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Tuesday 21 Nov 2017

हत्यारे


संजीव
43 न्यू डीडीए जनता फ्लैट्स, मयूर विहार फेस-1, दिल्ली- 91
एक्स! यानी दो उद्धत तलवारों का क्रॉस!
एक्स द्वीप! यानी परस्पर काटती दो हड्डियां और हड्डियों के आलंब पर टिक हुआ खोपड़ी का कंकाल!
द्वीप का वास्तिवक नाम 'एक्सÓ नहीं है। नाम कुछ और रहा होगा। खोपड़ी का कंकाल बता सकता तो बताता, क्या नाम रहा था उस द्वीप का। यह भी बताता कि क्यों नाम से बेनाम हो गया वह द्वीप, कैसे-कैसे लोग हुआ करते थे, कैसे-कैसे जीव-जन्तु, मौसम कैसा होता था, वनस्पतियां क्या थीं, कैसे रहते थे लोग, क्या था उनका इतिहास और भूगोल और क्या थी उनकी सभ्यता और संस्कृति।
पर अब कौन बताएगा? लहरें बता नहीं सकतीं, आसमान बता नहीं सकता, हवा बता नहीं सकती। पेड़-पौधे, मछलियां, और परिन्दे बयां कर नहीं सकते, बच्चे और किशोर तब इस दुनिया में आए नहीं थे और जो आए थे, इस दुनिया से जा चुके हैं।
यहां से हजार किलोमीटर की दूरी पर एक बूढ़ा जरूर है जो इस खोपड़ी के कंकाल को जगा सकता है, मगर पहले खुद जगे तब तो...। कम्पनी ने काफी पहले उसे नौकरी से निकाल दिया है। मछुआरों और जहाजी मजदूरों की जिस बस्ती में वह राह भटके बूढ़े बंदर की तरह डोलता रहता है, वहां उसे क्रू बूढ़ा कहते हैं। कोढ़ के जहां-तहां पैबंद, एकमात्र आंख खाड़ी की तरह खिंची हुई, सिर पर जहां-तहां मरुस्थल की झुलसी घास से बालों के गुच्छे, जैसे चूहों ने कुतर लिया हो, पौने 6 फीट का हडिय़ल बूढ़ा, लहीम सहीम कपड़े, खुद से और खुदी से बेदार क्रू हाथ के दोनों चौड़े पंजों को घुटनों पर उलझाए फिक्र की पुलिया पर अक्सर बैठा मिल जाएगा। चुप्पा इतना कि दुनिया की कोई भी हलचल उसे प्रभावित नहीं करती और बातूनी इतना कि एक बार बड़बड़ाना शुरू कर दे तो बस...। ऐसे में कोई नहीं मिलता तो सिर को झटके देते हुए अपनी इकलौती नीली आंख को नचाते हुए वह खुद से ही बतियाता रहता है। बाकी समय में उसकी नीली आंख में कोई नामालूम सी खीझ और अनुपात दग्धता चिलचिलाती रहती है।
सुनेंगे क्रू बूढ़े से उस एक्स द्वीप की कहानी...? ''सिर्फ एक टाइटेनिक ही नहीं, कितने टाइटेनिक डूबे हैं कुछ पता है? एक ही कोलंबस नहीं भटका था, कितने-कितने भटक गए। और कोई एक ही सेंट हेलेना नहीं है जनाब, खोजो तो कितने-कितने नेपोलियनों के कंकालों से भरे कितने-कितने सेंट हेलेना मिल जाएंगे।ÓÓ कुछ ऐसे ही असंबद्ध प्रलाप पहले वह बुदबुदाएगा, जैसे मंत्रों से खोपड़ी को जगा रहा हो, फिर धीरे-धीरे वह खोपड़ी में समाता जाएगा...।
''एक्स का क्या पूछते हो? एक्स चिन्ह भी है, निश्चिन्ह भी।ÓÓ
कर्क रेखा की चिलचिलाती मेखला जहां सिर के ऊपर से और विषुवत रेखा का गर्म छल्ला पांव के नीचे बारहों महीने तपता रहे, छू दो तो झुलस जाओ; प्रशांत महासागर एक ओर से फुफकारता हो तो अटलांटिक महासागर दूसरी ओर से।... हवाएं लहरों पर बार-बार लिखती और मिटाती रहती हैं उसका नाम। वहीं, कहीं वहीं अक्षांशों और देशांतरों के मकडज़ाल में जीवन के सूक्ष्म कण की तरह धीरे-धीरे स्पंदित होता रहा था वह द्वीप।
वे भी सभ्य थे, मगर हमारी तरह नहीं; साफ थे, मगर हमारी तरह नहीं; सुंदर थे, मगर हमारी तरह नहीं। हमारे पैमाने कुछ और होते हैं न! गाढ़े हरे और धानी रंगों से रंगा, सैकड़ों रंगों के बेल बूटों से सजा, मैंग्रूव जाति की वनस्पतियों वाला सब्ज द्वीप! वर्षा उन रंगों को धो-धो कर निखारती। समुद्र के खारे पानी से पंक में पौधों का दम बंद हो जाता तो वे जड़ों की नाक निकालकर बाहर से ऑक्सीजन खींचते। दिनों और सप्ताहों के सफर पर कुछ और द्वीप थे, उनके आगे कुछ और, यह कड़ी धरती के मुख्य भूभाग तक खिंचती चली जाती, मगर वहां तक आते-जाते थक जाती और नई दुनिया की रोशनी द्वीप-दर-द्वीप, बूंद-दर-बूंद चूकर ही वहां पहुंचती थी। बहुत जद्दोजहद से जिंदा रहते थे वे, मगर किसी से कुछ मांगते तो नहीं थे। किसी का कुछ छीनते तो नहीं थे...। तो यह था वह द्वीप, उसका पता अक्षांशों से पूछो, देशांतरों से पूछा, सभ्यता से पूछो, संस्कृति से पूछो, कहां गया वह।ÓÓ
इतना कहकर चुप हो जाएगा क्रू बूढ़ा। मायूसी तारी रही तो अपनी पहली आंख की तरह उसकी खामोशी झांय-झांय बजती रहेगी और खीझ बलबलाई तो कहानी उसकी दूसरी आंख की तरह खिंच जाएगी...
