Monthly Magzine
Thursday 23 Nov 2017

साइकिल

उदय प्रकाश
9-2 जज कॉलोनी
रो-वैशाली सेक्टर-9
गाजियाबाद (उ.प्र.)
मो.-09810716409
उसका नाम बी.जी. राजोरिया है। पूरा नाम बाल गोपाल राजोरिया। हमारे गांव में उसे बचपन में सब \'बालूÓ कहते थे। हम जब छोटे थे तो चिढ़ाने के लिए उसे बालू नहीं \'भालूÓ कहते। हालांकि चिढ़ता वह कभी भी नहीं था। हम उसे कहते- \'भालूÓ तो वह पूरी सहजता से जवाब देता- \'हांÓ, और बड़ी पारदर्शी आंखों से हमारी ओर देखने लगता हम निरुत्तर हो जाते।
हम चिढ़ाते- \'\'आलू भांटा की तरकारी, नाचे भालू की महतारी, चना जोर गरम।ÓÓ
वह खुद की ताली बजा-बजा कर हमारे साथ गाने लगता- \'\'नाचे भालू की महतारीÓÓ और हंसता। हम हार जाते। वह ऐसा ही हुआ करता था।
गांव में सबसे खतरनाक था जनार्दन सिंह। पहले पटवारी था। लेकिन \'पटवारीÓ के आ$िखर में \'ईÓ की मात्रा होने के कारण वह इस पदवी को नापसंद करता था। उसको इसमें \'मेहरपनÓ या \'मेहरारूपनÓ की निशानी दिखाई देती थी। वह खुद को मर्द मानता था। इसीलिए सब उसे \'पटवारा साहबÓ कहते थे। बड़ी-बड़ी मुच्छें। $फगुआ में धोती खोलकर नाचता और कबिरा गाता था। ठर्रा पी कर रात में दूसरों के घरों में घुसता और फिर वहीं खा-पीकर सो जाता। जब से सस्पेंड हुआ था, तब से और पीने लगा था। अकसर कलारी से रात में बोतल चढ़ाकर और बकरे का आंती-पोटा खाकर, गाना गाता हुआ जब वह रात में अपनी साइकिल से गांव लौट रहा होता, तो रास्ते में ही कहीं लुढ़क जाता। ऐसे में वह जमीन पर पड़ा-पड़ा अपनी साइकिल को गाली देता, उसे लात-जूतों से मारता फिर किसी दूसरे की साइकिल के कैरियर पर बैठकर जोर-जोर से गालियां बकता हुआ लौटा करता था। जो भी कोई जनार्दन सिंह को रास्ते से उठाकर लाता, उसे उस रात जनार्दन से अपना पिंड छुड़ाने में दांतों पसीना आ जाता। वह बाद में पछताता कि अच्छा-खासा यह गड्डेे में पड़ा था क्यों इस जिन्न को अपनी साइकिल पर बिठा लाया। लेकिन एक गांव का होने से संबंधों में चलन ऐसे ही निभाया जाता था। जनार्दन कभी उसके गले लगकर उसे अपना \'भाईÓ कहता हुआ हंसता या रोता, कभी उसकी कमीज पकड़कर उसे पीटने लग जाता।
कभी-कभी लोग अपनी साइकिल के कैरियर से उसे गिराकर तेजी से पैडल मारते हुए भागने की कोशिश करते। लेकिन ऐसे में जनार्दन सिंह जिन्न-जिन्नातों की तरह उडऩे लगा था। कितनी भी तेज साइकिल भगाओ, अंधेरे में ठीक साइकिल के पीाछे से जनार्दन की आवाज आती- \'\'अरे रुक रे हरामी। रुक। रुक।ÓÓ
बी.जी. राजोरिया यानी हमारे भालू ने साइकिल चलाना उसी जनार्दन सिंह की साइकिल से सीखा था। अकसर रात में कलारी से लौटते हुए रास्ते के किसी नाले या गड्डे में जनार्दन अपनी साइकिल छोड़ आता। दूसरे-तीसरे दिन, आसपास का कोई आदमी साइकिल लेकर उस तक पहुंचाता। अगर साइकिल पहुंचाने वाला साइकिल चलाना जानता, तो वह साइकिल चलाते हुए उसे पहुंचाता और अगर वह \'अनाड़ीÓ होता तो साइकिल पैदल घसीटता हुआ पहुंचाता। हमारे गांव में जिसे साइकिल नहीं आती थी, उसे \'अनाड़ीÓ कहते थे।
कोई नहीं चाहता था कि भालू \'अनाड़ीÓ  रहे। भालू खुद भी इससे शर्मिंदा रहा आता।
इसीलिए भालू रात में तब तक सोता नहीं था, जब तक कलारी से लौटते जनार्दन सिंह की आवाज गांव में सुनाई न देने लगे। गांव से एक किलोमीटर दूर सीवान से ही जनार्दन की आवाज सुनाई देने लगती थी। गांव में आठ कुत्ते थे। सब जनार्दन को अच्छी तरह से पहचानते थे। उसकी आवाज सुनते ही वे सब भौंकने लगते थे। उनमें से एक तो गांव के बाहर निकलकर जनार्दन को लेने सिवान तक जाता था। यह कुत्ता चितकबरा था। काले शरीर पर सफेद चित्तियां। उसे सब लोग \'कानूनगोÓ कहते थे। हमारे गांव के कुत्तों के नाम ऐसे ही होते थे। उदाहरण के लिए एक खूब मोटे कुत्ते का नाम \'मिनिस्टरÓ और एक बेहद आलसी, हमेशा सोते रहने वाले कुत्ते का नाम \'थानेदारÓ था।
रात में ठर्रे के नशे में जनार्दन खाता कम था, बोलता ज्य़ादा था। नशे में वह चितकबरे कुत्ते यानी कानूनगो के गले लग जाता। उससे लिपटकर रोता। फिर अपनी रोटियां उसे खिलाने लगता। कहते हैं जनार्दन की बीवी शादी के चार साल बाद चेचक में मर गई थी। एक बेटा था, वह भी जिंदा नहीं रहा। तभी से जनार्दन दूसरों के घरों में घुसने लगा था। शायद गांव में अकेला \'कानूनगोÓ ही था, जो उसका दर्द समझता था।
जैसे ही सीवान पर जनार्दन की आवाज  सुनाई देती, कुत्ते भौंकना शुरू करते और कानूनगो उसको साथ लिवाने के लिए सीवान की तरफ निकलता तो ठीक उसके पीछे-पीछे भालू भी चल देता। हमारे गांव से कस्बे की दूसरी सिर्फ चार किलोमीटर थी। बीच में एक नाला, कुछ खेत, जंगल और एक पहाड़ी के बीच से होकर रास्ता निकलता था। भालू जाता और रात में ही जनार्दन की साइकिल कहीं से खोज कर उठा लाता। दो-तीन दिन वह इत्मीनान से उस साइकिल को चलाना सीखता, फिर किसी दिन सीवान में उसे किसी खेत की मेड़ पर गिरा कर लौट आता। गांव का हर आदमी उसे साइकिल के साथ देखता लेकिन यह बात कोई जनार्दन तक नहीं पहुंचाता था। शायद हर कोई यह चाहता था कि किसी भी तरह भालू साइकिल चलाना सीख जाए। वह \'अनाड़ीÓ न रहे।
भालू को साइकिल का पागलपन था। वह रात में भी जब सब सो जाते साइकिल चलाता। साइकिल की चिकनी काली सीट पर बैठते ही उसे लगता कि वह एक दूसरी दुनिया की पीठ पर सवार हो गया है। एक ऐसी दुनिया जो उसकी पिछली दुनिया से एकदम अलग है। साइकिल के पैडल पर पैर का दबाव बढ़ाते ही वह पिछली दुनिया की धरती से मुक्त होने लगता। यह उड़ान थी। साइकिल के होने से भालू को पंख लग गए थे। जब वह साइकिल पर होता। तब भी उसके चारों ओर का दृश्य वही रहता जो पिछली दुनिया का दृश्य था। वही खेत, रास्ते, सेमलिया, जगतू और रामाधार के वही घर, कोसम, छिउले और सरई के वही पेड़- लेकिन वे सब अब किसी अलग ही दुनिया के लगते। भालू जनार्दन की साइकिल की सीट पर बैठा हुआ उड़ता-उड़ता उन्हें देखता। वे पीछे और नीचे छूटती चीजें थीं। वे सब उसे दूर नीचे और पीछे से छूटते हुए विदा देते लगते। वह किसी यात्रा में होता। साइकिल की टंडी, चिकनी, काली पीठ पर सवार। एक दूसरी दुनिया के आकाश में उड़ता हुआ।
