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Wednesday 22 Nov 2017

चंद अखबारी घटनाएं


श्रीलाल शुक्ल
मुख्यमंत्री का हेलिकाप्टर शहर की इमारतों को बौना बनाता हुआ जब काफी ऊंचाई पर पहुंच गया तब उन्होंने लम्बी सांस ली और जिस्म को ढीला छोड़ दिया गया; आंखें मूंद लीं। फिर आंखें खोलीं और सर घुमाकर बायें से दायें और दायें से बायें कैबिन का मुआयना किया।
उनके सहयात्रियों की चार जोड़ी आंखें उन्हें विनम्र व्यग्रता से देख रही थीं। पड़ोस की सीट से गर्दन बढ़ाकर राजस्व मंत्री ने धीरे से पूछा, ''कैसा महसूस कर रहे हैं?ÓÓ
''हमेशा की तरह! बहुत अच्छा!ÓÓ
वे शहर छोड़कर हरे-भरे उपान्तों के ऊपर से गुजर रहे थे और वहां की खुशगवार हवाओं को, उनका कैबिन में प्रवेश न होने के बावजूद, भीतर ही भीतर अनुभव कर रहे थे। उन्होंने 'बहुत अच्छाÓ कहा था पर उन्हें उससे भी ज्यादा अच्छा लग रहा था।
हेलिकाप्टर ने घुमाव के साथ अपनी दिशा बदली। अंतरिक्ष में नीला आकाश और शरतकाल के आरंभ में धुली-पुंछी धूप थी। नीचे घनी हरियाली की कई छवियां-कहीं पीलापन लिए, कहीं हल्की, कहीं गहरी हरी या काली। यह आम के बागों का अटूट विस्तार था जिससे इस समृद्ध इलाके की पहचान बनती थी। इसके ऊपर से गुजरना मुख्यमंत्री के लिए हमेशा एक स्फूर्तिदायक अनुभव होता था, जिसमें मालिक न होते हुए एक मालिकाना हैसियत का एहसास शामिल था। उन्होंने चैन की गहरी सांस ली, सीट बेल्ट टटोली और अपना सर खिड़की के और नजदीक के आए।
तीन घंटे पहले की घटना की चुभन अब खत्म हो रही थी।
कैबिन में उनके अलावा चार लोग थे कृषि मंत्री, राजस्व मंत्री, राहत कमिश्नर और सुरक्षा शाखा के पुलिस महानिरीक्षक जो उनके चहेते अफसरों में थे। वे सभी खामोश थे। खामोश मुख्यमंत्री भी थे पर उनकी आंखें मुखर थीं। वे जब कृषि मंत्री के चेहरे पर आकर टिकीं तो उनके लिए कुछ कहना जरूरी हो गया। उन्होंने कहा- ''मेरा मन इसे सिर्फ संयोग या दुर्घटना भर मानने के लिए तैयार नहीं है। इसकी जांच होनी चाहिए।ÓÓ
''जांच कौन करेगा?ÓÓ
''सी.बी.आई.।ÓÓ
''और अभी-अभी प्रेस वालों से जो कहकर आ रहा हूं उसका क्या होगा?ÓÓ
मुख्यमंत्री ने प्रेस कांफ्रेंस में कहा था- ''यह न कहिए कि आज की महासभा में हम पर पंडाल टूटकर गिरा। आने वाले चुनाव में भगवान जनता के सारे वोट हमें छप्पर फाड़कर देने जा रहा है। यह उसी का इशारा है।ÓÓ
कृषि मंत्री सोचते रहे, सोचकर बोले- ''तब फिर अपनी ही सी.आई.डी.। उससे खुफिया जांच कराइए। जांच तो होनी ही चाहिए।ÓÓ
