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Tuesday 21 Nov 2017

ख़ालिस

ओमप्रकाश मेहरा
12, रेसीडेन्सी एरिया,
डेली कॉलेज रोड,
इंदौर- 452 009
बात बस इतनी थी कि वह लड़की हॉस्टल के बड़े वाले लोहे के गेट के सामने उसके रिक्शे में बैठी और चार किलोमीटर दूर नेहरू पार्क के सामने उतर गई।
लेकिन क्या सचमुच बात बस इतनी सी थी? दरअसल कोई भी बात कभी भी इतनी सी नहीं होती। बात के पीछे स्थितियां होती हैं, इंसान होते हैं और उनका होना ही बात को जटिलता और फैलाव दे जाता है। इंसान होते हैं तो उनका मिज़ाज, उनके संस्कार उनके अनुभव और स्मृतियां भी होती हैं जो हर बात से, हर हमेशा गुत्थम-गुत्था होती रहती हैं और तब इतनी सी बात इतनी सी नहीं रह जाती।
क्या यही नहीं हुआ था अभी-अभी? उसने रिक्शा आगे बढ़ा लिया किन्तु लड़की के कातर कांपते शब्द भी उसके साथ-साथ चलते रहे। किराया देते समय जऱा ठिठक कर झिझकते हुए उसने कहा था- ''दादा। थोड़ा रूक नहीं जाओगे?Ó बस्स! यहीं से वह इतनी सी बात, इतनी सी नहीं रह गई। वह लड़की दो तीन बार पहले भी उसके ही रिक्शे में नेहरू पार्क आ चुकी थी। वहां एक युवक उसका इंतज़ार करता मिलता। दूर से ही उसे देखकर वह चहकती हुई हाथ हिलाती-'हाय।Ó
'हाय।Ó युवक का चेहरा भी खिल उठता।
 गांव-गंवई के उसके वजूद में रचे बसे तौर-तरीके उसे टंहोका देते। 'देखो तो आजकल की लड़कियांÓ! लेकिन फिर अब तक देखी हुई शहर की दुनिया उसके कान में कहती! तुमको क्या बौरा? दुनिया है! क्या हमेशा तुम्हारे सड़े-गले पुराने तरीकों से चलेगी? वह यह भी सोचता कि पुराने ज़माने में लड़कियों को खूटे में बंधी गायों की तरह रखा जाता था, वही क्या अच्छा था? वैसे भी दरअसल तमाम ऊपरी उथल-पुथल और बदलाव के इन वर्षों के बाद भी स्थिति में कोई खास परिवर्तन नहीं था। हां ऊपरी तौर पर अलबत्ता लड़कियों को पढऩे-लिखने और थोड़ा बहुत सतर्क और चौकस आंखों की निगरानी में थोड़ी बहुत आज़ादी थोड़ा सा घमने-फिरने के लिए मिल गई थी। अब वह कितना भी पुराना क्यों न हो- भला इस थोड़ी सी फेरबदल से क्यों और कैसा गुरेज? यूं तो दरअसल अब भी वे कैद-कैद सी रहती थीं लेकिन कुछ वक्त के लिए ही सही, इस तरह थोड़ा घूमने-घामने, हमउम्र लोगों से बोलने-बतियाने में भला क्या हजऱ् था? भली ही लगती थीं वे ऐसी। पर उसने गौर किया कि दरअसल आज हमेशा की तरह 'हायÓ या किसी और तरह के संबोधन का आदान-प्रदान उन दोनों के बीच नहीं हुआ था। लड़की शुरू से ही तनाव में दिखाई पड़ रही थी। आज उसने न हाथ हिलाया न चहकते हुए 'हायÓ कहा। युवक हमेशा की तरह उसका इंतज़ार ज़रूर कर रहा था लेकिन कुछ बेचैन सा नजऱ आ रहा था। लड़की से भाड़ा लेते समय पास ही खड़े युवक के चेहरे पर बेचैनी उसने साफ -साफ देखी थी।