गांव से उत्तर की ओर जाने वाली कच्ची सड़क खेतों और बगीचों को पार करने के बाद एक रेतीले कछार से होकर गुजरती थी। वहां छिट-पुट झाडिय़ां दूर-दूर उगी हुई थीं। कंटीली। कहीं-कहीं चट्टानों के टुकड़े। सलेटी कछुओं की पीठ की तरह, यहां-वहां उतराते हुए। रात में जनार्दन की साइकिल पर सवार जब भालू वहां से गुजरता तो एक खूब लंबे, दूर तक फैले सन्नाटे में डूबी कछार की रेत और यहां वहां कछुओं की सलेटी पीठ पर रहस्यलोक को उसके सामने रचती। आकाश में चंद्रमा होता, जिसकी धुंधली-सी पीली रोशनी किसी अछोर चादर की तरह उस पूरे कछार पर बिछी रहती। डरी हुई टिटहरी की आवाज उस सन्नाटे को कभी-कभी तोड़ती। और भालू की आंखें अपनी साइकिल की हैंडिल पर ठहर जातीं। आकाश का चंद्रमा सोने की लंबी लकीर बनकर हैंडिंल पर चमकता। हवा में चांदनी की ठंडक होती, जो भालू की सांसों के साथ उसके फेफड़ों के भीतर तक प्रवेश करती और उसका समूचा शरीर सिहरन से भर उठता। एक शीतल, उन्मुक्त ताजगी। चंद्रमा की रोशनी में नहाया हुआ उल्लास। ऐसे में अकसर भालू गाना गाता \'\'बोलै रे चिरैया हो आधी रात, टिटी हीं... टिटी हीं टिटी हींऽऽऽÓÓ
\'\'टिटी ऽ हींऽ टिटीऽऽ हीं ईंऽ... ईंऽ...ऽ।ÓÓ भालू की आवाज रात में दूर-दूर तक कछार,सीवान, खेतों की मेड़, नदी के किनारों और मेकल की तलहटी पर सुनाई देती। गांव में आधी रात कोई कभी अधनींद में अगर सुनता तो अपने आप मुस्कुरा देता।
भालू स्वप्न में भी साइकिल चलाता। वह पैडल मारना छोड़ देता। तब भी साइकिल चलती रहती। कोई खाई रास्ते में पड़ती तो साइकिल ऊपर उठ जाती, अपने आप, और उडऩे लगी। कभी वह मेकल पहाड़ की चोटी पर साइकिल चलाता हुआ, ऊपर से नीचे छूट चुके अपने गांव, खेत और पेड़ों को देखता और कभी वह नदी की तेज धार के भीतर बहते हुए पानी के तलघर में मछलियों, काई, शैवाल और नदी में डूबे मिट्टी के मटकों के बीच पैडल मारता। वहां कई बार पानी में रहने वाली, सांप जैसी बाम मछली, उसके हैंडिल से लिपट जाती और कभी-कभी तो पानी वाले सचमुच के पनडोंड़ सांप उसके पीछे पड़ जाते। वह भागता। जोरों से पैडल मारता। पानी के अतल से, नदी के तलघर से निकलकर वह बाहर की ठोस धरती पर पहुंचना चाहता। लेकिन उसकी आंखों के सामने चारों ओर अथाह जल का हरा रंग छा जाता। सांसों के साथ हवा की जगह पानी उसके फेफड़ों में भरने लगता। वह डरकर चीखता तभी उसकी साइकिल किसी पत्थर या टूह से टकराती, वह गिरता और चौंका हुआ अपने चारों ओर निहारता। कहां है नदी का तलघर? किधर गई मेकल पहाड़ की चोटी? कहां चले गए वे काले डरावने पानी वाले सांप?
घर के लोग कहते- भालू, पगला गया है। रात में सोते-सोते वह अपने छोटे भाई का पैर दबाने लगता या नींद में ही तडफ़ड़ाता हुआ हाथ-पांव फेंकने लगता। इस सच को कोई नहीं जान पाता था कि उस समय भालू दरअसल किसी अथाह खाई में गिरने से बचने के लिए अपनी साइकिल का ब्रेक लगाने की घबराहट भरी कोशिश में होता था।
बी.जी. राजोरिया उर्फ बालू उर्फ भालू ने इसी तरह साइकिल चलाना सीखा था। उसके घर की हालत ऐसी नहीं थी कि आठवीं, दसवीं, हायर सेकेंडरी या बी.ए. में उसके फस्र्ट डिवीजन से पास होने पर उसे कोई साइकिल खरीदकर देता। हां, बी.ए. करने के बाद उसके पिताजी ने सीवान से लगा हुआ अपना छह कट्ठे का खेत बेच दिया था और लोकल एम.एल.ए. बलराज त्रिपाठी की मदद से एक लाख रुपए की घूस देकर सरकारी डिग्री कॉलेज में लेक्चरर की नौकरी उसे दिला दी थी। जिस दिन खेतों की रजिस्ट्री हुई, भालू के घर में चूल्हा नहीं जला था। पुश्तैनी खेत थे। पुरखाती जमीन। कहते हैं घूस के एक लाख में से पचास हजर एम.एल.ए. ने ले लिए थे।
भालू का इसके बाद पंद्रह-बीस साल तक कहीं पता नहीं चला। कई जिलों के सरकारी कॉलेज में उसका ट्रांसफर होता रहा। एक दिन अचानक टेलीफोन की घंटी बजी। उधर भालू था। इसी शहर के एक कॉलेज में लेक्चरर। मैं लॉन्ड्री की दुकान चलाने लगा था। मेरे पिताजी ने खेत बेचकर घूस देने से मना कर दिया था, इसलिए हिन्दी साहित्य में फस्र्ट डिवीजन और गोल्ड मेडल होने के बावजूद कोई नौकरी मुझे नहीं मिल पाई थी। पता चला दस साल पहले भालू ने किसी लड़की से लव मैरिज कर ली थी। लड़की दूसरी जाति की थी इसलिए पिताजी नाराज थे। उन्होंने सोचा था कि बालू की नौकरी लगने के बाद दहेज में मोटी रकम लेकर शादी करेंगे और उसकी नौकरी लगवाने के चक्कर में जो छह कट्ठा पुरखाती जमीन निकल गई है, उससे दुगुनी जमीन खरीदकर गांव वालों को दिखा देंगे कि \'प्लानिंगÓ क्या होती है। लेकिन भालू ने उनकी सारी योजनाओं पर पानी फेर दिया था। पता चला, जैसे वह बचपन में साइकिल के पीछे पगला गया था, उसी तरह बाद में उस लड़की के पीछे भी पागल हुआ, जो अब उसकी पत्नी बन गई थी। मेरा अंदाजा है कि वह उस लड़की के साथ भी रात के सन्नाटे में गांव के बाहर के निर्जन, उजाड़, रेत की कछार, मेकल पहाड़ की चोटी या नदी की तेज धार के नीचे के तलघर में घूमता रहा होगा। यह भी अनुमान है कि आकाश में चमकते चंद्रमा की रोशनी में वह लड़की भी उसी तरह सोने की धुंधली चमकती धातु में बदल जाती होगी, जिस तरह जनार्दन सिंह पटवारा की साइकिल की हैंडिल रात में सोने की हैंडिल में बदल जाया करती थी।
दिलचस्प बात तो यह है कि अब हमारा भालू कविताएँ लिखने लगा था और \'कवि जीÓ के रूप में मशहूर हो गया था। कई छोटी-छोटी पत्रिकाओं में उसकी कविताएं छपतीं। उसने एक-दो किताबें भी छपा डाली थीं। लेकिन जब वह मुझसे मिलने आया तो बिल्कुल पहले वाला भालू ही लगा। मैंने सोचा था कि अगर अब मैंने उसे \'भालूÓ कहा तो वह नाराज होगा, कहेगा कि मुझे डॉक्टर राजोरिया कहो या बालगोपाल जी या बी.जी., लेकिन जैसे ही मैंने कहा \'भालूÓ उसने बड़ी सहजता से मेरी ओर देखा और बोला- \'हांÓ। मैं बचपन की तरह एक बार फिर हार गया था।
