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Sunday 19 Nov 2017

राजधानी से गुमी किताब


रमाकांत श्रीवास्तव
एल एफ-1/ई-8 /218
कनक स्ट्रिीट,  त्रिलोचन नगर, (त्रिलंगा)
भोपाल-462039 (म.प्र)
मो.9977137809
वह एक खूबसरती और महंगी किताब थी। एकदम ता•ाातरीन जिसे सूंघने से एक प्यारी गंध आती थी। जिस तरह मिट्टी की सोंधी गंध में या नये नोटों की गड्डी की गंध में एक अनोखापन और प्रभाव होता है, वैसा ही किताब में भी था। फ्रांसीसी पिता और लेटिन अमरीकी माता के बेटे पॉल मालरो के अनोखे जीवनानुभवों का निचोड़ उस किताब में था। किताब का शीर्षक था- 'कामेच्छा और रचनानुभव।Ó प्रकाशन के तीन महीने बाद ही बेस्ट सेलर की सूची में तीसरा स्थान पा लेने वाली उस महत्वपूर्ण किताब की विषयवस्तु की ही तरह उसकी साइज भी खास थी- बारह इंच लंबाई और दस इंच चौड़ाई। लिलाक के हल्के रंग के कवर के बीचों-बीच पांच इंच के क्रीम कलर के वर्गाकार में चटकीले रंगों से एक कोलॉज बना था जिसमें शिवलिंग, खजुराहो की मिथुन मूर्ति की कमर, जूलिया राबर्ट की आंखें, मेडोना की जांघें, माधुरी दीक्षित के चोली में से झांकते स्तन, पोर्नो फिल्म के नीग्रो अभिनेता डेविड के चेहरे की आक्रामक उत्तेजना, मकबूल $िफदा हुसैन के पांव, सुरंग में प्रवेश करती हुई ट्रेन और स्वाधीनता की मूर्ति की मशाल थी। ब्लर्ब में लिखा था- दुनिया के ग्लोबल गांव बन जाने के बाद विश्व भर के मानव समूहों के स्त्री-पुरुष सहज रूप से एक-दूसरे को उपलब्ध हो गए हैं तब जीवनानुभव के नये आयाम की ओर दृष्टि डालने का यह सद्य प्रयास है। यह किताब उम्दा कॉकटेल जैसे तरतराते स्वाद और नशे की तरह मजेदार और कामनाओं में उफान पैदा करने वाली है। 21 वीं सदी में साहित्य, कला और संस्कृति के अध्येता के लिए जरूरी विमर्श के लिए यह किताब प्रवेश द्वार है।
प्रकाशक से सीधे मंगाई गई यह किताब हिन्दुस्तान में कुछ ही लोगों के पास रही होगी। लेखकों-आलोचकों के बीच वो शायद वह एकमात्र प्रति थी और वह गुम गई। यह एक ऐसी गंभीर घटना थी जो दूरगामी प्रभाव डालने वाली थी! हर साल की तरह इस साल भी कहा जा रहा था कि राजधानी में इतनी ठंड पहले कभी नहीं पड़ी थी जहां तक साहित्यिक सांस्कृतिक माहौल का प्रश्न था वह एकदम गर्म था- बुदबुदांक तक! वहां जमकर साहित्य हो रहा था और कसकर संस्कृति हो रही थी। उन दिनों हिन्दी-साहित्य की सबसे महत्वपूर्ण घटना थी वह साक्षात्कार जिसमें प्रसिद्ध लेखक बलवीर जी ने नारी समस्या पर विचार करते हुए उन पांच नामी रत्नों को सर्वाधिक स्वतंत्र घोषित किया था जिनके साथ उनके दैहिक या उससे कुछ मिलते-जुलते संबंध थे। लोग लगातार चर्चाग्रस्त हैं कि इस स्वतंत्रता के कितने प्रवर्ग किए जा सकते हैं। मोटे-मोटे तीन वर्ग के प्रचलन को सुधीजनों ने विश्वसनीय माना। गरदन से ऊपर की स्वतंत्रता, कमर से गरदन तक की स्वतंत्रता और कमर से नीचे की स्वतंत्रता एक आलोचक ने उसे चुंबन, परिरंभण और रमण की सांस्कृतिक परंपरा से जोड़ते हुए बलवीर जी को कृष्ण भक्ति की आधुनिक धारा में रखने का आग्रह किया। साक्षात्कार की खूब चर्चा हुई और आरोप-प्रत्यारोप की फुहारों में साहित्य विद्यापति की सद्यस्नाता नायिका की तरह भीग कर ऐंठाने-मुर्राने लगा। स्वाभाविक है कि इस दौरान किसी भी रचना की चर्चा नहीं हो सकी क्योंकि सारे संपादक, सह-संपादक, लेखक, आलोचक, रिव्यू लेखक, कालम राइटर और ढे्र से पाठक इस प्रकरण में व्यस्त हो गए। सभी की गंभीर कोशिश यह रही कि इस चर्चा में शामिल होकर कोई न कोई वक्तव्य जरूर दिया जाए। जरूरी सवालों में हस्तक्षेप करने का यह नायाब नमूना था।
