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Sunday 19 Nov 2017

वर्ना क्या?

से.रा. यात्री
एफ-1,ई/7
नया कवि नगर,
गाजियाबाद-201002
बस में भीड़ की वजह से कहीं पांव रखने की भी गुंजाइश नहीं थी। हर 'स्टॉपÓ पर कुछ सवारियां और धंसी चली जाती थीं। स्थिति यह हो गई थी कि सीटों के बीच की छोटी और संकरी गैलरी में भी पचासों मर्द, औरतें और बच्चे फंसे हुए थे।
मैं बस में पीछे की ओर खिड़की के साथ चिपका बैठ था क्योंकि दो जनों की सीट पर मुड़-मुड़कर मेरे अलावा तीन और टिके हुए थे। जब मैं बस पर सवार हुआ था तो इतनी बुरी हालत नहीं थी। मैंने अब तक टिकट भी नहीं खरीदा था। कंडक्टर प्राय: स्वयं ही सवारियों तक चलकर आते थे, और टिकट दे देते थे, पर इस बस का कंडक्टर अपनी जगह से हिल ही नहीं रहा था। अब मुझे चिंता होने लगी थी कि कहीं 'चैकरÓ आ गया तो फजीहत हो जाएगी। बस में ड्राइवर के सामने वाले हिस्से पर साफ अंकित था कि बिना टिकट सफर करना अपराध है।
मैंने अपनी जगह से जरा सा उचककर जेब से पैसे निकाले और अपने स्थान से ही चिल्लाकर बोला ''कंडक्टर साहब, एक टिकट इधर भी देना।ÓÓ
पर कहां! कंडक्टर को उस भीड़ को चीरते-धकेलते हुए मुझ तक आने की फुर्सत कहां थी। उसने कतई ध्यान नहीं दिया कि कौन सवारी कहां से चिल्ला रही है। वह तो बस प्रवेश द्वार से लगी अपनी सीट पर बैठा अपने तक पहुंचने वाली सवारियों के टिकट काटता रहा।
गैलरी में एक युवक छत के डंडे से लटकी चमड़े की पट्टियां पकड़े खड़ा था। वह हल्के नीले रंग की मोटे कपड़े की जीन्स और एक ढीली-ढाली रंगी शर्ट पहने हुए था। वह कहीं भी सवारियों की खिड़की के पास झुककर बाहर पान अथवा तम्बाकू की पीक थूक देता था। उसे इस बात की जरा भी चिंता नहीं थी खिड़की से लगी बैठी सवारियों को इससे कितनी असुविधा होती थी या बस के समानान्तर गुजरते किसी साइकिल सवार या चलते-फिरते आदमियों पर पीक का पुचारा गिरने पर क्या गुजरेंगी। वह हर तरफ से बेखबर और खासा लापरवाह दिख पड़ता था।
जो हो- मुझे टिकट के लिए गुहार लगाते देखकर वह मुझसे बोला-''अंकल! लाइए मैं आपका टिकट ला देता हूं।ÓÓ
मैंने हाथ में पकड़े हुए पैसे उसकी ओर बढ़ाते हुए कृतज्ञता ज्ञापित की ''धन्यवाद!ÓÓ
मेरे हाथ से पैसे लेने के बाद उसने इधर-उधर देखकर किंचित धीमे स्वर से आसपास खड़ी सवारियों से कहा- ''किसी को तो टिकट नहीं चाहिए।ÓÓ
कई सवारियों ने हाथ में लिए हुए या बटुए से निकालकर पैसे उसकी ओर बढ़ा दिए। इसके बाद वह भीड़ को धकेलता-रौंदता कंडक्टर की दिशा में जाता हुआ दिखाई पड़ा। बस एक 'स्टॉपÓ पर ठहरी तो और भीड़ बस में अर्रा पड़ी। इससे खासी अफरा-तफरी मच गई। कोई सात-आठ मिनट बाद वह युवक लौटा और उसने जिन-जिन के पैसे उगाहे थे उनके टिकट देकर भीड़ को चीरते हुए आगे की ओर चला गया।
