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Saturday 25 Nov 2017

उनके बाप का मैदान


सुबोध कुमार श्रीवास्तव
जी-1/102, प्रथम तल, गुलमोहर कॉलोनी, ई-8
पंजाब नेशनल बैंक के पास
भोपाल (म.प्र.)- 462039
मो- 09907564010
दस-बारह वर्ष की उम्र के कुछ लड़के मैदान में खेल रहे हैं। रेल्वे कॉलोनी का खुला मैदान देखकर वे उस पर अपना अधिकार जमा लेते हैं। दोपहर का समय है और इस समय ये लड़के इस खाली मैदान को अपने बाप-दादाओं का आंगन समझते हैं। इस तरह का चकाचक अवसर इन्हें दोपहर को ही मिल पाता है जब इनके हमउम्र प्रतिद्वंदी लड़के अपने-अपने अंग्रेजी माध्यम वाले पब्लिक स्कूलों में किताब-कापियों से खेलते रहते हैं। नगरपालिका के टाटपट्टियों वाले स्कूलों में दो-तीन साल तक शिक्षकों से कुटने-पिटने के बाद इन होनहारों का ही नहीं, इनके पालकों का भी पढऩे-लिखने और पढ़ाने-लिखाने के प्रति मोहभंग हो जाता है और ये लड़के 'सारे जहां से अच्छा हिन्दोस्तां हमाराÓ गाते-गुनगुनाते हुए कभी भी, कहीं भी मस्ती मारते-फिरते हैं। इनके बदन पर कपड़े नहीं लत्ते होते हैं। भले ही धारीदार चड्डी फटी हो, हॉफपेंट में पीछे थिगड़े जुड़े हों या पायजामे में पांच सौ चालीस छेद हो, ये लड़के नंगे नहीं रहते। शर्म बड़ी चीज है और ये उसे बचाए हुए हैं। यूं भी आजादी के लगभग छ: दशकों बाद हमने इतनी तरक्की तो की ही है। समाज कल्याण, बाल कल्याण जैसे और भी कई कार्यालयों में, शासकीय-अद्र्ध शासकीय कार्यालयों की फाइलों में गरीबी की रेखा से नीचे का जीवन जीने वालों के नाम दर्जो होते हैं। भरी दोपहर रेलवे के मैदान में खेल रहे बच्चे इसी तरह के परिवारों की चाही-अनचाही शानदार औलादें हैं। झुग्गी-झोपडिय़ों की पैदाइश।
इन लड़कों का कप्तान भगोला और उप कप्तान करीम है। इनके पास गेंद नहीं है, बल्ला नहीं है और न ही स्टम्प हैं पर इनके पास एक गिल्ली, एक डंडा और खेलने का अटूट हौसला है। इनका प्रिय खेल है गिल्ली-डंडा, जो सस्ता-सुन्दर-टिकाऊ भी है। भगोला और करीम इसे क्रिकेट का बाप कहते हैं और टीम के सदस्यों ने इस खेल का क्रिकेटीकरण भी कर लिया है और नया नाम दिया है- 'ग्रिलेटÓ।
उपकप्तान करीम ने पहले टुल्ला मारने की परची निकाली और बीच मैदान में गुच्ची खोद कर उसमें गिल्ली जमा ली और टुल्ला मारने के लिए तैयार हो गया। कल्लू, चुन्नू, अब्दुल, मम्मू, टिल्लू, गन्नू व टीम के अन्य खिलाड़ी मैदान में फैल गए। कप्तान भगोला निर्देश देने लगा कि किसको किस पोजीशन पर खड़ा होना है। कितनी दूर गिल्ली जाने पर कितने रन मिलेंगे, यह पूर्व निर्धारित है। एक खिलाड़ी एक ओव्हर यानी छ: बार टुल्ला मार सकता है। वह डंडे की हल्की मार से पहले गिल्ली को हवा में उछालता है और फिर जमीन पर गिरने से पहले ही उस पर जबरदस्त प्रहार करता है। यदि किसी खिलाड़ी ने गिल्ली जमीन पर गिरने से पहले ही पकड़ ली तो वह कैच आउट हो जाता है। इस खेल में खिलाड़ी के किसी और तरह से आउट होने का प्रश्न नहीं नहीं है। होंगे क्रिकेट में किसी खिलाड़ी के आउट होने के दस तरीके।