इधर यह भी हुआ कि दो बड़े आलोचकों में ठन गई जबकि एक ऐसा समय था कि उनकी भव्य मैत्री के आलोक में पूरा हिन्दी प्रदेश चर्चा के विषय तय करता था। वैचारिक स्तर पर दो ध्रुवों पर खड़े इन विद्वानों की लेखन संबंधी पसंद एक सी रही है। वर्षों तक जिनका काम एक-दूसरे के बिना नहीं चलता था, वे एक-दूसरे को बड़बोला और अवसरवादी कह रहे थे। उनका सौाहाद्र्र बना हुआ था पर समीकरण में कहीं गड़बड़ हो गई थी। राजसूय यज्ञ के अश्व की तरह प्रत्येक दिशा में उनकी गति है। वे जाते हैं, देखते हैं और विजय प्राप्त करते हैं। वे जिस शहर में आते हैं वहां के बुद्धिजीवियों के हाथों में राजधानी में चलने वाली किसी चर्चा की फुलझरी थमा जाते हैं। नतीजतन कुछ दिनों के लिए वहां के रचनाकार और साहित्य प्रेमी पढऩा-लिखना छोड़कर उस फुलझरी से खेलते रहते हैं। इस तरह वहां भी साहित्य होने लगता है।
उन्हीं दिनों एक चर्चित रचनाकार ने एक छोटे शहर में आयोजित एक साहित्य समारोह की गोष्ठी में अपनी कविता की आलोचना करने वाले समीक्षक पर मानहानि का दावा करते हुए दस लाख रुपए की क्षतिपूर्ति की मांग की। उसने तीन लाख रचना की निंदा करने के लिए, तीन लाख मानसिक त्रास में डालने के लिए, तीन लाख बानवे हजार रुपए और पचास पैसे कविता को एक विदेशी कवि की रचना की नकल करने के लिए और सात हजार रुपए और पचास पैसे अपनी रचना पर बिना अनुमति लिए एक छोटे शहर में चर्चा करने के लिए मांगे। उसकी मान्यता थी कि होगा आलोचक प्रतिभाशाली और पढ़ा-लिखा पर वह देश के पांच सबसे प्रसिद्ध समीक्षकों और संपादकों में नहीं है। आलोचक एक छोटे स्थान का रहने वाला है- यानी 'इत्यादिÓ में शामिल होने योग्य है- यह भी सात हजार रुपए पचास पैसे के दावे का एक आधार था।
देश के एक सबसे ईमानदार और क्रांतिकारी लेखक ने अपने समय के सारे रचनाकारों और समीक्षकों को टुच्चा कहते हुए अपनी श्रेष्ठता का ढोल इतने जोर से पीटा कि वह फट गया। उसे उम्मीद थी कि साहित्य के महासागर में, हालीवुड की फिल्म 'डीप इम्पेक्टÓ की तर्ज पर एक विराट लहर उठेगी जिसके धक्के से सारी मूर्तियां टूट जाएंगी। वह प्रशंसा भरी तालियों और घृणा युक्त गालियों के लिए तैयार ही नहीं, बेचैन भी था पर लोग उसकी साहस-कथा पढ़कर भी उद्वेलित नहीं हुए और चुप लगा गए लिहा•ाा वह बेहद परेशान और उदास है। उसकी भेंट जिससे भी होती है वह उससे कहता है- इन दिनों मेरे विरुद्ध एक गहरा षडयंत्र रचा जा रहा है। लोग मुझे जानबूझकर हाशियों पर डालने केलिए आमादा हैं।
यह एक अलग बात है कि राजधानी में ही विनम्र भाव से चुपचाप काम करने ेवाले लोग भी हैं जो चर्चा के केन्द्र में नही ंरहते। यदि वक्त की रफ्तार ने सभी को बेईमान नहीं बना दिया तो हो सकता है कि आगे चलकर लोग उन्हें ही इस रूप में याद रखें कि बुनियादी काम उन्होंने किया है।
...और इन सबसे अलग हटकर और ऊपर भी हैं डॉ. सुनीति कुमार जो इन विवादों से अपने को दूर रखते हुए निरंतर काम करते हैं। पश्चिमी दुनिया में चलने वाली चर्चाओं को व्हाया दिल्ली हिन्दी क्षेत्र में प्रसारित करने की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी वे लगातार निभाते रहे हैं। उनके विदेशी मित्र नये चर्चित ग्रंथ उनके पास तुरंत भेजते हैं जिनका गहन अध्ययन वे करते हैं और उसका सुपरिणाम होता है हिन्दी क्षेत्र में साहित्य के नये मुद्दों पर गंभीर बहस की शुरूआत। पिछली सदी के नवें दशक में लेखकीय स्वतंत्रता और साहित्य की स्वायत्तता पर वे सभी का ध्यान केन्द्रित किए रहे। किसी की मजाल नहीं थी कि जहां वे उपस्थित होते वहां कुछ और चर्चा हो पाती। उनकी ओजस्वी वाणी और उद्धरण-प्रक्षेपण के आगे असहाय होकर लोग एक-दूसरे की ओर टुकुर-टुकुर ताकते रहे जाते। पिछले सात-आठ वर्षों से उत्तर आधुनिकता की सैद्धांतिकी को स्थापित किए रहने का श्रेय भी उन्हीं को है। यहां तक कि जब देरिदा दिल्ली आए थे तो कुछ लोगों को यह लगा था कि उत्तर आधुनिकता पर देरिदा के विचारों को डॉ.