''वर्षों पहले लेटिन अमरीका का वह जजीरा हमें पानी पर तैरता हुआ अचानक यूं ही मिल गया था- मैंग्रूव और ट्रॉपिकल जाति के पेड़-पौधों, लताओं, उद्भिजों से अटा पड़ा-खरगोश की तरह कान खड़े किए हुए भालू थे, बंदर थे, जंगली कुत्ते थे, बकरियां और भेड़ें थीं, सांप और मछलियां और घडिय़ाल थे, चील, कौवे, सारस और पंडुक... और हां बुलबुल और कोयल भी। मूल निवासी वैसे ही थे जैसे इस तरह के अंदरूनी द्वीपों के लोग हुआ करते हैं, न गोरे, न काले, न लंबे, न नाटे। समुद्र ने उन पर इतना नमक छिड़का था कि लहरों की तरह ही चेहरे हमेशा बिलकते रहते। धार्मिक आस्थाओं से जुड़े सीधे-सादे भोले-भाले सहज बोध के लोग। हमें लगा, शायद ही कभी इतनी दूर से कोई धर्म प्रचारक या हमारी तरह का कोई समुद्री अभियात्री आया होगा वहां।
कैप्टेन ने अपने बाइनोक्यूलर से देखा तो पहले अस्पष्ट सी कोई भीड़ नजर आई। कौन है ये? चिपांजी या... नहीं इंसान जैसे ही लग रहे थे, हां इंसान ही थे। वे हमारे जहाज को बड़ी हैरानी से देख रहे थे कि इतना बड़ा महल समुद्र में उन तक कैसे बहकर आ गया या कि उनके द्वीप को ही लहरों ने बहाकर उस महल तक ला खड़ा किया है? अपनी सहज बुद्धि से उन्होंने अनुमान लगाया कि हम भी इंसानों जैसे ही कोई जीव थे। यह सब ईश्वरीय वरदान था या कोई प्रकोप! उत्तेजना, आशंका और उत्सुकता इधर भी थी, उधर भी।
कैप्टन ने तट पर खड़ी अबूझ भाषा बोलती अद्र्धनग्न भीड़ के मिजाज को तौला, हाथों के इशारे किए, क्रम-क्रम से कुछ केक, मिठाइयां, फल, कपड़े और खिलौने फेंके। कुछ ने उठाए, कुछ ने नहीं; कुछ ने खाए, कुछ ने नहीं; कुछ ने पहने, कुछ ने नहीं। हमने धीरज नहीं खोया। हम आश्वस्त थे कि नया स्वाद उनमें संक्रामक बीमारी की तरह धीरे-धीरे असर करेगा ही, और उसने किया। धीरे-धीरे विश्वास के कुछ रेशे उभरे। उन्हीं रेशों के सहारे एक-एक कर हम नीचे उतरे और एक-एक कदम फूंक-फूंक कर रखने लगे। पता नहीं क्या सोच कर उन्होंने हमें घेर लिया और अपने सरदार के पास ले गए। कैप्टन ने हमें अच्छी तरह सिखा दिया था कि हमें कब, कैसे पेश आना है। हम सबने उनकी देखा-देखी हाथ फैलाकर झुक-झुककर अभिवादन किए और विनयपूर्वक उपहार दिए जगमगाते उपहार!
