक पल प्यार से देखता। उसके शरीर के अंगों को अपने भीतर उतारता। फिर मुस्करा कर कहता-''क्या सेठ डागा-दम्माणी के यहां जाना है?ÓÓ वह फस से हंस कर कहती-''नहीं माटर जी, पिल्ले को रोटी डालनी है।ÓÓ
वह भागती। मनडिय़ा उसे देखता-अपलक। अव्यक्त प्रेम की डोर से बंधा।
वह बंतली के बारे में सब कुछ जानता था। जब वह पांच बरस की थी तब उसका ब्याह शोयासर गांव में स्वजातीय परिवार में हो गया था। लड़के वालों ने बंतली के गरीब मां-बाप को रीत के पूरे तेरह सौ रूपये दिए थे क्योंकि लड़का लंगड़ा था और हकला कर बोलता था। बंतली को पति के बारे में कुछ भी पता नहीं था। वह अपनी ससुराल ब्याह करके गयी। तब उसका पति भी दस बरस का था... मुकलावा (गौना) होने के पहले ही वह विधवा हो गयी। उसने ससुराल की दहलीज को केवल एक बार ही लांघा। फिर उस दहलीज़ के दर्शन ही नहीं हुए। कई बरसों तक बंतली को इस पीड़ादायक सत्य से अनजान रखा गया। चमकदार-चमकदार बिंदिया लगाती थी। काजल भी डालती थी। चूडिय़ां भी पहनती थी।
जब वह पन्द्रह साल की हुई गणगौर के मेले में उसकी बीस वर्षीया भायली (सहेली) ने उसे गंभीर स्वर में कहा कि उसे केसरिया रंग के कपड़े नहीं पहनने चाहिए। वह तो शादी होते ही विधवा हो गयी थी। उसका पति मर चुका है। उसे विचित्र सा अनुभव हुआ और झटका भी लगा। उसे तो ब्याह को लेकर अपना विगत जरा भी याद नहीं। उदास हो गयी वह। अचानक उसके हंसते-खेलते जीवन में कांटेदार जंगल उग आए। धीरे-धीरे वह सामान्य हो गयी। समय हर रिसते-दुखते घाव को भर देता है।
एक दिन सुनसान जगह में उसने मनडि़ए का हाथ पकड़ कर पूछा- ''माटर जी! कित्ती बजी है? देखूं तो आपकी घड़ी चलती है या नहीं।ÓÓ वह घड़ी को घूरने लगी। सिरहन सी दौड़ गयी मनडिय़े के तन-मन में। उबाल सा हुआ भीतर। मनडि़ए ने झटका देकर हाथ छुड़ाया। उत्तेजित स्वर में कहा- ''हाथ क्यों पकड़ा है तूने?ÓÓ
बंतली अपरिभाषित दृष्टि फेंक कर मानिनी की भांति मचली और चली गयी। मनडिय़ा उसके स्पर्श से जो कुछ भी भीतर हुआ, उसे महसूसता रहा। बहुत ही अच्छा था वह स्पर्श।
कहावत है कि आदमी के पहले उसका यश-अपयश पहुंच जाता है। मनडिय़ा जैसे ही घर गया वैसे ही उसकी मां ने उस पर अंगारे बरसा दिए। लम्बे अर्थहीन प्रलाप के बाद वह मुद्दे पर आयी कि वह बंतली का हाथ पकड़ कर क्या कर रहा था। इतने आगे कैसे बढ़ गए? लोक-लज्जा, कुल-कुटम्ब और मरजादा का कुछ ध्यान ही नहीं।