''वे अपनी महारैली में हमें बुलाते हैं। हमारे पक्ष में नारे लगाते हैं। मेरा सार्वजनिक अभिनंदन करते हैं। हमारा हाथ मजबूत करने की घोषणा करते हैं। और तभी यह घटना घटती है। पंडाल का एक हिस्सा अचानक गिर जाता है। अफरा-तफरी मचेगी ही। पर कोई घायल जैसा घायल नहीं होता। अगर इतनी सी बात पर हम जांच बैठा दें तो उन्हें ऐसा लगेगा कि हम उन्हें विश्वासघाती या षडयंत्रकारी समझ रहे हैं? ÓÓ
''सर मैंने कहा : खुफिया जांच।ÓÓ
''आजकल कुछ भी खुफिया नहीं है।ÓÓ राजस्व मंत्री ने कहा।
राहत कमिश्नर खिड़की के बाहर देखने लगा। यह सब उसके सुनने के लिए नहीं था।
कृषि मंत्री अडिग थे, बोले, ''किसी न किसी की साजिश जरूर है। पंडाल का आधा हिस्सा अचानक नीचे बैठ गया, वह भी मंच की ओर से। ऐसा अपने आप कैसे हो सकता है? ऐसा कभी हुआ है?ÓÓ
''कभी नहीं।ÓÓ सिर्फ इन दो शब्दों से पुलिस महानिरीक्षक ने कृषि मंत्री के सुझाव की ताईद की।
मुख्यमंत्री ने दृढ़ता से कहा- ''हमारी ओर से किसी जांच की जरूरत नहीं। जिनकी सभा थी, जिनका पंडाल टूटकर गिरा, वे खुद जांच की बात करें तो और बात है।ÓÓ
कृषि मंत्री ने कहा- ''वह भी हो जाएगा। उनके प्रतिनिधि कल ही आपसे मिलेंगे।ÓÓ
कुछ पल खामोशी। धूप की चमक फीकी पड़ गई थी। मुख्यमंत्री ने कहा- ''बादल आ रहे हैं।ÓÓ
वे दोपहर की महारैली के बारे में सोच रहे थे।
विधानसभा के चुनाव नजदीक आ रहे थे। इस कारण राजधानी में आजकल विभिन्न जातियों, उपजातियों आदि की रैलियां हर तीसरे-चौथे दिन होती ही रहती थीं। ऐसी ही यह भी एक रैली थी: प्रजापति समाज की।
इन रैलियों को बढ़ावा देकर सत्तारुढ़ पार्टी अलग-अलग जातियों में अपने वोट पक्के कर रही थी। सभी रैलियों का तरीका और 'एजेंडाÓ लगभग एक-सा था। हर रैली में जाति विशेष शताब्दियों से चले आ रहे अपने शोषण के खिलाफ आवाज उठाती, ''हम अब जाग गए हैंÓÓ की घोषणा करती, इतिहास और मिथक की अंधेरी खोहों से खींचकर अपने महानायकों, शहीदों, संतों को बाहर ले आती। उनके स्मारक बनवाने, प्रतिमाएं लगाने के प्रस्ताव रखती और उनके जन्मदिन पर सार्वजनिक अवकाश की मांग करती। ये सभी आकांक्षाएं वाजिब थीं, गलत यही था कि उनका गैरवाजिब इस्तेमाल होने जा रहा था।
हर रैली का एक अनिवार्य कार्यक्रम था : मुख्यमंत्री को बुलाकर मंच पर उनका सार्वजनिक सम्मान।
यह सम्मान प्राय: इस प्रकार होता : शंख, घंटा, घडिय़ाल, तुरही, डफ आदि लोक वाद्यों के साथ और 'जिंदाबाद-जिंदाबादÓ के नारों के बीच मुख्यमंत्री का स्वागत, उनके सर पर सोने या चांदी का मुकुट रखवा जाना या उनके अभाव में सर पर एक बड़ा-सा पग्गड़ बांध देना; उनके हाथ में तलवार या गदा पकड़ा देना, उनकी स्तुति में भाषण देना, फिर उनका भाषण सुनना।
