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Wednesday 22 Nov 2017

जसोदा एक्सप्रेस


सुषमा मुनीन्द्र
द्वारा, श्री एम. के. मिश्र (एडवोकेट)
लक्ष्मी मार्केट, रीवा रोड,
सतना (म.प्र.)-485001
निगाही।
छोटा सा गांव।
वे सालों बाद निगाही आये हैं। कुल दो दिन के प्रवास पर। इस प्रवास में वे यही शोर सुनते रहे- जसोदा आ गई ... जसोदा खड़ी है... जसोदा चली गई...। जसोदा एक्सप्रेस ट्रैकर का नाम है। जसोदा निगाही और पचास किलोमीटर दूर बसे शहर के बीच दिन भर आवाजाही करती है। निगाही वासी, निकटवर्ती कस्बे अथवा शहर अथवा गांव और शहर के बीच में बसे अन्य गांवों तक जाने के लिये जसोदा पर निर्भर करते हैं। मनुष्य सुविधाभोगी जीव है। सुविधाओं का इतना जल्दी आदी हो जाता है कि फिर उस सुविधा के बिना इतनी असुविधा होने लगती है मानो वह असुविधा में कभी रहा नहीं।  कुछ साल पहले तक निगाही के लोग मुख्य सड़क से पांच किलोमीटर पैदल चलकर निगाही बड़े आराम से पहॅुंचते थे। अब जसोदा के बिना जरूरी काम टाल दिये जाते हैं पर पांच किलोमीटर पैदल चल कर मुख्य सड़क पर खड़े होकर सर्विस (गांव के लोग सरकारी बस को सर्विस कहते हैं) का इंतजार करना उन्हें असुविधाजनक लगता है। प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना के तहत निगाही को सड़क की सौगात मिल गई और जसोदा एक्सप्रेस पैसे कूटने में लगी है।
वे अपनी चाची की सबसे छोटी पुत्री अलकनंदा के विवाह में आये हैं। पत्नी और दोनों बच्चों को साथ लाना चाहते थे पर पत्नी वातानुकूलन में रहने की अभ्यस्त ठहरी।
''जानते हो न मई चल रहा है। गाडि़यों में भीड़ और गांव की गर्मी। मैं भीड़ और गर्मी बिल्कुल नहीं सह सकती। ए.सी. में रहने की आदत हो गई है। बच्चों ने कुछ हॉबी क्लासेस भी ज्वाइन की है।ÓÓ
''चाची का बहुत एहसान है मुझ पर। जब मैं पढ़ रहा था मेरे अम्मा-बाबूजी गुजर गये। मुुझे चाचा-चाची ने सहारा दिया और पूरी जिम्मेदारी से दिया।ÓÓ
''इसीलिये अलकनंदा के लिये पूरे बीस ग्राम की चेन भेज रही हूं। सोने की कीमत तो जानते ही हो।ÓÓ
''तुम लोग चलते तो चाची को अच्छा लगता।ÓÓ
''सड़ी गर्मी में।ÓÓ
''निगाही में छत पर सोकर तो देखो। छत बिल्कुल हिमालय है। मोटी चादर ओढ़कर सोना पड़ता है।ÓÓ
''ग्लोबल वॉर्मिंग के दौर में कोई छत हिमालय नहीं होती।ÓÓ
उन्होंने फोन पर चाचा को सूचित किया- वे आ रहे हैं। चाचा ने उन्हें बार-बार समझाया- ''बेटा, अब गांव पैदल नहीं आना पड़ता है। जसोदा एक्सप्रेस चलने लगी हैै। उसमें आ जाना। यह तुम्हें बस स्टैण्ड वाले हनुमानजी के मंदिर के ठीक सामने मिलेगी। अच्छा।ÓÓ