'ऐसा क्यों?Ó -उसके मन में सवाल उठा किन्तु फिर उसे भी उसने परे कर दिया, होगा कुछ अपन को क्या? वह रिक्शा आगे बढ़ाने को था कि अचानक बड़े कातर शब्दों में झिझकते हुए लड़की ने कहा था- 'दादा!Ó थोड़ा रुक नहीं जाओगे ?Ó
यह नई बात थी। दरअसल इसके पहले लड़की ने कभी किसी तरह की निजी बात उससे न की थी, इसलिए उसे अटपटा लगा और 'दादाÓ संबोधन पर तो वह विस्मय से ही भर उठा। उसे लगा कि लड़की उसके यहां बने रहने की ज़रूरत महसूस करती है।
उसने कुछ देर सोचा। जेब में कुछ कटे-फटे नोटों और रेजग़ारी मिलाकर सात-आठ रुपयों की रकम रही होगी, जबकि आज पैसों की ज्यादा ज़रूरत थी। घर में पत्नी रामकली और बेटी किन्नी बुखार में पड़ी थीं। घर खर्च के अलावा इन लोगों के खून की जांच और दवा के लिए पैसे चाहिए ही थे जबकि अब से बस दो घंटे बाद ही शाम पाली के लिए मालिक के पास रिक्शा वापिस जमा कराना था। इतने थोड़े से वक्त में जी जान लगा के अगर सवारियां न ढोई तो भला क्या कमाई होती।
''नहीं बिटिया आज जरूरत भर कमाई न हो पाई। रिक्शा भी वापिस करना है।ÓÓ अपनी तरफ  से पूरी सदाशयता दिखाते हुए उसने लड़की से कहा और रिक्शा आगे बढ़ा लिया। लड़की का चेहरा और उतर गया सा लगा। थोड़ी देर पहिले 'ऊंह अपने को क्या ?Ó कहकर जिस सवाल को उसने टाल दिया था उससे वह सचमुच पिंड न छुड़ा सका। हैरत की बात थी कि बाकी बचे वक्त में मशक्कत करके आज की ज़रूरत भर किराया पीट लेने के इरादे की अब दूर-दूर तक कोई परछाई तक न थी। उस इतनी सी बात में यह बेतरह गिरफ्तार हो चुका था और दिनों की तरह अलग से चुपचाप किराए के पैसे देने की बजाय लड़की ने क्यों उससे एक आत्मीय संबोधन के साथ उससे थोड़ी देर रुकने की प्रार्थना की थी? लड़का भी बेचैन सा क्यों था? क्या हुआ होगा? कुछ अनबन? झगड़ लिए होंगे? हां यही सही बात है। आजकल पढ़े लिखे बच्चे ही बने रहते हैं। उसी तरह पल में खुश और चहकते हुए और पल भर में लड़-झगड़ कर बिसूरते हुए।
चलो आज झगड़े हैं तो कल मेल भी हो जाएगा। कहो आज ही हो जाए।
अचानक वह बहुत हल्का महसूस करने लगा। अपने आपे में आया तो एहसास हुआ, रिक्शा जाने कब का एक किनारे रुका पड़ा था और वह अपने आप से ही बातें कर रहा था।
आसपास कोई नहीं था पर वह अचानक बेहद झेंप गया। शायद इसलिए कि इस क्षण उसने अपने आपको उन दिनों में लौटते पाया था, जब लगभग इस लड़की-लड़के की उम्र में तीस साल पहले नई नई ब्याहता रामकली को साथ लेकर दो पैसे कमाने वह गांव छोड़ आया था... भूल सकता है क्या उन दिनों वह एक दूसरे का इसी तरह रूठना, मनाना। पता नहीं कब एक मुस्कान उसके चेहरे पर फैल गई। ठेल-ठाल करके उसने रिक्शा आगे बढ़ाया और मेडिकल कॉलेज रोड पर चल पड़ा।