उनका विश्वास फिर भी पूरी तरह नहीं जमा। हमने धीरज नहीं खोया। धीरे-धीरे हमने उनकी बोली-बानी, चाल-चलन संकेतों और रुझानों को समझा और हवा में बू की तरह घुलने लगे। इसके लिए हमें खुद को काफी नीचे उतारना पड़ा। हमने उनके देवता की उनसे भी ज्यादा पूजा की और सारसों की बलि चढ़ाई। टूटी-फूटी बोली सीख ली थी हमने। उसी बोली में हमने उन्हें महानतम और पवित्रतम बताते हुए उनके रीति-रिवाजों को श्रेष्ठ और अद्वितीय बताकर उनकी भावना को सहलाया। अब वे पिघलने लगे, पिघलकर बहने लगे। तट के अंदर घुसते-घुसते हम उनके घरों-परिवारों में जा धंसे।
मेरा टेंट जरा दूर पर था। टेंट के पास ही एक खेत था। खेत में एक लड़की आती थी- बीस एक साल की- किनी। मैंने उसे एक लोहे की कुदाली दी थी, बस इतनी सी बात पर वह मुझे भला मानुष समझने लगी थी। हम जहाजियों के लिए औरतें बड़ी नियामत चीज होती हैं। बंदरगाहों पर लंगर पड़े नहीं कि हमारा पहला काम होता है औरतों की तलाश...और वे मिल भी जाती हैं- नरम-गरम! मगर मैं कसम खाकर कह सकता हूं कि अपनी तमाम समुद्री यात्राओं में मुझे किनी जैसी औरत नहीं मिली। आप पूछोगे, भला ऐसा क्या था किनी में तो मुझे जवाब में सिर्फ एक बात कहनी पड़ेगी 'फरेबों से भरी हमारी इस मक्कार दुनिया में मासूमियत से बड़ी कोई खूबसूरती हो सकती है क्या?Ó
कितनी मासूम थी वह। और मैं...?
मैं ही क्यों हम सभी पहले दरजे के मक्कार थे। काम हो जाने तक हम सबको उनके प्रति एकनिष्ठ बने रहना था और कोई भी ऐसा आचरण नहीं करना था कि कोई भड़क जाए। किनी और मैं समुद्र के किनारे वाले टीले पर घंटों लहरों के शोर में बैठे रहते या द्वीप में दूर-दूर तक टहलते। किनी के माध्यम से मैं जो कुछ जान पाता, वापस आकर अपने साथियों को बताता। इस तरह एक मामूली मिस्लिटी से बढ़कर मेरी हैसियत द्वीप विशेषज्ञ की हो गई। स्थितियां अनुकूल पाकर आखिर हमने अपना वह काम शुरू करने का निश्चय किया, जिसके लिए सूंघते-सूंघते हम वहां आए थे- तेल का पता लगाने का काम।
एक वर्ष पूर्व ही तेल उत्पादक देशों ने तेल की कीमत अचानक बढ़ा दी थी और तेल और बिजली पर टिकी भागती, जगमगाती हमारी सभ्यता में खलबली मच गई थी। बिजली तो पानी, हवा, आग, सूर्य और कचरों तक से दुही जा सकती थी लेकिन तेल नहीं। उसके लिए तो धरती के गहरे जाना होता है। साला, पचास जगह ड्रील करो तो एक जगह मुश्किल से तेल मिलेगा वह भी कभी-कभी चमगादड़ के मूत भर... हमारी कंपनी के डायरेक्टर ने कहा था,'खोजो! इस पृथ्वी पर अभी भी कितनी जगहें बची पड़ी हैं, जिन पर गीधों की नजर नहीं गई है और जहां तेल है। तेल न मिला तो हमें ंमजबूरन अपनी कंपनी बंद कर देनी होगी फिर भेड़-बकरियों, मुर्गे-मुर्गियों की तरह इतने भू-गर्भवेत्ता वैज्ञानिक, मिस्तरी और दूसरे सारे लोग सड़क पर आ जाएंगे। सो, हम जहाज पर कुछ प्राथमिक उपकरण लेकर समुद्र में निकल पड़े थे, हमारी मशीनें सूंड डालकर तेल खुद चूस कर वैज्ञानिकों की हथेली पर रख देतीं और वे आनन-फानन में छान-फूंक, सूंघ-सांघ कर बता देते कि तेल है या नहीं, है तो कितना।
हमने हालांकि काफी एहतियात से काम शुरू किया, बाकायदा उनके देवता को बलि देकर, सरदार को चढ़ावे चढ़ाकर, ओझा को घूस देकर मगर फिर भी किसी सिरफिरे ने हम पर कुत्ते छोड़ दिए। साइलेंसर लगे एक मामूली से गन से हमने उसे मार गिराया। कुत्ते के मरने को ओझा ने देवता की इच्छा के रूप में व्याख्यायित किया और हमारा रोब गालिब हो गया। ओझा हमारे पक्ष में था, सरदार हमारे पक्ष में था, देवता हमारे पक्ष में थे। हमारा ड्रील द्वीप की छाती पर घूमने लगा। बल्ब जल उठे। यह सब उस द्वीप पर पहली बार हो रहा था।
द्वीप के कोने-कोने से लोग आते और हमारे काम को बड़ी उत्सुकता से देखते। किनी मुझसे अचरज से पूछती, 'ओझा बता रहा था, किसी अमृत का पता लगा रहे हो तुम लोग।Ó
'हांÓ। मैं उसे अपनी बांहों में भींचते हुए कहता।
'लेकिन वो सरफिरा तो कहता था कोई तेल है।Ó
'तेल ही वह अमृत है।Ó
'तेल और अमृत? यह कैसे हो सकता है?Ó किनी हैरान हो जाती, 'तुम्हें पता है, सरफिरा एक बार उधर वाले देश से पानी जैसी कोई चीज ले आया था। एक सर्दियों में गया था, दूसरी सर्दियों में लौटा था। लोगों ने उसे घेर लिया, 'क्या ले आए होÓ पानी? उसने कहा- 'पानी नहीं आग!Ó फिर उसने आग पर उसे छिड़का तो सचमुच की आग फुफकार उठी। हम सभी डर गए। उसने कहा डरने की कोई बात नहीं यह आग नहीं तेल है- सोई हुई आग। उसने यह भी बताया कि जिस देश से वह लौटा है, वहां बड़े-बड़े महल हैं, लोग आकाश में उड़ते हैं, समुद्र पर चलते हैं- इसी तेल से। तुम लोग जिस तेल का पता लगा रहे हो, क्या यह वही तेल है?Ó
'हां, वह भी, और भी बहुत कुछ!Ó
'तब तो बहुत ही बुरा है।Ó
'क्यों?Ó
''पहली बार जब वह तेल आया था, मेरी दादी ने नारियल का तेल समझकर उसे पीना चाहा, कई दिनों तक उल्टियां करती रही। यह तो ओझा था, वरना...।ÓÓ
'अरे नहीं!Ó मैंने उसे एक शीशी सेंट दिया, सूंघकर उसे अच्छा लगा, 'अरे वाह, यह तो अच्छा लगता है।Ó
'यह भी इसी तेल से निकलेगा।Ó मैंने उसे बताया तो वह चकित रह गई!