मुख्यमंत्री अपने भाषण में उस जाति की ऐतिहासिक गौरव-गाथा सुनाते, उसके किसी महानायक के नाम पर किसी खंडहर, टीले या तालाब को स्मारक में बदलने का वादा करते, कुछ चौराहों और पार्कों को उनकी प्रतिमा की स्थापना के लिए नामजद करते, इस सबके लिए कई लाख (और आजकल कई करोड़) रुपए की सहायता का ऐलान करते, पिर चुनाव जीतने के बाद उस जाति की ही रही-सही समस्याओं को सुलझाने का वादा करते हुए मुकुट, पग्गड़, गदा, तलवार, तीर-कमान जो भी मिला हो- उसे बटोरकर चलते बनते।
आज की सभा में उनके सर पर सिर्फ पग्गड़ बांधा गया, एक गदा पकड़ाई गई और प्रजापति-समाज के पुराने पेशे के अनुरूप उन्हें एक कलापूर्ण सुराही भेंट की गई। अपने भाषण में उन्होंने प्रजापति-समाज की लगभग सारी समस्याएं तुर्त-फुर्त निबटा दीं। अच्छे बर्तन के लिए अच्छी मिट्टी की जरूरत है और उसे पूरी करने के लिए उन्होंने दायें हाथ को हथौड़े की तरह ऊपर-नीचे करते हुए बताया कि आज और इसी वक्त से प्रत्येक प्रजापति को उम्दा मिट्टी की सप्लाई करने का काम जिला मजिस्ट्रेट का होगा और इस बारे में बहुत सख्त आदेश आज तीन बजे तक जारी कर दिए जाएंगे।
तभी उनके ऊपर का पंडाल एक ओर से गिरना शुरू हुआ। एक हिस्सा उनके कंधे पर भी गिरा। पर गनीमत थी, उन्हें तुरत बाहर खींच लिया गया। जो पंडाल की चपेट में आ गए थे, वे भी कुल मिलाकर बचे ही जैसे थे।
सच तो यह है कि आज का दिन सबेरे से ही मनहूस था। ग्यारह बजे तक उन्होंने जनता दरबार किया था, यानी अपने बंगले की लॉन पर फरियादियों के बीच, बिना घंटा के शहंशाह जहांगीर की भूमिका निभाई थी। फरियादियों में एक पुराना स्वतंत्रता सेनानी निकल आया था। उसने अधपगले अंदाज में उन्हें दर्जनों असंसदीय गालियां सुनाई थीं और बार-बार उन्हें 'ढपोरशंखÓ कहा था। ''इन्हें उधर ले जाकर नाश्ता-पानी कराइए, ये हमारे बुुजुर्ग हैं, हमें इनका सम्मान करना चाहिए।ÓÓ उन्होंने कहा जरूर था पर उन्हें अपनी जवानी में तेज तर्रार नेता की हैसियत से जूतम-पैजार की वे कई घटनाएं याद आ गई थीं जिनमें उनकी ज्यादातर नायक की भूमिक रहती थी। उनका मन खट्टा हो गया था। उसके बाद दूसरी मनहूस घटना वही थी जिसे उन्होंने पत्रकारों के सामने 'छप्पर फाड़ केÓ मुहावरे से निपटा दिया था।  अब वे शहर से दो सौ किलोमीटर दूर आ गए थे और अपने को मुक्त महसूस कर रहे थे। हेलिकाप्टर के भीतर धरती को पांवों के नीचे और आकाश को अपने सर से बालिश्त भर ऊपर समझने का एहसास उन्हें संतोष दे रहा था। धूप फिर से चमकने लगी थी और यह जानते हुए भी कि वे यह यात्रा एक भयानक बाढ़ की तबाही का दृश्य देखने के लिए कर रहे हैं, उनके मन में व्यग्रता न थी। वह दृश्य कुछ मिनटों में ही उनके सामने खुलने वाला था।
राहत कमिश्नर ने कहा :
''सर... इधर... बायीं ओर... पानी का वह फैलाव... नदी का दायां किनारा... पर... कुछ पता नहीं... किनारे मिट गए हैं अब हम नदी के ऊपर हैं... उधर... बदतर हालत... चौाबीस-पच्चीस गांव... सभी कुछ तबाह है... चालीस मौतें...ÓÓ