रेलवे स्टेशन से वे बस स्टैण्ड के पास वाले हनुमानजी के मंदिर आये लेकिन जसोदा एक्सप्रेस नाम का वाहन नहीं  ढूंढ पाये। तब जिगना की ओर जाने वाली बस में बैठ गये और निगाही के पहुंच मार्ग पर उतर कर पैदल निगाही पहुंचे। उनकी पिचकी ट्यूब टायर सी दशा देख चाची सकते में आ गईं।
''जसोदा में नहीं आये? लौटते समय जसोदा से जाना। जसोदा यहां स्कूल के पास से सकारे साढ़े सात बजे छूटती है। साढ़े नौ बजे तक सहर पहुंचा देगी। वापसी की ट्रेन साढ़े ग्यारह बजे है न। जसोदा चलने लगी है तो बड़ा आराम हो गया है बेटा।ÓÓ
चाची के चेहरे पर छाया कौतुक देख कर वे हंस दिये। ट्रैकर का नाम जसोदा एक्सप्रेस सुन कर तो निमग्न हो गये। उन्हें भारत की रेलों और नदियों के नाम बहुत लुभावने लगते हैं। बोले -
''ठीक है चाची। देखा जाये जसोदा एक्सप्रेस में कितना आराम मिलता है।ÓÓ
तीसरे दिन सुबह जब वे जसोदा में बैठे, भोर की धूप उजली और वायु नम थी। उन्होंने घड़ी देखी। साढ़े सात। जसोदा में चार-छ: सवारी पहले से मौजूद थी। अच्छे कपड़ों और शहरी होने के कारण उन्हें आगेे की सीट दी गई। वे चालक से बोले -
''जल्दी पहुंचा देना। साढ़े ग्यारह बजे दिल्ली की ट्रेन पकडऩी है।ÓÓ चालक ने भरोसा दिलाया ''जसोदा माने उडऩ खटोला। समझो आप पहुंच गये।ÓÓ
 यह पहली ट्रिप है इसलिये चालक कुछ ताजा दिख रहा है। अंतिम ट्रिप तक लस्त-पस्त हो जाता है। पैसा कूटना है तो अधिकतम ट्रिप करनी पड़ती है।
 जसोदा चल दी। सूखू टोला, बम्हनान, अहिरान, बनियातरी आदि टोलों से इतने लोग चढ़े कि जसोदा क्षमता से अधिक भर गई। धुंआ-गंध-पसीना। उन्होंने जेब से रूमाल निकाल कर नाक पर रख लिया। वे देख रहे हैं फिर भी विश्वास नहीं कर पा रहे हैं जसोदा में इतने लोग कैसे समा सकते हैं। थोड़ा आगे जाकर अधिकांश लोगों को उतरना पड़ा। किसी ने दांयें तरफ के खेत का पानी बांयें तरफ के खेत में ले जाने के लिये रातों-रात सड़क खोदकर नाली बना ली थी। जसोदा क्षमता से अधिक भरी थी अत: पहिया नाली में फँस जाने जैसी आशंका से चालक ने सवारियों को उतार दिया। उतरने-चढऩे में दस मिनिट व्यय हुए। जसोदा चली। निगाही का पहुंच मार्ग जहां मुख्य सड़क से जुड़ता है वहॉं एक गांव बसा है। मुख्य सड़क से लग कर बसा होने के कारण लोग इस गांव को उन्नत मानते हैं। यहां पाठशाला, ग्रामीण बैंक और आवागमन की अच्छी सुविधा है। जसोदा यहां आकर रुक गई। चार-छ: लोग उतरे। एक अधेड़ और पन्द्रह-सोलह वर्ष की युवती चढ़ गये। उनका ध्यान युवती की ओर गया। नयी चटक साड़ी, गोटा लगा ब्लाउज, मांग में सिंदूर, चमकीली टिकुली, चांदी और गिलिट के गहने। युवती नव परिणीता जान पड़ती थी। अधेड़ और युवती की बातों से पता चला वे पिता-पुत्री हैं और मजदूरी करते हैं। युवती के मामा के गांव