मैंने उसे चिढ़ाने के लिए गाना गाया- \'आलू भांटा की तरकारी।Ó
भालू ने बिना रुके संगत की \'\'नाचे भालू की महतारी, चना जोर गरम।ÓÓ और हंसने लगा। बिल्कुल पहले की तरह। उसे चिढ़ाया नहीं जा सकता था। वह अजातशत्रु था। अपराजेय। हम दोनों हंसने लगे। इतना कि दोनों की आंखें डबडबा गई और उनमें से आंसू बहने लगे।
भालू बिल्कुल भी नहीं बदला था, जबकि इस बीच सारी दुनिया पूरी तरह से बदल चुकी थी। हमारा गांव भी पहले वाला, मिट्टी के कच्चे घरों और खपरैलों वाला गांव नहीं रह गया था। वहां कई पक्के मकान बन गए थे। चार-पांच घरों में टीवी के डिश एंटीना लग गए थे। जुताई के लिए ट्रैक्टर लाए जाते। रोपाई, निराई, गहाई और बिनौने का काम औरतें करने से कतरातीं। खेती के काम के लिए मजदूर नहीं तैयार होते थे। कादो-कीचड़ में कौन दिन भर घुसे? भूमिहीन लोग बड़ी संख्या में गांव छोड़कर शहर चले गए थे। वहां वे रिक्शा चलाते या कंस्ट्रक्शन के काम में मजदूरी करते। कुछ सड़क की पटरियों पर रेहड़ी-ठेला लगाते। गांव में कुछ नहीं बचा था। सारी नकदी शहरों में ही सिमट गई थी। रोजगार भी वही था। कहीं फ्लाई ओवर बन रहा होता, कहीं होटल, कहीं कई-कई मंजिल ऊंचा रिहाइशी काम्पलेक्स, कहीं मेट्रो रेल। गांव में चोर तक नहीं झांकते थे। सेंध मारते तो उन्हें भात के तबेले और कैथ-करौंदा के देशी अचार की हंडिय़ां के अलावा और कुछ न मिलता। अनाज खेतों में अब भी पैदा होता था, लेकिन बाजार में उनका कोई दाम नहीं था। सरकार हल्ला-गुल्ला मचाने पर या किसानों की हालत पर तरस खाकर कभी-कभार अनाज उनसे खरीदकर अपने गोदामों में सड़ा डालती।
कुल मिलाकर हालत खराब थी। लेकिन तरक्की तब भी हुई थी। हमारे गांव से जो चार किलोमीटर का रास्ता खेतों, जंगल और पहाड़ी के बीच से जाता था, जहां जनार्दन सिंह कलारी से ठर्रा पीकर लौटता हुआ अपनी साइकिल के साथ किसी गड्ढे में गिरा मिलता था, वह रास्ता स्टेट हाईवे की कोलतार वाली पक्की सड़क में बदल गया था। जंगल कट चुका था और वहां केडियाजी का डेढ़ करोड़ का कोल्ड स्टोरेज बन गया था। कछार और मेकल पर्वत की तलहटी से होकर गुजरने वाली कच्ची सड़क, जिस पर हमारा भालू रात में साइकिल चलाता था, अब विश्व बैंक की मदद से पक्के, हाईवे में तब्दील हो चुकी थी। उस पर दिन रात ट्रक और दूसरी गाडिय़ां दौड़ती रहती थीं। सड़क के दोनों ओर ढाबे खुल चुके थे। शाही पनीर, छोले मसाला, मलाई कोफ्ता, तंदूरी चिकन, दाल मखनी, बटर चिकन, दाल फ्राइ, बिरयानी और जाने क्या-क्या वहां हर पल तैयार मिलता। रात में सड़क के किनारे गरीब औरतें धंधे के लिए खड़ी दिखती। पड़ोस के गांव की फुलवंती ट्रक ड्राइवरों के बीच \'नीली चड्ढी वालीÓ के नाम से मशहूर थी।
तरक्की तो हुई थी। ठूनू, समनू, रमैया, कोदू के बेटे-बेटियों के नाम अभिषेक, रितिक, सनी, सोनाली, एकता, रिंकू जैसे होने लगे थे। एम.एल.ए. त्रिपाठी अब लोक निर्माण मंत्री बन गए थे। सरपंच ठेकेदार बन गया था और उसके घर में टाटा 407, कमांडर जीप और एस्कार्ट का ट्रैक्टर खड़े हो गए थे। हां, स्कूल की इमारत ढह गई थी और बच्चे पेड़ के नीचे पढऩे जाते थे। सरकारी अस्पताल में ढोर-डांगर सोते थे। गांव के गरीब घरों में ऐसी नई पीढ़ी अचानक पैदा हो गई थी, जिसका हुलिया और नाक-नक्शा शहर के अमीरों की औलाद से मेल खाता था।
लेकिन आश्चर्य कि भालू अब तक वही था। वही पहले वाला भालू। पता चला कि ब्याज मुक्त कर्ज की सारी योजना के बावजूद उसने अपने पी.एफ. से कार नहीं खरीदी। उसने साइकिल ही लिया। हर दूसरे साल वह पुरानी साइकिल बेच देता और नई खरीद लेता। कॉलेज वह साइकिल से ही जाता।
भालू ने जिस लड़की से प्यार किया था और फिर \'लव मैरिजÓ, उस लड़की का नाम माला था। भालू को जब उस पर बहुत प्यार आता तो वह उसे \'माला डी की गालीÓ कहता। वह उसे ऐसे में \'भालूÓ या कभी-कभी \'आलूÓ कहती। वर्ना ज्य़ादातर सामान्य अवस्था में वह उसे \'एÓ या \'ऐÓ कहती थी। भालू उसे साइकिल के कैरियर पर बिठा कर फिल्म दिखाने या बाजार खरीदारी करने ले जाता। लेकिन शहर के बाहर, जहां सुनसान होता, वह उससे कहा- \'\'आओ, सामने डंडी पे बैठ जाओ।ÓÓ
माला जब डंडी पर बैठती तो भालू की नाक में हवा में उड़ते उसके बाल घुसते और भालू की नाक में या तो खुजली होती या उसे छींक आने लगती। वह माला की पीठ पर अपनी नाक रगड़ता, जिससे माला को खूब गुदगुदी मचती और वह डंडी पर बैठी-बैठी जोरों से हंसने लगती। ऐसे में साइकिल का हैंडिल डगमगाने लगता। अगर वहां जंगल होता, तो जो हवा भालू के नथुनों में घुसती उसमें वनस्पतियों की गंध और ंजंगल की नमी होती। लेकिन माला अपने बालों में \'केयोकारपिनÓ का तेल लगाती थी, इसलिए वह वनस्पतियों और \'केयोकारपिनÓ की मिली-जुली गंध होती। भालू को गंध का यह मिक्सचर बहुत पसंद था। वह सराबोर होता हुआ बहुत खुश होता। जोर-जोर से पैडल मारने लगता। वह चाहता था कि माला ऐसे में गाना गाए, लेकिन शादी के बाद से आजतक माला ने गाना कभी नहीं गाया था। उसे गाना आता ही नहीं था। एकाध बार उसने \'हूं... हूं... हूं...Ó करते हुए गाने की कोशिश भी की तो पहले तो उसे हंसी आई फिर खांसी का दौरा पड़ गया। \'\'रहने दो। बाद में गा लेना।ÓÓ भालू ऐसे में कहता और फिर \'माला डीÓ की गर्दन में नाक रगड़ते हुए उसकी \'केयोकारपिनÓ सूंघने लग जाता।
दोनों की शादी के दस साल हो गए थे, लेकिन अभी तक वे माता-पिता नहीं ंबने थे। लगता है कि यह बात वे भूल ही गये थे।