करीम पहले 'डंडिगÓ यानी बैटिंग कर रहा है इस सस्ते और सुन्दर खेल में बॉलिंग की कोई गुंजाइश नहीं है। दो बार गिल्ली उछाल नहीं लेती तो वह तीसरी बार बड़ी सावधानी से उसके किनारे पर डंडे से हल्का वार करता है और कुछ ऊपर उठने पर पूरी ताकत से टुल्ला जमा देता है। गिल्ली मैदान के बाहर चली जाती है। कोई भी खिलाड़ी उसे कैच नहीं कर पाता। वह खुशी से चिल्लाता है, 'छक्का है, सिक्सर, पूरे छ: रन हुए। पिछली कसर भी पूरी हो गई। दो रन का औसत हो गया।Ó
कल्लू और अब्दुल गिल्ली के पीछे दौड़ रहे थे। करीम के मुंह से छक्का सुनकर कल्लू भी चिल्लाया, 'छक्का नहीं चौका है। मैदान के अंदर टप्पा खाकर गिल्ली बाहर गई है। चार रन मिलेंगे।Ó
शेष सभी खिलाड़ी भी कल्लू के स्वर में स्वर मिलाते हुए चीखे, 'चौआ है। चार रन हुए।Ó
करीम कुछ सोचकर अब्दुल की ओर देखता है, बड़ी आशा भरी निगाह से जैसे वह तीसरा अम्पायर हो। अब्दुल भी उसे दो टूक जवाब दे देता है, 'तुम हमारे मामू के लड़के हो तो इसका यह मतलब तो नहीं है कि मैं चौआ को छक्का कह दूं। इतने लड़के झूठ तो नहीं बोलेंगे।Ó
फैसला हो गया और करीम को चार ही रन दिए गए। इस खेल में 'रिप्लेÓ की कोई व्यवस्था नहीं है। खिलाडिय़ों का बहुमत मान्य है। रुआंसा होते हुए करीम बोला, 'दो बार गिल्ली फिस्स हो गई और अब तुम लोग हमें छ: की जगह चार रन दे रहे हो। खैर, कर लो रोहनाटाई। अभी तो तीन टुल्ले बाकी हैं। मेरे साथ भगवान हैं। वे न्याय करेंगे।Ó उसने डंडा ऊपर उठाते हुए कहा।
कप्तान भगोला को करीम की बकबक अच्छी नहीं लगी तो उसने भी अपनी कप्तानी झाड़ दी, 'खेलना है तो खेलो नहीं तो घर की राह पकड़ो। एक तो तुमने पहले ही परची निकालने में बेईमानी की और पहले नम्बर पर टुल्ला लगने आ गए। चौआ को सब लोग चौआ कह रहे हैं। दुक्की कोई नहीं कह रहा है। तुम्हारे साथ यदि भगवान हैं तो हमारे साथ भी खुदा हैं। ज्यादा डींग न हांको। तुम्हारे तीनों टुल्ले फुस्स हो जाएंगे।Ó
विवाद शांत हो जाने पर करीम गुच्ची में गिल्ली जमाने लगा। कप्तान भगोला ने सभी खिलाडिय़ों को मैदान में फैल जाने का इशारा करते हुए कहा, 'टिल्लू कल्लू, अब्दुल सब सावधान रहना। कैच नहीं छूटना चाहिए। गिल्ली को आकाश में ही झेल ली। सुसरा करीमवा फार्म में आ चुका है।Ó