ड्रील नीचे नहीं जा पा रहा था। मेरी बुलाहट हुई। मैं स्पॉट पर गया तो पीछे-पीछे किनी भी थी। अंदर से पिलपिला कर पानी बाहर गिर रहा था। फटा फट फटा फट! पंप के इंजन का शोर मैंने नीचे से आते पत्थर के टुकड़ों को हाथ से लेकर परखा एक दिन पहले जो ग्रेनाइट के टुकड़े आ रहे थे, ये टुकड़े वैसे ही थे। पत्थर अगर दूर तक हैं तो ड्रील को नष्ट करने में कोई बुद्धिमानी नहीं। पत्थर को डायनामाइट से उड़ा देना ही उचित होगा। कैप्टन और दूसरे विशेषज्ञ चिंता में पड़ गए। उनकी आशंका थी कि ऐसा करके वे द्वीप के निवासियों को आशंकित कर देंगे, फिर हमारा बना-बनाया खेल खत्म हो जाएगा और फिर डायनामाइट से काम न सधा तो...?
'क्यों न दूसरा कुआं खोदा जाए, द्वीप के दूसरे छोर पर।Ó
'और वहां भी यहां की तरह ही साढ़े तीन हजार फीट ड्रील करने के बाद यही चट्टान मिली तो?Ó
मेरे इस तर्क का उनके पास कोई जवाब न था?
इस दिन समुद्री चक्रवात आया था। कुछ मौसम ने साथ दिया कुछ मेरे सेंट के उपहार ने, डायनामाइट का विस्फोट कराया गया और कोई प्रतिक्रिया सामने न आ पाई, अलबत्ता तेल का सगुन हमें मिल गया। स्लेट और खोखले पत्थर बता रहे थे कि आगे तेल है। जहाज पर तो हमारी लैब थी, वहां से अभी पुष्टि की जानी बाकी थी।   
मौसम साफ होते ही किनी किसी पालतू परिन्दे-सी चहकती हुई मेरे पास आ गई, 'क्यों मिल गया?Ó
'तेल।Ó
'तेल नहीं, मेरी सुगंधि।Ó
''ओह वो! थोड़ा धीरज धरो। अभी तो तेल निकलेगा काला -काला तेल, फिर उसे हमारे शोधन यंत्रों में भेजा जाएगा जहां पहले गैसोलिन निकलेगी, वो हाई-स्पीड पेट्रोल।ÓÓ
'नहीं पहले मेरी सुगंधि।Ó
'फिर तुम आकाश में उड़ोगी कैसे, समुद्र पर चलोगी कैसे?Ó
'सच। तब तो बड़ा मजा आएगा। लेकिन मुझे डर लगता है।Ó
'डरने की कोई बात नहीं, मैं जो रहूंगा तुम्हारे साथ।Ó
'अच्छा चलो देखा जाएगा। लेकिन इसके बाद तो सुगंधि...।Ó
'नहीं इसके बाद फिर पेट्रोल।Ó
'और उसके बाद सुगंधि।Ó
'नहीं उसके बाद केरोसिन, वो तेल जिसे बूढ़ी नारियल का तेल समझकर पी गई थी।Ó
'आक थू! उसका नाम लेते ही मुझे उबकाई आने लगती है।Ó
'अभी तुम्हें उबकाई आ रही है, लेकिन एक दिन ऐसा आएगा जब ये सारा इलाका इसी तेल की बदौलत जगमगाने लगेगा। अभी तुम दो-तीन बल्ब जलता देखकर दंग हुई जा रही थी...Ó
'बल्ब?Ó
'हां, कल्पना करो, क्या होगा जब ऐसे, बल्कि इससे भी सुंदर और चौंधियाते हजारों रोशनियां जल उठेंगी, जब सूरज, चांद और सितारे तुम्हारे दामन में होंगे, जब तुम्हें नारियल के छाए झोपड़ों में नहीं रहना होग, ये पत्थर नहीं होंगे, जिनसे बार-बार तुम्हारी खूबसूरत उंगलियों को ठेस लगती है, साफ-सुथरे महलों में रहोगी, चिकनी-चिकनी सड़कें होंगी और इफरात सुख-संपत्ति।Ó
'और मेरी सुगंधि?Ó
मैं बार-बार उसे भौतिक उपलब्धियों के चमत्कारों की दुनिया में ले जाना चाहता मगर वह थी कि हर बार सुगंधि पर लौट आती।
'वो भी...।Ó अब जैसे भी हो, उसे सुगंधि थमाए बगैर मेरी मुक्ति नहीं थी।
थोड़ी देर तक वह मेरे आगोश में रही। अचानक एक सवाल फिर उसके दिमाग में अंखुआया, 'अच्छा जो तेल तुम लोग निकालोगे, वह किस चीज का तेल है?Ó
'पत्थर का, मिट्टी और बालू का...।Ó
'तब तो सचमुच के जादूगर हो तुम लोग। क्या सभी चीजों से तेल निकल सकता है?Ó
'हां।Ó
'आदमी का भी?Ó
मैंने उसे देखा, उसकी आंखें गुलाबी और सांसे गर्म हुई जा रही थी। उसे गहरे चूमते हुए मैंने पूछा- 'मन प्राण में कुछ पसीजता है क्या?Ó
'हां।Ó