मजबूरी में छोडऩा पड़ा था गांव। थोड़ी सी जमीन थी। पिता शांत हुए तो साहूकार ने खाता सामने फैला दिया- ''देख लो, जमीन गिरवी पड़ी हैं, सूद बढ़ रहा है। या तो पूरा पैसा चुकाओ या जमीन हमारे नाम कर दो।ÓÓ अचानक एकदम उचाट सा हो गया था मन। धत् साला, इस गांव में अब गांव जैसा क्या रह गया? बाप को मरे अभी चार दिन हुए नहीं कि सूदखोर किसी भेडि़ए की तरह लार टपकाता लपक आया था। लगा यह जग़ह छोड़ देनी चाहिए। वहां अब बचा भी क्या था? माताराम पहिले ही शांत हो चुकी थीं। बाप ने मां-बाप दोनों बनकर उसे पाला-पोसा था। साल भर पहिले उसका ब्याह भी करवा गए। जब वे ही न रहे तो अब इस जगह से क्या मोह ? बाप थे तब तक साहूकार ने गिरवी रखे खेतों पर खेती करने दी थी और सारा उधार एक साथ चुकाने की बात कभी न की थी। उस खेती की आधी आमदनी से घर परिवार चलता और आधा सूद पटाने में खर्च होता। लेकिन आम साहूकारों के कजऱ्ों की तरह यह कजऱ्ा भी वैसा ही था जिसकी रकम सुरसा के मुंह की तरह बढ़ती ही जाती थी। गांवों में रोजग़ार धंधे यूं भी चौपट हो रहे थे। शहरों में बड़ी-बड़ी फैक्टरियां खुल रही थीं जिनमें वे सब चीजें मशीनों से बनने लगी थीं जो अब तक कारीगर हाथ से बनाते आए थे। करघे के कपड़े की जगह 'मिलÓ का कपड़ा, तेल घानियों के तेल की जगह डालडा और बड़ी मिलों का डिब्बा बंद तेल। पहले हाथ और 'मिलÓ दोनों के काम साथ चलते थे। अब बड़ी मिलों का एकछत्र राज था और उनकी चीज़ों ने गांवों पर भी धावा बोल दिया था। चमरौंधी पन्हइयों की जगह गांव में अब बूट ले रहे थे। हाथ से बुने कपड़े की जगह लोग टेरीलीन की बात करते। यहां तक कि एकाध साल तो दूसरे विश्वयुद्ध में क्षतिग्रस्त हुए पैराशूटों का कपड़ा भी मिट्टी के मोल बिका... लोगों ने शौक से उसके कपड़े सिलवाए और आपस में एक दूसरे को कम खर्च वाला नशीं होने की दाद दी। खेती में भी तब कोई दम न बचा था। मजदूरी भी आधी-पौनी मिलती। नतीजतन गांवों के लोग शहरों की तरफ  रूख़ कर रहे थे। उसी दौर में वह भी टूटा-फूटा घर और आंगनबाड़ी बेच बाच कर इस कस्बे में आ लगा।
जमते-जमते कुछ वक्त लगा। वह तो गऩीमत थी कि गांव से कस्बे में बदलती हुई इस जग़ह में अब भी थोड़ी बहुत गंवई सरलता बाकी थी। शायद इसी के चलते उसे सिर छिपाने को पांच रुपए महीने किराए पर एक कोठरी मिल गई। भले ही अंधेरी और आसपास सड़ते पानी के डबरों की वजह से बदबूदार और सीलन भरी थी लेकिन छत टिन की थी। बरसात के मौसम में पूरी कोठरी में इधर से उधर खटियां सरकाने की नौबत न आती।
यह तीस साल पुरानी यादों में इतना डूब गया था कि उसे सुनाई ही नहीं पड़ा कि पीछे एक मोटरगाड़ी बड़ी देर से हार्न बजाए जा रही थी और वह था कि अपनी धुन में सड़क के बीचों-बीच सुस्ताती-सी गति में पैडिल चलाए जा रहा था। चौंककर उसने रिक्शा एक किनारे किया तो अंग्रेजी की एक गाली निकालते, मोटर मालिक जो खुद गाड़ी चला रहा था, गाड़ी तेजी से निकाल ले गया। उसने सोचा-'हां, माना हमसे गलती हुई लेकिन भाई इसमें गाली गुफ्तार की कौन बात है ? पर भाई गाड़ी वाले बड़े लोग हैं- गाली तो देंगे ही।Ó