मैं उसकी परोपकर भावना से बहुत प्रभावित हुआ। मैंने मन ही मन सोचा कि लोग व्यर्थ ही आजकल के नौजवानों को भला-बुरा कहकर कोसते रहते हैं। लगता है सयाने लोग आजकल की पीढ़ी को ढंग से समझे बिना ही एकतरफा नादिरशाही फैसला दे देते हैं।
मैं चाहता था कि उस लड़के से कुछ बातें करूं और उसकी इस सदाशयता पर उसे बधाई दूं मगर कहां? वह तो पता नहीं आगे जाकर भीड़ में कहां गुम हो गया था।
थोड़ी देर बाद किसी 'स्टॉपÓ पर क्षण भर के लिए बस ठहरी तो सवारियों के रेले के साथ ही एक 'टिकट चेकरÓ महोदय भी बस में चढ़ आए और सिरे से ही सवारियों के टिकट चैक करने लगे। आप जानते ही हैं कि जिन सवारियों के पास रेल या बस में टिकट होते हैं वह टिकट चैकर को बहुत हेय-दृष्टि से देखते हैं और कुछ इस तरह व्यस्त हो जाते हैं कि जैसे उन्होंने उसे देखा ही नहीं है।
टिकट निरीक्षक जब हम लोगों के पास पहुंचा तो कई लोगों के टिकट देखकर गंभीरता से बोला- ''यह इस बस के टिकट नहीं है। आप लोग यह टिकट कहां से बटोर लाए हैं? लगता है आप लोग किसी और बस में बैठे होंगे- और पुराने टिकट दिखा रहे हैं।ÓÓ
हौलदिल होते हुए मैंने अपना टिकट उसकी ओर बढ़ाया तो वह गर्दन हिलाकर बोला- ''यह टिकट भी किसी और ही बस का है।ÓÓ मैंने भीतर से कच्चा होने के बावजूद आत्मविश्वास कायम रखने की कोशिश की- ''नहीं जनाब, यह टिकट इसी बस का है और जरा देर पहले ही पूरे पैसे देकर खरीदा है।ÓÓ
''खरीदा होगा, पैसे देकरÓÓ, उसने उपेक्षा जतलाई और कंडक्टर को सख्ती से आवाज लगाई- ''ओये हाकमसिंह इत्थे सुणÓÓ
भीड़ में से निकलते हुए लम्बा चौड़ा कंडक्टर हाकम सिंह, चैकर तक किसी तरह आ पहुंचा तो चैकर ने मेरे खद्दर के कपड़ों पर व्यंग्य करते हुए कहा- ''नेताजी की बात सुण। यो टिकट तन्ने दिया हैगा इनोनू? इस टिकट की बस तो इस रूट पर चलती भी नई है भाया।ÓÓ
मैं झुंझलाकर बोला- ''आप मेरी ब$गैर बात बेइज्ज्•ाती कर रहे हैं जनाब।ÓÓ $िफर मैंने गैलरी में खड़ी और पास बैठी सवारियों से ताईद चाही- ''क्यों भाइयों आपके सामने उसे लड़के को पैसे नहीं दिये थे टिकट लाने के लिए।ÓÓ
चूंकि मुझसे पहले भी कुछ सवारियों के टिकट देखकर टिकट परीक्षक कह चुका था कि उनके टिकट इस बस के नहीं थे, इसलिए वह चकराकर बोला- ''ओये नत्थू गड्डी रोक दे।ÓÓ
ड्राइवर ने ब्रेक देकर बस जहां की तहां रोक दी। कंडक्टर हड़बोंग में घबराकर अपनी कनपटी खुजलाने लगा। चैकर ने उसकी आंखों के सामने मेरा टिकट लहराते हुए कहा- ''हाकम सिंहÓÓ हवालात जाणा है तेरे कू? इतने जाली टिकट सवारियों के पास किधर से आ पड़े बोल खोत्ते दी पुत्तर।ÓÓ