बहरहाल,भालू ने जो घटना मुझे उस दिन बताई, वह उसके साथ अभी चार महीने पहले ही घटी थी। भालू उस घटना से बहुत परेशान था। उसके मुताबिक इस शहर में आने के बाद उसने हमेशा की तरह अपनी पुरानी साइकिल बेच दी थी और \'मजीद एंड संस एंड ब्रदर्सÓ की मशहूर साइकिल की दुकान से नई साइकिल खरीदी थी। यह साइकिल थी तो काले रंग की, लेकिन वह काला दूसरे कालों से बिल्कुल अलग एक अजब तरह से काला था। एक नजर में वह काफी चिकना, चमकीला, किसी धातु का रंग लगता, तो दूसरे ही पल वह घिसा हुआ मटियाया-सा, कहीं रंग खुरदुरा दिखने लगता। ऐसा भी नहीं था कि धूप के कोण या रोशनी के कम ज्यादा होने की वजह से ऐसा होता रहा हो। ऐसा अपने आप हो जाता। देखते-देखते।
\'मजीद एंड संस एंड ब्रदर्सÓ की दुकान पर जब उसने पहली बार  इस साइकिल को देखा, तो वह काले रंग के इस खेल को फौरन ताड़ गया। फिर तो बहुत देर तक वह इसी फेर में उलझा रहा कि वह इसका असली काला पहचान ले, लेकिन वह बार-बार चकमा खा जाता था। वह उसने बाद में जाना कि काले की इस धोखाधड़ी के पीछे साइकिल की डंडियों में खिंची उन दो समानांतर लकीरों का हाथ है, जिनमें से एक का रंग नीला और दूसरे का सुनहला था। दो पतली-पतली बारीक सूत की तरह साइकिल की तीनों डंडियों के समूचे त्रिभुज पर खिंची हुई समानांतर रेखाएं। भालू जान गया था कि ये दोनों लकीरें जैसे ही एक पल को आदमी की आंख को अपनी ओर खींचती हैं, ठीक उसी पल वह काला अपना रंग बदल लेता है। भालू ने बहुत कोशिश की। सांस तक रोके रखा कि साइकिल की डंडी के काले से आंख न हटे, लेकिन हर बार कोई न कोई गड़बड़ हो जाती। कभी पलक झपक जाती, कभी कहीं से कोई आवाज दाल-भात में मूसलचंद बनकर बना-बनाया खेल चौपटकर जाती।
इत्मीनान से इस साले काले को देखूंगा, बाद में। यही सोचकर भालू ने वह साइकिल खरीद ली थी। लेकिन उसमें ताला नहीं था। \'मजीद एंड संस एंड ब्रदर्सÓ के अश$फाक ने कहा था कि दो-चार दिनों में इस साइकिल का \'ओरिजनलÓ ताला मिल जाएगा। \'डुप्लीकेटÓ तो अभी भी मिल जाएगा, लेकिन ज्यादा अच्छा होगा कि डॉ. बी.जी. राजोरिया दो-चार दिनों तक इंतजार कर लें। वैसे भी इस शहर में चोरी-चकारी नहीं होती इसलिए साइकिल मह$फूज ही रहेगी।
माला साइकिल के रंग से पहले खुश नहीं हुई। वह नीले या हरे रंग की साइकिल के इंतजार में थी। लेकिन शाम को भालू उसे साइकिल के कैरियर पर बिठाकर शहर के बाहर हरदेई माता मंदिर मार्ग की ओर ले गया, जो खासा सुनसान होता था और कॉलेज के लड़के-लड़कियां उधर झाडिय़ां या खड्ड खोजते-फिरते थे; तो माला को वह साइकिल ठीक-ठाक लगने लगी। जब भालू ने सुनसान देख कर उससे कहा कि \'\'आओ, सामने डंडी में बैठ जाओ माला डी।ÓÓ तो वह हंसने लगी। \'अच्छा भालूÓ उसने ऐसा कहा। डंडी के साथ एक दिक्कत यह थी कि देर तक बैठे रहने पर वह नीचे से गडऩे लगती थी। इसीलिए घर से निकलने वक्त भालू एक तौालिया अपने कंधे पर डाल लिया करता था। तौलिए को दुना-तिना कर डंडी पर रख दिया जाता और वह गद्दी बन जाती, जिस पर माला बैठती।
भालू का दिल करता है कि माला भी साइकिल चलाना सीख जाए। वह बताता कि आजकल औरतें कार और स्कूटर ही नहीं हवाई जहाज भी चलाती हैं। लेकिन तमाम कोशिशों के बावजूद साइकिल नहीं सीख पाई। \'\'ये साइकिल दो अंगुल के पहिए पर सीधी टिकी कैसे रहती है? ऊपर से चलती भी है। मुझे तो यही सोच कर डर लगता है।ÓÓ माला कहती। भालू निराश हो चुका था। फिर उसने एक दूसरा रास्ता निकाला। वह माला को आगे साइकिल की सीट पर बिठा देता और खुद पीछे कैरियर पर बैठ जाता। वह माला से कहता, \'\'तुम हैंडिंल संभालो। मैं पैडल मारता हूं।ÓÓ भालू पीछे से सीट पकड़कर, कैरियर पर बैठा हुआ पैडल मारता और माला सीट पर बैठी हैंडिल संभालती। भालू को अच्छा लगने लगता तो वह पीछे से माला की जांघे सहलाता और उसकी पीठ पर नाक रगड़ता। गुदगुदी के मारे माला हंसती को हैंडिल डगमगाने लगती।
आज नई साइकिल की डंडी पर माला जब बैठी हुई थी जब हवा में उड़ते हुए उसके बाल भालू की नाक में खुजली पैदा करने लगे और भालू पहले छींकने और फिर उसकी गर्दन पर नाक रगडऩे लगा, तभी अचानक उसे लगा कि आज नई साइकिल की डंडी पर माला नहीं कोई दूसरी नई लड़की बैठी हुई है। यह एक अजब-सा अनुभव था। डंडी पर माला के होते हुए भी वहां कोई दूसरी लड़की थी जो माला न होते हुए भी, माला थी। क्या यह अपना रंग बदलने वाली साइकिल की काली डंडी का कमाल था? भालू को इतना अच्छा लगा कि वह जोर-जोर से अपनी नाक उसकी गर्दन पर रगडऩे लगा। तभी माला ने मुस्कुराते हुए कहा, \'\'भालू, मैंने आज भृंगराज तेल लगाया है।ÓÓ
भालू की समझ में अब आ आया कि जंगल की वनस्पतियां, घास नमी और फूलों से सनी हवा में आज \'केयोकारपिनÓ की महक की जगह \'भृंगराजÓ होने के कारण माला दूसरी लड़की में बदल गई थी। खैर शहर से दूर, माता हरदेई मंदिर मार्ग के सुनसान में भालू ने माला को साइकिल की डंडी के काले रंग के खेल के बारे में बताया। माला पहले तो मानने को तैयार नहीं हुई, लेकिन जब उसने भी आंखें गड़ाकर डंडी के काले रंग को घूरना शुरू किया तो उसे लगा कि भालू सच कह रहा है। आ$िखरकार थककर उसने कहा, \'\'ऐसा तो हर काले रंग की साइकिल के साथ होता होगा। तुम किसी भी काली साइकिल को घूरो तो उसकी डंडी अपना रंग जरूर बदलेगी। या फिर क्या पता कि सारी गड़बड़ इन दोनों लकीरों की वजह से होती हो। नीली और सुनहली।ÓÓ
उस रोज भालू दुखी था कि माला को ये बहुत महत्वपूर्ण बात नहीं लगी। लेकिन उस रोज शहर से लौटते हुए भालू ने अपनी \'\'माला-डीÓÓ के लिए कई ब्रांड के तेल खरीदे। डाबर आंवला, वैसलिन हेयर टॉनिक, नवरतन, हिम कल्याण वगैरह-वगैरह। सब की गंध एक-दूसरे से अलग थी।
लेकिन वह घटना जिसने डॉ. बी.जी. राजोरिया उर्फ बाल गोपाल उर्फ बालू अर्थात बालू को परेशानी में डाल दिया था, वह घटना तो रह ही गई। अब आप संक्षेप में उसी का विवरण सुनिए।