खेल चल रहा है। हर लड़का अपनी पारी खेलेगा। दाम लेगा। दाम देगा। हर लड़के के छ: छ: टुल्ले पूरे हो जाएंगे तो फिर नए सिरे से खेल शुरू हो जाएगा। ये थोड़ी देर तक खेल कर संतुष्ट हो जाने वाले लड़के नहीं हैं। यदि इनकी चले तो ये रात-दिन खेलते ही रहें। पूरी जिंदगी खेलते रहें। खेल रहे होते हैं तो भूख नहीं सताती। कितना अच्छा है। घर पहुंचने पर पेट में चूहे कूदने लड़ते हैं। लेकिन भात की हंडिया खाली हो चुकी होती है। किसी तरह दो बेर रुखा-सूखा खाने को मिल जाता है, यही काफी है। तभी तो इनके लिए खेल ही जीवन है। इनके खेल यानी गिल्ली डंडा, मार गेंद, गोली-कंचा, कबड्डी, लुकाछिपी, बिजली के खंभों पर निशाना साधकर पत्थर मारना, मैदान में गोल-गोल घूमकर पेशाब करना, प्रेमरत कुत्ता-कुतिया पर पत्थर फेंकना आदि। ये इस तरह के खेल हैं जिनमें पैसे नहीं लगते या चवन्नी-अठन्नी से काम चल जाता है।
दोपहर ढल रही है। चार बज चुका है। मैदान में कुछ और भी लड़के खेलने आ चुके हैं। ये कुबेर कॉलोनी के संभ्रांत घरों के लिपेपुते राजकुमार हैं। इनके पास एक नहीं दो-दो बल्ले हैं, लाल क्रिकेट की गेंद है, स्टम्प हैं, पैड्स हैं, दस्ताने हैं और पैरों में खिलाड़ी जूते हैं। सिर पर वैसी ही टोपियां हैं जैसी नामी खिलाड़ी लगाते हैं। कुछेक ने धोनी की तरह बाल भी बढ़ा लिए हैं। इनकी हर जेब में चुइंगम होती है और ये उसे चूसते हुए मैदान में दौड़ते हैं, रन बनाते हैं, बॉलिंग करते हैं। आउट होते हैं। आउट करते हैं। कभी-कभी कैच भी कर लेते हैं पर प्राय: कैच छोड़ देते हैं। अंग्रेजी बोलने की कोशिश करते हैं लेकिन गालियां ठेठ हिन्दी में देते हैं... तेरी तो...
कुबेर कॉलोनी के इन चिकने पातों को क्रिकेट से बेहद प्यार है। दीवाने हैं क्रिकेट के। अपने दादा-दादी, नाना-नानी के नाम इन्हें भले ही न मालूम हों, पर इस बात की पूरी जानकारी इनके पास होती है कि किस खिलाड़ी का चक्कर किस फिल्म अभिनेत्री के साथ चल रहा है या किस खिलाड़ी को कितनी आय विज्ञापनों द्वारा  प्राप्त हाती है। 'आई एम ए डिस्को डांसर...Ó की धुन गुनगुनाते हुए ये ठाठ से मैदान में खेलते हैं जैसे मैदान इनके बाप-दादाओं का हो।
'तुम लोग मैदान खाली करे। अब हम लोग यहां खेलेंगे। यहां लुच्चो-लफंगों का खेल गिल्ली-डंडा नहीं, शरीफों का खेल क्रिकेट शुरू होगा। तुम लोग मैदान के बाहर खड़े होकर हमारा खेल देख सकते हो, 'कुबेर कॉलोनी की टीम के नायक नितिन ने गुच्ची की जमी गिल्ली को जूते की ठोकर मारते हुए कहा। अजय, विजय, कपिल, अमिताभ, साहिल, फिरोज, सिद्धार्थ, शांतनु आदि मैदान के दोनों ओर स्टम्प ठोंकने लगे।Ó
करीम और कल्ली ने स्टम्प पकड़ लिए। चुन्नू ने दहाड़कर कहा, 'अभी हमारा खेल पूरा नहीं हुआ है। हमें दाम लेना है। इसके बाद ही मैदान छोड़ेंगे हम।Ó