कंडक्टर के चेहरे पर हवाइयां उडऩे लगीं। उसने टिकट चैकर के हाथ से टिकट लेकर ध्यान से उलटा-पलटा इसी समय कई और सवारियों ने भी अपने-अपने टिकट उसकी ओर बढ़ा दिए। कई टिकट देखने के बाद वह सिर हिलाते हुए बोला- ''यों सारे टिकट मन्ने इसू नई किये साबजी।ÓÓ
''फेर? होर कूण भूत-परेत इसू करेगा इनोनू?ÓÓ, टिकट चैकर बलबलाया।
इसका कोई उत्तर कंडक्टर के पास नहीं था। निदान, सारी सवारियों के टिकट चैक करने के बाद ग्यारह टिकट कंडक्टर द्वारा 'इशूÓ स्वीकार नहीं किये गए।
मैं अपनी सीट छोड़कर खड़ा हो गया और उस नवयुवक को तलाश करने की गरज से आंखें इधर-उधर घुमाने लगा कि उससे पूछूं कि उसने हम लोगों को यह टिकट किससे लेकर दिये हैं।
जब वह लड़का कहीं नजर नहीं आया तो मैंने चैकर से कहा- ''आप तो देख ही रहे हैं- बस में बेपनाह भीड़ है और हर आदमी अपना टिकट खरीदने के लिए बस के पीछे की ओर बैठे कंडक्टर के पास नहीं पहुंच सकता- इसलिए कंडक्टर के करीब तक पहुंचने वाली किसी सवारी को पैसे देकर टिकट खरीदने की कोशिश की जाती है। यहां भी यही कुछ हुआ है। एक लड़का यहीं खड़ा था। वह हम सबसे पैसे लेकर यहां से हटा और उसने सबको टिकट लाकर दे दिया। लेकिन लगता है वह इस धोखाधड़ी के बाद आगे की ओर बढ़ते हुए बीच के किसी 'स्टॉपÓ पर उतर गया।ÓÓ मेरी बात पर जब बहुत सी सवारियों ने सहमति के स्वर में बोलना शुरू कर दिया तो टिकट चैकर कुछ ढीला पड़ा और उसने 'पैनल्टीÓ स्वरूप सबकी दोबारा टिकट खरीदने का निर्देश दिया। जब हम सबने फिर से टिकट खरीद लिये तो टिकट चैकर पिछली तरफ जाकर प्रवेश द्वार से बाहर निकल गया। उसके जाने के बाद बस की सवारियों के बीच जो चख-चख मची उसकी तो जैसे कोई सीमा ही नहीं रही।
बहुत दिन निकल गए थे और उस घटना को लगभग भूल भी चुका था कि सहसा स्थिति बदल गई।
एक दोपहर मैं एक विभाग के डायरेक्टर मित्र के चैम्बर में बैठा था। उसे कुछ रिक्त स्थानों की पूर्ति के लिए इंटरव्यू करने थे। आवेदनकर्ताओं की फाइल उसके सामने खुली पड़ी थी और वह मुझसे बातें कर रहा था।
चूंकि अब वह साक्षात्कार शुरू करने ही जा रहा था तो मैं कुर्सी से उठने लगा। वह दायां हाथ हिलाकर बेतकल्लुफी से बोला- ''दसेक कैन्डीडेट हैं कुल जमा। बैठो! एक घंटे में फ्री होकर काफी पियेंगे। तुम्हें कहां जाने की ऐसी जल्दी मच रही है।ÓÓ
मैं हंसकर बोला- ''कहीं जाने की कोई जल्दी नहीं ंहै- मगर यह तुम्हारा विभागीय काम है- कुछ गोपनीयता भी जरूरी हो सकती है।ÓÓ
''न तो तुम किसी कैन्डीडेट के सिफारिशी हो- न तुम्हें कोई निर्णय करना है- यू आर ए साइलैन्ट स्पेकटीटर। देखो तो सही जरा- कैसे-कैसे नमूने आते हैं हमारे पास इन दिनों नौकरी पाने के लिए।ÓÓ और यह कहकर बेफिक्री से हंस पड़ा।