में बांध बन रहा है जहां ये काम करने जा रहे हैं। वे सोचने लगे कुछ दिन अच्छा पहन ले फिर तो सिर में तसला रख गारा ही ढोयेगी। सहसा उन्होंने घड़ी देखी। साढ़े आठ। वे परेशानी में थे जबकि चालक कुछ और सवारियों की प्रतीक्षा में रुका था। जल्दी ही सिर पर गठरी-मोटरी लादे कांछ वाली उटंग धोती पहने हाथ से गाड़ी को रोक रखने का संकेत करती लगभग दौड़ती हुए चार औरतें आ पहॅुंची।
खलासी चिल्लाया ''जल्दी बैठो।ÓÓ
चारों जसोदा में विराज गईं। उनके मुख पर किला फतह कर लेने जैसा उत्साह था।
खलासी विशिष्ट अंदाज में चिल्लाया ''चल्यो।ÓÓ
जसोदा चली लेकिन पांच-छ: किलोमीटर आगे गढ़ी में दो लोगों को उतारना था।
खलासी फिर विशिष्ट अंदाज में चीखा ''रोक्के....।ÓÓ
चूं...चूं..चूं....। जसोदा रुक गई।
चालक चिल्लाया ''गाड़ी काहे नहीं चलाने देता बे?ÓÓ
''का करें ? अइसन-अइसन बौड़म सवारी बइठती हैं के.. दादा जल्दी उतरो।ÓÓ
जिस जसोदा को गॉंव वाले सुविधा कहते हैं वह उन्हें अपने जीवन का सबसे बड़ा श्राप मालूम पड़ती थी। वे अपमानित महसूस कर रहे थे। इस तरह की भीड़, गंध, बेवकूफियों का सामना करना पड़ेगा उन्होंने नहीं सोचा था। दिल्ली के ठाट स्मरण हो आये। ठाट याद आते ही उन्हें लगने लगा वे अपमानित नहीं बल्कि बेइज्जत हो रहे हैं। आगे सड़क पर किसी वाहन के शीशे किरिच-किरिच हुए फैले थे। ठीक उनकी बगल में आसीन अधेड़ बताने लगा ''परसों यहां पर जीप और ट्रक टकरा गये थे। दो लोग तो तुरंतै मर गये।ÓÓ
अधेड़ उनमें काफी रुचि ले रहा था जबकि वे प्रतिक्रियाविहीन बैठे रहे। अन्य लोगों ने प्रतिक्रिया दी-
''आजकल के ड्राइवर आंख मूंद कर चलाते हैं।ÓÓ
''सड़क की हालत देख रहे हो कैसी खराब है। सरकार सो रही है।ÓÓ
''हां तो ड्राइवर सड़क के गड्ढे देखे कि सामने से आता वाहन देखे?ÓÓ
''ओभर लोडिंग के कारण इक्सीडेन्ट हो रहे हैं। समझेे न। अरे भइया, यह सादी-ब्याह का सीजन है। लोग बसों और रेलों की छत पर बैठ कर आना-जाना कर रहे हैं। सत्तर सीट वाली बस में यदि डेढ़ सौ आदमी न बैठे तो ड्राइवर गाड़ी नहीं हॉंकता है।ÓÓ
वे खिसिया गये ''लोग बैठते क्यों हैं? बस में जगह नहीं है तो दूसरी बस का इंतजार करें।ÓÓ
उन्हें बोलते देख अधेड़ ने रुचि बढ़ा ली ''कौन घाम में खड़ा रहे साहब। दूसरी बस फिर पता नहीं कितनी देर बाद मिले। तो थोड़ा कष्ट ही सही।ÓÓ
वे उपेक्षा से बोले ''तब तो रोज दुर्घटना होगी। न लोगों को कानून और व्यवस्था का लिहाज है न ड्राइवर-कन्डक्टर को डर है।ÓÓ चालक ने दखल दिया ''कानून हो तो हम डरें। पुलिस को खुस रखो। बस।ÓÓ
वे आजिज आकर चुप हो गये। सांस लेना दूभर हो रहा है, बात करने की ऊर्जा कहॉं से लायें। सहसा जसोदा जोर से उछली। कुछ लोगों के सिर आपस में टकरा गये। पहिया बड़े गड्ढे में पड़ गया था।