उस दिन कॉलेज से लौट कर भालू ने पेटभर से ऊपर खा लिया था। कढ़ी ऐसी थी, जैसी मां बनाती थी। फिर पके हुए आम की फांके। भालू जब खाने पर आता, तो डकार की जगह वह नहीं छोड़ता था। \'खाए के परे रहो और मार के टरे रहो।Ó यह वाक्य वह अक्सर बोलता था। बचपन में गांव में किसी ने अच्छे स्वास्थ्य और समझदारी का यही नुस्खा बतलाया था, जिसका पालन करते हुए भालू हपच कर खाता और फिर पलंग पर लंबा पसर जाता। खाकर सो जाना चाहिए, और किसी को मारपीट कर वहां से टल जाना चाहिए- यह नुस्$खा यही सिखाता था।
तो उस दिन भालू कढ़ी-चावल और आधा किलो आम खाकर सोया हुआ था कि माला ने आकर उसे जगाया। \'\'कोई पुलिस वाला तुम्हें पूछ रहा है।ÓÓ उसने कहा। बालू उठकर बाहर आया तो साइकिल पकड़े एक पुलिस वाला खड़ा था। \'क्या बात है?Ó भालू ने पूछा। उसने कभी किसी पुलिस वाले से आज तक बात नहीं की थी। पुलिस वाला का$फी मरियल और बीमार-सा लग रहा था, जैसे टाय$फायड की लंबी बीमारी से आज ही उठा हो। \'\'चलो, साहब ने बुलाया है।ÓÓ उसने अपनी साइकिल की हवा देखते हुए कहा- \'\'लेकिन बात क्या है?ÓÓ भालू थोड़ा-थोड़ा डर रहा था, जिसे वह छुपाना चाहता था। \'\'मेरे को पता नहीं। साहब ने साथ ले आने को कहा है।ÓÓ उस मरियल सिपाही ने कहा। भालू समझ गया कि बिन साथ लिए यह खड्डूस यहां से जाएगा नहीं। मैं बाद में आ जाता मुंशीजी, तो? उसने पहले कहा, फिर अचानक बाला- \'\'अच्छा, चलता हूं। दो मिनट में तैयार हो के आता हूं। असल में आज कढ़ी चावल ज्य़ादा खा गया था।ÓÓ भालू ने ऐसा उस पुलिस वाले को खु़श करने और उससे थोड़ी-सी आत्मीयता बनाने के लिए कहा था, लेकिन उसने भालू को ऐसे देखा, जैसे उसे अजीर्ण या $कब्ज हुआ हो, तो भालू डर गया।
उसे थाने के बरामदे में देर तक एक बेंच पर बैठे रहना पड़ा। उसने बहुत सोचने की कोशिश की कि उसे आ$िखर थाने पर क्यों बुलाया गया। अपने होश-हवास में उसने कभी कोई अपराध तो किया नहीं था। फिर उसे लगा कि शायद उसकी पिछले दिनों लिखी एक कविता की वजह से उसे बुलाया गया होगा। उस कविता में उसने लिखा था कि आजादी के बाद चोरों, दलालों और ठगों ने सत्ता पर कब्जा जमा लिया है। यह भी कि इस देश में अब कोई भी शरीफ और सीधा-साधा आदमी जी नहीं सकता। भ्रष्ट ताकतवरों के कुत्ते उसका चीथड़़ा उड़ा देते हैं। फिर उसे याद आया कि पिछले दिनों उसके कॉलेज के चार लड़के किसी अपहरण और फिरौती वाले केस में पकड़े गए थे। उनमें से एक लड़का उसके घर भी एकाध बार आया था। वह पढऩे में ठीक-ठाक था। शायद नौकरी पाने या किसी छोटे-मोटे व्यापार की $खातिर पैसा इकट्ठा करने के लिए उसने वह अपराध किया होगा। संभव है, उसी के बारे में कोई जानकारी लेने के लिए उसे यहां बुलाया गया हो। वैसे भी यह कोई मामूली पुलिस स्टेशन नहीं, जिला पुलिस मुख्यालय का दफ्तर था।
लगभग पौन घंटे के बाद एक मोटा-सा मुस्कराता मुच्छड़ उसके पास आया और उससे तमीज के साथ बोला- \'\'चलिए, साहब अंदर बुला रहे हैं आपको।ÓÓ  भालू उसके पीछे-पीछे चलने लगा।
वह एक बड़ा-सा कमरा था, जिसकी दीवार पर गांधीजी, नेहरू जी, शास्त्री जी, राजेन्द्र प्रसाद और राधाकृष्णन, इंदिरा गांधी की तस्वीरें टंगी थी। एक कोने की ओर सुभाषचंद्र बोस और यशवंत राव बलवंत राव चव्हाण के चित्र भी थे। सामने बड़ी-सी मेज थी, जिसमें दो-तीन फोन रखे हुए थे। एक फोन  अभी भी बज रहा था। ऐश ट्रे, पेपर वेट, पेन होल्डर, फाइलें, डस्टबीन और पीछे की दीवार पर ए.सी. वगैरह ऐसी सभी चीजे थीं, जो सरकारी दफ़्तरों में किसी अ$फसर के कमरे में होती ही हैं। मेज के पीछे घूमने वाली कुर्सी से उठकर एक चिकने गोल-मटोल चेहरे वाला चपटी-चौड़ी नाक, घनी-काली भौंहों का सांवला-सा आदमी अपने सफेद दांत निकाले उसकी ओर हाथ बढ़ाए मुस्कुरा रहा था। \'\'आइए। आइए... माफ कीजिए आपको थोड़ा इंतजार करना पड़ा। असल में मीटिंग जरा ज्य़ादा खिंच गई। पुलिस की नौकरी का बुरा हाल है। आनंद तो आप लोगों को है। पढ़ा, पढ़ाया और सृजन किया। हिही... ही...। हिही... ही...। ही।ÓÓ
वी.के. भूधर। विनोद कुमार भूधर। यही उस युवा आई.पी.एस. का नाम था। उसने डॉ. बालगोपाल राजोरिया उर्फ भालू के लिए काफी मंगाई। \'\'अभी इसी महीने मेरी पोस्टिंग यहां हुई है। यकीन करिए, जब से मैं यहां आया, उसी दिन से आपसे मिलने की तमन्ना दिल में थी। बहुत पढ़ा है आपको। इधर मेरी भी कुछ कविताएं आई हैं \'दिगंतÓ, \'साहित्यÓ, \'शब्दÓ, और \'रचनाÓ जैसी प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में। बड़ी साहित्य सेवा कर रहे हैं ये लोग। अभी \'साहित्यÓ वाले त्रिपुरारी शरण आए थे। हमने डेढ़ लाख का विज्ञापन दिलाया है। मेरी रचनाओं पर दूरदर्शन के डिप्टी डायरेक्टर एल.डी. त्रिपाठी जी ने एक लंबा लेख लिखा  है। छाप रहे हैं। आप अपनी राय जरूर दीजिएगा।ÓÓ
भालू पुलिस सुपरिटेंडेट भूधर जी से मिलकर खुश हुआ। उसे लगा कि अब शहर में उसका कुछ रौब-दाब बढ़ जाएगा। उसे याद आया कि अभी कुछ दिनों पहले ही भूधर जी को एक महान दिवंगत कवि की स्मृति में स्थापित एक बड़ा सम्मान मिला था। उनके मुकाबले भालू की हालत साहित्य में फटीचर ही कही जा सकती थी। यह उसका भाग्य ही था कि भूधर जी उसे मित्र और सहधर्मी मान रहे थे।
उस दिन भूधर जी के साथ वह दो घंटे तक बैठा रहा। वे चाहते थे कि शहर में साहित्यिक-सांस्कृतिक गतिविधि शुरू की जाए। लोग एक-दूसरे से जुड़ें। सांस्कृतिक वातावरण का निर्माण हो। वे भालू को छोडऩे बाहर तक आए। भालू जब अपनी नई साइकिल पर चढऩे लगा तो भूधर जी ने पूछा कि आपने कार क्यों नहीं खरीदी? \'\'क्योंकि मुझे साइकिल में ही मजा आता है।ÓÓ भालू ने उत्तर दिया। \'\'समझ गया। जैसा सोचा था, आप बिल्कुल वैसे ही निकले। सादगी और बचत की ही बात नहीं, पर्यावरण की भी बात है। जापानियों और चीनियों को देखिए, साइकिल ही चलाते हैं।ÓÓ युनिवर्सिटी का वाइस चांसलर भी होगा, तो भी साइकिल से ही आएगा-जाएगा। अभी मैं कवियों के एक डेलिगेशन में चाइना गया था। हमारे यहां तो इन विदेशी कंपनियों ने माहौल बिगाड़ दिया हैा। सुपरिटेंडेंट ऑफ पुलिस मिस्टर वी.के. भूधर ने कहा।