यही तेल है जो देह, मन, प्राण और आत्मा से रिसता है और जिस पर हमारी यह बुलंद इमारत टिकी है, जिससे हम हवा में उड़ते-फिरते हैं, पानी पर चलते-मचलते हैं, इस कायनात की सारी बुलंदी, सारी ऊष्मा, सारी रोशनियां और सारी खुशबुएं हमारे दामन में होती हैं।Ó कैप्टन और देवता की आवर्जना की अपनी-अपनी सीमा रेखाएं लांघ कर हम पहली बार एक पुरुष और एक नारी की तरह मिले थे। वह भी अपने होश में नहीं थी, मैं भी अपने होश में नहीं था।
होश में आते ही मुझे अपने पिछले क्रिया-कलापों पर हैरानी हुई। मैं उस अबोध लड़की को क्यों बताने लगा था वह सब! यह तेल मिलने की खुशी थी, या कहीं मैंने ही ज्यादा पी रखी थी? नहीं पीकर तो मैं उसके पास जाता नहीं था, उसे बदबू से बेपनाह नफरत थी। तब समझ नहीं पाया था, अब लगता है, नहीं, वह प्रेम था। प्रेम ही था।
प्राय: रोज ही शाम को जहाज पर हम एकत्र होते और तब तक की स्थिति का आकलन करते। उस रात पर फिर एकत्र हुए और तेल और द्वीप से जुड़े सभी पहलुओं पर गौर करने लगे। 'दोस्तों, लगता है, हमारी कोशिश सफल होने को है, दो-एक दिनों में तेल हमें मिल जाएगा।Ó कैप्टन ने अपनी बात शुरू की, 'अगर ऐसा हुआ तो यह पुनर्जीवन होगा, हमारे लिए भी, हमारी कंपनी के लिए भी। सभ्य समाज की आबादियों से दूर, इस निर्जन समुद्र की गरजती, फुफकारती, लहरों के बीच, इस अमूल्य खजाने को, प्रकृति ने, लगता है, हमारे लिए ही सबसे चुरा कर रख छोड़ा था। लेकिन अब हम ऐसे मुकाम पर आ पहुंचे हैं जहां से आगे बढऩे के लिए हमें कुछ महत्वपूर्ण बिन्दुओं पर गौर कर लेना होगा। मसलन, द्वीप अभी तक तो लगता है कि स्वाधीन है, मगर ज्यादा दिनों तक स्वाधीन नहीं रह सकता। हमारी ही तरह कुत्ते हर जगह सूंघते हुए दौड़ रहे हैं।  डर न सिर्फ हमें द्वीप के निवासियों के बागी बन जाने से है, बल्कि दूसरी तेल कंपनियों और देशों से भी। ऐसे में हमारे पास सशस्त्र निजी गार्डों या सेना का होना जरूरी हो गया है। दूसरी बात यह कि तेल की धार जब पहली बार फूटेगी तो इस बात का खास ख्याल रखना होगा कि कोई आग का कण उसके संपर्क में न आए, वरना सारा द्वीप जलकर राख हो जाएगा। सेना या गार्ड्स की जरूरत यहां भी है। कभी-कभी तेल कुओं में लगी आग का मुंह सील करने के लिए एक्सप्लोसिस की जरूरत भी आएगी, जो आसपास की ऑक्सीजन को थोड़ी देर के लिए सोख लें, वह भी हमारे पास नहीं है। ये और ऐसी कई बातें हैं, जिन पर हम खुद निर्णय नहीं ले सकते।Ó
'आप सही कहते हैं।Ó हमारे बुजुर्ग और अनुभवी भूगर्भ विशेषज्ञ ने समर्थन किया, 'इन सब पर और ऐसे और भी कई मसले हैं, जो आगे आएंगे, हमें ंडायरेक्टर की स्वीकृति और सैन्क्शन जरूरी है।Ó
'आप तो उत्खनन से लेकर परीक्षणों तक सारे घटकों का आकलन करते रहे हैं, क्या अनुमान है, आपका तेल के बारे में।Ó 'इतनी जल्दी किसी नतीजे पर पहुंचना, जल्दबाजी होगी, हर तेल कूप, दूसरे से भिन्न होता है लेकिन...Ó
'लेकिन क्या?Ó हम सभी अधीर हो उठे थे।
'प्रारंभिक रिपोर्ट जैसा इंगित कर रही हैं, द्वीप पानी पर नहीं, तेल पर तैर रहा है। इतना तेल अगर हमें मिल जाए तो हम दुनिया के सबसे धनी आदमी हो जाएंगे।Ó हम खुशी से उछल पड़े और आनंदातिरेक में जंगली जानवरों-सी हरकतें करने लगे। दूसरे दिन हम लौट आए। लौट आए फिर से वापस आने के लिए पूरी तैयारी के साथ। सारी तैयारियां करते-कराते हमें तीन महीने लग गए। चौथे महीने हम लौटे तो वहां बसंत का मौसम था। लंगर डालते हुए हमने अपने जहाज से द्वीप को निहारा तो आंखें जुड़ा गई- वही हिलकोरे लेती हरियाली, झूमते नारियल के पेड़, सरसराती हवाएं, छर्रे-छर्रे टूटती लहरों की गर्वीली फुत्कार और कहीं दूर, बहुत दूर धुंध में डूबता हुआ चिलकते सिंधु का संवलाया विस्तार। इसी के नीचे भरा हुआ था तेल का अकूत भंडार। यह सारा वैभव हमारा होगा; हमारे सिवा किसी का नहीं।