ऐसे ही कुछ शब्द थे जो उनके कानों से टकरा रहे थे, टूटकर गिर रहे थे। वास्तव में उनकी आंखें, कान, मन-चेतना के सारे उपादान एक अकेली संवेदना में समाहित होकर उस दृश्य में डूब गए थे जो उनके सामने फैला हुआ था।
पहली नजर में उनको खिड़की के बाहर पानी का फैलाव भर दिख पड़ा जो अपनी निस्पंदता में किसी संभावित विनाश की खामोशी छिपाए हुए था। पर उन्हें समझने में देर नहीं लगी कि पानी निस्पंद नहीं है, उसमें भयानक गति है जिसका अंदाजा धारा में डूबती उतराती और तेजी से बही जाती हुई सैकड़ों बेमेल चीजों को देखकर किया जा सकता था- सूखे लक्कड़, पेड़ों की झिंझोरी हुई छिन्न शाखाएं, घास-फूस, छप्पर-छानी, उन पर बैठी चिडिय़ा, कुछ बिलबिलाते हुए कीड़े (जो सांप रहे होंगे), जानवरों की लाशें और न जाने क्या-क्या! ये सब तेजी से चलती रील की तस्वीरों की तरह एक छोर से बहती हुई आती थीं और देखते-देखते दूसरे छोर में विलीन हो जाती थीं। पानी के इस भूरे पाशविक फैलाव में गांव नहीं दिख रहे थे पर नदी के जलमग्न किनारों पर बहुत दूर घास-फूस की फुनगियां, अधडूबे पेड़ और चिडि़य़ों के झुंड देखे जा सकते थे। क्षितिज में पेड़ों की स्याह, मौजूदगी थी जो यहां से एक कतार में दिख रहे थे पर वे बहुत दूर थे- इतनी दूर कि लगता था, क्षितिज की ही तरह उन्हें भी कभी छुआ नहीं जा सकेगा।
अचानक नदी के ऊपर से गुजरते ही कुछ आगे चलकर उन्होंने प्रवाहहीन  पानी में खड़ा हुआ पेड़ों का एक झुरमुट देखा। वहीं पास कच्ची दीवारों के कुछ गलते-ढलते अवशेष दिख पड़े। ये झोपडिय़ां रही होंगी। वहां पानी की सतह पर प्लास्टिक की एक टुटही बाल्टी हवा के साथ दायें-बायें डोल रही थी। उन्होंने पूछना चाहा कि झोपडिय़ों में रहने वाले कहां गए होंगे। पर इसका उत्तर उन्हें पहले ही मिल गया।
पेड़ों के तने से लगता था कि वे चार-पांच हाथ गहरे पानी में डूबे हैं। उनकी डालों पर उन्हें कुछ हरकत जान पड़ी और ऊपर की टहनियों पर उन्हें कुछ लोग हाथ हिलाते और चीख दिख पड़े। पायलट से कहकर उन्होंने झुरमुट की तीन-चार बार परिक्रमा की और कहा, ''आप लोगों ने देखा : पेड़ों पर कई परिवार टंगे हुए हैं- औरतें हैं, बच्चे हैं।ÓÓ
राजस्व मंत्री ने कहा- ''जी हां, बाढ़ के यही तो संकट हैं। जान बचाने के लिए पेड़ों पर अटके रहना पड़ता है।ÓÓ
''पूछना होगा, इन्हें यहां से अब तक निकाला क्यों नहीं गया।ÓÓ
''सेना की कोई न कोई नाव इनकी रक्षा के लिए आ रही होगी। फिर भी नीचे उतरते ही देखेंगे।ÓÓ
''खाने-पीने का क्या हो रहा होगा?ÓÓ
''हेलीकाप्टर से खाने के पैकेट दो दिन से गिराए जा रहे हैं।ÓÓ