कोई सिर को सहलाते हुये, मुंह से सी-सी की ध्वनि निकालते हुए बोला ''ड्राइवर धीरे चलो। जान है तो जहान है।ÓÓ
उनकी नजर जसोदा में चिपकाये गये दुर्गा देवी के स्टिकर पर पड़ी। ठीक नीचे लिखा था- ईश्वर आपकी यात्रा सफल करें। सचमुच इस तरह की यात्रा भगवान ही सफल कर सकते हैं। आगे संकरी पुलिया थी। बोर्ड में लिखा है- पुलिया कमजोर है। कृपया धीरे चलें। वे कॉलेज के दिनों से इस चेतावनी को पढ़ते आ रहे हैं। पुलिया अपना कर्तव्य किये जाती है लेकिन शासन-प्रशासन को इसकी कमजोरी खत्म करने की सुध अब तक नहीं आई।
ग्यारह किलोमीटर की दूरी तय कर जसोदा जब कस्बा पहॅुंची सवा नौ हो रहे थे। चालक ने पेट्रोल पम्प के पास गाड़ी रोकी और सामने की दुकान में चाय पीने लगा। जाते-जाते कह गया ''चाह पी लें तो कुछ आंख खुले। दो दिन से बारात ढो रहे हैं। ठीक से सो तक नहीं पाते।ÓÓ
वे दहशत में हैं। रात भर का जागा चालक किस तरह पहुंचायेगा? उन्होंने चारों तरफ देखा। कोई दूसरा वाहन दिखे तो उसमें चले जायें। कोई वाहन नहीं दिखा। शादी-ब्याह और चुनाव के समय वाहन उपलब्ध नहीं होते। बसें-जीपें बारात ढो रही हैं। बस स्टैण्ड यहां से एक किलोमीटर है। रिक्शा ले वहॉं जायें और वहॉं बस न मिले तो जोखिम होगा। जितने लोग यहॉं उतरे उससे दो गुने चढ़ गये फिर भी खलासी पूरी ताकत से चिल्ला कर लोगों को आकृष्ट कर रहा था।
''आज तो ट्रेन छूट जायेगी।ÓÓ वे अत्यधिक परेशानी में मानो अपने-आप से बोले।
अधेड़ को रुचि दिखाने का मौका मिल गया ''कितने बजे की ट्रेन है?ÓÓ
''साढ़े ग्यारह बजे। रीवा-नई दिल्ली एक्सप्रेस।ÓÓ
''तब तो जाइये, ड्राइवर को बुला लाइये। वह ऐसे नहीं आयेगा। आपका कुछ लिहाज करेगा और आ जायेगा।ÓÓ
वे कसमसाते हुए बैठे रहे ''इन छोटी जगहों में भी महानगरों की तरह यातायात के नियमों का सख्ती से पालन होना चाहिये। जो पालन न करे उसका चालान हो।ÓÓ
अधेड़ लट्टू हो गया ''अउर का। हम एक बार दिल्ली गये रहे। समझ लीजिये, बस थोड़ा सा रुकती थी। लोग बैठें तो अउर न बैठें तो। हम तो चढ़ ही नहीं पाते थे। अउर दिल्ली मेें आप इस तरह जहॉं-तहॉं वाहन खड़ा नहीं कर सकते। अउर यहां। गाड़ी फुल्ल है पर खलासी चिल्लाता जा रहा है।ÓÓ
पीछे की सीट पर बैठे त्रिपुण्डधारी ने अपना अनुभव सुनाया ''एक बार मैं बुरा फंसा था साहब। बस स्टार्ट थी। मैं बैठ गया। ड्राइवर लोग बस स्टार्ट किये रहते हैं जिससे लगता है बस छूटने ही वाली है। इस लालच में लोग बैठने लगते हैं। उस ड्राइवर को सवारी नहीं मिल रही थी इसलिये वह गाड़ी नहीं चला रहा था। किसी तरह चलाई तो क्या देखता हूं वह शहर के चौराहे का चक्कर लगाकर सवारी ढूंढ रहा है। घंटा भर बाद वह बस वहीं ले आया जहां से चला था। बहुत हो हल्ला हुआ तब बस चित्रकूट के लिये रवाना हुई। ये ड्राइवर लोग ऐसी-ऐसी चालाकी करते हैं, ऐसा-ऐसा चकमा देते हैं कि कहते नहीं बनता। आदमी कहां जाकर इनकी शिकायत करे? जाइये, ड्राइवर को बुलाइये। नहीं तो ट्रेन छूट जायेगी।ÓÓ