उसने इस बात से साफ  इंकार करते हुए कहा कि वह जो सोच रही है, वैसी बात नहीं है। उसने हाथ पकड़ कर सिर्फ यह देखा कि घड़ी चल रही है या नहीं। मां तपते तवे की तरह छिनक कर बोली- ''अरे मेरे लाडेसर, तूने जितना आटा खाया है मैंने उतना नमक खाया है। वह विधवा छोकरी... सोच, मोहल्ले वाले तुम दोनों को लेकर खुसर-पुसर करने लगे हैं। इस घड़ी रांड को आग लगा दे।... कहीं यह दूसरी बात करके न दिखाए?ÓÓ लोगों की जबान पर ताला नहीं लगाया जा सकता।
''मां! तू बात का बतंगड़ क्यों बनाती है। हाथ पकडऩे से किसी का धर्म तो खराब नहीं हो जाता।ÓÓ
मां गरज पड़ी, ''पहले हाथ... फिर बाथ...फिर...? अरे तू मर्द-लुगाई के खेलों को नहीं समझता।
मनडिय़ा खामोश हो गया। बाहर चला गया। पीपल के चबूतरे पर बैठकर बंतली के छुअन के अहसास का सुख भोगने लगा। उसे स्त्री-पुरुष के एक ही रिश्ते का परिचय था। पति-पत्नी का रिश्ता। प्रेम, लगाव और जुड़ाव का उसे पता तो था पर वह उन्हें शब्दों में परिभाषित करने में असमर्थ था। मगर इस स्पर्श में कुछ विचित्र ही पुलक थी। इच्छा होती थी  कि वह सोनलिया रंगरूप की छोकरी के पास फिर चला जाए पर मां का खौफ? लोक भय। साहस नहीं जुटा पाया।
बंतली जब-जब मनडि़ए को देखती थी तब-तब वह उसके पास आकर मटक कर पूछती थी कि माटर जी! कित्ती बजी है। फिर जब वह देखती थी तो उसके दिल की धड़कन तेज हो जाती थी। वह सोचता था कि बंतली की आंखों में कुछ और है। एक अलग आकर्षक दीप्ति। लेकिन उसके संस्कार तुरंत झटका मारते थे कि मां ने उसे सचेत किया है कि मोहल्ले की बहू-बेटी को बहू-बेटी ही समझे।.... वह असमंजस स्थिति में पड़ जाता था।
बंतली पूछती- '' माटर जी? सूने क्यों हो गए?ÓÓ
''बंतली!ÓÓ वह उत्तर नहीं दे पाता। सांप की तरह धीमे से खिसक जाता।
न चाहते हुए भी बंतली की तस्वीर उसके हृदय-पटल पर उतरती गयी। कई सपनों, भावनाओं, आवेगों व उत्तेजनाओं से भरपूर बातें सोचता था। चेहरे पर प्यार की लुनाई चमक जाती थी।
इस ऊहापोह में दो मौसमों ने विदा ले ली। न जाने अपने भीतरी संवेदनाओं को और कोमल करने के लिए वह भांग पीने लगा। शाम के समय वह नियम से भांग पीता था और लहराता हुआ घर आता था। रूटीन बन गया था-नौकरी- समय बताना और भांग पीना।
इस बार सावन में खूब मेह बरसा। ताल-तलैया ऊपर तक भर गए। धरती हरित-वसन पहनने लगी। मोर टहुकने लगे और सांप अपनी बांबियों से निकल कर ठंडी जमीन का आस्वाद लेने लगे। कहीं- कहीं लाल मखमल जैसे छोटे जीव 'मेमोलियेÓ दिखायी देने लगे।
मनडिय़ा तैरना जानता था। 'भरोलईÓ तलाई में वह नहा रहा था कि उसे बंतली दिखायी दी। बंतली ने उसे संकेत किया। वह तैर कर उसके पास गया।
बंतली ने उससे टाइम पूछा। फिर उसके सन्निकट आकर कहा- ''माटर जी! मुझे भी तैरना सिखा दीजिए न?ÓÓ
''सिखा दूंगा। तू उधर गऊ-घाट की ओर आ जा। वह ढालू-घाट न? जहां गायें पानी पीती हैं?