सुरक्षा अधिकारी ने कहा- ''बहुत। बाढ़ में बहकर सांप भी आ जाते हैं और पेड़ों की शरण लेते हैं।ÓÓ
राजस्व मंत्री ने उसे घूरकर देखा, जैसे उनकी बदइंतजामी की आलोचना हो रही हो, कहा- ''उनसे तो आप ही निपट सकते हैं। यह हुनर मेरे महकमे में नहीं है।ÓÓ
''फिर भी...ÓÓ मुख्यमंत्री बोले।
''पन्द्रह मिनट में हम कलेक्टरेट में होंगे। पहुंचते ही इन लोगों के बारे में देख लिया जाएगा। वे बारह मिनट बाद कलेक्टरेट के अहाते में उतरे। पड़ोस के मैदान में एक विशाल जनसभा उन लोगों का इंतजार कर रही थी। हेलिकाप्टर को देखते ही लोग इधर की ओर झपटे पर पुलिस की मुस्तैदी से वहीं रोक लिए गए। मुख्यमंत्री को पहले कलेक्टरेट में बैठकर जननायकों और अफसरों की बैठक में बाढ़ की दशा और राहत कार्य की पड़ताल करनी थी और उसके बाद जनसभा में भाषण देना था। उन्होंने स्थानीय तथ्यों की नवीनतम जानकारी की जगह अपनी कल्पना और भाषण कला पर ज्यादा भरोसा करते हुए इसे बदल दिया; बोले- ''सबसे पहले मुझे जनता से मुखातिब होना है।ÓÓ
वे तेजी से मैदान की ओर बढ़े। कृषि मंत्री ने कहा, ''रास्ते में जो परिवार पेड़ों पर टंगे दिखे थे...।ÓÓ
राजस्व मंत्री ने कहा- ''कलेक्टर से कह दिया है। सेना की मोटरबोट उन्हें लेने जा रही है।
कृषि मंत्री बोले- ''ऐसे सैकड़ों नहीं, हजारों। जो तबाही हुई है उसे घटाकर नहीं देखना है।ÓÓ
''ठीक बात!ÓÓ कृषि मंत्री ने कहा और दूसरी ओर देखने लगे।
पैंतीस मिनट में ही मुख्यमंत्री के भाषन ने प्रशासन की विजय-पताका हर चीज पर फहरा दी- उस क्षेत्र में शताब्दी की सबसे भयंकर बाढ़ पर, हजारों एकड़ फसल की बर्बादी पर, अनगिनत इंसानों और जानवरों की मौत पर, सैकड़ों बस्तियों की तबाही पर, विपक्षियों की आलोचना और बाढ़ पीडि़तों के प्रदर्शनों पर! हमेशा की तरह उनके भाषण ने ऐसा चमत्कार किया कि लगा कि जनसभा में सभी के पेट दुर्लभ व्यंजनों से भर गए हैं, सभी के जिस्म पर साफ-सुथरे नये कपड़े आ गए हैं। सभी के मन में स्फूर्ति और आनंद की हिलोरे उठ रही हैं। और वे सभी जादू के गलीचों पर बैठे हुए आकाश मार्ग से उन महलों की ओर जा रहे हैं जो ध्वस्त झोपड़ी की जगह अभी-अभी बनकर तैयार हुए हैं। पगलायी भीड़ जिंदाबाद- जिंदाबाद के नारे लगाती रही और जान नहीं पाई कि मुख्यमंत्री कब जननायकों अफसरों की दरवाजा बंद बैठक में पहुंच गए।
उनका पहला वाक्य था- ''सार्वजनिक सभा में मैंने अभी-अभी जो घोषणा की हैं उन्हें आप सबने सुना है न?ÓÓ
राहत कमिश्नर और कलेक्टर ने एक साथ अपनी-अपनी जेब से नोटबुक निकाली। उन्होंने राहत कमिश्नर को पढऩे इशारा किया। राहत और विकास के अनेक वायदों के बीच पढ़ते-पढ़ते वह एक जगह ठिठका; उन्होंने कहा- पढि़ए... पढि़ए...।