लोग तेजी से अपने रंग-ढंग व्यवहार, बरताव बदल रहे थे। यह तो वह था जो अपना थोड़ा बहुत सरल गंवईपन अब तक बचाए हुए था। यही आस-पड़ोस के काम आना, ज़रूरतमंद की मदद कर देना, मोहल्ले के किसी को जरूरी में अस्पताल-उस्पताल जाना पड़े तो रात-बिरात रिक्शा लिए हाजिर हो जाना... वगैरह-वगैरह। यानी कुल मिलाकर अपने भीतर के आदमी की, तमाम मुश्किलात के बावजूद सुरक्षित बचाए रखना।
''फिर क्या हुआ जो तुमने लड़की की विनती पर ध्यान न दिया?ÓÓ उसके मन ने कोंचते हुए उससे सवाल किया।
''आज दिन ही कुछ मनहूस था।ÓÓ उसने अपने आपसे बहाना बनाया।
''कैसे ?ÓÓ
खाली पेट घर से निकलना पड़ा। पत्नी और बेटी दोनों बीमार। रामकली बुखार में। किन्नी पेचिश में। वही शायद दो टिक्कड़ बना देती पर आटा खत्म था और उधार देने वाले बनिए की दुकान भी बंद। जेब भी खाली थी। बच्ची का कोई दोष न था फिर भी उसने गुस्से में उसे झिड़के दिया- ''किसी को परवाह नहीं मेरी।ÓÓ गुस्से में चिनचिनाता निकला ही था कि टायर पंक्चर हो गया। जैसे-तैसे उसे बनवाया। स्टेशन का एक मुसाफिर मिला जो एक घटिया बनिया निकला। उसके हाथों में दो रूपये थमाकर भागता हुआ स्टेशन के भीतर दाखिल हो गया। उसे जी भर कोसने के बाद, नुक्कड़ की चाय की दुकान से एक पावरोटी, एक कप चाय के साथ निगलकर किसी तरह भूखे पेट को राहत पहुंचाई। फिर एक दो छोटी-मोटी संवारियां मिलीं। फिर अभी-अभी इस लड़की को नेहरू पार्क छोड़ा और अब खाली रिक्शा लिए भटक रहा है।
''यह क्या हो रहा है मुझे?ÓÓ उसने चौंक कर अपने आप से पूछा। जेब में अभी बमुश्किल कुछ कटे-फटे नोट थे, जिनसे एक दिन की रोटी भी नहीं जुट सकती। तीस पर रामकली और किन्नी की दवा।
अगले एक दो घंटों में दस-बीस रुपये बजरिया की तरफ  मुडऩे का निश्चय किया। लेकिन मन था कि काम में लग ही नहीं रहा था। रह-रह कर वहीं अटक जाता।
-''दादा! थोड़ा रुक नहीं जाओगे ?ÓÓ फिर वही आवाज वह एक बार फिर खुद को कोसने लगा। क्या मालूम सचमुच किसी परेशानी में रही हो। अरे! और कुछ नहीं तो पूछ ही लेता- ''क्या बात है बच्ची?ÓÓ लड़की की जग़ह किन्नी कहती तो क्या न रूकता? किन्नी की सुबह डांट जरूर आया था लेकिन अब पछता रहा था। छि, आज उसने दो-दो बच्चियों को ठेस पहुंचाई।
उसके पैर एकदम निढाल हो गए। परेशान तो वह था ही। किन्नी का विचार आते ही जैसे उसे साफ -साफ दिख गया कि ''दादा थोड़ा रुक नहीं जाओगेÓÓ उस आवाज पर क्यों उसका मन अटक-अटक जा रहा था। वह घबरा सा भी गया। पता नहीं, कहीं लडकी पर कोई खतरा न रहा हो। हे भगवान!  उससे यह कैसी चुक? रिक्शा इस वक्त एक तरफ  खड़ा करके वह पीछे की सीट पर बैठ कर सोचने लगा। यह तय नहीं कर पा रहा था कि बंजरिया की तरफ  जाए या पीछे लौटे। एक तरफ घर-परिवार की ज़रूरतों के लिए यथेष्ट कमाई कर लेने की जि़म्मेदारी तो दूसरी की तरफ  वहां नेहरू पार्क के सामने, उस अबोध सी बच्ची की क़ातर अनुनय पर कान न देने की हृदयहीनता से उपजा अपराध बोध और आत्म ग्लानि!