लेकिन द्वीप पर दोबारा पांव रखते ही, हमारी खुशफहमी को ठेस लगी। हमारी अनुपस्थिति में हमारे ही देश की एक दूसरी तेल कंपनी द्वीप के दूसरे छोर पर आसन जमा चुकी थी। किनी से मुझे थोड़ी-बहुत जो खबर मिली, उससे हमने अनुमान लगाया कि हमारी ही कंपनी के किसी आदमी को उस कंपनी ने ज्यादा पैसे देकर खरीद लिया था। यानी कि हमारी ही तरह उस कंपनी को भी इस बात की जानकारी मिल चुकी थी कि द्वीप पानी पर नहीं तेल पर तैर रहा है। अकूत तेल, इतना तेल अगर उन्हें मिल जाए तो वे दुनिया के सबसे अमीर हो जाएंगे। उनके तरीके हमसे ज्यादा असरदार थे, उपहार ज्यादा आकर्षक, आश्वासन ज्यादा लोभनीय।
दोनों कंपनियां आमने-सामने हुईं।
हमने उन्हें ललकारा, 'यह हमारा है।Ó
उन्होंने जवाब दिया, 'तुम्हारा नहीं, हमारा।Ó
द्वीप के देवता वैसे ही खड़े थे, सरदार वैसे ही खड़ा था, सारी आबादी वैसे ही खड़ी थी- विस्मित और हैरान। लेकिन अब हमें उनकी राय की परवाह नहीं थी। उनकी सामथ्र्य ही क्या थी, चिंता थी तो उस दूसरी कंपनी की। हम दोनों में समझौते के लिए बातचीत चलती रही और अपने-अपने हिस्से के विकास और विस्तार के काम भी। जैसे ही तेल मिलने की खबर बाहरी दुनिया में फैली दोनो ंतेल कंपनियों  के सहायक उग आए। धड़ाधड़ शेयर्स बिकने लगे, खरीदे हुए सैनिक आए, खरीदे हुए अस्लाह- पहले छोटे, फिर मझोले, फिर बड़े। द्वीप पर खुलेआम सड़कें बिछाने, जेनरेटर्स फिट करने और मशीनें ले आने ले जाने का काम चलने लगा। उम्मीद थी कि हमारे बीच कोई समझौता हो जाएगा।
किनी रोज ही बुरी-बुरी खबरें लेकर आती, 'आज वे मेरा सारस पकड़ ले गए, आज उन्होंने फलां-फलां उपहार दिए। आज उन्होंने मेरा भी हाथ पकड़ा। वो तो कहो मैं हाथ झटक कर भाग खड़ी हुई। आज एक दूसरी लड़की को लेकर तुम्हारे और उनके आदमियों के बीच मारपीट हुई। आज वे चार बकरे और दो लड़कियां उठा ले गए...।Ó वह यह सब ऐसे बताती, जैसे मैं इसे रोक लूंगा। कितनी भोली थी किनी।
उस दिन वह आई तो उसका मुंह उतरा हुआ था। 'आज क्या हुआ?Ó मैंने पूछा।
'बहुत ही बुरा।Ó
'कुछ बताओ भी तो।Ó
'वे लड़कियां गई थीं, कीमती गहने-कपड़े लेकर लौट आईं, मगर वे उदास नहीं, खुश थीं।Ó
'तो इसमें बुरा क्या हुआ?Ó
'उनके मन में इन शैतानों के लिए न$फरत जो मर गई। देवता का जरा भी $ख्याल नहीं।Ó
पता नहीं वह क्या-क्या बड़बड़ाती रही, सहसा विक्षिप्त की तरह उसने मेरा हाथ पकड़ा 'चलो।Ó वह मुझे सीधे देवता के पास खींच ले आई 'खाओ कसम कि तुम इस लड़ाई में भाग नहीं लोगे। खाओ कसम कि और चाहे कुछ भी हो जाए, हम दोनों खुद को एक-दूसरे के लिए जिंदा रखेंगे।Ó
यह एक बेहद अटपटी कसम थी। किनी का विश्वास रखने के लिए मैंने खाई। किनी ने मुझे बताया कि यहां स्त्री-पुरुष के जुड़ाव के बाद एक नाव बनाते हैं, जो नही ंबना पाते, उन्हें उपहार में एक नाव दे दी जाती है। नाव से वे समुद्र में जाते हैं मछलियां पकड़ते हैं। आज हमारा जुड़ाव हो गया देवता के सामने। कल तक उम्मीद है, नाव मुझे मिल जाएगी। मैं उसी नाव पर रात को तुम्हारा इंतजार करूंगी। हम दोनों यह द्वीप छोड़कर औरों की तरह समुद्र मे ंचल देंगे। नहीं भी पहुंच पाए तो क्या, जब तक जिंदा रहेंगे, साथ-साथ तो रहेंगे।