''बाढ़ राहत के लिए छ: करोड़ रुपए की पहली किश्त...ÓÓ वह झिड़का, उसने कलेक्टर की ओर लाचारी से देखा। कलेक्टर ने सबको सुनाकर कहा- ''या छब्बीस करोड़?ÓÓ
मुख्यमंत्री ने कहा- ''यह कैसा घपला है? मंैने छब्बीस करोड़ की घोषणा की है। आपने क्या दर्ज किया है? छह करोड़?ÓÓ
उसने कहा- ''मैं शोर में ठीक से सुन नहीं पाया था इसीलिए...।ÓÓ
राजस्व मंत्री ने अपने अफसर को सहारा दिया- ''इनको भ्रम हो गया होगा। पहले छ: करोड़ की ही बात की थी।ÓÓ
मुख्यमंत्री ने स्थानीय विधायक की ओर देखते हुए कहा- ''जानता हूं। पर वह फैसला राजधानी के वातानुकूलित कमरे का था, यह फैसला इस इलाके की तबाही को देखकर यहीं पर अब, अभी से लिया गया है। छब्बीस करोड़ अभी, बाकी जरूरत के मुताबिक  बाद में। ÓÓ
मीटिंग कारोबारी ढंग से बंद कमरे में हो रही थी, फिर भी तीन विधायकों ने तालियां बजाईं।
राहत कमिश्नर आगे बढ़े : ''मिलसा बांध की मरम्मत के लिए पचहत्तर लाख रुपए की तत्काल मंजूरी।ÓÓ
मुख्यमंत्री ने कलेक्टर से कहा, ''हां! मिलसा बांध! अभी किसी ने कहा कि उसकी मरम्मत का काम चौबीसों घंटे चल रहा है।ÓÓ
''जी सर!ÓÓ
''चौबीसों घंटे? राउंट द क्लॉक?ÓÓ
''यस सर।ÓÓ अब मुख्य अभियंता ने जवाब दिया। यह भी कहा कि ''बांध जहां टूटा है वहां अभी बालू की बोरियां डाली जा रही हैं, सैकड़ों पहले ही डाली जा चुकी है। स्थायी मरम्मत पानी का स्तर घटने पर शुरू होगी।ÓÓ
मुख्यमंत्री ने घड़ी पर न•ार डाली, कहा- ''चलिए, आपका बांध भी देख लिया जाए। मीटिंग दस मिनट में खत्म होनी चाहिए।ÓÓ
सूरज डूबने में एक घंटे से कम रह गया था।
मुख्य अभियंता ने कहा- ''बांध की सड़क बहुत खराब हो गई है...।ÓÓ
''आप कैसे जाते हैं।ÓÓ
''जी, मैं जैसे-तैसे जीप से जाया करता हूं।ÓÓ
''चलिए, मैं भी जैसे-तैसे जीप से चलूंगा।ÓÓ उन्होंने सबको सुनाकर कहा, ''सबके चलने की •ारूरत नहीं। ज्यादा से ज्यादा दो जीपें...।ÓÓ
उनकी जीप बीच में थी, आगे कुछ अधिकारियों की, पीछे सुरक्षा गार्ड की, जिसे मिलाकर तीन हो गई थीं। साढ़े चार किलोमीटर का रास्ता बहुत धीरे-धीरे कट रहा था।
बांध की जर्जर सड़क पर गड्डों और खतरनाक कटानों बचाते हुए जीप सावधानी से बढ़ रही थी। जवान कलेक्टर ने खुद ड्राइवर का काम संभाल लिया था। वे कुछ देर उसकी कुशलता को खामोशी से देखते रहे। बोले- ''आपको अपनी समस्या चीफ सेक्रेटरी से कहनी थी, या सीधे मुझसे। प्रधानमंत्री कार्यालय को बीच में लाने की क्या जरूरत थी?ÓÓ
''माफी चाहता हूं सर। पर यह गलती मेरी पत्नी की थी। मेरी जानकारी के बिना ही उसने दिल्ली में...।ÓÓ