'तुम्हारी और तुम्हारे दाम की ऐसी की तैसी। तुम लोग तो यहां पूरे दिन खेलते ही रहते हो। धमाचौकड़ी मचाते रहते हो। कोई और काम तो है नहीं तुम लोगों के पास। न पढऩा न लिखना। स्कूल में तो तुम लोगों को कोई घुसने भी नहीं देगा। हम लोगों को सि$र्फ दो घंटे मिलते हैं खेलने के लिए।Ó
चार बज चुका है और ठीक छ: बजे हमें घर पहुंचाना है। हम लोगों को पापा-मम्मी के द्वारा तैयार किए गए टाइमटेबिल के अनुसार चलना पड़ता है। थोड़ी सी भी देर हो जाएगी तो पापा डंडा करने लेंगे। वह करीम और कल्लू से स्टम्प छोड़ देने के लिए कहता है, 'अपने गंदे हाथों से हमारे स्टम्प मैले न करो।Ó
भगोला बीच में आ जाता है और तेज स्वर में कहता है, 'तुम्हारे पापा डंडा करें या बांस-बल्ली, डूंड़ा इसमें हमें क्या लेना-देना। मैदान तुम लोगों का ही नहीं हमारा भी है और हम पहले से यहां खेल खेल रहे हैं। यहां तुम लोगों का नाम नहीं लिखा है।Ó
'तो क्या तुम्हारे बाप का नाम लिखा है मैदान के बीच रंगीन अक्षरों से। तुम्हारे बाप का काम है सुबह-शाम मैदान की सफाई करना, झाड़ू लगाना, यहां-वहां ऊग आई घास खोदना। यह काम तो तुम्हारे पिता करते नहीं है। आज भी मैदान में झाड़ू नहीं लगी। कितना गंदा कर देते हो तुम लोग मैदान। आज मैं पापा से इस बात की शिकायत करूंगा। तभी तुम लोग सीधे रास्ते पर आओगे।Ó अमिताभ तमककर कहता है और साहिल गिल्ली-डंडा छीनकर मैदान के बाहर फेंक देता है।
'तुम मेरे बाप तक नहीं जाना। ठीक नहीं होगा। बिछा दूंगा यहीं। तुम्हारे बाप का दिया नहीं खाता।Ó भगोला अभिताभ की कॉलर पकडऩे आगे बढ़ता है पर अब्दुल बीच में आकर उसे रोक लेता है।
'हिम्मत है तो मुझे छूकर देखो। यदि तुम लोगों की शिकायत आज पापा से नहीं की तो मुझे अमिताभ नहीं कुत्ता कहना। कहूंगा हफ्ते भर से मैदान में झाड़ू नहीं लगी और गुच्ची खोद-खोद कर तुम लोगों ने मैदान को क्रिकेट खेलने लायक नहीं छोड़ा है।Ó अपने पापा से ऊंचे पद का अभिमान अमिताभ के स्वर से टपकता है।
टिल्लू कुछ बड़ा और समझदार लड़का है। उसने समझ लिया कि स्थिति बिगड़ रही है तो भगोला को एक ओर करते हुए बोला, 'झगड़ा हम लड़कों में हो रहा है और हम आसपास में इसे सुलटा लेंगे। बड़ों को बीच में नहीं लाएंगे। लो हम लोग मैदान खाली कर रहे हैं। तुम लोग जी भर के खेलो।Ó
एक बेहद कमजोर पक्ष है झुग्गी-झोपड़ी में रहने वाले लड़कों का। किसी के पिता चौकीदार हैं तो किसी के सफाई कर्मचारी या अन्य दैनिक वेतनभोगी अस्थायी कर्मचारी जिन्हें कभी भी नौकरी से निकाला जा सकता है। अपने-अपने बापों की विवशता ये समझते-बूझते हैं। बुझे मन से ये लड़के मैदान खाली कर देते हैं पर अपनी हार फिर भी स्वीकार नहीं करते। मैदान के बाहर खड़े होकर साहबों के लड़कों का खेल देखने लगते हैं। किसी भी खिलाडी को हूट करने में इन्हें महारथ हासिल है। कोई खिलाड़ी कैच छोड़ देता है तो ये उसकी खिल्ली उड़ाते हैं, अच्छी गेंद फेंकता है तो चिल्लाते हैं- नो बॉल। कई बार तो इनके चीखने के कारण ही कैच छूट जाते हैं। यह भी इन लड़कों के लिए एक खेल ही है। खेल-खेल में कोई नया खेल ढूंढ लेते हैं।
