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Friday 17 Nov 2017

सहयात्री


राधावल्लभ त्रिपाठी
अगर आप गर्मी की दोपहर में कभी बस से सफर करें, तो भीड़ और सन्नाटा दोनों आपके साथ लगे हुए चलते हैं।
यह एक ऐसे ही सफर का किस्सा है। दिल्ली से आ रहा था मैं। दिल्ली से झांसी तक का सफर तो रात की ट्रेन से किया। झांसी में सुबह दीदी के यहां मिलने चला गया तो भोजन कराए बिना वे कैसे जाने देतीं? देविका ने भी कहा था कि झांसी में एक-दो घंटे रुक कर मिल जरूर लेना दीदी से। चलो ठीक रहा, मिल सभी गए थे- दफ्तर जाने की हड़बड़ी में जीजा जी, स्कूल जाने को बस्ते संभालते ऋतु और वसंत और इन तीनों के जाने के बाद घर में सन्नाटा ढोती दीदी। अब मैं कितनी देर उनका सन्नाटा बंटाता? उनसे विदा लेकर चला तो इधर टनटनाती दोपहर।
खैर, बस स्टैण्ड पहुंचा। नंगे फर्श पर सोए अधनंगे लोगों के बीच से होता हुआ और गोबर से पांव बचाता हुआ पहुंच गया टिकिट खिड़की तक। पूछताछ वाली खिड़की पर कोई बाबू नहीं था और छतरपुर वाली खिड़की बंद थी। शिवपुरी वाली खिड़की खुली थी और भला हो उस पर बैठे बाबू का। उसने बताया कि एक बजे कोई बस है छतरपुर के लिए। घड़ी में देखा एक बजने में दस मिनिट बाकी थे।
मैं पास की एक बैंच पर बैठ गया।
''पालिश?ÓÓ - पांच-छ: साल के एक फटेहाल लड़के ने मेरे पास आकर पूछा।
जब तक मैं उसके सवाल का कुछ जवाब देता, ऐन बगल में हुए शोर-शराबे ने मेरा ध्यान खींच लिया। पांच-छ: देहात से आई स्त्रियां थीं- शायद अचानक वे शहर में यहां मिल गई थीं एक-दूसरे से। वे एक घेरा बनाकर धरती पर उकड़ू बैठ गई थीं और उस घेरे में से ही तो उठा था उनके रोने का समवेत स्वर जिसने मेरा ध्यान खींच लिया था। समझ लीजिए ऐसी भरी दोपहरी में मंद सप्तक में विहाग का अलाप। अब आप कहेंगे कि मैं संगीतकार हूं इसलिए सब जगह राग रागिनियां ही सुनता रहता हूं। अजी नहीं, बाकायदा लयबद्ध आलाप था- विलंबित से धीरे-धीरे द्रुत होता हुआ! स्वर मध्य सप्तक से होकर तार सप्तक तक पहुंचे लगे। फिर उनमें से एक बुजुर्ग स्त्री अपनी संगिनों से कहने लगी- ''मूंग जाओ बिना मूंग जाओ।ÓÓ रुदन के सामूहिक स्वर सम पर आकर थमे और फिर उनमें बातचीत शुरू हो गई, जिसके ताने-बाने में घर-परिवार, जचगी, बीमारी और मृत्यु की कथाएं बुनती गई।
''पान लैहो का जीजा?ÓÓ -मेरी दूसरी बगल से उठे इस प्रश्न ने इसी बीच मेरा ध्यान खींचा।
सवाल मुझसे नहीं, किसी साले ने अपने जीजा से किया था।
''ना भैया, अपनी दीदी को ही खिलाओ, इन्हें बस में उल्टी-वुल्टी होने लगती है।ÓÓ सूटधारी जीजा ने जवाब दिया और कुछ हटकर बुजुर्ग स्त्री के साथ खड़ी कथित 'दीदीÓ को ताका। उसने भी कनखियों से इन्हें देखा, फिर बुजुर्ग महिला से बतियाने में पुन: व्यस्त हो गई, जो शायद उसकी मां होगी।
तभी मेरा ध्यान छतरपुर वाली खिड़की की ओर गया, तो मैं उस ओर दौड़ा। टिकिट बंटने शुरू हो गए थे। मेरे पीछे वह लड़का भी आ लगा, जो अपने जीजा और दीदा को विदा देने आया था।
''ए भाई साहब! इसमें क्या है? इनको ऊपर चढ़वाइये!ÓÓ -बस का क्लीनर तानपूरे को देखकर कहने लगा।
''इसमें बाजा है- टूट जाएगा।ÓÓ -मैंने उसे समझाया। काफी जिरह करने के बाद उसने मुझे तानपूरा लेकर ऊपर चढऩे दिया।
बस खाली थी। आराम से एक पूरी सीट पर तानपूरा रख कर मैं बैठ गया। ''देखें भाई साहब, कैसा बाजा हैÓÓ ... तभी क्लीनर ने आकर कहा और तानपूरे की खोल उतारने लगा।
अगर दो बड़े सूटकेस उठाकर बस में चढ़ता लड़का उसका ध्यान न खींच लेता तो वह शायद तानपूरा खोल कर वही बजाने भी लग जाता। यह वही लड़का था, जिसने मेरे पीाछे टिकिट लिया था। मैंने खिड़की से देखा- उसकी दीदी अपनी मां के कंधे पर सिर रखकर रो रही थी। मुझे उन स्त्रियों की याद आई जिनके रोने के समवेत सुर मैंने थोड़ी देर पहले ही सुने थे। वे अब कहां होगी?