सुनीति कुमार देरिदा से बेहतर समझते हैं। उनकी जागरुकता अनुकरणीय है। दुनिया में जो भी चिंतन हो रहा है, वह भारतीय समाज और साहित्य पर किस तरह घटित होता है उसकी व्याख्या करने की अद्भुत समझ उनमें है। उनके मित्र, प्रशंसक और अनुगामी समीक्षक प्रशांत वर्मा उन्हें ंसात घोड़ों वाले रथ पर आरुढ़ आदित्य कहते हैं। साहित्य, दर्शन, कामशास्त्र, ज्योतिष, पाश्चायत्य काव्यशास्त्र, लोक संस्कृति और साम्यवाद विरोध रूपी सात घोड़ों की वल्गाओं को थामे वे देश की राजधानी में सूर्य की तरह चमक रहे हैं।
जो किताब गुमी वह डॉ. सुनीति कुमार की थी। वे गहरे अवसाद में थे और प्रशांत वर्मा अपराधबोध से बुरी तरह ग्रस्त थे क्योंकि किताब उन्हीं के हाथों गुमी थी। उन्होंने डॉ. सुनीति कुमार की स्टडी में वह किताब देखी थी और मात्र तीन दिनों के लिए वे उसे मांगकर ले आए थे। प्रशांत वर्मा यह महसूस कर रहे थे कि साहित्य के प्रति उनसे कितना बड़ा अपराध हो गया है। हिन्दी भाषी क्षेत्र में एक गंभीर और दीर्घजीवी चर्चा की शुरूआत डॉ. सुनीति कुमार कर सकते थे लेकिन उसमें बाधा आ गई। निश्चय ही उस किताब की पहली चर्चा और उससे उठे प्रश्नों को विश्लेषित करने वाले वे पहले व्यक्ति होते। प्रशांत वर्मा जानते थे कि आगामी दो-तीन वर्षों तक के लिए एक गंभीर विमर्श की सारी तैयारी का पटरा बैठ गया है। उनके मन में यह भय भी था कि अपने गंभीर स्वभाव के कारण डॉ. सुनीति कुमार ने उनसे कुछ कहा नहीं था पर यदि वे ज्यादा नाराज हो गए तो प्रशांत घाटे में रहेंगे। डॉ. सुनीति कुमार यानी तरक्की का गेटवे।
कौन जानता था कि प्रशांत वर्मा की असावधानी एक गंभीर मोड़ ले लेगी। न उनकी भेंट बी.आर. कोइतोर से होती और न यह सब घटित होता। अपने फ्रेंड, फिलासफर और गाइड डॉ. सुनीति कुमार द्वारा अपनाई जाने वाली नीति का मर्म उन्हें अब समझ में आ रहा है। वैसे सच्चे अनुगामी की तरह वे स्वयं इस सूत्र का पालन करते हैं कि किसी से प्रभावित मत हो। यदि होते हो तो जा हिर मत करो और न ही जिज्ञासा दिखलाओ।
बलवीर जी ने तीन सप्ताह पहले कथा साहित्य पर जो गोष्ठी की थी उनमें बी.आर. कोइतोर शामिल हुआ था। प्रशांत वर्मा ने सुन रखा था कि पिछले दिनों जो कथाकार चर्चित हुए हैं, उनमें ंकोइतोर की ओर लोगों का ध्यान इसलिए आकृष्ट हुआ क्योंकि उसकी रचनाओं में एक विशेष प्रकार की आदिवासी गंध है। उसके दोनों संकलनों पर छोटी पत्रिकाओं में चर्चा हुई थी। वह सतह पर कहीं नहीं था पर अंतर्धारा की तरह हर जगह मौजूद था। बलवीर जी के संयोजकत्व में, राजधानी की प्रसिद्ध पत्रिका द्वारा आयोजित परिसंवाद में कोइतोर का उपस्थित रहना इसका प्रमाण था। पटना, भोपाल तक के लेखकों को तो बुलाया जा सकता है पर बस्तर अंचल में जगदलपुर से भी और दक्षिण में रहने वाले लेखक की दिल्ली में कहां रसाई! पर बलवीर जी इस मामले में उदार और ईमानदार रहे हैं। लेखिकाओं का मामला होने पर उनकी उदारता बढ़ जाती है और ईमानदारी उसी अनुपात में घट जाती है।
परिसंवाद के दौरान, दो गोष्ठियों के अंतराल में लाउंज में चाय पीते समय कोइतोर दिल्ली के प्रसिद्ध पत्रकार श्रीवास्तव से फर्राटेदार अंग्रेजी में बहस कर रहा था। उत्तर आधुनिकता के एक लक्षण अंत:स्फोट पर बौद्रीआ के लेख 'द मासेज : द इंप्लोजन ऑफ द सोशल इन द मीडियाÓ  पर विश्वसनीयता और आत्मविश्वास से बातें कर रहा था। उन दोनों के आसपास जिज्ञासु एकत्रित थे। हिन्दी लेखक की खूंखार अंग्रेजी हमेशा प्रभाव डालती है। प्रशांत वर्मा बिना उत्सुकता दिखलाए प्रभावित हुए थे और उन्होंने मन ही मन तय किया था कि कोइतोर की दोनों किताबों की वे समीक्षा करेंगे। वैसे भी चमकती हुई काली त्वचा, झक्क सफेद आंखें, निकलते हुए कद और कसे हुए शरीर वाला लगभग चालीस की उम्र वाला कोइतोर उन्हें वेस्टइंडीज के क्रिकेट खिलाड़ी ब्रायन लारा जैसा स्मार्ट लगा था, दूसरे लेखकों थोड़ा भिन्न। सेमीनार की अंतिम गोष्ठी के बाद प्रशांत वर्मा कोइतोर के साथ ही हॉले से बाहर आए। सहज दिखलाई देते हुए उन्होंने अपना परिचय दिया तो कोइतोर ने विनम्रता से कहा- ''मैं आपको अच्छी तरह जानता हूं। मैंने आपके कई लेख पढ़े हैं और आपकी कई किताब भी।ÓÓ