किनी अपने घर चली गई, मैं अपने जहाज पर लौट आया। किनी की बात सच हुई। ठन गई दोनों कंपनियों में, ठन गई सभ्यता की नाक में नकेल डालकर रातों रात दुनिया के महाबली बनने के सपनों में।
देखते ही देखते द्वीप अशांत हो उठा। वनस्पतियों और फूलों की सुगंध में बारुदी दुर्गंध भर गई। जंग क्या थी एक तूफान था। हमने उनके कुएं को लक्ष्य कर रॉकेट और मिसाइलें दागीं, उन्होंने हमारे कुएं को लक्ष्य करके, जैसे वे कुएं न हों, किले हों। अगले निशाने बने हमारे जहाज। जहाज का तेल समुंदर की सतह पर फैल गया। काला-काला धुआं गोल-गोल काले वृत्त पर आग का वलय-आता और पेड़ों, चट्टानों, झोपड़ों से टकराकर आतिशबाजियों सा छितरा जाता। समुद्र में आग, द्वीप पर आग। द्वीप के लोग खरगोशों की तरह गुहार लगाते हुए कभी हमारे पास आते, कभी उनके पास! चीख पुकार और आयुधों के शोर में महाविनाश की बर्बर लीला चलती रही। कितनों के परखचे उड़ गए, कितने जिंदा जल गए, कितने घायल।ÓÓ...
आपको शंका होगी, ''तुम गलत बोलते हो। सिर्फ तेल के लिए इतने खतरनाक आयुध? आखिर ये उन्हें मिले कहां से?ÓÓ
बूढ़ा क्रू घायल खजहे कुत्ते सा गुर्रायेगा, ''तुम तो ऐसे पूछ रहे हो जैसे वे आकाश से टपकते हों या इन्हें बनाने, बेचने और इस्तेमाल करने वाले संत होते हैं।ÓÓ या फिर वह एक छोटा-सा प्रतिप्रश्न करेगा, ''तुम चोरों को मुझसे ज्य़ादा जानते हो क्या?ÓÓ अगर इस पर भी आपकी जिज्ञासा शांत न हुई तो वह एकबारगी चिढ़ जाएगा, ''तुम वहां गए थे या मैं?ÓÓ... देखो, देखो, मेरे बदन को ये हाथ, ये पांव, ये चेहरे, ये आंखें... ये कोढ़ के नहीं, जलने के दाग हैं, आग मेरी आंखों को छील गई है। क्या-क्या नहीं जल गया उसमें मेरा... इस आग से निकले हुए आदमी को देखो, आग की लिखावट को पढ़ो, जितनी बाहर दिख रही है, उससे कहीं ज्यादा अंदर है।ÓÓ
आप नरम पड़ेंगे, 'क्षमा करो। मुझे मालूम न था...Ó बूढ़े क्रू को देखकर यह विश्वास करना मुश्किल होगा कि वह आगे कुछ कहेगा लेकिन वह कहेगा, अंदर के पिघले लावे को निकाले बिना उस ज्वालामुखी को चैन नहीं...।
''लड़ते-लड़ते जब दोनों कंपनियां दीवालिया हो गई तब जाकर लड़ाई बंद हुई और समझौता हुआ। समझौते के तहत आधे-आधे पर रजामंदी हुई, यानी आधा तेल हमारा, आधा उनका, जो भी तीसरा दावेदार आएगा, उससे दोनों कंपनियां मिल कर निबटेंगी। इसे 'महान समझौतेÓ की संज्ञा दी गई। उस रात बचे हुए लोगों ने जश्न मनाया, समृद्धि के जाम पिए गए। उस रात देर तक नाचते रहे हम, मैं भी, आंख और बदन पर के जख़्मों के बावजूद।
नाचते-नाचते मुझे किनी की याद आई, क्या पता वह कहां हो, किस हालत में हो। यूं कहो, उस समय मुझे एक औरत की तलब हो रही थी और मुझे किनी याद आई। सुबह होते ही मैं उसके झोपड़े की ओर चल पड़ा। रास्ते भर जगह-जगह बर्बादी का आलम था। चारों ओर कटे, छिनगाये झुलसे पेड़ और डालियों के काले-काले अवशेष, छितराये जले झोपड़े और झुलस कर विकृत हो गई लाशें, उनकी शिनाख्त सिर्फ सड़ांध से हो सकती थी वरना काली शिलाओं, काली डालों और काली लाशों में फ$र्क कर पाना मुश्किल था। इतिहास मिट गया, भूगोल मिट गया था, रास्ते गुम थे, शिनाख्त गायब थी। दो मील के सफर में मुझे न एक भी हरा पेड़ मिला, न एक भी आदमी या अन्य कोई जीव। मैं एकबारगी डर गया 'हे ईश्वर, मेरी किनी जहां भी हो, सुरक्षित हो। तुम्हारे सामने ही हमने शपथ खाई है। मुझमें मक्कारी हो सकती है, मगर वह...? वह तो बिल्कुल ही निर्दोष है। कितनी दूर से अपरिचय के कितने-कितने जंगल हटाकर एक-दूसरे के करीब आए हैं हम!...