बस भरने लगी थी। ड्रायवर अपनी सीट पर आ चुका था और हार्न दे रहा था।
उसके बाद वे सब पीछे सरकने लगे- कुल्फी वालों के ठेले, पालिश वाला उदास लड़का, देहात से आई स्त्रियों का हुजूम, फर्श पर भिनभिनाती मक्खियां, उनके बीच सोए अधनंगे लोग, अपनी दीदी की ओर विदा की मुद्रा में हाथ हिलाता उसका भाई, आंसू पोंछती उसकी मां... उसके बाद फिर क्या हुआ मुझे पता नहीं। दिल्ली के संगीत-सम्मेलन में हुए अपने कार्यक्रम के बारे में सोचने लग गया था शायद मैं। ऐसा आपके साथ भी हो सकता है। बस में हिचकोले खा रहा होता है आपका शरीर और आप होते हैं और कहीं। पर तभी कुछ ऐसा हुआ कि मुझे प्रस्तुत दृश्य की ओर लौटना पड़ा। बस में किस्म-किस्म की बातचीत, चीख पुकार आदि का सम्मिलित शोर, जिसके कान आदी हो चुके थे, दबता लगा और तेज चीख उसके ऊपर फैल गई।
वह एक बच्चे के रोने की आवाज थी। कोई बच्चा कभी इतने ऊंचे स्वर में भी रो सकता है- यह जिंदगी में पहली बार उस समय महसूस हुआ मुझे। समझ लीजिए कि बस की पूरी पचास सवारियों की सम्मिलित चिल्ल-पों एक तरफ और अकेले उस एक बच्चे की चीख दूसरी तरफ। फिर भी बच्चे की चीख ने वहां के सारे शोर को दबा दिया था और अब तो सारे यात्री अपनी बातचीत बंद कर उस ओर देखने लगे थे जहां से वह चीख फूटी थी। कुछ लोग उस बच्चे की मां से कह रहे थे- ''अरे मोड़ा खों चुप तो कराओ बाई।ÓÓ
मगर बच्चे को चुप न होना था, सो न हुआ। ''बात का है- तकलीफ का है मोड़ा खों!ÓÓ कुछ लोग बार-बार बच्चे की मां से दरियाफ्त करने लगे। यहां तक कि कंडक्टर ने बिना टिकिट बैठ गई सवारियों के टिकिट काटना बंद कर दिया और ड्रायवर भी बस की गति धीमी कर मुड़-मुड़ कर पीछे देखने लगा।
फिर पीछे की सीट से होती हुई यह खबर आगे तक आई कि वह महिला जा रही है अपने मायके और बच्चा जो है वह अपने बाप से ज्यादा ही हिला हुआ है। बच्चे को समझाया गया था कि बाप भी अभी इसी बस में आकर चढ़ेगा, पर जब बस चल पड़ी तो वह समझ गया कि उसके साथ धोखा हुआ है।
इसीलिए विद्रोह की उग्रता थी उसके रोने में। उसकी आवाज हम सबके कान के पर्दे चीरती हुई सारी बस को कंपा रही थी।
तब इस दृश्य पर एक नेतानुमा महाशय अवतरित हो पड़े। -''अरे भैया ड्रायवर साहब बस रोक दो और बाई को घर छोड़ आने दो अपना मोड़ा।ÓÓ -किसी तरह बच्चे की चीख के बीच अपना गला ऊपर उठाते हुए उन्होंने कहा।
लिहाजा बस रुक गई। बच्चे का रोना भी थमने लगा। कंडक्टर उस महिला को लताड़ता हुआ पूछने लगा कि उसका घर किधर और कितनी दूर है। ''क्या करें कंडक्टर साÓब! बच्चा ही तो है। मचल गया।ÓÓ -आसपास बैठे लोग कंडक्टर को समझाने लगे।
तय यह हुआ कि वह महिला बच्चे को घर छोड़कर आएगी, तब तक बस यहीं रुकी रहेगी। ''हम तो पेलई के रए थे जो मोड़ा हमाए कने ना रेहे! बच्चे को कइयां उठाएÓÓ- बड़बड़ाती हुई वह बस से उतर रही थी।
मायके से विदा लेकर ससुराल जाती लड़की ने महिला और बच्चे को देखा और पति की ओर मुस्कुराई। दोनों एक-दूसरे को देखकर हंसे। मेरे पीछे की सीट पर बैठे पंडित जी ने कुर्ते की जेब से सरौता और सुपारी का टुकड़ा निकाला और सुपारी काट कर मुंह में डालते हुए बगल में बैठे व्यापारी से बोले- ''बालहठ, तिरिया हठ और राजहठ- इनसे पार नहीं पा सके...ÓÓ
बस रुकी हुई थी। लोग बेचैनी से घड़ी देखते और ऊंघने लगते। लोग अपना वक्त बर्बाद होने के कारण चिढ़ रहे थे और बड़बड़ा रहे थे। पर वे यह प्रश्न नहीं कर सकते थे कि ऐसा क्यों हो रहा है। प्रश्न करते भी तो किससे?