मुख्यमंत्री जानते थे कि उसकी पत्नी दिल्ली में देल्ही पब्लिक स्कूल की किसी शाखा में पढ़ाती हैं, होनहार है और सोसायटी में एक चित्रकार के रूप में मशहूर हो रही है, उसकी कुछ राजनीतिक महत्वाकांक्षाएं भी हैं। अपने पति को दिल्ली में ही केन्द्रीय सरकार के किसी पद पर देखने के लिए वह काफी अर्से से आतुर थी। अब वह उसका दिल्ली तबादला कराने में सफल हो चुकी थी, कलेक्टर के तबादले का हुक्म हो चुका था।
मुख्यमंत्री ने कहा- ''आप इस सप्ताह के अंत तक यहां चार्ज दे सकते हैं।ÓÓ
कलेक्टर चुपचाप जीप चलाता रहा, बज़ाहिर उसका ध्यान सड़क के बीच में बांध के धसकने से बने हुए एक गड्डे पर था। उसे किनारा देकर जब कुछ दूरी तक रास्ता ठीक जान पड़ा, उसने कहा- ''सर, मैं दिल्ली जाना चाहता हूं। इसमें शक नहीं। पर अपने इस जिले की जहां मैंने ढाई साल सेवा की है- इस हालत में कैसे छोड़ सकता हूं। जब तक बाढ़ से लोगों की सुरक्षा और राहत का अभियान पूरा नहीं होता, मैं यहीं रहना चाहूंगा। वैसे, आपका जो भी आदेश हो।ÓÓ
जीप में पीछे बैठे राहत कमिश्नर और सुरक्षा महानिरीक्षक ने एक साथ आंख उठाकर एक दूसरे को देखा और मुस्कुराए। दोनों की आंखों के सामने छब्बीस के बाद सात शून्यों का एक सुनहरा आंकड़ा एक साथ चमक उठा था। दोनों जानते थे कि जब से जनसभा में मुख्यमंत्री ने राहत की पहली किश्त की घोषणा की तभी से वह आंकड़ा कभी इन्द्रधनुष की बहुरंगी छटाए लेकर, कभी ठोस सोने की चरम दीप्ति के साथ कलेक्टर के आंखों के आगे निरंतर झिलमिला रहा है। जनसेवा का तकाजा उसे अब वहां कई महीने रोके रखेगा, भले ही दिल्ली का तबादला निरस्त हो जाए।
मुख्यमंत्री ने कहा- ''ठीक है।ÓÓ
अब फिर खामोशी। बाढ़ के आतंक को वे अब पहली बार इतनी नजदीकी से देख रहे थे, हेलिकाप्टर की ऊंचाई से नहीं, अपने दायें-बायें फैले हुए जल-विस्तार की पीठ पर चलते हुए।
कुछ दूर चलकर कलेक्टर ने वहां की प्राकृतिक स्थिति पर भूगोल पर कुछ कहना शुरू किया पर उसने महसूस किया कि मुख्यमंत्री असामान्य रूप से खामोश हैं; वह चुप हो गया। बायीं ओर काफी दूर पर नदी की धारा में दो मोटरबोट दिख पड़ी। उनकी हल्की भर्राहठ बांध तक गूंज रही थी, कलेक्टर ने मुख्यमंत्री का ध्यान उनकी ओर खींचना चाहा पर मुख्यमंत्री जिस तन्मयता से अपने बायीं ओर पानी की ठंडी विभीषिका को देख रहे थे, उसे तोडऩे की वह हिम्मत नहीं जुटा पाया।
लगता था कि कोसों लंबा प्रागैतिहासिक जंतु है जो पूरी तौर से पानी में डूबा हुआ है, सिर्फ उसकी खुरदरी पूंछ पानी के ऊपर है और वह बांध की कटी-पिटी सड़क है। यह पूंछ किसी भी क्षण ऊपर उठ सकती है। दायें-बायें हिल सकती है, अचानक पानी में गुम हो सकती है।