'अच्छा!Ó प्रशांत वर्मा प्रसन्न हुए और उससे भी ज्यादा चकित। ''आपने किताब रायपुर से खरीदी होगी।ÓÓ
''जी नहीं, मैं किताबें सीधे प्रकाशक से मंगा लेता हूं।ÓÓ
प्रशांत वर्मा फिर जाहिर किए बिना प्रभावित हुए और बोले- ''मैंने आपकी कुछ ची•ों पढ़ी हैं। आपके संकलन में मिल जाए तो मैं उन पर लिखना भी चाहूंगा। वैसे आप कहां रहते हैं?ÓÓ
कोइतोर कुछ क्षणों तक असमंजस में रहा फिर बोला- ''मैं बस्तर का रहने वाला हूं। जगदलपुर से लगभग डेढ़ सौ किलोमीटर दक्षिण-पश्चिम में गंगालूर के पास एक गांव का हूं मैं। वैसे अभी मैं दंतेवाड़ा में रहता हूं। एकदम जंगल के बीच का रहने वाला समझिए मुझे।ÓÓ
''अच्छा! क्या वहां अब भी जंगली जानवर हैं?ÓÓ प्रशांत वर्मा ने उत्सुकता दिखलाई।
''अब तो कम हैं पर बचपन की याद है मुझे। कभी हमारी झोपड़ी के पास मुर्गी के दबड़े के करीब यदि चीता आ जाता था तो हमारी दादी उसे डंडे से उसी तरह भगाती थी जैसे आप लोग कुत्ते-बिल्ली को भगाते हैं।ÓÓ
''आपसे बातें करना बहुत दिलचस्प होगा।ÓÓ प्रशांत वर्मा ने कहा- ''कहां रुके हैं आप?ÓÓ
''मैं पहाडग़ंज के होटल सिराज में ठहरा हूं। आप आइए, मेरे साथ ही आज की शाम बिताइए। बातें दिलचस्प हों या न हों पर यदि आप महुआ की विशुद्ध शराब पीने में दिलचस्पी रखते हों तो मुझे अतिथि सत्कार का मौका दें। मैं यहां के मित्रों को चखाने के लिए ही खासतौर पर दो बोतलें लाया हूं।ÓÓ कोइतोर ने सीधे और साफ ढंग से कहा।
''भाई, हमें तो मत छोड़ दीजिएगा।ÓÓ किसी ने उसके कंधे पर पीछे से हाथ रखा। ये गोष्ठी में शामिल पत्रकार श्रीवास्तव और ललित निबंध लेखक अंशुल गुप्ता थे, ''मुझे एक लेखक मित्र ने बतलाया था कि महुआ का स्वाद शैम्पेन जैसा लगता है।ÓÓ
''हां, स्वाद शैम्पेन जैसा पर असर उससे बढ़करÓÓ कोइतोर के ओठों पर मुस्कान फैल गई। ''आइए चलें।ÓÓ
जब वे होटल रवाना हुए तो एक बड़े लिफाफे के भीतर रैपर में लिपटी हुई किताब प्रशांत वर्मा के हाथ में थी जिसे वे उसी दिन डॉ. सुनीति कुमार से तीन दिनों के लिए मांग कर पढऩे के लिए लाए थे।
पहाडग़ंज के होटल सिराज के कमरा नं. 204 में सेंटर टेबल पर नमकीन और सलाद की प्लेटें सजाने के बाद कोइतोर ने अपने मेहमानों के गिलासों में शराब ढालते हुए कहा-''यह देशी शराब भट्टी में बिकने वाली शराब नहीं है। यह हाथ की उतारी विशुद्ध शराब है जिसे आदिवासी खुद बनाते हैं। जब यह एकदम ताजी गर्म-गर्म रहती है तब तो इसका मजा ही कुछ और है। मैंने इसमें थोड़ा सा प्रिजर्वर भर मिला दिया है। लीजिए, उठाइए गिलास। पहला घूंट कुछ अजीब-सा लग सकता है पर फिर भी तथाकथित विदेशी शराब से बेहतर ही होगा। चियर्स।ÓÓ
''मैंने बस्तर की एक और शराब 'सल्$फीÓ के बारे में सुना है।ÓÓ श्रीवास्तव ने एक बड़ा घूंट भरकर कहा- ''हूंहूऽऽऽ... गुड टेस्ट।ÓÓ
''सल्फी शराब नहीं है श्रीवास्तव जी। सल्$फी एक किस्म की ताड़ी है। सल्$फी नाम के पेड़ का रस। सूर्योदय से पहले पियें तो एक स्वास्थ्यवर्धक पेय। शाम को पियें तो ते•ा नशा। हमारे यहां चावल से भी एक नशीला पेय बनता है जिसे लांदा कहते हैं।ÓÓ
''एक बात कहें आप से...ÓÓ प्रशांत वर्मा कुछ ठहर कर बोले ''आपका नाम काफी है लंबा- बी.आर. कोइतोर।ÓÓ
''आप बी.आर. कहें या केवल कोइतोर।ÓÓ