वे फनफना गये ''आप मेरी सीट देखना।ÓÓ
अधेड़ ने वचन दिया ''बिल्कुल। गर्मी से प्राण जाते हैं।ÓÓ
इच्छा थी चालक की गर्दन मरोड़ दें लेकिन धीरज से बोले ''चलो भी।ÓÓ
चालक ने उन्हें ऐसे विलोका जैसे उन्होंने छिछोरी बात कह दी हो ''चलते हैं। हमें अपना धंधा भी देखना पड़ता है।ÓÓ लेकिन जल्दी ही उनके वस्त्रों और आभिजात्य का ख्याल कर सभ्य बन गया ''चलिये, हम आ रहे हैं।ÓÓ
लौटते हैं और देखते हैं उनकी सीट पर कुरते की बाहें कोहनी तक चढ़ाये बड़ी मूंछों वाला आदमी आसीन है।
वे बोले ''मिस्टर सीट मेरी है।ÓÓ
मूंछ वाला ठेठ बघेली में बोला ''सीट मा तोंहार नाम लिखा हय का?ÓÓ
''नाम आपका भी नहीं लिखा। मैंने आपसे कहा था सीट देखना।ÓÓ उन्होंने अधेड़ को साक्षी बनाया।
अधेड़ सकुचा गया ''ये माने नहीं।ÓÓ
''हम त न उठब। जा थाना-कचहरी। रपट लिखाबा। पइसा दिहे हयन ता सीट मा त बइठबै करब।ÓÓ
मूंछ वाला विपरीत दिशा में इस तरह देखने लगा जैसे प्रपंच में पडऩे की आदत नहीं।
उन्होंने खुद को विवश पाया। न सामान्य नागरिक के मूलभूत अधिकारों की दुहाई दे सकते हैं, न अपने पद का प्रयोग कर सकते हैं, न इस मूंछ वाले को कानून समझा सकते हैं। बाकी लोग सीन देख रहे हैं। मॅूंछ वाले का विरोध करने का हौसला किसी में नहीं है। पीछे बैठे त्रिपुण्डधारी ने विकल्प दिया -
''पीछे आ जाइये साहब, हम जगह बनाते हैं।ÓÓ
वे किसी तरह बनाई गई जगह में फिट हो गये। त्रस्त हैं पर सोचने लगे - इस परिस्थिति में चालक गाड़ी कैसे चला पाता है और पूरा पैसा देकर लोग कितनी जहमत झेलते हैं। दिल्ली में वे ए.सी. कार में अकेले बैठ कर चलते हैं। सचमुच इस देश में बहुत असमानता है।
कुल अड़तालीस सवारी लेकर किसी तरह जसोदा चली। लोग सीटों पर, सीटों के बीच में, पीछे खड़े हुए, पायदान पर एक पैर टिकाये हुये, बोनट पर लदे हुए, चालक की ओर लटके हुए यात्रा पर हैं। चालक तिल भर स्थान पर बैठ कर गाड़ी चला रहा है। चालक की दाहिनी ओर बैठे दो आदमियों में से एक ने पूछा-
''दादा, आराम से हो न?ÓÓ
चालक मगन है ''हौ, हौ। सीजन में कुछ कमाई हो जाती है।ÓÓ वे जसोदा के भीतर लोगों से ऐसे घिरे हैं कि बाहर के वातावरण की झलक नहीं मिल रही है। मानो बंद गाड़ी में बैठे हैं। वे चिंतित हैं कब गन्तव्य तक पहुंचेंगे लेकिन लोग निश्चिंत हैं। कोर्ट-कचहरी, राजनीति-नेता, बाजार भाव-महंगाई, ग्रामीण स्कूल में कराई जाती नकल, महंगी शादियों पर इतनी बात कर रहे हैं कि उन्हें लग रहा है मस्तिष्क फट जायेगा।