''ठीक है।ÓÓ मनडिय़ा डुबकी मार कर चला गया। बंतली तालाब से जैसे ही बाहर निकली वैसे ही उसका बाप आ गया। वह उसके साथ कपड़े पहन कर चली गयी।
मनडिय़ा भांग के नशे में लहराता और अछूत कन्या फिल्म का गीत ''मंै वन की चिडिय़ा बनके वन-वन डोलूं रे....ÓÓ गाता हुआ जैसे ही घर में घुसा, वैसे ही मां ने जहरीले स्वर में पूछा- ''कहां से सवारी आ रही है?ÓÓ वह बंतली के ख्यालों में खोया हुआ था। झट से बोला- ''आठ बजकर सत्रह मिनट। घड़ी उसने कान से चिपका ली थी। मां ने हवा में हाथ उछाल कर कहा- ''अरे निखट्टू। मैंने टैम नहीं, कहां से आ रहे हो, यह पूछा है।
मनडिय़ा ने झूठ बोला कि वह रंगोलई तालाब में नहा कर महादेव जी के दर्शन करके आ रहा है।
मां गरज पड़ी, ''सारे मोहल्ले में चख-चख हो रही हैं। तू कभी न कभी मेरी नाक कटाएगा। अब मैं तेरी कहीं न कहीं शादी करूंगी। यह तेरी घड़ी कभी न कभी बुरी घड़ी लाएगी। हर रोज नयी बात सुनती हूं। यदि मुझे कभी रीस (क्रोध) आ गयी तो मैं तेरी इस घड़ी को ऊखली में डाल कर मूसल से कूट डालूंगी। क्यों तू जमी-जमायी इज्जत पर मिट्टी डालना चाहता है।.... यह घड़ी तो तेरा बहाना है पर तू...।
मनडिय़ा काफी नशे में था। मां की ऊटपटांग बातें सुनते-सुनते वह काफी उत्तेजित हो रहा था। क्रोध बारूद की तरह फट पड़ा। उसने चीख कर कहा, ले मां यह घड़ी....। उसने घड़ी आंगन में पटक दी। फिर उसने अश्व के पांव के नीचे लगे खड़ताल, जो उसक देशी जूती के एड़ी के नीचे लगे थे। अपने दाएं पांव को घड़ी पर पटक-पटक कर उसका कचूमर निकाल दिया। विषाक्त स्वर में बोला- ''ले मां, तू अपना जी सोरा कर, सुख की नींद लो।
मां हतप्रभ हो गयी। स्तब्ध और विमूढ़। उसने कहा- ''ओ नासपिटे! तूने घड़ी तोड़ी क्यों?ÓÓ
मनडिय़ा छत पर जाकर सो गया। मां कब तक बड़बड़ाती रही, उसे नहीं मालूम।
सुबह पूछने वालों की कई आवाजें आयी पर वह चुप रहा। जब घड़ी ही नहीं, फिर क्या जवाब दे। वह सिर झुका कर घर से निकलता था और वापस आ जाता था। चाहकर भी बंतली के घर की ओर नहीं जाता था। एकदम मुर्दा-मर्दा मन हो गया था उसका।
एक माह बीते-बीतते उसे रेल्वे के दफ्तर की पर्सनल ब्रांच में नौकरी लग गयी। मैथमेटिक में अव्व्ल था वह। हिसाब-किताब में बेजोड़। पर मां और उसके बीच नामालूम दूरियां पैदा हो गयीं। अजनबीपन। जब वह पहली तन्ख्वाह लेकर आया तो उसे अपने घर के आगे जरा हलचल दिखायी थी। वह तेज कदम उठाता हुआ पहुंचा। उसकी मां को हैजा हो गया था। किसी यजमान के घर वह श्राद्ध का भोजन जीम कर आयी थी भयंकर कै और दस्त। उपचार की व्यवस्था होने के पूर्व ही उसकी मां चल बसी।
वह टूट गया। मां का चोखी तरह क्रियाकर्म और मृत्युभोज किया। यजमान ने उसमें अधिकांश पैसा लगाया क्योंकि वह भी एक अपराधबोध से ग्रस्त था कि उसके घर भोजन करने के बाद ही मनडि़ए की मां मरी थी।
20वें दिन उसके घर में मां के देहांत का सन्नाटा पसर गया। उसे लगा कि सब  कुछ शांत-स्थिर है। रिश्तेदार चले गए। शून्यता उसे कचोटने लगी। भांग की मात्रा बढ़ गयी।