''हां, ये ठीक रहेगा।ÓÓ प्रशांत घूंट भरकर बोले- ''वैसे आपका सरनेम मेरे लिए एकदम नया है।ÓÓ
''दरअसल यह सरनेम ना होकर दक्षिण बस्तर में निवास करने वाली जनजाति की उपशाखा है। इसके कई गोत्र हैं और सभी के अलग-अलग टोटेमिक चिन्ह हैं। मैं उइके गोत्र का हूं और नाम है बन्नू राम।ÓÓ कोइतोर ने मुस्कुराते हुए बात शुरू की और फिर जोर से हंसा- ''स्नॉबरी केवल दिल्ली वालों की जागीर नही ंहै। मैंने सोचा सरनेम या गोत्र के बदले अपनी जातीय पहचान रखूं। अब देखिए क्या जोरदार नाम बना है बी.आर. कोइतोर या कोयतोर।ÓÓ
मजा लेते हुए श्रीवास्तव ने अंशुल गुप्ता की ओर देखा...  ''इंटरेस्टिंग तो आप मुरिया माडिय़ा हैं।ÓÓ
''रियली इंटरेस्टिंग...ÓÓ कोइतोर खुलकर हंसा... ''अंशुलजी मुरिया अलग होते हैं और माडिय़ा अलग।ÓÓ कोइतोर ने तीन बड़े घूंटों में पैग $खत्म करके गिलास रखते हुए कहा- ''हमारे बुजुर्ग बतलाते हैं कि पहले के समय हमें कोयतोर ही कहा जाता था पर अब हमें इस नाम से कोई संबोधित नहीं करता। सरकारी और गैर सरकारी लोग ही हमारा नाम तय करते हैं- मनमाने ढंग से। लोग हमें गोंड़ कहने लगे फिर माडिय़ा कहने लगे। आप जानते हैं कि बस्तर में बाहर से आए लोग हमें 'मामाÓ कहते हैं। सोचिए... भला।ÓÓ
'मामा!Ó तीनों ने मुस्कुराते हुए आश्चर्य व्यक्त किया।
''हां, आप जगदलपुर से दक्षिण की ओर चलिए तो जैसे ही तीर-कमान और टंनिगया लिए हुए आदिवासी औरतें आदमी दिखलाई देंगे, लोग कहेंगे देखो मामा-मामी।ÓÓ
''आप बुरा न माने कोइतोर.. डोंट टेक इट अदर वाइज। अब तक तो वह इलाका काफी तरक्की कर गया होगा। आपको देखकर तो यही लगता है। आइ मीन टू से...ÓÓ
''हमारे यहां जो भी तरक्की हुई है उसे आप तरक्की कहेंगे या असंतुलित और अंधा विकास? आप यहां से राजधानी एक्सप्रेस या प्लेन में बैठकर रायपुर तक जाइए फिर आप बस में बैठकर गीदम तक चले जाइए। हमारे विकास की पोल खुल जाएगी। बचपन में मेरी एक बहन इसलिए मर गई क्योंकि उसे मलेरिया का इलाज नहीं मिल सका। हमारे इलाके में अभी भी ऐसे सैकड़ों स्कूल हैं जहां शिक्षक पन्द्रह अगस्त और 26 जनवरी को दिखलाई देते हैं। होने को तो कम्बल में मखमली थिगड़े की तरह कहीं-कहीं शानदार विद्या परिसर भी हैं। आज भी हमारे लोगों के लिए तीर-कमान और कुल्हाड़ी जीवन की जरूरत है जबकि यहां शौकीन लोग ड्राइंग रूम भी सजावट के लिए उसका इस्तेमाल करते हैं। प्रशांत जी, चीजो के इस्तेमाल के फर्क से जिंदगी का फ$र्क भी समझ में आता है।ÓÓ
''अब ऐसा है कोइतोर जी...ÓÓ अंशुल जी की आवाज रपटने लगी थी ''... सूचना और सच के बीच भी तो अब... क्या कहते हैं वो ... अंतर हो गया है। पर आप जैसा जीता-जागता आदमी तो हमारे सामने है जो... क्या कहते हैं ग्रैंड एंड गार्जियस...ÓÓ
''हमारी ट्रेजेडी तो यही है अंशुल जी कि हमारा जीवन या तो पोस्टरनुमा विज्ञापन है या रहस्य। लोगों के लिए बस्तर यानी घोटुल, सल्फी, तीर-कमान लिए आदिवासी या फिर कुटुमसर की गुफाएं और बैलाडीला आयरन प्रोजेक्टÓÓ कोइतोर के ओठ थोड़े वक्र हुए। उसने गिलास से बड़ा घूंट लिया और फिर हंसने लगा। आपको एक मजेंदार बात बतलाऊं। जब मैं कॉलेज में पढ़ता था तब चंडीगढ़ से आए मेरे एक सहपाठी ने मुझसे कहा कि उसने किसी से यह सुना था कि बस्तर के घने जंगलों के बीच किसी बड़े तालाब में एक मत्स्य कन्या रहती है जिसका एक आदिवासी युवक से प्यार है और उससे मत्स्य कन्या को दो बच्चे भी हैं। मेरा वह दोस्त मत्स्य कन्या के अनिंद्य सौंदर्य और मनुष्य के साथ  की जाने वाली उसकी कामक्रीड़ा की कल्पना से बेहद उत्तेजित था।