अफसर दोस्त इस तरह मुक्त होकर हंस पड़े तो समझना चाहिए कि फिर वह आपसे पिण्ड छुड़ाने की जल्दी में नहीं है।
अफसर ने घंटी बजाई तो दरवाजे पर पड़ी चिक हटाकर कमरे में बावर्दी चपरासी दाखिल हुआ। डायरेक्टर महोदय ने एक टाइप किया हुआ कागज उसके हाथ में थमाते हुए कहा- ''भीकाजी! यह इन्टरव्यू में आने वालों की लिस्ट है- कैन्डीडेटों को नम्बरवार भेजते रहना।ÓÓ
भीकाजी कागज लेकर चला गया और उसने जरा देकर बाद ही नाम पुकारकर एक प्रत्याशी को भेज दिया।
साक्षात्कार शुरू हो गया। मैंने कुछ देर तक तो कुछ प्रत्याशियों के हाव-भाव और घबराए हुए चेहरे देखे और फिर उधर से आंखें हटाकर मेज पर पड़े अखबारों को उलटना-पुलटना आरंभ कर दिया।
बीच में कभी-कभी अनायास मेरी आंखें उम्मीदवारों की ओर उठ जाती थी। बाकी उम्मीदवार तो कमरे में चुपचाप ही दाखिल हो रहे थे मगर एक ने द्वार पर से चिक हटाकर बहुत शालीनता से पूछा- ''मे आई कम इन सर?ÓÓ
मेरे मित्र ने गर्दन को हल्का सा खम देकर उसे आने की इजाजत दे दी। जब वह कुर्सी पर आकर बैठ गया तो मुझे वह चेहरा कुछ परिचित सा लगा। युवक मेरे निकट पड़ी कुर्सी पर आकर बैठ गया पर उसने मुझे नहीं देखा। वह अपने हाव-भाव और लिबास से खूब चुस्त-दुरुस्त दिखाई पड़ता था। मेरे मित्र ने उससे जो भी सवाल पूछे उनके उत्तर उसने संक्षेप में दिए और पूरे आत्मविश्वास से वह सामने मित्र की ओर देखता रहा। अन्य उम्मीदवारों की अपेक्षा उसे समय भी अधिक ही दिया गया।
इस तमाम वक्त मैं अपनी स्मृति को गहराई से कुरेदकर यह याद करने की कोशिश करता रहा कि मैंने उसे कहां देखा है।
जब उसे जाने के लिए कह दिया गया तो उसने कुर्सी से उठते हुए सहसा मुझे देखा। उससे आंखे मिलते ही मुझे तुरंत याद आ गया। यह वही जाली टिकट देने वाला फ्राड था। जिसने कितने ही लोगों की उस दिन बस में जमकर फजीहत कराई थी। टिकट चैकर के चुभते  हुए जुमले मेरे कानों में बजने लगे।
मेरी ओर देखकर वह क्षण भर तो ठिठका मगर अगले क्षण मुड़कर तेजी से बाहर जाने लगा।
मैं भी तुरंत कुर्सी छोड़कर उठ खड़ा हुआ और किंचित सख्त लहजे से बोला- ''ऐ मिस्टर, जरा रुकिये तो। आपसे एक मिनट बात करनी है।ÓÓ लेकिन वह वहां रुका नहीं, दरवाजे पर पड़ी चिक हटाकर फुर्ती से बाहर निकल गया।
मेरे इस अप्रत्याशित व्यवहार और लहजे पर डायरेक्टर मित्र को घोर आश्चर्य हुआ। वह पूछ बैठा- ''आखिर क्या बात है। क्या तुम इसे पहचानते हो?ÓÓ
मैंने उत्तेजित होकर कहा- ''हां-हां मैं इसे बखूबी पहचानता हूं। इससे मुझे एक पुराना हिसाब भी चुकाना है।ÓÓ