जब दफ्तर जाने लगा तो वे ही आवाजें-माटर जी कित्ती बजी है? मास्टर जी कितने बजे हैं?... अब उसे अपनी घड़ी की टूटी किरचें चुभने लगी। घड़ी का ना होना केवल उसे खलता ही नहीं बल्कि किंचित अपमान का अनुभव कराने लगा। पर उसको वहम हो गया था कि यदि वह घड़ी ले आएगा तो उसकी मां की आत्मा को जरूर दुख होगा। उसे कई बार संदेह होता था कि उसकी मां को घड़ी के कारण भी सदमा लगा। अब वह घड़ी नहीं खरीदेगा। लेकिन वह जैसे ही घर से बाहर निकलता वैसे ही समय पूछने वालों का सिलसिला खत्म ही नहीं होता था। बंतली की तरफ  वह जाता ही नहीं था। वह सोचता था कि टाइम पूछने वालों को कैसे उत्तर दे। परेशान, उद्विग्न और चिंतित। जब भांग पीकर आता तो हनुमान जी के मंदिर में प्रार्थना करता कि उसकी लाज रख। बंतली से कैसेबात करूं। घड़ी ही तो बहाना थी।
बहुत हिसाबी आदमी था। एकदम केलकुलेटर। वह एक दीवार घड़ी ले आया। अपने मस्तिष्क में समय का हिसाब बिठाने लगा। समय के अंतराल और क्षणों का हिसाब। उसकी वह इंद्रियां विकसित होने लगीं। वह बिना घड़ी समय बताने लगा। चंद ही दिनों में उसका हिसाब-किताब ठीक बैठ गया। देवयोग ही वह कहता था उसे। निरंतर अभ्यास। उसके मस्तिष्क में समय बताने वाला कम्प्यूटर बैठ गया। बहुत कम क्षणों का अंतर। फिर क्या था? वह बंतली के घर की ओर चला गया। बंतली बिना डर के उसके पास चली आयी। पूछ बैठी, माटर जी कित्ती बजी है?... अरे आपके पास तो घड़ी ही नहीं है।
मनडिय़े ने आत्मविश्वास भरे स्वर में कहा- ''मेरे पास ऐसी घड़ी है बंतली जो कभी भरी खराब नहीं होगी। अभी छ: बजकर दस मिनट हुए हैं। जाकर पूछ ले।ÓÓ
''आपकी मां...।ÓÓ उसने सहसा प्रसंग बदला।
''जोग की बात है? घर सूना हो गया है।ÓÓ
''आप ब्याह कर लीजिए।ÓÓ
''ब्याह कराने वाली तो भगवान के पास चली गयी है। अच्छा चलूं। तू समय पूछती रहना। मेरे पास आत्म-घड़ी है। हनुमान बाबा की कृपा है। सही समय ही बताऊंगा।ÓÓ
बंतली उसकी रहस्यपूर्ण बात समझी नहीं।
...
उस मिलन के तीसरे दिन एक शर्मनाक घृणित हादसा हो गया। बंतली करीब शाम ढले जंगल फारिग होने गयी सो वापस नहीं लौटी। काफी देर के बाद उसकी खोज शुरू हुई। मनडि़ए के पास आकर बंतली के घरवालों ने आकर पूछा तो वह भी हैरान। ढूंढने लग गया।... बंतली प्रेतात्मा की तरह गायब हो गयी।... वह चिंता और आशंकाओं से घिर गया। वह सोचता था कि कहां ढूढ़े उसे? हंस-हंस कर तो उससे ही बोलती थी। फिर वह गयी कहां? उसे न दिन को चैन न रात को नींद।
दौड़-भाग में दो दिन बीत गए। दूसरे दिन बंतली अपने आप रात को लौट आयी। उसके गालों पर दांतों के निशान देखकर घर वाले समझ गए कि रांड किसी से अपना काला मुंह कराके आयी है। जब पूछा तो उसने बताया कि ''उस दिन वह लोटा लेकर 'जंगलÓ गयी तो तीन आदमी एक गाड़ी (जीप) पर आए और उसे जबरदस्ती गाड़ी में डाल कर ले गए। मंै चीखी तो उन्होंने मेरा मुंह बंद ही कर दिया। वे मुझे न जाने कहां ले गए। एक घर था। वहां एक आदमी ने मेरे साथ अधरम का काम किया।ÓÓ