मैंने कितने ही छितराये मलबों पर टेर लगाई 'किनी! मेरी किनीÓ मगर यह एक एकांतिक अरण्य रोदन था। कहीं कोई होता तब तो मेरी पुकार का जवाब आता। वही हहास मारती हवा थी और सर धुनती लहरें! ध्वनियों-प्रतिध्वनियों के बीच आवाज का मेरा खुद का बुना हुआ वहम ही मुझ तक आ रहा था, किनी का नहीं। अचानक मेरी न•ार सागर-तट पर बालू में धंसी एक नाव पर गई। करीब गया तो देखा नाव जगह-जगह से जली और टूटी हुई थी, फिर भी पेंदा सुरक्षित था। पेंदे की बालू में मैंने जो देखा तो थर्रा गया- वह एक नरकंकाल था।...
'वादे के मुताबिक तुम दोनों को लड़ाई शुरू होने की रात को एक नाव पर कहीं दूर निकल जाना था।Ó
''हां था। फिर भी...?ÓÓ
अब क्रू अपनी ही कहानी को उधेडऩे लगेगा, उसके पास बहुतेरे तर्क होंगे, मसलन- इस बात की पक्की गारंटी कहां है। बहुत से लोग द्वीप छोड़कर भाग भी गए थे, किनी नहीं जा सकती क्या? उसे जबरन भी तो ले जा सकते हैं उसके लोग? रहा कंकाल, तो आग ने परिचय के सारे चिन्हों पर कालिख पोत दी थी। आभासित सत्य और वास्तविक सत्य में फर्क नहीं होता क्या?
इन सारे चक्करदार तर्कों का एक ही लब्बोलुवाब है और वह यह कि किनी जिंदा है और एक न एक दिन क्रू को ढूंढते हुए उस तक आ पहुंचेगी। उसके इस विश्वास को बना ही रहने दीजिए। यूं भी भावुकता का दौरा जब उस पर आएगा तो आप उसे रोक नहीं पाएंगे। वह बड़बड़ाता जाएगा। ''ड्रिल अभी भी घूम रहा था धरती पर और मेरे सीने पर। उफ! द्वीप के लोगों ने हम हत्यारों का विश्वास क्यों किया, क्यों?ÓÓ
बूढ़े क्रू की कहानी सिसकियों में ढल जाएगी। थोड़ी देर बाद वह सामान्य होगा, अपनी खाड़ी सी खिंची हुई आंख को पोंछते हुए अपनी फूटी आंख के सुराख बने झांय-झांय झहराले सन्नाटे से बोलेगा, ''उस हरे-भरे खुशहाल द्वीप को कब्र में बदलकर दोनों कंपनियां लौट आईं। द्वीप न अब पानी पर तैरता है, न तेल पर, बल्कि खून पर तैरता है, खून पर...!ÓÓ ''मगर इतना खर्च कर, इतना विनाशकारी युद्ध लडऩे और फिर संधि कर लेने के बाद दोनों तेल कंपनियां लौट क्यों आईं यकायक? तेल क्यों नही ंनिकाला उन्होंने?ÓÓ आप हैरान रह जाएंगे।
क्रू की इकलौती खुनाई आंख इस बार छलक कर बाहर आ जाएगी, ''तेल।..? तेल वहां था ही कहां?ÓÓ
''मगर तुमने तो बताया था कि वैज्ञानिकों, भूगर्भवेत्ताओं और विशेषज्ञों ने द्वीप पर तेल होने की पुष्टि की थी।ÓÓ
कहानी को विराम देती-सी क्रू की आंख के आंसू की एक बूंद टपकेगी और तेल सी पसरती ही चली जाएगी ज्ञान-विज्ञान, प्रौद्योगिकी विकास सभ्यता और संस्कृति पर...!