झुग्गी झोपडिय़ों में रहने वाले लड़के जल्दी ही इस खेल से ऊब जाते हैं और आकाश में उड़ती हुई रंगीन पतंगों को, उनकी बलखाती-इठलाती अदाओं को, उनके नखरों को, उनके अद्भुत नृत्य को देखकर मुग्ध होने लगते हैं। आकाश में कनकौआ है, पुछल तारा है, चांदसितारा है, तिरंगी है, चौरंगी है तो पुछल्ली भी है किसी नन्हीं चिडिय़ा की तरह फुदकती हुई पतंगे आकाश में अठखेलियां कर रही हैं, आपस में लड़-झगड़ रही है। पेंच लड़ाए जा रहे हैं। ढील दी जा रही है। गोते लगवाए जा रहे हैं। खींचातानी चल रही है। लड़के गर्दन ऊपर उठाए आकाश में निहार रहे हैं। इनकी गर्दन कभी नहीं दुखती।
एक पतंग कट गई है और आकाश में आवारागर्दी कर रही है। हवा के साथ लहराती हुई कभी यहां तो कभी वहां बह सी रही है। भगोला और करीम के दल के सभी लड़के 'कट गई... कट गई..Ó चिल्लाते हुए उसके पीछे भागते हैं। ऊपर एक पतंग और नीचे अनेक लड़कों का भांगड़ा सा होने लगता है। पतंग आकाश में ऊपर-नीचे, दाएं-बाएं हो रही है और जमीन पर लड़के उसकी दिशा के साथ हिल-डुल रहे हैं, उचक रहे हैं। लड़कों में पतंग लूट लेने की होड़ मची हुई है। नए-नए लड़के इस दौड़ में शामिल हो रहे हैं। अच्छा मजमा लगा हुआ है।
और साली पतंग घूम-फिर कर, लड़कों को पदा कर बीच मैदान में ही गिरती है, जहां कुबेर कॉलोनी के राजकुंवर क्रिकेट खेल रहे हैं। झुग्गी झोपडिय़ों के लड़के तार फांदकर मैदान में घुस जाते हैं। इनमें से कुछेक के हाथों में डंडे और इकट्ठे भी हैं। सभी लड़के एक साथ पतंग पर टूट पड़ते हैं। एक अनार सौ बीमार सो पतंग चिथड़े-चिथड़े हो जाती है। इस जंग में कुछ लड़के घायल भी होते हैं। कंटीले तार के कारण किसी का घुटना छिल गया है तो किसी की कोहनी से खून रिस रहा है। धक्का-मुक्की के इस जबरस्त माहौल में किसी लड़के ने अपने विरोधी को लंगड़ी मारकर गिराया भी है। पर इन मस्त और फक्कड़ लड़कों की दिनचर्या में कुछ बदलाव नहीं। अब इनके हाथों में फटी पतंग के रंग-बिरंगे टुकड़े हैं और इतना प्राप्त कर ही ये परम संतुष्ट हैं। बेहद उत्साहित। हो-हल्ला करते हुए मैदान से बाहर आ जाते हैं।