मित्र ने चकित होकर मेरा तमतमाया हुआ चेहरा देखा और चपरासी को तलब करने के लिए घंटी का बटन दबा दिया। लेकिन मैं कमरे में फिर ठहरा नहीं। चपरासी चिक हटाकर जब कमरे में दाखिल हो रहा था तो मैं बाहर निकल रहा था।
मैंने तेजी से आगे बढ़कर उसको लिफ्ट से बाहर ही घेर लिया और क्रूरता से मुस्कराते हुए बोला- ''कहिए मिस्टर किधर भागे जा रहे हैं। क्या आपको यह नौकरी नहीं चाहिए?ÓÓ
उसने सकपकाते हुए मुझे देखा पर वह बोला कुछ नहीं, मेरे मन में उस दिन के अपमान की स्मृति से क्रोध का समुद्र उफन रहा था। उस टिकट वाली घटना को लेकर मेरी बेइज्जती भी तो कुछ कम नहीं हुई थी।
मैंने व्यंग्य कसा- ''हां तुम नौकरी करना भी क्यों चाहोगे? जाली टिकट बेचकर ही काफी आमदनी हो जाती होगी।ÓÓ
इस दफा उसने तीखी नजरों से मुझे देखा और तिलमिलाकर बोला- ''ऑड सिचुएशंस में आदमी क्या कुछ कर सकता है शायद आप जैसे बड़े आदमी यह नहीं समझ सकते। जिंदगी कभी-कभी बहुत अजीब व्यवहार करती है।ÓÓ
मैं और भी ज्यादा कटखना हो उठा- ''दार्शनिक ढंग की बातें तो आप खूब अच्छे ढंग से कह लेते हैं। जहर का प्याला पीने वाले सुकरात तो शायद आप ही हैं। और शायद इसीलिए लोगों से रुपया धेला झटककर अपना धंधा चला रहे हैं।ÓÓ
इस बार वह मुंहजोर हो आया- ''सर! आदमी को कभी-कभी इससे भी कहीं आगे जाना पड़ता है। पर आपसे यह सब कहने का कुछ मतलब भी हो सकता यह मैं नहीं समझता।ÓÓ
उसका अंतिम वाक्य सुनकर मुझे लगा कि मैं शायद जररूत से ज्यादा कटु हो उठा हूं। यह तो उसकी बातों से •ााहिर हो ही गया था कि वह पढ़ा लिखा तो था ही। हो सकता है उस दिन विपरीत परिस्थितियों में उसका आचरण बदला हुआ रहा हो।
मैंने अपना स्वर बदलकर इस बार जरा मुलायमियत से कहा- ''अच्छा तो ठीक है, फिर आओ मेरे साथ तुमसे कुछ बातें करना चाहता हूं।ÓÓ
लिफ्ट से जरा हटकर विभागीय कैन्टीन थी। मैं उसे साथ लेकर उसी तरफ चला गया। हम दोनों भीतर हॉल में जाकर एक खाली मेज के इर्द-गिर्द कुर्सियों पर बैठ गये। मैंने बेयरा को बुलाकर दो प्याले चाय और बै्रड पकोड़ा लाने का आर्डर दिया। बेयरा चाय लेने चला गया तो मैंने उसके चेहरे पर आंखें टिकाकर कहा- ''हां अब बोलो मामला क्या था जो तुमने उसे रो•ा इतनी घटिया हरकत की थी। तुमको मालूम है उस दिन ग्यारह इज्जतदार लोगों को कितना जलील होना पड़ा था।ÓÓ