''क्या सचमुच कहीं मत्स्य कन्या थी?ÓÓ अंशुल जी ने पूछा तो कोइतोर ठठाकर हंसा। प्रशांत जी और श्रीवास्तव  ने भी मजा लिया। हंसते-हंसते कोइतोर अचानक गंभीर होकर बोला- ''प्रशांत जी, मैं यह नहीं कहता कि विकास नहीं हुआ पर मुझे देखकर अंदाज मत लगाइए। मेरे जैसे भाग्यशाली कितने लोग हैं?ÓÓ मेरे विषय में जानना चाहेंगे आप!ÓÓ
सचमुच कोइतोर की तरक्की भाग्य का खेल थी वरना उसका बचपन अन्य आदिवसियों के बचपन से कुछ भिन्न नहीं था। जिस गांव में वह पैदा हुआ था, वह दक्षिण बस्तर के किसी भी गांव की तरह पेड़ों, झुरमुटों और पहाड़ की ओट में छिपा हुआ और कहीं-कहीं उनके बीच में झांकता सा नजर आता था।
बढ़ते हुए दूसरे बच्चों की तरह वह भी जंगल से लकड़ी लाता था और नदी से पीने का पानी। उसके यहां गोर्गा यानी सल्फी घर की जरूरत से ज्यादा होता था इसलिए वह हफ़्ते में दो बार नजदीक के बाजारों में उसे बेचने जाता था। अपनी मुर्गियों की वह देखभाल करता था और बकरियों को जंगल में चराता। साथियों के साथ वह तीर-कमान और गुलेल से शिकार करता। दोस्तों के बीच उसकी साख थी क्योंकि सबसे अच्छा निशाना उसी का था। पढऩे की तीव्र इच्छा के बाद भी वह कभी-कभार ही स्कूल जा पाता था। उसके मां-बाप चाहते तो थे कि वह पढ़े पर यह भी कहते थे कि जब तुम्हारे मास्टर ही नहीं आते तो अच्छा यह कि घर पर कामकाज ही करो।
यह तो स्वीडिश क्रिश्चियन मिशन के फादर राबर्ट की कृपा थी कि वह कहां से कहां पहुंच गया और वह भी बिना धर्म परिवर्तन किए! फादर राबर्ट का अस्पताल उस इलाके में आदिवासियों के बीच सेवा कार्य करता था। अपनी एम्बुलेंस में वे धूल भरी कच्ची सड़कों से होते हुए छोटे-छोटे गांवों तक पहुंच जाते थे। उन्हें हर कोई जानता था और लोग उन्हें डॉक्टर बाबा कहते थे। कोइतोर से उनकी भेंट संयोगवश हुई थी।
वे सितंबर के दिन थे। बारिश खत्म हो गई थी। गझिन जंगल में खूब हरियाली छाई हुई थी। साल के ऊंचे वृक्षों पर पक्षियों का कलरव और बंदरों की किच-किच थी। गांव के पास बहती नदी का पानी एकदम साफ-सुथरा हो गया था और उसमें तैरती मछलियां साफ नजर आतीं। नदी के किनारे दूरदूर तक कास के सफेद फूल फूले हुए थे। उस दिन गांव में इकमा पंडुम की हलचल थी जो आदिवासियों में मनाया जाने वाला नवाखानी का पर्व है। पहली फसल की खुशी में सब्जी-भाजी के साथ बनाए गटका को खाकर और भर पेट लांदा और एर्रूकल पीकर लोग मस्त थे। स्कूल के मास्टर जी आज गांव में थे और पर्व में गांव वालों के साथ शरीाक थे।
बन्नूराम ने दोस्तों के साथ सबेरे शिकार किया था। दो हरियल और एक खरगोश को उन्होंने मार गिराया था। नदी के किनारे ही उन्हें भूनकर खाया था इसलिए गटका के दो-चार कौर खाकर वह घर के सामने सल्फी के पेड़ के पास बैठकर अपनी किताब पलट रहा था। उसे उम्मीद थी कि उसके मास्टर उसे जरूर देख लेंगे और खुश होंगे। मास्टर तो महुआ में इसके कदर मत्त थे कि उसे नहीं देख पाए लेकिन अपनी एम्बुलेंस लेकर गांव आए फादर राबर्ट की निगाह उस पर पड़ गई थी। इलाके के जीवन की गहरी जानकारी रखने वाले फादर राबर्ट ने जब देखा कि गांव में इकमा पंडुम मनाया जा रहा है तो वे लौट गए पर जाने के पहले उन्होंने बन्नूराम से पूछा था- ''क्यों बच्चे, तुम पढऩा चाहते हो?ÓÓ
''हां, खूब पढऩा चाहता हूंÓÓ बन्नूराम ने कहा था।
फादर राबर्ट तीन दिनों के बाद फिर आए थे और उन्होंने उसके मां-बाप को समझाया कि वे लड़के को उनके साथ भेज दें। उन्होंने वादा किया कि वे लड़के को पढ़ाएंगे- लिखाएंगे। लड़का थोड़ी देर उनके अस्पताल में काम करेगा और उसका धर्म-परिवर्तन तभी किया जाएगा जब उसके मां-बाप चाहेंगे। कान्वेंट स्कूल में पढ़कर और फिर कॉलेज की शिक्षा पूरी करते-करते बन्नूराम के ऊपर आवरण को तोड़कर एक नया आदमी निकल आया- बी.आर. कोइतोर। फादर के साथ उसने दो बार यूरोप की यात्रा की। पांच साल कॉलेज की प्रोफेसरी की और फिर अपना खुद का छोटा-सा व्यवसाय शुरू किया जिसमें उसे सफलता मिली। जब तक फादर राबर्ट जिंदा रहे, उसे याद दिलाते रहे कि वह कभी न भूले कि वह कौन है और उसके जड़ें कहां है।