आगे बांध अचानक कुछ चौड़ा हो गया था, शायद यहां गाडिय़ां खड़ी करने और उन्हें मोडऩे की जगह निकाली गई थी। वहां एक किनारे कुछ शोभाकारी वृक्ष लगाए गए थे जिनकी मोटी टहनियां और तने भर बचे थे, बाकी का सब कुछ बारिश और हवा के थपेड़ों ने छीन लिया था। यहीं से लगभग सौ मीटर की दूरी पर बांध में पहले दरार आई थी, बाद में उसी से लगभग तीन मीटर चौड़ी धारा फूट निकली थी। वह और भी चौड़ी हो सकती थी, पर 'राउंड द क्लॉकÓ मेहनत से उसे नहीं रोक लिया गया था। बिना कुछ बोले हुए मुख्यमंत्री वहां से टूटे हुए बांध की ओर धीरे-धीरे चले। चार-पांच लोग उनके पीछे थे। मुख्य अभियंता, के 'राउंट द क्लॉकÓ हो रही मरम्मत के दावे का पर्दा$फाश हो गया था। वे और कलेक्टर सबसे पीछे थे। बांध की यह सड़क उस क्षेत्र के लिए जीवनरेखा जैसी थी। फिर भी मुख्यमंत्री ने देख लिया था, पहले वहां जो भी हुआ हो, इस वक्त मरम्मत का कोई काम नहीं हो रहा था वास्तव में बांध के टूटने के पहले और टूटने तक पानी को बालू की बोरियों से रोकने के लिए बड़ी मेहनत से काम किया गया था पर जब, जबकि दोनों ओर पानी का स्तर लगभग बराबर हो गया था और नदी की ओर से दूसरी ओर का बहाव बंद हो गया था, मरम्मत का काम रुक गया था; जलस्तर घटने का इंतजार हो रहा था।
मुख्यमंत्री टूटे हुए बांध के किनारे चुपचाप खड़े हो गए। सामने सीमाहीन, जल का विस्तार था जिसे बांध का अगला हिस्सा कुछ दूर तक विभाजित करता चला गया था। उनके दायें-बाएं एक ओर दूर क्षितिज में वृक्षों की स्याह, धुंधली, कतार और दूसरी ओर सूर्यास्त के काले-लाल बादल पानी के फैलाव की प्रत्यक्ष निस्सीमता को छेक रहे थे।
मुख्य अभियंता और कलेक्टर उनके पास पहुंचकर उनके क्रोध के विस्फोट और सजा के ऐलान का इंतजार करते रहे। कुछ हिम्मत करके मुख्य अभियंता ने बांध की मरम्मत को लेकर अपनी सफाई में मुंह खोला, कहा- ''सर...।ÓÓ
मुख्यमंत्री ने हाथ के इशारे से उसे चुप कर दिया, हाथ के इशारे से ही उसे हट जाने को कहा। उसके दूर चले जाने पर कलेक्टर भी वहां से पीछे हट गया। उनकी मंशा समझकर और लोग भी पीछे हट गए। बाढ़ का यह वीरान, अवसाद भरा दृश्य देखने के लिए वहां वे अकेले रह गए।
अब सबेरे का जनता दरबार भी उनसे पीछे छूट गया, पंडाल-ध्वंस पर 'छप्पर फाड़ केÓ मुहावरे वाली सूक्ति भी, एक घंटा पहले हुई जनसभा की घोषणाएं भी, लापरवाह अ$फसरों को दंडित करने की इच्छा भी- इन क्षणों में न जाने कितना कुछ पीछे छूट गया। साथ ही आधी सदी पहले एक निर्धन, बदहाल गांव की धूल भरी गली में जो कुछ अपना पीछे छोड़कर वे बाहरी दुनिया में आए थे, उसकी धुंधली अस्थिर छाया सामने पानी पर मंडराती सी जान पड़ी।
पता नहीं वे कितनी देर अकेले खड़े रहे। सूरज डूब चुका था पर अंधेरा होने में अभी देर थी। राजस्व मंत्री ने बेआवाज कदमों से धीरे-धीरे उनके पास पहुंचकर कहा- ''वापस चलें, सर।ÓÓ
वे एक पल राजस्व मंत्री को अजनबी निगाहों से देखते रहे, बोले- ''कहां?ÓÓ