इस धमाचौकड़ी के कारण कुबेर कॉलोनी के लड़कों का खेल कुछ देर के लिए रुक जाता है। वे खिसियानी बिल्ली की तरह खंभा नोंचते रहते हैं। जानते हैं कि झुग्गी-झोपडिय़ों में रहने वाले लड़कों की संख्या अधिक है तो लड़-झगड़ कर उनसे जीता नहीं जा सकता और बार-बार पापा के पद की धौंस भी नहीं दी जा सकती। सिद्धार्थ ने इन लड़कों के प्रति घृणा उगलते हुए कहा, 'नाली के इन कीड़ों ने एक अठन्नी की पतंग के पीछे अपना सारा खेल चौपट कर दिया। मजा किरकिरा हो गया। पतंग तो किसी को मिली नहीं है पर पट्ठे कागज की चिंदी पाकर ही मटक रहे हैं, उछलकूद कर रहे हैं। जंगली हैं जंगली। साले गंवार कहीं के।Ó
और गंवार लड़के मैदान के बाहर तरह-तरह के तमाशे कर रहे हैं। उनकी खुशी बढ़ती जा रही है। वे रंगीन कागज के टुकड़ों को छोटे-छोटे पत्थरों में लपेटते हैं और उन्हें ऊपर आकाश में उछाल देते हैं। पत्थर कागज का साथ छोड़कर नीचे गिर जाते हैं। अब आकाश में रंग-बिरंगे कागज के टुकड़े हवा के साथ उड़ रहे हैं और लड़के अपनी-अपनी चिंदी यानी नन्हीं पतंग के साथ यहां-वहां डोल रहे हैं। 'चली चली रे पतंग मेरी चली रे...Ó गा रहे हैं। नाच रहे हैं। चिल्ला रहे हैं। एक-दूसरे को धकिया रहे हैं। एक-दूसरे से लिपट रहे हैं। ये इस तरह के फक्कड़ लड़के हैं जो हर स्थिति में सुख की तलाश कर लेते हैं। इन्हें देखकर कोई यह नहीं कह सकता कि खुद इनकी जिंदगी कटी पतंग की तरह है।
कुबेर कॉलोनी के लड़कों ने अपना खेल बंद कर दिया है और सामान समेट रहे हैं। छ: बज रहे हैं हालांकि दिन नहीं डूबा है और अच्छा-खासा उजाला है। इन भले लड़कों को समय पर घर पहुंचना है और पापा-मम्मी से अच्छे लड़के होने का प्रमाणपत्र प्राप्त करना है। मां-बाप की डांट का भय इन्हें कुछ और सोचने भी नहीं देता। घर पहुंचकर होम-वर्क पूरा करना है। कुछ देर तक और भी खेलने की इच्छा है पर ये अच्छे लड़के एक दबाव के तहत विराम लगा देते हैं।
उनके मैदान छोड़ते ही झुग्गी-झोपडिय़ों के लड़के फिर मैदान में घुस जाते हैं। इन्हें अभी और भी खेलना है। घर जाने की कोई जल्दी नहीं। जब तक अंधेरा नहीं हो जाएगा, ये बदमाश खेलते ही रहेंगे। अभी इन्हें और भी चौके-छक्के लगाने हैं। इनके लिए गिल्ली-डंडा जिंदाबाद है।
'ये छिछोरे फिर मैदान में डट गए। इन सालों की तो चांदी ही चांदी है।Ó उल्लू के पट्ठों को न तो स्कूल जाने की चिंता है और न ही होमवर्क पूरा न होने पर सर की डांट का डर। मुझे घर पहुंचने पर गणित की ट्यूशन भी पढऩी है। ठीक सात बजे मुटल्ली मैडम घर आ धमकती है और एक घंटे तक तीन-पांच करती रहती है। बुरी तरह चट जाता हूं। तुम सब भी तो ट्यूशन पढ़ते हो। कोई दो विषय की तो कोई तीन-तीन विषयों की। लगता है कि हम लोगों की आधी जिंदगी तो पढ़ते हुए ही बीत जाएगी और बाकी बची आधी उम्र अपने लौंडे-लपाटियों को पढ़ाते-लिखाते निपट जाएगी। हमसे ज्यादा सुखी तो ये झुग्गी-छाप लड़के हैं। अधनंगे रहते हैं पर ठाट से खेलते हैं। यदि जिंदगी का नाम मौज-मस्ती है तो ये फटेहाल लड़के हमारी अपेक्षा अधिक भाग्यशाली हैं। अजय