''रोक्के...।ÓÓ खलासी चिल्लाया।
युवती और उसके पिता का गंतव्य आ गया है। उन्हें उतरना है। गाड़ी अच्छी गति में थी। चालक झल्ला गया-
''का बे? आज एकय ट्रिप में दिन बिता देगा का?ÓÓ
''का करें? अइसी बौड़म सवारी...।ÓÓ
''हम बता दिये थे भटनमारा में उतरेंगे। अब गाड़ी काहे न रोकोगे?ÓÓ युवती जोर से चिल्लायी।
युवती और उसका पिता गाड़ी में इस तरह फंसे थे कि उन्हें उतरने में बहुत समय लगा। स्थिति का लाभ ले युवती को उतरने में सहायता पहुंचाते हुए आशिक मिजाजों ने जहां-तहां छुआ। वे वितृष्णा से भर उठे। आज का मनुष्य कितना शातिर होता जा रहा है।
''चलो...।ÓÓ खलासी ने हांक लगाई।
''अब न रोकेंगे।ÓÓ चालक ने चेतावनी दी।
''कइसे न रोकोगे? हम चोरहटा में उतरेंगे। सेंत में नहीं बैठे हैं। केराया दिये हैं।ÓÓ गठरी-मोटरी वाली एक औरत बोली।
युवती और उसके पिता के उतरने से खाली हुई जगह इस तरह भर गई कि सोच पाना कठिन है वे दोनों कहां और कैसे बैठे थे। पांच-सात किलोमीटर आगे बढऩे पर पेड़ के नीचे खड़े दो स्कूली लड़कों ने हाथ दिखाकर जीप रोकी। लड़के चालक के परिचित थे और शायद रोज इसी विधि से स्कूल तक पहुंचते थे। चालक चिल्लाया -
''सोहन, जल्दी आओ।ÓÓ
''पहुंचा दो भाई। या ट्रेन छुड़वा कर दम लोगे।ÓÓ
ऊंचे ओहदे के साथ वे इस तरह कातर हो सकते हैं उन्हें मालूम नहीं था।
''बाबूजी, आप तो पढ़े-लिखे हैं। इस घाम में लड़कों को कहां छोड़ दें। इंसानियत कुछ होती है।ÓÓ कहते हुए खलासी ने दोनों लड़कों को जसोदा में खींच लिया।
उन्हें इंसानियत का पाठ इस खलासी से सीखना होगा। वे इतना क्यों सह रहे हैं? विभाग में किसी का इतना साहस नहीं है जो बताये उन्हें क्या सीखना चाहिये। इच्छा हुई दो कौड़ी के खलासी को बतायें वे क्या हैसियत रखते हैं पर उसको मुंह लगाना उन्हें ओछापन लगा। वस्तुत: वे इतने संत्रस्त हो चुके थे कि कुछ कहने-सुनने की क्षमता नहीं थी। लड़के बैठे और अपने लिये जगह भी बना ली। भीड़ में जगह बनाना आना चाहिये।
जसोदा चोरहटा पहुंची।
गुमटी में पान खा रहे पुलिस के जवान ने गाड़ी रोक ली। गाड़ी वाले इस रूट से संबंधित पुलिस कर्मियों को खिलाते-पिलाते रहते हैं लेकिन कभी हत्थे भी चढ़ जाते हैं। गाड़ी रुकते ही आधे लोग इस तत्परता से उतर गये जैसे इस तरह की आकस्मिक अड़चनों के आदी हैं। चालक ने सलाम बजाया -
''मालिक, लोग मानते नहीं। सबको बइठाना पड़ता है। इसलिये थोड़ा ओभर लोडिंग हो जाती है। एक साहब बइठे हैं। उन्हें ट्रेन पकडऩी है। जल्दी में हूं हजूर।ÓÓ