उसका बाप उसे पीटता हुआ धीमे से चीखा ''रांड तू अपना काला मुंह करके यहां आई ही क्यों? कहीं कुआं-खांड कर लेती। तालाब में डूब मरती।ÓÓ
मनडि़ए को जब मालूम पड़ा तो वह भी भाग कर गया। उसने कहा कि पुलिस को खबर करनी चाहिए। बंतली का बाप भड़क उठा- '' तूने ने ही तो इस रांड को बिगाड़ा है। ऐसे ही यह इज्जत मिट्टी में मिला कर आ गयी और अब तू पुलिस को हमारे घर के आगे और खड़ी कर ताकि रही-सही इज्जत मिट्टी में मिल जाए। लोग हम पर थू-थू करें।ÓÓ
अनपढ़ लोगों में तब पुलिस का अजीब तरह का खौफ  था। पुलिस जिसके घर आ गयी, उसकी इज्जत धूल में मिल गयी।
बंतली की मां मनडिय़े पर झपटतीे सी बोली ''मादरकाढ़। तेरे कारण ही तो यह उच्छाछली (उच्छृंखल) हुई- माटर जी कित्ती बजी है...। इसने तो हमारे जन्म की ही बारह बजा दी। मैंने इस करमजली को पैदा ही क्यों किया? तू चला जा...।
मनडिय़ा समझ गया कि यहां बेसी ठहरना ठीक नहीं है। वह अनेक प्रश्नों से घिरा हुआ लौट आया। बंतली एक कोने में अपराधी की तरह सिर झुकाए खड़ी थी। रो रही थी। मनडिय़ा दुखी और असहाय। घर आकर वह बंतली के बारे में ही सोचता रहा।
बंतली फारिग होने के लिए जरूर घर से बाहर निकलती थी। शेष घर में पड़ी रहती थी या घर का काम करती थी। वह अपनी ओर से बोलती भी नहीं थी। घर में ताडऩा, यातना और उपेक्षा। उसे लगने लगा कि वह पापिन हो गयी है। उसके शरीर में पाप घुस गया है। हां, जब वह कपड़े से हुई तो उसके घर वालों की सांस में सांस आयी कि पांव तो भारी नहीं हुए वर्ना तो घोर संकट में फंस जाते? लेकिन बंतली गालियां, उपेक्षा और कई बार की मारपीट से ऊब गयी। अपने आप से तंग आ गयी। कुंआ-खाड़ करने की मनसा दृढ़ होती गयी।
मनडिय़ा को उसका दोस्त धनिया बंतली और उसके घरवालों के बुरे व्यवहार के बारे में जो बातें बताता था उन्होंने उसे झकझोर दिया था। कई बार बंतली के मां-बाप खामखा उसे भी उस कांड में भागीदार बना देते थे। जबकि उसने कभी भी बंतली के साथ अनुचित हरकत नहीं की। वह सिर्फ उसे समय बताता था।
उस दिन मनडिय़ा 'रंगोलईÓ तलाई से भांग पीकर सांझ के समय आ रहा था कि उसने बंतली को हाथ में लोटा लिए देखा। उसे शंका ने घेरा कि वह इतनी दूर क्यों आयी है। उसने उसका छुपकर पीछा किया। वह तालाब की ओर जा रही थी जो लबालब भरा था। बंतली तालाब की पाल पर खड़ी हो गयी। वह भरे तालाब को दार्शनिक की दृष्टि से देखने लगी। शायद मृत्यु की दुष्कल्पना ने उसे अनजाने में ही थरथरा दिया हो। सहसा उसमें आवेग की जगह श्लथपन उपज गया। चेहरा आंसुओं से भर गया। शरीर का ढीलापन उसके कच्चे होते हुए इरादे को बता रहा था। कदाचित मरूं या न मरूं के द्वंद्व ने उसे असमंजस में डाल दिया हो। वह पानी की ओर धीरे-धीरे बढ़ी। देखा-कोई मानुस नहीं था। वह कूदे, इसके पहले ही मनडि़ए ने उसे पकड़ लिया। वह चीखी नहीं। चिल्लाई नहीं। अशांत और उत्तेजित भी नहीं हुई। वह शांत स्वर में बोलीं- ''माटर जी। मुझे मर जाने दो। सभी यही चाहते हैं। घर तो गर-घर हो गया है। दूसरा कोई ठौर ठिकाना नहीं।ÓÓ उसने प्रार्थना भरी दृष्टि से देखकर पुन: कहा- ''माटर जी! इसमें मेरा क्या कसूर है। वे मुझे जबरदस्ती ले गए।ÓÓ