-''यहां बैठे-बैठे क्या सोच रहा है भाई... चल कर देख ही ले न, शायद उसे भी ज़रूरत हो।ÓÓ मन ने उसे सुझाव दिया।
हां, यही ठीक है। अभी आधा घंटा ही तो हुआ है। लड़की अगर रिक्शा-उक्शा की टोह में होगी तो वह काम आ जाएगा। वैसे पार्क की तरफ  शाम ढले सुनसान सा हो जाता है। और रिक्शे-तांगे बड़ी मुश्किल से मिलते हैं। उसने रिक्शा रोका और पार्क वाली दिशा में वापिस मोड़ लिया। तेज चलकर पन्द्रह-बीस मिनट में ही वह वहां पंहुच गया। लेकिन यह क्या? गेट के सामने खासी भीड़ थी। उसका दिल किसी आशंका से कांप उठा। उसके पैर किसी अनहोनी के डर से अचानक एकदम बेज़ान से हो गए। पास से गुजरते हुए, कुछ लोगों की बातचीत के टुकड़े उसके कान में पड़े- '' अभी उम्र ही क्या थी बेचारी की। हत्यारे ने बुरी तरह चाकू से गोद डाला।ÓÓ
उसका जी धक्क से हो गया। रिक्शा रोककर पूछा-ÓÓ क्या हुआ है बाबूजी ?ÓÓ
-''एक लड़की की लाश मिली है।ÓÓ
वह बदहवास सा एक तरफ  खड़ा हो गया। तू ही जिम्मेदार है तू ही! रूक जाता तो क्या घिस जाता तेरा। क्या अपना-अपना ही हमेशा दिमाग पर सवार रहना चाहिए? अरे भाई इंसानों की दुनिया में आए हो तो कुछ तो इंसान रहो। उसका सिर चक्कर खाने लगा। उसके दिमाग में पश्चाताप, निराशा और जड़ता सी पैठती चली गई। उसकी कुछ समझ में न आ रहा था। वह किन लोगों के बीच था इसका उसे कोई चेत न था। लग रहा था कहीं बाहर दूर से आवाजें सुन रहा था।
-''हत्यारा पकड़ा गया क्या? लगा पास ही किसी ने अपने बाजू वाले से पूछा।ÓÓ
-''कौन था।ÓÓ
-''होगा वही इस शहर का नामी गुंडा, जिसे पैसे देकर चाहे जो करवा लो।ÓÓ
-''लड़की के साथ कोई और था क्या?ÓÓ
-''नहीं। अकेली थी।ÓÓ
-''अरे! 'उसने सोचा।ÓÓ तो वह लड़का कहां गया, जिससे मिलने वह आई थी कहीं उसने ही तो नहीं करवा दिया मर्डर? नहीं-नहीं यह कैसे हो सकता है। तो फिर किसने मारा उसे? हो न हो वही गुंडा होगा जिसका जिक्र लोग कर रहे था। हो सकता है लडकी का कोई और चाहने वाला रहा हो जिसने उस गुंडे को पीछे लगाया हो।ÓÓ
यहां तक पहुंचकर अब मैं इस कहानी को यहीं विराम देने के लिए विवश हूं। मुझे पता नहीं यह कहानी किधर मुड़े। मुझे खुद नहीं सूझ रहा। शायद आप ही इसे आगे बढ़ाना चाहें। संभावित विकल्पों की ओर इशारा मैं कर सकता हूं, आप अनुमति दे तो....