सिपाही कुछ मसखरा सा था ''जल्दी है तो तुम्हें नहीं रोकूंगा। इतना बता दो इतनी ढेर सवारी बैठा कर चला कैसे लेते हो?ÓÓ
चालक झेंप गया ''जादे नहीं है साहेब।ÓÓ
''पचास तो तब भी लगती हैं।ÓÓ सिपाही ने अनुमान लगाया।
''लोग मानते नहीं हैं। सबको बइठाना पड़ता है। मालिक।ÓÓ
''पूरे करतबबाज हो। बैठाओ, बैठाओ। सबको बैठाओ। इस समय चालान खूब हो रहा है, बताए देते हैं।ÓÓ
''हुकुम।ÓÓ
सिपाही के हटते ही खलासी ने हांक लगाई और लोग आकर तेजी से लद गये। उन्होंने माना ऐसी आवाजाही इन लोगों के लिये सामान्य बात होगी। गठरी-मोटरी वाली चार औरतों को खलासी ने नहीं बैठने दिया -
''तुम लोगों को चोरहटा में उतरना था। यही चोरहटा है।ÓÓ
''नहीं, थोड़ा आगे जायेंगे। यहॉं से बहुत पैदल जाना पड़ेगा।ÓÓ एक महिला ने गठरी, गाड़ी में रख दी।
खलासी ने गठरी सड़क पर गिरा दी ''आगे गाड़ी नहीं रुकेगी।ÓÓ
''अंधेर है दादू। पूरा पइसा दिये हैं।ÓÓ
औरतों की फरियाद पर किसी का ध्यान नहीं था। लोग धुन में हैं। वे इतने संत्रस्त हो चुके हैं कि उन्हें लगा सिपाही ने जीप रोक कर षड्यंत्र रचा है। ताकि वे ट्रेन न पकड़ सकें। उन्हें अपनी सहनशक्ति पर हैरानी हो रही थी। यह सब कैसे सह रहे हैं? औरतें खलासी को गाली देने लगीं और चालक ने गाड़ी बढ़ा दी।
जसोदा ने रफ्तार पकड़ी। लेकिन ठीक सामने पूरी सड़क पर कब्जा किये हुए गाय-भैसों का समूह है। इतने पशुओं को दस-बारह साल का दुबला बालक नियंत्रित कर रहा था। बचपन बचाओ जैसा नारा ऐसे बच्चों तक नहीं पहुंचता। चालक लगातार हॉर्न बजाता रहा पर पशु तो पशु ठहरे। बालक डण्डे के प्रहार से पशुओं को किनारे करने की असफल कोशिश में लगा रहा। गाड़ी के पायदान में एक पैर से आसरा लिये हुए व्यक्ति ने एक भैंस की पूंछ मरोड़ दी। भैंस बिदक कर उछलने लगी। लोगों के लिये यह हंसने का अच्छा मौका था। वे दु:खी हुए। ऐसी धक्का-मुक्की में लोग हॅंस कैसे पाते हैं? गाड़ी गाय के पुट्ठे से टकरायी और पशुओं ने किसी तरह निकलने लायक जगह बना दी। खलासी और लोग सामूहिक रूप से बालक को गाली देते रहे। आज की यात्रा उनके जीवन की सबसे घटिया घटना होगी। उन्होंने घड़ी देखी। पौने ग्यारह। ट्रेन तो गयी। शहर लगभग दस किलोमीटर की दूरी पर है। खलासी ने छुट्टा नहीं है कह कर लोगों के किराये से बचे शेष पैसे अब तक नहीं लौटाये हैं। जल्दबाजी में लोग उतर जाते हैं और शेष पैसे खलासी की जेब में। एक ग्रामीण दो रुपये के लिये तब से आफत किये है-
''ए हो, दुइ रुपिया लौटाओ।ÓÓ
''दे देंगे। भागे नहीं जा रहे हैं। बस स्टैण्ड में छुट्टा करायेंगे तब दे देंगे।ÓÓ खलासी उपेक्षा से बोला।
''छुट्टा ले के चला करो। लूट मचाये हो।ÓÓ
''दद्दा दिमाक न खा लो। बहुत लोगों का पैसा लौटाना है।ÓÓ