मनडि़ए ने दयाद्र्र दृष्टि से देखा। उसमें संवेदनशीलता के अजस्त्र स्रोत फूट पड़े। रेशा-रेशा पिघलने लगा। उसे लगा कि बंतली पहले की तरह मासूम है। उसके चेहरे पर सतियों वाली पवित्रता है। बच्चे वाली निर्दोषता। ओह! वह भी तो उसे लेकर निरंतर मधुर सपने देखता था। जहां तक उसे याद है कि उसने सपने में उसे कई बार अपवित्र किया था। ख्यालों में घर वाली बनाया था। सुहागरात मनायी। एक बार तो बच्चा भी पैदा किया। आदमी का मन कितना पापी होता है। बेलगाम।
उसने उसके कंधों पर हाथ रखकर कहा- बंतली। मुझसे ब्याह करोगी।
बंतली की आंखें विस्फारित हो गयीं। अपने को समेटते हुए वह कठिनता से बोली- ''नहीं, लोग क्या कहेंगे? फिर मैं पापिन हूं। कीचड़ हूं।... नहीं माटर जी नहीं, आपकी इज्जत मिट्टी में मिल जाएगी और आपको जाति से बाहर कर दिया जाएगा।... और मेरे मर जाने से सबको सुख-शांति मिलेगी।ÓÓ
उसने गहरे अपनेपन से कहा- ''बंतली! मुझे तो अशांति ही मिलेगी। कोई पाप नहीं दिखायी देता। मनु जी ऋषि ने लिखा है कि जिस स्त्री के सथ जबरजन्ना (बलात्कार) किया गया हो वह मासिक धर्म के बाद शुद्ध हो जाती है।... मतलब है कि वह पापिन नहीं रहती।... बंतली! मैं अकेला हूं। कमाता खाता हूं। हाथ से रोटी बनाता हूं, झाड़ू-बुहारी करता हू। तू मेरा कष्ट नहीं जानती। मुझसे ब्याह कर ले।ÓÓ
बंतली मनडि़ए के सीने में धंस गयी। मनडि़ए ने बंतली को बताया कि वह शहर से दूर रेल्वे क्वार्टर किराये पर ले लेगा। वहां सब व्यवस्थाएं करके हनुमान मंदिर में ब्याह कर लेगा। फिर हम इन शहर के लोगों से दूर चले जाएंगे।
मनडि़ए ने अपने रेल्वे कर्मचारियों से सलाह-मशविरा और नैतिक समर्थन लेकर बंतली से ब्याह कर लिया और अपने लोगों से दूर परदेशियों में आ बसा। बंतली के घरवालों को जब इसका पता चला तो वे चुप रहे। जैसे उनके घर से यह बला चली गयी तो परेशानियां गयीं।
वह बंतली को बहद प्यार करता था। ब्याह के तीसरे साल बंतली के पांव भारी हुए। मनडिय़ा बहुत खुश हुआ । बंतली भी मां बनने की खुशी में गद्गद थी।
हां, मनडिय़ा बिना घड़ी के टाइम बताता है- यह बात इधर भी दफ्तर को लांघ कर आ गई थी। बड़े, बच्चे और मित्र सब पूछते रहते थे मास्टर जी कितने बजे हैं?..... क्या टाइम हुआ है... मास्साब! कित्ता बजा है।.... वह उत्तर देता। लोगों को अजीब सी खुशी होती।
मनडि़ए का जीवन सहज सरल और खुशियों भरा था। वह एक बेटे का बाप भी हो गया। उसने अपने साथी कर्मचारियों को नामकरण पर भोजन कराया।
बच्चे को जन्म देने के बाद बंतली और सुंदर लगने लगी। ममत्व की दीप्ति से उसका चेहरा चमकने लगा। मांसल भी हो गयी।
जब मनडि़ए का बेटा 'प्रेमÓ तीन महीने का हुआ तो रविवार के दिन मनडिय़ा अखबार पढ़ रहा था। बंतली अपने लाडले को झूले में सुलाकर मनडि़ए के पास आयी। अचानक उसकी नजर अखबार के पन्ने पर पड़ गयी। उसमें छपे एक फोटो को वह घूर कर देखने लगी। उसकी आकृति पर रंग-बिरंगी परछाइयां आने-जाने लगीं। कभी पत्थर की तरह सख्त और कभी कुत्ते की कै कि तरह घृणित। देखते-देखते वह कुछ पलों के लिए विमूढ़ हो गयी। फिर जैसे वह जबरदस्ती बोली- 'माटर जीÓ माटर जी... यही है वह आदमी जिसने मेरे साथ जबरजन्ना (बलात्कार) की थी।