अंत में नेताजी-नुमां व्यक्ति ने ऊंचे स्वर में कहा- ''अरे भैया ड्रायवर ए भैया कंडक्टर। कहा रहती है यार वो अउरत! यही कहीं नजदीक में कुम्हारपट्टी ही तो बताया था न! अरे भैया तनिक गाड़ी बैक कर लो- निगते निगते आवेगी तो और देर लगावेगी ऐसे तो!ÓÓ
जब तक बस में बैठे यात्री समझ पाते कि हो क्या रहा है, बस पीछे की तरफ रेंगने लगी।
आप मुझे अहमक समझेंगे, पर मुझे बड़ा स्वाभाविक लगा बस का यों पीछे चलना। मुझे लगा मैं तो वैसे भी रिवर्स गियर में चलती बस में ही यात्रा करता आ रहा हूं।
पर मेरी बाजू की सीट पर बैठी बूढ़ी स्त्री बेचैन हो उठी। ''काय का बात हो गई? पीछे खों काय जा रइ गाड़ी?ÓÓ-उसने अपने बगल में बैठी युवती से पूछा।
मैं सुन नहीं पाया युवती ने क्या बताया। पर उसकी प्रतिक्रिया में पता नहीं कैसे वह अपनी बहू की जचकी का हाल बताने लगी।
बस धीरे-धीरे पीछे रेंगती हुई कुम्हारपट्टी की गली के मोड़ तक आ गई थी। कुम्हारपट्टी के बच्चे और कुछ स्त्रियां अचरज से बस को देख रहे थे। शायद पहली बार कोई बस इस तरह ऐन उनकी गली के सामने आ खड़ी हुई थी।
''अरे भइया बुलाओ यार! कोई जानता है क्या उस अउरत का मकान?ÓÓ -नेताजी ने फिर आवाज लगाई।
दो लोग नीचे उतरे और उस महिला को ढूंढने चले गए। वे शायद कुम्हारपट्टी के भूगोल से परिचित थे।
अब बस त्रिशंकु की तरह यहां आकर ठहर गई थी, न आगे जा रही थी, न पीछे। मुझे लगने लगा कि यों उस स्थिर बस में बैठे-बैठे ही युग बीत जाएगा और इस तरह तो मैं कभी छतरपुर न पहुंच पाऊंगा। इधर नेताजी भी उस 'अउरतÓ को गालियां देते हुए नाराजगी प्रकट कर रहे थे।
आखिर जो दो यात्री उस स्त्री को खोजने गए थे, वे वापस लौटे। साथ में वही स्त्री और वही का वही उसका बच्चा भी। ''काए फिर जे बच्चा खों उठा लाईं। अब फिर जो रेंकहे सो चुप कराहे जाखों?ÓÓ -नेताजी उस पर बरस पड़े।
स्त्री ने कोई जवाब दिया ही नहीं। बच्चे को कैंया उठाये वह चुपचाप बस में चढ़ी और अपनी सीट पर बैठ गई। बच्चा अब एकदम मौन था। उन दो यात्रियों के साथ एक तीसरा आदमी भी बस में अपना सामान उठाए हुए चढ़ा। ''नाराज मत होइये बाबूजी।ÓÓ -उन यात्रियों में से एक नेताजी को समझाने लगा- ''बच्चा अब नहीं रोवेगा। पट्ठा अपने साथ अपने बाप को भी पकर लाया है।ÓÓ
''तो तुम हो ई बच्चा के बाप?ÓÓ -नेताजी ने तीसरे यात्री को संबोधित किया- ''कहां से लाउड स्पीकर फिट करवा के लाये हो या तुम ई मोड़ा के गले में।ÓÓ