पहला विकल्प
उसके मन में अचानक एक ख्य़ाल कुनमुनाया, जिसने उसे भीतर तक कंपा दिया। लड़की को यहां तक लाए तो तुम ही थे बच्चू। पुलिस वाले इतना पता तो लगा ही लेंगे। माना कि हत्या से उसका कुछ लेना-देना नहीं था लेकिन ये पुलिस वाले क्या चीज होते है! यह उसे खूब पता है। बेवजह शक़ में कई बार उनके साथ पड़ चुका है। उन्हें फौरन से पेश्तर किसी सुराग की खबर अपने उच्च अधिकारियों को देकर शाबासी लेनी ही होती है न! आगे चलकर यही चाक-चौबंदी, जो भले ही गलत पायों पर टिकी तो तमगे दिलाने और तरक्की पर तरक्कियां झोली में डाल लेने के काम आती है। छवि सुधरती है सो अलग। फायदा यह कि फिर कोई बंदा आपके उल्टे-सीधे पर आसानी से उंगली नहीं उठा सकता। पद, पोजीशन और प्रतिष्ठा; ये सब इस मुल्क में बहुत सारी सहूलियतें मुहैया कराते हैं। बेवकूफ हैं वे, जो सरकारी नौकरी में रहकर भी सहूलियतें नहीं बटोरते।
बहरहाल उसने घबराकर यह सोच डाला कि वह फौरन धर लिया जाएगा। फिर लॉकअप में उसके साथ जो कुछ हो उसकी कल्पना करते ही उसकी रूह कांप उठी। याद है, एक बार तो उसके रिक्शे पर बैठी दो अजनबी सवारियां झगड़ लीं तो वह धर लिया गया। वे तो दे-दिलाकर छूट गए, उसकी धुलाई इस बात पर हुई कि साले गुंडो की दलाली करता है। अब लो, क्या कहें? क्या उसे मालूम था कि वे गुंडे थे? और थे भी तो उन्हें रिक्शे पर बिठाया था, उनकी दलाली कैसी? पर पुलिस तो पुलिस। न बाबा न!
इस बार तो एक खून का मामला है, वह भी उस लड़की का; जिसे वही अपने रिक्शे पर पार्क तक लाया था। पुलिस के हाथ पड़ गया तो हड्डी-पसली न छोड़ेंगे। लड़की के लिए ज़रूर उसका मन उदास हुआ। लेकिन भाग लेना ही बेहतर है, उसने सोचा।
आखिऱ उसकी जिम्मेदारी अपने घर-परिवार के प्रति भी तो थी, इस लफड़े में फंस गया तो बीमार पड़ी रामकली और बेटी किन्नी का क्या हाल होगा! हमेशा की तरह मन ने एक माकूल बहाना पेश किया, जिसके पीछे भली प्रकार छिपा जा सकता था। उसने रिक्शे का रूख़ मोड़ा और तेज गति से वहां से भाग निकला। बार-बार पीछे मुड़कर देखता कि कहीं पुलिस पीछा तो नहीं कर रही।
दूसरा विकल्प
खूब कोशिश कर उसने रिक्शा आगे बढ़ाया। घंटी टुनटुनाई तो सड़क पर खड़े लोग हटे और वह उनके बीच से सर्र से निकल गया। उसकी उड़ती-उड़ती सी न•ार पार्क के गेट के पास सफेद चादर से ढंकी आकृति पर पड़ ही गई और उसका सर्वांग कांप उठा। ''देख! देख! पड़ी है वहां उस मासूम लड़की की निर्जीव देह, जिसने चलते वक्त बड़ी बेचारगी के साथ कहा था- ''दादा, थोड़ी देर रूक नहीं जाओगे?ÓÓ तुझे क्या मालम उस वक्त उसके मन में कोई खौफ़ रहा हो। तू न रूका और वह अब वहां लावारिस पड़ी है।ÓÓ
क्या पुलिस के डर से, अपना पल्ला झाड़ कर भाग लेना ठीक है? ''नहीं-नहीं भाग कैसे निकलेÓÓ मन में प्रश्न उठा। इसका उत्तर सरल न था। उसकी आत्मा क्या मर गई है? यह सवाल और भी मुश्किल था। लगा उसके भीतर बैठा हुआ कोई, सवाल पर सवाल दागे जा रहा है और उसे परेशान किए हुए है। वह लड़की किस होस्टल में भी और उसका नाम पता वहां मिल सकता था, यह बात वह जानता था और उसकी मदद से पुलिस आसानी से उसके मां-बाप को ख़बर जल्द से जल्द पहुंचा सकती थी। लड़की की मिट्टी की फजीहत न हो इतना ही बहुत था। वरना घरवाले तो बेचारे सोचते होंगे बच्ची पढ़ाई कर रही है और ठीक-ठाक है, शायद दीवाली की छुट्टियों में घर जाए। उन्हें क्या मालूम था कि ...।