ने झुग्गी-झोपडिय़ों में रहने वाले लड़कों के सुख के प्रति अपनी ईष्र्या व्यक्त करते हुए कहा तो उसके साथियों ने गर्दन हिलाकर अपनी स्वीकृति का हुंकार भरा। विजय ने अपनी व्यथा उगल ही दी, 'यार, गिल्ली-डंडा खेलने में बहुत मजा आता है। इसका आनंद ही कुछ और है और हम इस अनूठे आनंद से वंचित हैं। मैं दो-तीन बार चोरी से गिल्ली-डंडा खेल चुका हूं। घर में काम करने वाली बाई के लड़कों के साथ। ससुरे जबरदस्त टुल्ला मारते हैं। कपिलदेव को तो मैंने खेलते हुए देखा नहीं है पर अपना चहेता धोनी ऐसे ही शॉट लगाता है। लेकिन डैडी कहते हैं कि गंदे और गंवार लड़के ही इस दो कौड़ी के खेल को खेला करते हैं। गिल्ली-डंडा गरीबों और अनपढ़ लोगों का खेल है तो अपनी किस्मत में तो इसका मजा लूटना ईश्वर नहीं लिखा नहीं।Ó
'और पतंग लूटने में जो खुशी मिलती है, उसका तो बखान भी नहीं किया जा सकता। जब कभी कटी पतंग हाथ लग जाती है तो लगता है कि हमने रोम का साम्राज्य जीत लिया है। आकाश में पतंग होती है और हमारे हाथ में डोर तो लगता है कि हम पृथ्वी को नचा रहे हैं। पर ये सब बातें मैं अपने पापा को नहीं समझा सकता। एक दिन मैंने झौंक में आकर एक कटी पतंग के पीछे दौड़ लगा दी थी और उसे लूटकर ही दम लिया था। लग रहा था कि कक्षा में प्रथम आ जाने पर मुझे कोई सुनहरी शील्ड इनाम में मिली हो। पर पापा ने इनाम के नाम पर मेरे गाल पर एक चांटा जड़ दिया था और मुझे लफंगा, आवारा और पता नहीं क्या-क्या कहा था। मैंने गंदे, मैले-कुचैले और अधनंगे लड़कों के साथ मिलकर, उनकी दौड़ में शामिल होकर चवन्नी-अठन्नी की पतंग के पीछे मारामारी की थी। पापा ने मेरी लूटी हुई पतंग फाड़ दी थी और मेरे हाथ में एक सौ रुपए का नोट थमाते हुए कहा कि मैं पतंगे, चकरी, धागा, मंजा आदि खरीद लूं और छत पर पतंग उड़ाऊं। उन्होंने मुझे चेतावनी दी थी कि मैं कभी भी कटी पतंग के पीछे न भागूं, न ही झोपडिय़ों के लड़कों को मुंह लगाऊं। अब तुम लोग ही यह बताओ कि इसमें क्या मजा है। पर पापा तो बेमजा बात ही करते हैं। कपिल ने अपने पापा की शिकायत सी की। वह लगभग रुआंसा हो गया।
कुबेर कॉलोनी के चिकने-चुपड़े लड़कों के साथ इस तरह के किस्से जुड़े हुए हैं। कोई गोली-कंचा खेलते हुए पिटा है तो किसी की धुनाई कबड्डी जैसा उजड़ा खेल खेलने के कारण हुई है। मैदान में गंदे लड़कों की चहल-पहल रंग में है। कल्लू को गुच्ची में गिल्ली जमाते हुए देखकर कुबेर कॉलोनी की क्रिकेट टीम के कप्तान नितिन की गिल्ली-डंडा खेलने की तमन्ना ने इतना जोर मारा कि वह कल्लू के पास पहुंच गया और मिन्नत सी करते हुए बोल, 'यार कल्लू, दो-चार टुल्ले मुझे भी मारने दो। देखूं कि लगते हैं या नहीं। तुम लोग तो इस खेल में उस्ताद हो।ÓÓ