लोग हंसने लगे। बस फिर चल पड़ी- अब की बार आगे की दिशा में। बच्चे का बाप नेताजी से माफी मांगता हुआ बताने लगा कि धंधे का टेम है, सादी-ब्याह में ही तो घड़े बिकते हैं कुछ, सो साली की सादी में बच्चे को उसकी मताई के साथ भेज रहा था, सोचा था फेरे के दिन नाम को ही आवेंगे थोड़ी देर, मगर मोड़े की जिद के आगे क्या करते। तभी मेरे बाजू की सीट पर बैठी बूढ़ी स्त्री के ऊंचे उठते स्वर के कारण मेरा ध्यान उसकी बहू की जचकी की करुण कथा पर चला गया। बताते हुए बूढ़ी का स्वर भर्रा गया था। कुछ खराबी न थी उसकी बहू में। मगर दो बार बच्चा हुआ। भगवान ने उठा लिया। तीसरी बार डॉक्टरों ने साफ कह दिया- ''जच्चा-बच्चा में से सिर्फ एक बचेगा, बोलो क्या चाहिए?ÓÓ इस विकट संकट की घड़ी तक पहुंच कर बुढिय़ा पल्लू से आंसू पोंछने लगी थी।
''फिर क्या हुआ? बहू बच तो गई न!ÓÓ -वहां तक की कथा सुनने के बाद बुढिय़ा के बगल में बैठी युवती ने पूछा।
''काहे नहीं बचती बिन्ना!ÓÓ -बुढिय़ा ने आंसू पोंछकर कहा- ''लड़का और उसका बाप तो कहने लग गए कि बच्चे को बचा लो, मगर हमने साफ कह दिया- कैसे कसाई हो तुम लोग...ÓÓ
उसकी कथा बहू के उस संकट से सुरक्षित बच आने के बाद समाप्त हो गई। अब मैं ऊंघने लगा। बस में एक सन्नाटा खिंचता सा लगा मुझे पर नहीं... वह तो शुरू से ही मेरे साथ लगा आया था, बस बीच-बीच में वह भीड़ के भीतर छिप जाता था।
अचानक मेरी झपकी टूटी तो वह सन्नाटा एकाएक उछलकर सुसराल जाती लड़की और उसके पति के बीच से सर्राता हुआ भागा। वह लड़की अभी तक अपने पति से बतियाने से सकुचा रही थी, पर अब बड़े उत्साह से अपने भाई के बारे में उसे कुछ बता रही थी। मेरी बगल की सीट वाली बूढ़ी स्त्री ने अपनी बहू को जचकी के संकट से उबारने के बाद अपने ननदोई के साले की मूर्खताओं का किस्सा छेड़ दिया था। पीछे बैठे लोग बस को पीछे ले जाने वाले बच्चे को केन्द्र में रखकर एक नाटक रच रहे थे। ''...क्यों रे, फेंक दें खिड़की से? मारत है का तोरी मताई? बाप नईं मारत?...ÓÓ इसी तरह की बातें वे कह रहे थे उससे।
छतरपुर बस स्टैण्ड पर पहुंचा तो रात का सन्नाटा वहां पसरा दिखा। उसे तोड़ते हुए वे सब मेरे साथ उतरे-बगल की सीट वाली बूढ़ी स्त्री और उसके साथ की नवयुवती, पति के साथ विदा होकर आई लड़की, नेताजी, पंडितजी और व्यापारी, कुम्हारपट्टी के दंपत्ति और उनका बच्चा- ये सब।
धीरे-धीरे वे सब पता नहीं कहा गुम हो गए और मैं फिर उसी सन्नाटे में रिक्शे की तरफ बढ़ा। मगर जैसे ही रिक्शा चला मुझे फिर लगा कि सन्नाटा सहसा छलांग मारकर पीछे सर्राता निकल गया है और वे सब मेरे साथ चल रहे हैं- बूढ़ी स्त्री, नवयुवती, वे पति-पत्नी, नेताजी, पंडित जी, व्यापारी और कुम्हारपट्टी के लोग भी... यहां तक कि जचकी के संकट से उबरने वाली बहू भी... और देहात से आई स्त्रियां भी- घर पहुंचकर घंटी बजाते ही जैसे ही देविका ने दरवाजा खोला मुझे लगा कि वे सब मेरे पीछे खड़े हैं और अभी मेरे साथ भीतर चले आएंगे। इतने सारे लोग- मेरे छोटे से घर में!
''क्यों? साथ में कोई है क्या?ÓÓ -देविका ने उस तरह असमंजस में मुझे खड़ा देखकर कहा।
''हां... नहीं तो!ÓÓ -मैंने कहा और भीतर गया।