भालू जब थाने से निकल कर बाहर आय तो जो पुलिस वाला उसको बुलाने आया था, वह बाहर एक ठेले वाले के पास खड़ा चाट खा रहा था। भालू को देखकर वह मुस्कुराने लगा और उससे गोलगप्पे खाने का आग्रह करने लगा। भालू बड़ी मुश्किल से छूट पाया।
भालू ने जब घर में माला को थाने की बात बताई, तो माला खुश हुई। उसने कहा कि मुझे पता नहीं था कि कविता लिखने पर पुलिस वालों से दोस्तों होती है। भालू ने कहा कि अगर मैं साइकिल चलाना न सीखता तो कभी कविता न लिख पाता। उसने माला को पहली बार यह बात बताई कि कविता लिखने और साइकिल चलाने में एक जैसा मजा आता है। लेकिन माला ने पूछा कि इसका मतलब जो साइकिल नहीं चलाते वे कभी कविता नहीं लिख सकते? तो इसका जवाब भालू नहीं दे सका और वह कपड़े से साइकिल को पोंछने लग गया।
और तीसरे ही दिन भालू की नई साइकिल चोरी हो गई। कॉलेज से लौटते हुए भालू शेविंग क्रीम और साबुन खरीदने मित्तल डिपार्टमेंटल स्टोर्स मेें मुश्किल से पांच मिनट के लिए घुसा था। बाहर आया तो साइकिल नहीं थी। उसने लोगों से कहा कि उसने साइकिल इसी जगह बिजली के खंभे के पास, पी.सी.ओ. के बगल में खड़ी की थई लेकिन लोग कोई खास रुचि नहीं ले रहे थे। साइकिल की चोरी ऐसी घटना नहीं थी कि वे इससे डरें, घबराएं या महत्वपूर्ण मानें। भालू उस दिन रिक्शे में बैठकर पूरे शहर में घूमता रहा कि कहीं उसे उसकी काले रंग की साइकिल खड़ी दिख जाए। उसे \'म•ाीद एंड संस एंड ब्रदर्सÓ के अश$फाक पर जबर्दस्त गुस्सा आ रहा था। \'डुप्लीकेटÓ ताला ही दे देता, तो साइकिल तो कम से कम बच जाती। शहर में ऐसी चोरी-चकारी तो होती नहीं। \'साइकिल मह$फूज रहेगीÓ ये उसी साले अश$फाक की दुम ने कहा था। अब? हो गया न काम।
घर लौटकर आया तो माला झगड़े पर उतारू हो गई। \'\'अभी $फोन करो एस.पी.को। किस दिन काम आएंगे। तुमको पता नहीं, इन पुलिस वालों को सारे चोरों की जानकारी रहती है। हफ्ता बंधा रहता है। मुझसे लिख के ले लो। हमारी साइकिल कहीं नहीं जाएगी।ÓÓ
भालू को सबसे ज्यादा इस बात का दुख था कि पता नहीं दूसरी साइकिल में वैसा धोखेबाज काला रंग मिलेगा कि नहीं। उसने उस दिन, उसी कंपनी की, उसी रंग की दूसरी साइकिल \'मजी द एंड संस एंड ब्रदर्सÓ की दुकान पर देखी थी। उनका काला बिल्कुल मालूमी काला था। ज्यों का त्यों काला का काला। हालांकि नीली और सुनहरी लकीरें उनकी डंडियों पर भी पड़ी थीं, लेकिन वे बेजान थीं। उनमें कोई करिश्मा नहीं था।
भालू सचमुच बहुत दुखी था। उसे यह ठीक नहीं लग रहा था कि साइकिल की चोरी जैसी मामूली बात वह एस.पी. भूधर जी को बताए। फिर भी वह पहले जिला पुलिस मुख्यालय गया। वहां उसे वही मरियल पुलिस वाला मिल गया, जो उसदिन उसे बुलाने आया था और बाद में गोलगप्पे खाने की जिंद कर रहा था। उसका नाम सुधीर कुमार पांडे था। वह भालू से मिलकर बहुत खुश हुआ। वह भालू को अपनी साइकिल के कैरियर में बिठाकर थाने ले गया। थाने का हवलदार कोई राणा था। उसकी बड़ी सी तोंद थी और गला इतना मोटा था कि उसमें से आवाज फंसी हुई बाहर आती थी। राणा को जब पांडे ने बताया कि लेक्चरर साहब नये एस.पी. साहब के दोस्त हैं और दोनों लोग किताब लिखने का काम करते हैं तो राणा भी खुश हुआ। उसने कहा कि चोरी की रिपोर्ट लिखने या एफ.आई.आर. दर्ज कराने से कोई $फायदा नहीं। साइकिल महीने भर के भीतर मिल जाएगी। राणा ने बताया कि असल में चोरी की साइकिलें इकट्ठा थोक में बरामद होती है। इस बार जैसे ही साइकिलें पकड़ी गईं, वह खबर भेज देगा। पुलिस चौकी में हवलदार राणा के सामने की होटल से समोसे, छोले और स्पेशल चाय मंगाकर सत्कार किया। फिर पूछने लगा कि \'\'एस.पी. साहब से कब से पहचान है? साथ-साथ आप लोगों ने पढ़ाई वगैरह की होगी?ÓÓ उसने पूछा। वह बहुत निराश हुआ, जब भालू ने उसे बताया कि वह तो एस.पी. साहब से कुल मिलाकर एक ही बार मिला है। राणा ने बात को संभालते हुए कहा, \'\'गीत-कवित्त और साइकिल न सही हमारे और पांडे के लिए तो आप एस.पी. साहब से मेलजोल बनाए रखो।ÓÓ
इसके बाद कई हफ्ते गुजर गए। भालू कभी-कभी पुलिस थाने के सामने से जानबूझकर निकलता। हवलदार राणा कहीं भूल न गया हो। राणा उसे देखकर मुस्कुराता। साइकिल का जिंक्र ही नहीं होता था। भालू थाने में अपना फोन नंबर भी लिखा आया  कई बार मन होता कि वह माला को लेकर माता हरदेई मार्ग पर बहुत दूर निकल जाए, जहां मोहिनी नाम की छोटी-सी नदी बहती थी और वहां दोनों एक साथ नहाएं। मौका लगे तो नदी के धार के भीतर वह माला-डी को डंडी में बिठाकर साइकिल चलाए। उसकी इच्छा होती कि जंगल में पहुंचकर वह माला की गर्दन में नाक रगड़े और सूंघे कि वह इस बार कौन-सी लड़की में बदल गई है। उसके खरीदे हुए सारे तेल ज्यों के त्यों रखे हुए थे। इस बीच दो बार एस.पी. भूधर उसके फ्लैट में आ चुका था और त्रिवेणी छगनानी महिला कॉलेज के वार्षिकोत्सव समारोह में दोनों अपनी-अपनी कविताएं पढ़ चुके थे। हालांकि भालू को यह बहुत बुरा लगा था कि कॉलेज की प्रिंसिपल सुश्री मालती अग्निहोत्री और गवर्निंग बॉडी के चेयरमैन श्री सुन्दरचंद छगनानी ने एस.पी. भूधर की कविताओं की ही अपने भाषण में प्रशंसा की थी। भालू मंच पर किसी गरीब मदारी की तरह बैठा हुआ था, जिसे सड़क से पकड़कर जबरन वहां ले आया गया हो। उसका परिचय भी कवि के रूप में नहीं शासकीय महाविद्यालय के 'हिन्दी साहित्य के विद्वान प्राध्यापकÓ के रूप में करवाया गया था।