मनडि़ए ने उसे गौर से देखा। देखकर जरा हंसते हुए कहा- ''अरे पगली! यह तो मिनिस्टर है। बहुत बड़ा आदमी।ÓÓ
उसने अपने चेहरे पर कठोरता की परत लाकर कहा- ''यही है वह नीच, राक्षस... कुत्ता, माटर जी मैं झूठ नहीं बोलती।ÓÓ
मनडि़ए ने उसके सिर पर हाथ रखा और बालों को सहला कर संयत स्वर में कहा- ''मेरी जीवन जेवड़ी (डोर) एक शक्ल के कई लोग होते हैं। यह तो मंत्री है आज का राजा।ÓÓ
वह बहुत उत्तेजित हो गयी। उसके जबड़े खिंच गए। बोली- ''यही है वह बदमाश।... अब आप इसे मत छोडिय़े... यह पापी है... कुत्ता है... यह....।ÓÓ
उसका गला रूंध गया। मानो वह कहना चाहती है कि यह वह दरिंदा वहशी है। कसाई।ÓÓ
''माटर जी! इसे आप मार डालिए, अंधा, बहरा, गूंगा कर दीजिए?ÓÓ वह आवेश में कांपने लगी।
मनडि़ए ने बंतली को शांत करते हुए कहा- ''तुझे वहम हुआ है बंतली, कोरा वहम। बुरे आदमी की शक्ल भी अच्छे आदमी से मिल सकती है।ÓÓ
हालांकि मनडिय़े को मालूम था कि इस मंत्री का प्रारंभिक और राजनीति में प्रवेश करके मंत्री बनने तक का जीवन कई अपराधों से भरा था। शायद यही हो वह कमीना! रक्तपाती।.... लेकिन वह शक्तिशाली लौह आवरणों से ढंका हुआ इंसान है। कौन सेंध सकता है उसके आवरणों का। उसके जैसा मामूली क्लर्क नहीं-नहीं। उसका विरोध रेत में लाठी मारने जैसा होगा। और बंतली के जो अपयश गहन गुफाओं में चले गए हैं, उन्हें सूर्य के उजाले में लाकर वह मिटा तो नहीं सकता। फिर तनावों का जन्म होगा। जो जीवन में और परिवार में जम गए हैं, वे फिर उखड़ जाएंगे। जो मधुर स्थितियों को हमने जन्माया है, वे फिर मर जाएंगी। मनडिय़ा अपने को उस मंत्री के मुकाबिले बहुत दुर्बल पाता था। नहीं चाहता सब कुछ उखाडऩा और जीवन को बेतरतीब करना।
उसने बंतली को अपनी ओर खींचकर चूमा और कहा- ''बंतली! यह वह नहीं है। यदि यह वह है भी तो यह हमें चींटी की तरह मसल देगा।.... तू शांत रह। विश्वास कर यह वह नहीं है। फिर ईश्वर हर पापी को कभी न कभी दंड देता है। हनुमान बाबा इसे भी देगा।ÓÓ
जब मनडिय़ा यह कह रहा था तब उसका मन उसका साथ नहीं दे रहा था। शब्द जैसे हिल रहे थे। फिर भी वह अपनी औकात समझता था और यह भी जानता था कि कोई प्रमाण नहीं है उसके पास सिवाय बंतली के आक्रोश, गुस्से और संवादों के।
बंतली ने अखबार का वह पृष्ठ बिछाया। घृणा से बोली, ''इस पापी का इस घर में रहना भी ठीक नहीं है।ÓÓ फिर उसने अपने बालों में से लोहे का क्लिप निकाला। चेहरा घृणा से भर गया। आंखों में खून उतर गया। उसने उस क्लिप से उस मंत्री के फोटो की पहले आंखें फोड़ीं, फिर नाक काटा, शरीर की चिंदी-चिंदी की और उस पन्ने को चूल्हे में झोंक आयी।
तभी बाहर से नौकरानी गवरा की आवाज आयी- ''माटर जी! कित्ती बजी है?ÓÓ
मनडि़ए ने कहा- ''नौ बज कर तेरह मिनट।ÓÓ