अपने लिए उस्ताद संबोधन सुनकर कल्लू पसीज गया और बड़े प्यार से बोला, 'तुम तो इतने भारी बल्ले से गेंद में शॉट लगाते हो। डंडे से गिल्ली में टुल्ली भी मार लोगे। आज कुबेर कॉलोनी की क्रिकेट टीम और हमारी गिल्ली-डंडा टीम के बीच मैच हो जाए। समय कम है इसलिए एक-एक ओव्हर का ही सही, तुम अपनी टीम के कप्तान हो तो पहले तुम अपनी टीम के लिए छ: टुल्ले लगाना। फिर हमारी टीम का कप्तान भगोला भी छ: टुल्ले लगाएगा। गिल्ली के मैदान पर जाने पर छ: रन, झाडिय़ों के पास चार रन, चूने की ल$कीर के पास दो रन और जहां-जहां हमने डंडे से गाढ़े निशान बनाए हैं, वहां गिल्ली गिरने पर एक रन मिलेगा। तीन रन की कोई गुंजाइश नहीं।Ó कल्लू उस्ताद ने जोर से आवाज देकर अपने साथियों को एक ओव्हर के ग्रिलेट मैच की जानकारी दे दी।
दोनों टीम के खिलाड़ी सहमत हो गए तो मैच शुरू हुआ। पहले कुबेर टीम के कप्तान नितिन ने टुल्ला लगाना शुरू किया। टॉस की कोई जरूरत नहीं समझी गई। नितिन ने छ: बार गिल्ली उछाली पर तीन बार वह फिस्स हो गई। यानी हवा में उछली ही नहीं। दो बार एक-एक रन और एक बार दो रन मिले। कुल चार रन हुए। गनीमत यही रही कि वह कैचआउट नहीं हुआ। एक रन की औसत नहीं हुई तो वह कुछ निराश भी हो गया। जबकि झुग्गी झोपडिय़ों के लड़कों के चेहरे चमकने लगे।
भगोला अपनी टीम की ओर से टुल्ले लगने के लिए तैयार हो गया। उसने बड़ी सावधानी के साथ गिल्ली गुच्ची में जमा ली और नितिन से कहा, 'अब तुम लोग फील्डिंग करो मतलब कि दाम दो। मैं टुल्ले लगा रहा हूं। देखने कि दो टुल्ले में ही तुमसे आगे निकल जाऊंगा।Ó
काइयांपन के साथ मुस्कुराते हुए नितिन ने कहा, 'हम लोग तुम लोगों से दाम लेते हैं और इसीलिए अच्छे घर-परिवारों में पैदा हुए हैं। हम लोग तुम लोगों का दाम नहीं देते। हम तुम्हें पढ़ाते हैं, तुमसे पढ़ेंगे नहींÓ उसने और उसके साथियों ने जोरदार ठहाका लगाते हुए मैदान छोड़ दिया। शरीफ लड़के कुबेर कॉलोनी की ओर बढऩे लगे। कांटेदार तार को लांघ कर।
'भगोला ठगा सा उन्हें जाते हुए देखता रहा फिर उसने टुल्ला लगा ही दिया। गिल्ली मैदान पार कर गई और कुबेर कॉलोनी के लड़कों के सामने जाकर गिरी। झुग्गी-झोपड़ी के लड़के खुशी से झूमने लगे। करीम ने चिल्लाकर कहा, दो रन और पांच टुल्लों से जीत गए। हिप-हिप हुर्रे...Ó भगोला के कंधों पर बैठकर मैदान में जुलूस निकाला जाने लगा। हर खिलाड़ी विजय का जश्न मनाने लगा। इनके लिए यह भी तो एक खेल ही है।
कपिल ने सामने गिरी गिल्ली उटाकर नाली में फेंक दी और अपने दोस्तों से कहा, 'मेरे पापा ठीक ही कहते हैं कि इन छिछोरों से दूर ही रहना चाहिए। साले, गिल्ली-डंडा खेलते हैं और हमारी बराबरी करने चले हैं।Ó पर इस बार उसके साथियों ने ठहाका नहीं लगाया।