''... तो आप यूरोप घूम चुके हैं। तभी आप इतनी शानदार अंग्रेजी बोलते हैं।ÓÓ श्रीवास्तव के चेहरे पर कोइतोर के लिए एक नये किस्म का सम्मान भाव उभरा।
''क्या इससे मैं अधिक प्रतिभाशाली समझा जाने लायक हो गया?ÓÓ कोइतोर ने व्यंग्य भाव से कहा- ''सच तो यह है श्रीवास्तव जी कि हम यूरोप और अमरीका की वैचारिक जूठन उठाने वाले लोग हैं। जी हां, आर्थिक नीति भर नहीं, साहित्य लोचना और संस्कृतिबोध में भी। हमारे बीच ऐसे कई लोग हैं जो उन मुद्दों पर बहस करते हैं जिन पर बरसों पहले यूरोप में बहसें होती थी। कभी साहित्य की स्वायत्तता, कभी उत्तर आधुनिकता कभी कुछ और। बहस भी ऐसी हिन्दी में जो अंग्रेजी का अनुवाद लगती है। हमने तो अपने जातीय जुमलों तक से किनाराकशी कर ली है।ÓÓ
''लगता है आप काफी नाराज हैं हम जैसे लोगों से। पर कोइतोर, इससे तो कोई इंकार नहीं कर सकता कि अब समस्याएं वैश्विक है।ÓÓ प्रशांत के स्वर में भी व्यंग्य था।
''बेशक, मैं भी मानता हूं पर हमारे वैश्विक में कहा है नाइजीरिया, म्यांमार, चीन, अलास्का, पेरू और कहां है झाबुआ और अबूझमाड़। हमारा भूमंडलीकरण तो अमीर देशों को अपना दिमाग बेचने का नाम है। राजनीति में अपने स्वालंबन को नष्ट करने वाला वित्त मंत्री हमें महान दिखलाई देता है और साहित्य में ऐसे लेख हमें स्थूल नजर आते हैं जो संघर्ष करने वाले मानव समूहों को रचना के केन्द्र में रखते हैं। पश्चिमी जुमलों से हमारी जिंदगी को विश्लेषित करने वाले हमें गूढ़ दार्शनिक लगते हैं। मुझे मा$फ करें पर इस सेमीनार में आपमें से अधिकांश यह जाहिर करने की कोशिश में थे कि नया से नया संदर्भ ग्रंथ आपने पढ़ा है। यहां जिंदगी की नहीं बल्कि नई किताबों की चर्चा ज्यादा हुई है।ÓÓ
एकदम सन्नाटा छा गया। सभी के गिलास खाली हो चुके थे। किसी ने गहरी सांस लेकर बदन तोड़ा। अंशुल गुप्ता घड़ी देखकर बुदबुदाए... ''ग्यारह... बज गए। ... चला जाए।ÓÓ
''मैंने बातों में ध्यान नहीं दिया कि आप लोगों के गिलास खाली हैं। अभी तो ये दूसरी बोतल ज्यों की त्यों रखी है।ÓÓ
''नहीं... नहीं... कोइतोर...ÓÓ प्रशांत वर्मा ने कहा। ''जितनी पी है उतने में ही दिल्ली की ठंड परास्त हो गई है और...ÓÓ
''दिमाग साला टुन्न हो गया।ÓÓ अंशुल जी लडख़ड़ाते हुए से उठे फिर सम्हलकर बोले- ''बहुत आनंद आया कोइतोर.. सचमुच आपसे मिलकर बहुत अच्छा लगा। अब... अब इजाजत दें। अबकी जब दिल्ली आएं तो होस्ट बनने का मौका मुझे दें।ÓÓ
सभी उठ खड़े हुए। कमरे के दरवाजे पर सबसे हाथ मिलाते हुए कोइतोर ने कहा ''माफ कीजिएगा यदि कुछ ऐसा-वैसा कह गया हूं तो... बक रहा हूं जुनूं में क्या-क्या कुछ। वो यूं है कि जाति गुण बाकी हैं अभी भी मुझमें। हम लोग संवेदनशील और कुछ जिद्दी होते हैं। कभी उधर आएं तो खबर दें, आपको बस्तर घुमाऊंगा। अंशुल जी, कौन जाने आपको देखकर मत्स्य कन्या पानी से बाहर आ जाए।ÓÓ
हंसते हुए लोग विदा हो गए।
बाथरूम जाकर और कपड़े बदलकर जब कोइतोर सोने की तैयारी में था तब उसने पलंग पर बड़ा-सा लिफाफा देखा। लिफाफे के भीतर किताब थी। लिलाक रंग के कवर वाली किताब बेहद खूबसूरत थी। लेखक था पॉल मालरो। किताब को तुरंत वापस करने का कोई उपाय नहीं था और कोइतोर को दूसरे दिन सुबह पांच बजे की गाड़ी पकडऩी थी।
उसी रात उसने किताब पढऩी शुरू कर दी।
ट्रेन में सारे दिन और रात ग्यारह बजे तक का अधिकांस समय कोइतोर ने पॉल मालरो की किताब पढऩे में बिताया। लगभग पन्द्रह दिनों के बाद उसने इंश्योर्ड पार्सल से किताब प्रशांत वर्मा के पते पर वापस कर दी।