थोड़ी देर बाद बेयरा हमारे सामने चाय और पकौड़े रख गया तो उसने चाय के प्याले के किनारे पर उंगली घिसी और आंखें झुकाए झुकाए बोला- ''मैंने वाणिज्य विषय लेकर पोस्ट ग्रेजुएट की डिग्री ली हुई है, पैरेण्ट्स मुझसे पूरी तरह आजिज आ चुके हैं। तीन साल हो गए जूते घिसते हुए। न जाने कहां-कहां कितने इंटरव्यू दे चुका हूं। कहीं से नौकरी का कोई ऑफर नहीं मिलता। मैं तो चपरासी की 'फोर्थ ग्रेडÓ की नौकरी करने से भी नहीं चुकूंगा मगर वहां मेरी डिग्री आड़े आ जाती है। आप जानते हैं। मैं घर वालों से अब आंखें मिलाकर भी बातें नहीं कर पाता। कुछ क्षण की चुप्पी के बाद वह अपने कपड़ों की ओर उंगली उठाकर बोला- ''आज इस इंटरव्यू में भी यह एक दोस्त के मंगेनू कपड़े पहनकर आया हूं। बस आप इसी से हालात का अंदाज लगा लीजिए।ÓÓ
मैंने कहा- ''वह तो मैं समझ सकता हूं मगर वह जाली टिकट...।ÓÓ
उसने अपने दायें हाथ का पंजा मेरी ओर करके कहा- ''जरा इसे छूकर देखिये- हाथ में ठेकें पड़ गई है।ÓÓ
''यानी आप बस की छतों की राड्स पकड़े-पकड़े मेहनतकश हो गए हैं।ÓÓ इस बार मैंने किंचित हल्केपन से कहा।
उसने चाय का घंूट भरा और उदासी से बोला- ''अपना खर्च चलाने के लिए एक पढ़े-लिखे बेरोजगार नौजवान के लिए क्या आप कोई माकूल उपाय सुझा सकते हैं इस देश में?ÓÓ
मैंने कई मिनट सोचकर कहा- ''ईमानदारी की बात यह है कि मैं कोई रास्ता नहीं सुझा सकता मगर...।ÓÓ
वह एक मायूस हंसी हंसते हुए बोला- ''आपकी 'मगरÓ का मतलब मैं समझता हूं कि आप मुझे ऊंचे-ऊंचे उपदेश देकर नैतिक बने रहने की सीख बखूबी दे सकते हैं।ÓÓ उस लड़के के भीतर उमड़ती कड़वाहट और उसकी अवसादग्रस्त मुद्रा ने कहीं मुझे भीतर से हिला दिया। चाय खत्म हो चुकी थी। हम दोनों कुर्सियां छोड़कर उठ खड़े हुए। मैंने काउन्टर पर जाकर चाय के पैसे चुकाए और उसके साथ केन्टीन से बाहर आ गया। जब हम लिफ्ट के सामने पहुंच गए तो मैंने कहा- ''अच्छा... उम्मीद है आपसे फिर भेंट होगी।ÓÓ मेरी इस बात पर वह हड़बड़ाया। शायद उसे वही टिकट की धोखाधड़ी वाली बात की ध्वनि में सुनाई दी। वह एक क्षण ठिठककर खड़ा रहा और फिर लिफ्ट की ओर बढ़ गया।
मैं डायरेक्टर मित्र के केबिन में लौटकर गया तो मैंने पाया कि सारे उम्मीदवार साक्षात्कार देने के बाद जा चुके थे और मित्र मेरी राह देख रहे थे। मुझे देखकर मजाकिया लहजे में बोले- ''अजीब हाल है तुम्हारा भी। कैन्डीडेट के पीछे यों लपके जैसा वह कोई सर्टीफाइड क्रिमिनल हो हो और आप जनाब जेम्स बॉंड। मैंने तुम्हारे पीछे-पीछे 'प्यूनÓ को दौड़ाया भी मगर पता नहीं तुम उस लड़के के साथ किधर गुम हो गए।ÓÓ फिर वह मेज के कागजों को एक फाइल में रखते हुए पूछ बैठे- ''हां मामला क्या था जो तुम उसे देखकर इतने उत्तेजित हो उठे थे?ÓÓ