भालू के पास जब से साइकिल नहीं रह गई थी, वह खोया-खोया रहता। इन दिनों वह तांगे से कॉलेज जाने लगा था। वैसे शहर में सवारियां आमतौर पर रिक्शे पर चलती थीं। तांगा सामान्य सवारी नहीं थी। लेकिन भालू को रिक्शे के मुकाबले तांगा इसलिए पसंद था, क्योंकि तांगे को घोड़ा खींचता था, आदमी नहीं। इस बात से यह निष्कर्ष निकालना भी बहुत उचित नहीं होगा कि भालू के भीतर घोड़ों के प्रति आदमी की तुलना में कम सहानुभूति या दया थी। दरअसल भालू को तांगा इसलिए पसंद था कि उसमें बैठने के बाद पीछे की ओर देखा जा सकता था। इस तरह देखने में ज्यादा इत्मीनान रहता था। पीछे देखते हुए छुपे भी रहा जा सकता था। जबकि रिक्शे के सामने की ओर मुंह और चेहरा करके बैठना पड़ता था, जिसको हर कोई देख लेता था। दूसरी बात यह थी कि यह तांगा भालू को अपने किराए के मकान से निकलते ही पीपल के पेड़ के नीचे सोए मैकू मेहरदीन के साथ तुरंत मिल जाता था। मैकू मेहरदीन गांजा पीता था। तांगे में घोड़े और गांजे की जो मिली-जुली गंध होती वह भालू को बहुत अच्छी लगती थी। और तीसरी बात यह थी कि तांगे का किराया भालू ने 'मंथलीÓ के हिसाब से तय कर लिया था, जो रिक्शे के मुकाबले कम था। वैसे यह बात भी सच थी कि तांगे में कॉलेज जाना भालू को $खुद भी अटपटा लगता था। खासतौर पर पिछले कुछ दिनों से जब से बी.ए. फाइनल में पढऩे वाली लड़की जसप्रीत कौर अपनी साइकिल से उसके तांगे के पीछे-पीछे बीच रास्ते से लग जाती थी। पौने छह फुट ऊंची, हट्टी-कट्टी, जैबलिन थ्रो, डिस्क थ्रो और भारोत्तोलन में चैंपियन जसप्रीत कौर कॉलेज में 'मालेश्वरीÓ और 'दारासिंहÓ के नाम से प्रख्यात थी। वह तांगे के पीछे-पीछे साइकिल चलाती हुई लगातार भालू से बोलती रहती- ''आप कार क्यों नहीं ंखरीद लेते सर जी? स्कूटर ले लो गुरु जी। मेरी साइकिल पे आ जाइए सर। सर, आपका घोड़ा हंस रहा है। क्या घोड़ा भी गांजा पीता है सर?ÓÓ वगैरह-वगैरह। भालू परेशान हो जाता।
भालू परेशान होकर पुलिस चौकी बार-बार जाने लगा। हवलदार राणा पहले तो चाय पिला देता था फिर धीरे-धीरे चाय पिलाना तो दूर भालू को देखकर उसने मुस्कुराना और कुर्सी से उठना भी बंद कर दिय। हवलदार राणा उससे एस.पी. के बारे में बात करना चाहता, जबकि भालू चाहता था, बात उसकी साइकिल के बारे में हो। एक दिन माला ने कहा कि पड़ोस के पाठक जी, जो कि कॉलेज में $िफजिक्स पढ़ाते हैं; कह रहे थे कि डॉ. बाल गोपाल राजोरिया को चाहिए कि वह हवलदार या थाने के एस.एच.ओ.से साइकिल चोरी की एफ.आई.आर. की कॉपी ले लें। पुलिस वाले इसीलिए एफ.आई.आर. नहीं दर्ज करते क्योंकि उन्हें तफ़्तीश करनी पड़ती है।
इस बार भालू ने हवलदार राणा से एफ.आई.आर. की कॉपी मांगी। राणा पहले तो टालता रहा फिर गरम होने लगा। भालू भी गरम हुआ। राणा गुस्से में उठा और बोला, ''नहीं है एफ.आई.आर.। तुम उसे लेकर करोगे क्या? तुम्हें साइकिल चाहिए कि एफ.आई.आर.। आओ मेरे पीछे। ह•ाार रुपल्ली की साइकिल के पीछे तुमने जान आ$फत में कर रखी है। यहां लाखों की चोरी होने पर भी बंदे तमी•ा से बात करते हैं। कोई इस तरह जान हलाकान नहीं करता।ÓÓ
हवलदार भालू को थाने के पिछवाड़े में ले गया। वहां गिरी-पड़ी हुई दीवार का एक अहाता था, जिसके अंदर टूटी-फूटी कारों, स्कूटरों, डायरों, पहियों, इंजनों का कबाड़ भरा हुआ था। उसी दीवार के दाहिने कोने पर पंद्रह-बीस टूटी-फूटी, जंग खाई साइकिलें खड़ी हुई थीं। ''ले जाओ कोई भी छांट कर। मरम्मत करा लेना। तुम्हारी वाली साइकिल मिली भी हो तो अब ऐसी ही हालत में मिलेगी।ÓÓ
''लेकिन ये मेरी साइकिल तो नहीं है।ÓÓ भालू ने कहा।
''तुम्हें साइकिल से मतलब है कि टंटा खड़ा करने से। ले जाओ कोई सी भी।ÓÓ राणा ने उसे पटाने की कोशिश की। भालू सचमुच परेशान था। एक तो चोरी की किसी और की साइकिल उठा लाने की गवाही उसका मन नहीं देता था, ऊपर से उसकी समझ में यह नहीं आ रहा था कि वह हवलदार राणा को अपनी साइकिल के रंग बदलने वाले काले रंग के बारे में कैसे बताए। शायद अपने जीवन में अब वह कभी भी वैसी दूसरी साइकिल नहीं खरीद पाएगा, जिसका कोई रंग अपने आप से अपना रंग बदल ले।
आखिर बहुत देर सोच-विचार करने के बाद भालू ने कहा- ''देखिए आप ऐसी करिए कि एफ.आई.आर. की कॉपी ही मुझे दे दीजिए। चोरी की और फिर दूसरे की साइकिल तो मैं नहीं ले जाऊंगा।ÓÓ
''आप जानबूझकर पंगा ले रहे हो। कॉलेज के प्रिंसिपल साहब भी कह रहे थे कि तांगे में कॉलेज आकर आप सबकी नाक कटा रहे हो।ÓÓ हवलदार राणा ने समझाने की कोशिश की।
''उसकी कोई बात नहीं। आप रिपोर्ट की कॉपी तो दे दें।ÓÓ भालू ने फिर कहा। उसका कहना ही गलत हो गया। हवलदार राणा उसकी ओर देखकर मुस्कुराया- 'नहीं तो आप एस.पी. साहब से मेरी शिकायत कर देंगे, है न?Ó हवलदार अपनी कुर्सी पर दुबारा बैठ गया और अपने पास ही खड़े सिपाही से सिर्फ अपने लिए एक स्पेशल कॉफी मंगवाई और दांत कुरेदते हुए डॉ. बालगोपाल राजोरिया से कहा, ''एस.पी. साहब भी तुम्हारी असलियत जान चुके हैं। तुम गांजा पीते हो तांगे वालों के साथ बैठकर और कॉलेज की लड़कियों से इश्कबा•ाी करते हो बीच सड़क पर। अब खोपड़ी मत खाओ। साइकिल बरामद हो जाएगी तो इत्तला कर देंगे।ÓÓ
भालू बहुत थका-हारा घर पहुंचा। उसने माला से ठीक से बात नहीं की। रात में पुलिस वालों के खिलाफ एक कविता लिखी। ठीक से खाना नहीं खाया और देर रात तक सो नहीं सका।
लगभग तीन महीने बाद एक दिन सुबह-सुबह सुपरिटेंडेंट ऑफ पुलिस वी.के. भूधर अपनी जीप से भालू के घर पहुंचे। उन्होंने भालू से तुरंत तैयार होकर साथ चलने के लिए कहा। उन्होंने किसी बहुत बड़ी साहित्यिक संस्था की स्थापना की थी। वहां पर देश के जाने-माने साहित्यकार, कवि, संपादक, पत्रकार आदि पहुंच रहे थे। भूधर जी चाहते थे कि भालू भी वहां चलकर अपनी कविताओं का पाठ करें।
भालू ने मुझे उस आयोजन का जो विवरण दिया था, वह लगभग उसी के शब्दो में इस प्रकार था।