''पैसा मांग रहे हैं, दिमाक नहीं खा रहे हैं। हो गया हमारी तरफ से तुम दुइ रुपिया का समोसा खा लेना।ÓÓ
हंसने का यह एक और मौका।
खलासी ने खिसिया कर जेब से दो रुपये का सिक्का निकाला ''समोसा तुम खा लेना। अइसी बौड़म सवारी... रुपये दो रुपये के लिये लोग इज्जत उतार लेते हैं।ÓÓ
जसोदा में थोड़ा प्रहसन चल रहा था उधर सामने से चले आ रहे ट्रक से बचने के लिये चालक ने स्टेयरिंग झटके से घुमा दी। पायदान पर टिका व्यक्ति असंतुलित होकर नीचे जा गिरा। भगवत्कृपा से सड़क के किनारे पड़े बालू के ढेर पर गिरा। लोगों ने शोर मचाया। गाड़ी रुक गई। किसी के गिरने पर लोग हॅंसी नहीं रोक पाते। गिरने वाला किसी तरह उठा लेकिन लोगों को हंसते देख अपमानित हुआ ''डिराइवर तुम कैसी गाड़ी चलाते हो?ÓÓ
चलक ने अपना पक्ष रखा ''आप ठीक से नहीं बैठे थे। हम गाड़ी न काटते तो ट्रक वाले ने मार ही डाला था। ट्रक वाले अंधे होकर चलाते हैं। लगी तो नहीं?ÓÓ
''तुम इतनी सवारी काहे भरते हो?ÓÓ गिरने वाला छिल गई कोहनी पर फूंक मारने लगा।
जवाब खलासी ने दिया ''आप लोग बैठते हो तभी हम बैठाते हैं। न बैठो।ÓÓ
प्रतिक्रियायें आने लगीं।
''पूरा किराया दो लेकिन आराम से सफर नहीं कर सकते।ÓÓ
''अरे भैया। सफर पर निकलो तो पता नहीं होता सकुशल घर लौटेंगे या राम नाम सत्य होगा।ÓÓ
गिरने वाले को एहतियात के तौर पर बीच में बैठाया गया। लोगों ने सहानुभूति दी ''चलो बच गये। सुनो ड्राइवर। आराम से चलाओ। हवाई जहाज की तरह न उड़ाओ।ÓÓ
शहर दिख रहा है लेकिन अभी टमस नदी पर बने टोल बैरियर पर पर्ची कटानी है। वाहनों की लम्बी लाइन लगी है। पुल निर्माण की लागत बहुत पहले वसूली जा चुकी है लेकिन टोल टैक्स लेना जारी है। पर्ची कटाकर आगे बढऩे तक पन्द्रह मिनिट स्वाहा। अब यहॉं से गति नहीं बन पाती। सड़क पर भीड़ और जगह-जगह बने स्पीड ब्रेकर। जिस स्पॉट पर दुर्घटना होती है वहां फौरी तौर पर स्पीड ब्रेकर बना दिया जाता है। मानो दुर्घटना रोकने का यह कारगर उपाय है। जसोदा बार-बार रुकती रही। जिस व्यक्ति का घर जिस जगह से समीप है वह वहीं गाड़ी रुकवा लेता है। जसोदा जब अंतिम रूप से बस स्टैण्ड के पास वाले हनुमानजी के मंदिर के पास ठहरी, साढ़े ग्यारह हो चुके थे। चालक ने मानो मसखरी की ''लो साहेब, पहुंचा दिया। आप किसी दूसरे वाहन से आते वह हमसे पहिले नहीं पहॅुंचा सकता था। आपने देखा होगा कोई वाहन हमें ओभर टेक कर आगे नहीं निकला।ÓÓ
उन्होंने जवाब देना अपना अपमान समझा। चुपचाप जसोदा एक्सप्रेस से उतर गये। लग रहा था महीनों से यात्रा पर थे। यहां से रेलवे स्टेशन तीन किलोमीटर है। जो रिक्शा सामने दिखा उस पर बैठ गये-
''रेलवे स्टेशन। तेज
चलाओ।ÓÓ