मैंने मित्र को वह जाली टिकटों वाली बात नहीं बतलाई। मैंने अपनी बात में भरोसा पैदा करने की कोशिश करते हुए कहा- ''वह नालायक एक रिटायर्ड परिचित का बेटा है। मैंने उसे तुम्हारे पास लाने के लिए न जाने कितनी बार बुलाया होगा- पर वह दुष्ट कभी नहीं आया। आज यह यहां अकस्मात दिख गया तो मैंने सोचा लाओ आज इसकी खबर ही ले लूं।ÓÓ कुछ क्षण रुककर मैं बोला- ''पिता रिटायर हो चुके हैं, लड़का अच्छा खासा एजुकेटेड होकर भी इधर-उधर झक मारता घूम रहा है।ÓÓ
''चलो तो फिर ठीक है- आज तो यह तुम्हारे सामने ही आ गया। तीन 'वैकेन्सीजÓ है। लड़का इन्टेलीजेन्ट भी है। मैं तो इसे वैसे भी लेने की बात सोच रहा था- मैरिट पर भी 'स्टैण्डÓ करता है।ÓÓ
मैंने इस संबंध में कोई खास दिलचस्पी जाहिर नहीं की बल्कि थोड़ी लापरवाही ही दिखाई- ''ठीक है माकूल हो तो ले लो। वैसे घर वाले तो इसे लेकर चिंचित हैं ही। साल दो साल और खाली रह गया तो आवारा बन जाएगा।ÓÓ
''ओक्केÓÓ कहकर मित्र कुर्सी छोड़कर खड़े हो गए और हाथ में पकड़ी हुई फाइल को पीछे दीवार से लगी अलमारी में रखने लगे। सहसा मुझे उस लड़के का नाम जानने की इच्छा हुई।
मैं बोला- ''श्रीनाथ! जरा इसकी एप्लीकेशन तो दिखाना। देखूं इस उल्लू की एम.कॉम में श्रेणी क्या है।ÓÓ
दोस्त ने अपनी मेज की ओर पलटकर सारी फाइल मेरी ओर बढ़ाते हुए कहा- ''विजय लूथरा की वैरी गुड सैकिंड डिविजन है।ÓÓ
मैंने फाइल में से उसका आवेदन पत्र खींचकर देखा। उसका नाम विजय लूथरा था। वह दिल्ली की किसी दूर की बस्ती में रहता था। अंक उसके अट्ठावन प्रतिशत से ऊपर थे और पिता की मृत्यु हो चुकी थी।
मुझे अपना झूठ पकड़ा जाने का भय हुआ। मैंने अभी-अभी श्रीनाथ से कहा था कि उस लड़के के पिता मेरे परिचित हैं। कहीं श्रीनाथ ने भी दोबारा उसका आवेदन पत्र देख लिया तो मेरे झूठ की सारी कलई खुल जाने वाली थी। मैंने तुरंत फाइल बंद करके लौटा दी और उतावली से बोला- ''बहुत हो चुका अब फौरन काफी पिला दो, सिर दुख रहा है।ÓÓ
श्रीनाथ ने चपरासी को बुलाकर काफी के लिए कहा दिया और मेज पर पड़ी फाइल को कुर्सी से उठाकर अलमारी में रखने के बजाय मेज की दराज में डालते हुए बोला- ''क्या जमाना आ गया है। बेरोजगारों की लाइन लगी हुई है हर तरफ। हमारे जमाने में तो कोई बी.ए. भी बेरोजगार नहीं रहता था।ÓÓ
मेरी चेतना में फिर वही दृश्य घूम गया जब इस विजय लूथरा नाम के खासे पढ़े-लिखे लड़के ने ग्यारह लोगों को धोखा देकर पांच-सात रुपए इकट्ठे किए थे। मैंने श्रीनाथ की बात पर कहा- ''अच्छा है तुम्हें इस जमाने के असली हालात का अब भी गुमान नहीं है वर्ना...ÓÓ
''वर्ना क्या होता।ÓÓ श्रीनाथ ने चकित होकर पूछा, जैसे मुझे कोई भेद की बात मालूम हो। मैं हंस पड़ा और बोला- ''वर्ना क्या? वर्ना का खेल खत्म हो गया अब तो।ÓÓ
और श्रीनाथ के आगे कुछ पूछने से पहले ही चपरासी काफी की ट्रे लिए कमरे में दाखिल हो गया।