पता नहीं कहां से तैरता हुआ, लड़की का उदास चेहरा उसके कानों में फुसफुसा गया-'दादाÓ ...कुछ देर.....,वही का वही वाक्य एक बार फिर। उस वक्त तो न रुका, अब तो रुक जा भले आदमी। उसने खुद को उलाहना दिया और एकदम निढाल हो गया। उसकी आत्मा कसमसाई। उसकी आंखें भर आई।
थोड़ा बहुत न संभलता तो शायद हिचकियां लेता फूट-फूट कर रो पड़ता। थोड़ा मन संभाला। फिर सोचा वह नहीं बताएगा तो पुलिस अपने तरीके से धीरे-धीरे पता लगाएगी, इश्तहार देगी, शहर में घोषणा करवाएगी। हो सकता है एकाध दिन के इंतज़ार के बाद होस्टल वार्डन या तो पुलिस में रिपोर्ट करे या उसके माता-पिता को चि_ी लिखे या जिनके पास फोन है उन्हें फोन द्वारा खबर करे। तब तक बहुत देर हो चुकी होगी। उस निर्दोष और अबोध बच्ची की लाश चीरफाड़ के बाद मुर्दाघर में लावारिस और दयनीय हालत में पड़ी रहेगी।
अचानक झटके से रिक्शे के पैडलों पर उसके पैर रुक गए। उसके पूरे निश्चय के साथ रिक्शा मोड़ा। वह वापस पार्क के सामने पहुंचा, रिक्शे से उतरा, भीड़ में धंसा और बिना लेेशमात्र भी घबराए थानेदार के सामने पहुंचकर बेधड़क कह उठा-''साहब। मैं माधव हूं, माधव रिक्शेवाला। यह लड़की पार्क तक मेरे रिक्शे में आई थी। इसने कुछ देर मुझे यहां रुकने को कहा था लेकिन मेरा हरज़ा होता इसलिए मैं नहीं रुका। तब साढ़े पांच बजे थे। यह लड़कियों के कॉलेज के होस्टल में रहती थी।ÓÓ वह एक सांस में कह गया।
 जैसा कि लजि़मी था, थानेदार ने शक भरी लाल-लाल निगाहों से उसे घूरा... उसने उन आंखों में बल खाते कहर को महसूस भी किया किन्तु उसके मन के भीतर इस क्षण कोई डर नहीं था। ''वो क्या है साब... उसने मुझे बोला था कि ....ÓÓ वह लगातार बोले ही जा रहा था। वह क्या कुछ कहे जा रहा था उसे जऱा भी होश न था। वहां एकत्र लोग इस दृश्य को विस्मय से देख रहे थे, जिसमें लाल लाल घूरती आंखों वाले एक इंस्पेक्टर के सामने एक सीधा-सादा दब्बू सा दिखने वाला रिक्शे वाला न जाने क्या-क्या बोले जा रहा था और ताज्जुब था कि अब तक इंस्पेक्टर ने न उसे डांटकर चुप कराया था, न इस धृष्टता के लिए दो-चार बेंत ही जमाए थे...।
यूं तो इस शहर में रोज ही दो-चार हत्याएं हो जाती थी और कई-कई दुर्घटनाओं में मौतें... यहां के बाशिंदे अक्सर रस्मी संवेदना व्यक्त कर अपनी राह लगते..। उसने कई बार महसूस किया था कि यहां आने के बाद वह भी धीरे-धीरे इन्हीं बाशिंदों की तरह बनता जा रहा था लेकिन इस पिछले कुछ मिनटों में इंस्पेक्टर के सामने बेधड़क बोलते हुए लगा कि एक निर्दोष लड़की की मौत ने जिस तरह उसे हिला दिया था वह गवाही देता था कि इस शहर का बाशिंदा तो वह हो चुका था लेकिन उसके भीतर की मिट्टी अभी ज्यों की त्यों थी...एक ख़ालिस इंसान की मिट्टी...।
पाठकवृंद। कोई और विकल्प आपके पास हो तो आप स्वतंत्र हैं, पर जल्द बता दें कि आपका क्या निर्णय है ताकि मैं बेचारा इस आरोप से छुट्टी पाऊं कि लो। एक निर्दोष लड़की की तो जान गई और मैं हूं कि उसमें कहानी ढूंढ रहा हूं।