प्रशांत वर्मा की जान में जान आई और उन्होंने ढेर-सी मा$फी मांगते हुए किताब डॉ. सुनीति कुमार को लौटा दी। किताब के खो जाने की सूचना देकर एक लताड़ वे खा चुके थे। प्रशांत जानते थे कि डॉ. सुनीति कुमार पहली फुर्सत में इस किताब को पढ़कर कुछ महत्वपूर्ण लिखेंगे। गंभीर चर्चा के नये सूत्र विकसित होंगे। एक ता•ाी बयार बहेगी।
... पर हफ्ते भर बाद ही उन पर जैसे गाज गिरी।
बी.आर. कोइतोर ने किताब पर हिन्दी और अंग्रेजी में लेख लिख मारे। अंग्रेजी के लेख को राजधानी के प्रसिद्ध अंग्रेजी पत्र ने महत्व देते हुए प्रकाशित किया था। उसमें किताब का परिचय भर नहीं था बल्कि उसमें विषयवस्तु का विस्तृत और गंभीर विश्लेषण था। कोइतोर मालरो के श्रम से प्रभावित हुआ था पर उसने यह भी कहा कि लेखक की नीयत सा$फ नहीं है और उसका नजरिया व्यावसायिक। सेक्स संबंधी मालरो के विचारों और काम भावना के कलाओं से रिश्ते की बाबत उसकी अवधारणों की खिल्ली उड़ाते हुए उसने उनकी धज्जियां उड़ा दी और कहा कि जिन जुमलों को मालरो आधुनिकता की चाशनी में पाग कर पेश कर रहा है, उनमें से कई तो आदिवासी समाजों में प्रचलित रहे हैं लेकिन वे भी समय के बदलाव के साथ उनमें से कुछ को छोड़ चुके हैं। मालरो आधुनिक विश्व की बात करते हुए यह भूल गया कि दुनिया अभी भी कई सदियों को एक साथ जी रही है। स्थिति की विडम्बना यह है कि अभी भी तीर-कमान लेकर चलने वाले मानव समूह में स्त्री-पुरुष के संबंध अधिक संतुलित और ईमानदर हैं। मालरो स्त्री और पुरुष को त्वचा के रंग और शरीर के अनुपात में देख रहा है जो विशुद्ध रीतिवादी नजरिया है। उसने यह भी व्यंग्य किया कि महानगरों के लेखकों-आलोचकों का एक खास वर्ग भले ही इस किताब को महत्वपूर्ण मान लें पर वास्तव में यह एक साधारण रचना है। हर नई चीज को आधुनिक मान लेने वाले बुद्धिजीवी इस पर मनोरंजक चर्चा भले ही चला लें पर यह सतही विचारों का ग्रंथ है।
प्रशांत वर्मा का मन ग्लानि और अपराधबोध से भरा हुआ था। वे समझ रहे थे कि उनकी गलती से साहित्य और संस्कृति का नुकसान हो गया है। यदि किताब न गुमी होती और उस पर डॉ. सुनीति कुमार ने चर्चा की शुरूआत  की होती तो उसमें कलात्मक बारीकियां होतीं। रात को प्रशांत वर्मा डॉ. सुनीति कुमार के यहां पहुंचे। वे अपनी स्टडी में एक ईजीचेयर पर निढाल-से बैठे थे। उनका चेहरा मलिन हो गया था जैसे सात घोड़ों की वल्गाएं थामने वाले आदित्य का बदली छा जाने पर हो जाता है। उनके बगल के टेबल पर अखबार रखे हुए थे और सामने सेंटर टेबल पर व्हिस्की का गिलास। उन्होंने बैठे-बैठे ही कहा- ''आओ प्रशांत, आलमारी से बोतल और गिलास निकाल लो।ÓÓ
अपना पैग बनाकर प्रशांत वर्मा ने दायें हाथ की अनामिका गिलास में डुबोकर कुछ बूंदे डॉ. सुनीति कुमार के चरणों पर छिड़क दीं। इस कर्मकाण्ड का पालन वे अनिवार्यत: किया करते हैं।
''तुमने बी.आर. कोइतोर का लेख पढ़ा?ÓÓ डॉ. सुनीतिकुमार के ओठों पर उदास मुस्कुराहट थी।
''जी पढ़ा। मुझे अपनी गलती की गंभीरता अब ज्यादा कचोट रही है।ÓÓ प्रशांत धीमे स्वर में बोले। ''एक वैश्विक प्रश्न को इस लेखक ने किस $कदर आंचलिक नजरिए से देखा है जबकि इस किताब के कई बारीक पहलू विचारणीय हैं।ÓÓ डॉ. सुनीति कुमार कुर्सी के हत्थे पर हाथ फिराते हुए बोले।
''वैसे डॉक्टर साहब, आप जब भी इस पर कुछ लिखेंगे तो नये सिरे से बहस छिड़ेगी ही।ÓÓ
डॉ. सुनीति कुमार ने अपने दायें गाल को सहलाते हुए धीरे से कहा- ''हां... देखो... वैसे कलात्मकता के अवमूल्यन का समय है यहां।ÓÓ
उनके गहरे अवसाद को देखकर प्रशांत वर्मा ने रात वहीं रुकने का फैसला किया। अपने घर पर उन्होंने फोन से सूचना दे दी। वे सारी रात डॉ. सुनीति कुमार के साथ बैठकर पीते रहे। वे पूरी तरह सजग थे। उन्हें मालूम था कि हेमिंग्वे और मोपासां ने आत्महत्या की थी।