''मेरी तो हवा वहां खिसक गई यार! सारे के सारे पुलिस वाले, आबकारी वाले, तहसील और दूसरे सरकारी महकमों के अ$फसर यहां कविताएं पढ़ रहे थे। जो बड़ा सा हॉल था, उसमें उन्हीं के परिवार और सरकारी डिपार्टमेंट के लोग भरे हुए थे। अजब बात थी यार। हर जगह निजीकरण हो रहा था, साहित्य को सरकारी सेक्टर में ले आया गया था। वहां भूधर जी ने अपनी कविताओं का पाठ किया। कई साहित्यिक पत्रिकाओं के शताब्दी अंकों का विमोचन वहां हुआ। कुछ पुस्तकों का लोकार्पण भी हुआ।ÓÓ
भालू ने बताया, अगले दिन सभी अखबारों में इस कार्यक्रम की खबरें छपीं। लेकिन भालू जिस घटना से आज तक परेशान है, वह रात में घटी। हुआ है कि कार्यक्रम के बाद सब लोग सर्किट हाउस आ गए। वहां भूधर जी ने खाने-पीने का इंत•ााम करवा रखा था। भालू ने कहा कि यार, अगर मुझे थोड़ा भी अंदा•ाा होता कि साहित्य का असली संसार कौन-सा होता है, तो मैं $कसम खाता हूं कि कभी कविता न लिखता। मैं तो सोचता था कि साइकिल चलाने में जो सुख और आनंद मिलता है, उसमें बैठकर जैसे मैं किसी दूसरी दुनिया में नदी के तलघर में दूर-दूर तक फैली चंद्रमा की रोशनी में डूबी रेत की कछार में, जहां चंद्रमा साइकिल की हैंडिल में सोने की तरह जलता है या मेकल पर्वत की चोटी पर पहुंच जाता हूं, कविता भी उसी तरह है। लेकिन यार, यहां तो मैं कहीं और पहुंच गया था। वे लोग तो वहां पी-पीकर धुत थे, उनसे खड़ा नहीं हुआ जा रहा था, लेकिन सबके सब साहित्य और समाज को बदल डालना चाहते थे।
भालू ने बताया कि आधी रात जब सुपरिटेंडेंट ऑफ पुलिस भूधर जी और कुछ साहित्यकारों तथा पत्रकारों के साथ सरकारी जीप में वह लौट रहा था, जीप भूधर जी ही चला रहे थे और वे आधे घंटे से अपनी कविताओं के साथ गजानन माधव मुक्तिबोध की कविताओं की तुलना कर रहे थे, अचानक भालू ने कहा था कि अच्छा हो अगर आप मेरी साइकिल बरामद करवा दें। भूधर जी जब बात को टालते हुए कबीर की फक्कड़ता और उनकी कविता पर बोलने लगे तो भालू ने उन्हें यह बताना मुनासिब समझा कि वह कभी भी गांजा आदि नहीं पीता और हवलदार राणा दरअसल झूठ बोल रहा है। भालू ने उन्हें अपने उन अनुभवों के बारे में भी बताना चाहा जो साइकिल के साथ उसके बचपन से जुड़े हुए थे। उसने बताया कि कैसे एक बार वह नदी की धार के भीतर तलघर में, अपनी साइकिल के साथ जल मकडिय़ों, बाम मछली और पानी वाले सांपों के बीच फंस गया था।
एस.पी. साहब नाराज होने लगे थे। उन्होंने गुस्से में •ाोर देकर कहा कि साहित्य और संस्कृति का पतन हो रहा हैा। यह समय सामाजिक उद्देश्य से भरे हुए साहित्य को रचने का गंभीर समय है। हद है कि आप इतनी देर से अपनी फिसड्डी साइकिल का राग आलाप रहे हैं, तो भालू ने उनसे साइकिल के काले रंग और उसकी डंडियों के त्रिभुज में खिंची उन नीली और सुनहरी रेखाओं के बारे में बताना शुरू किया, जो देखने वाले की आंख को अपने साथ उलझाकर डंडी के काले रंग को यह मौका देती थी कि वह चुपके से अपना रंग बदल ले। उसने कहा कि उसकी पत्नी ने भी इसे देखा है कि वह काला रंग वास्तव में ऐसी ही अनहोनी हरकत  किया करता था।
अब हद हो चुकी थी। एस.पी. भूधर ने एक्सीलेटर पर पैर दबाया और इतनी तेज जीप भगाने लगे कि उसमें बैठे सभी लोग डर गए। 'साहित्यÓ पत्रिका, जिसके शताब्दी विशेषांक का लोकार्पण आज इसी समारोह में हुआ था, उसके संपादक श्री त्रिपुरारी शरण ने भालू से कहा कि डॉ. राजोरिया अब आप कृपया चुप रहिए। 'शब्दÓ और 'रचनाÓ पत्रिकाओं के संपादकों ने भी उसको चुप रहने का इशारा किया। लेकिन भालू का कहना था कि भूधर जी इतने $खतरनाक तरीके से जीप भगा रहे थे और उन्होंने इतनी ज्यादा पी रखी थी कि वह वास्तव में डर गया था।
''धीरे चलिए। एक तो आपने इतनी पी रखी है, ऊपर से 80 कि.मी. से ज्यादा स्पीड में जीप भगा रहे हैं। कानून की ही बात नहीं है, हम लोगों की लाइ$फ की भी बात है।ÓÓ यह भालू ने कहा, ''यकीन मानो मैंने बस यही कहा है, कि अचानक एस.पी. साहब ने जीप रोक दी और मुझे धक्का देकर नीचे गिरा दिया।ÓÓ
''कैसे-कैसे लोग घुसे पड़े हैं साहित्य में।ÓÓ भूधर ने गुस्से में बिफर कर कहा था। भालू ने बताया कि जीप इसके बाद बड़ी तेजी से चली गई। उसके भीतर से ठहाकों की आवाजें आ रही थीं। मैं तीन घंटे उस रात पैदल चलता रहा। सबेरे चार बजे वापस घर पहुंचा। मेरे घुटने और कुहनी में खरोंचे थीं। थोड़ी सी नाक भी छिल गई थी। माला मेरा हुलिया देखकर रोने लगी। भालू ने बताया कि इसके बाद उसके कान पकड़े और फिर वह कभी भी किसी साहित्यिक आयोजन में नहीं गया।
''मुझे वहां बड़ा डर लगता है यार। पता नहीं कौन कब धक्का कर बाहर गिरा दे।ÓÓ भालू ने उस दिन कहा था। वह वास्तव में परेशान था। इस बात को महीना भर से ऊपर हो गया।
मुझे देखिए, मैं लॉन्ड्री चलाता हूं, और अपना पेट पालता हूं। साहित्य से भला मेरा क्या लेना-देना? भालू ने भी पिछले हफ्ते एक नई साइकिल खरीद ली है और वह अभी भी ''बोले रे चिरैया हो आधी रात, टिटी... हीं, टिटी हीं, टिटी हीं ऽऽ ई ऽऽÓÓ गाता हुआ, देर रात शहर की सड़कों पर या माता हरदेई मंदिर मार्ग पर, अपनी साइकिल पर घूमता रहता है। रात में अगर कोई अधनींद में उसकी आवा•ा सुनता है तो अपने आप मुस्कुरा पड़ता है। मैं अपने बचपन के दोस्त बाल गोपाल राजोरिया उर्फ भालू से यह कहना चाहता हूं कि भालू सुन, तू दरअसल में कुछ नहीं , सिर्फ रात में डरी हुई एक टिटिहरी भर है। और कहावत यही है कि किसी टिटिहरी के रोके आसमान कभी नहीं रुकता। तू अपनी साइकिल चला और आकाश की चिंता छोड़ दें।
भाई लोगों, आपको तो उस चिडिय़ा की कहानी भी पता होगी, जिसके अंडे समुद्र बहा ले गया था और तब से वह लगातार गुस्से और दुख के साथ अपनी चोंच में रेत भर-भर कर समुद्र को पाटने में लगी है। हो सकता है, आप समुद्र का ही साथ दें।  लेकिन जहां तक मेरी बात है, मैं तो उस टिटिहरी के साथ हूं, जो आसमान को रोक रही है और उस बेवकूफ चिडिय़ा के साथ हूं, जो समुद्र को अपनी चोंच की रेत से पाट रही है। मेरी यही बात भालू उर्फ बाल गोपाल राजोरिया के बारे में भी लागू होती है।