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Tuesday 21 Nov 2017

आने वाले जन्मदिन के बहाने

मंजूर  एहतेशाम
बिल्कुल नया न होते हुए भी यह शहर अपने आप में कुछ अलग ही था : कस्बाती संस्कारों और बड़े शहरों की न$कल करने वाले $खतरों और $खतरनाक लोगों से भरा हुआ। यह बदलाव देखते-ही-देखते आया था। पहली बार जब वह मरियम के साथ यहां आया था, वह अनुभव आज से बिल्कुल भिन्न था। हालांकि तब भी उनका यहां पड़ाव खासा लम्बा रहता था। बिटिया का जन्म ही यहां हुआ था। लेकिन तब कुछ ऐसा था जो बीच के, उनकी अनुपस्थिति के, काल में $खत्म हो गया था। या शायद यह कि पहले की तरह अब वह और मरियम एक नहीं थे और ज्यादा लोग मरियम के साथ थे। सितम यह कि मरियम की $गल्तियों को अनदेखा करके लोग साबिर को इस बिगाड़ का जिम्मेदार करार देना चाहते थे। कुछ इतने उदार थे कि सारी बात को मियां-बीवी के बीच का मामला कहकर द$खल नहीं देना चाहते थे. मरियम और साबिर को, यह लोग, 'असाधारण व्यक्तिÓ कहकर, जान बचाना चाहते थे। असाधारण शहर के असाधारण नागरिक।
वैसे उसे खुद भी लगता था कि वह साधारण लोगों से भिन्न है। इसलिए कि अभी तक जीवन में बहुत कम ऐसा हुआ था जिसे साधारण कहा जा सके। शुरूआत उसकी पैदाइश से हो गई थी।
-सच या यूं ही हॉंक रहे हो?! एक शाम जब दोस्तों में उसने बढ़ती उम्र और जिंदगी के राय$गां जाने का जिक्र अपनी आने वाली सालगिरह के हवाले से किया था तो किसी ने उसका जन्मदिन जानना चाहा था। बताने को चार-छ: तारीखें तो थी नहीं, उसने जन्म की तिथि, पैदाइश के साल के साथ, बता दी थी। 15 अगस्त, 1947। सुनकर साथ बैठे सारे लोग अपने-अपने ढंग से चौंक गए थे। वह भी, जो पहले कई बार सालगिरह के जशन में शरीक हो चुके थे।
-अगर ऐसा है, एक ने बात में लुत्फ पैदा करने को कहा था- तो आप अपने इंति$काल की तारी$ख अभी से तय समझो!
- क्या?
- 26 जनवरी! अब वह सन कोई-सा भी हो सकता है।
लोगों को मजा आया था। मिलकर हंसे थे सब।
किन-किन बातों पर लोगों को हंसने से रोका जा सकता है, साबिर नईम! किस-किस को उन अविश्वसनीय घटनाओं पर य$कीन करने को मजबूर करोगे जिनका सिलसिला तुम्हारा जीवन रहा है। लोगों का यह छोटा-सा मजमा जो तुम्हारी  जिंदगी के एक ही अध्याय, 'साबिर तथा पिंकी-उ$र्फ-मरियमÓ, अर्थात 'यह इश्$क नहीं आसानÓ जानकर अपने होशो-हवास खोये है, ऐसे जैसे कोई उडऩ-तशतरी नजर आ गई हो, उसे अपना बचपन, नौजवानी, जवानी-कैसे और कितना समझा पाओगे! जब तुम कहोगे कि तुम्हारे एकान्त के क्षण में, सीने के भीतर एक मस्जिद के कुशादा सेहन-सा हो जाता है, जहां मदरसे में पढऩे वाले बच्चों की गुनगुनाहट में मीना, महराबे और सतून एक गहरी सोच में खोये होते हैं, तो इनमें से जो तुम्हें संजीदगी से लेते हैं वह मनोवैज्ञानिक विश्लेषण करके तुम्हारी बात का संबंध तुम्हारे दादा से जोड़ देंगे जिनका कभी एक बड़ा दीनीं मदरसा था। (आज भी है; उसके संचालक बदल गए हैं।) दूसरे, तुम्हारे उन पिता से जिन्हें तुमने कभी नहीं देखा, और जो अपने बाप से विद्रोह करके अलग अपने मदरसे की बुनियाद डालना चाहते थे। वह तुम्हारे नाना के प्रिय शागिर्दों में से थे जो अपने जमाने के एक और बड़े आलिम थे। तुम्हारे दादा का मदरसा जिसका संचालन अब तुम्हारे एक फूफा करते हैं, क्योंकि तुम्हारे बाप को, जो उनके इकलौते बेटे थे, मतभेद के कारण, उन्होंने 'आ$कÓ कर दिया था, तुम खुद उनके आबाई शहर जाकर देख चुके हो, क्योंकि उसका असली वारिस तुम खुद को मानते हो, इस सबसे इन तमाशबीनों को क्या मतलब! यह बात तो अगर खुद तुम्हारे बा$की घरवालों को मालूम हो जाए- अम्मा और सौतेले भाई-बहनों को, तो तुम्हारे उनसे रहे-सहे ताल्लुकात का भी $खात्मा हो जाए। 'पिता का परिवारÓ तुम्हारे जीवन का वह अध्याय है जिसे उन तमाम लोगों ने जो उसकी त$फसील जानते थे, सेंसर करने की कोशिश की है। अम्मा की खुशी-खुशनूदी को! सब उनकी $खैरात पर जो पलते रहे हैं। आम जानकारी सिर्फ इतनी थी कि वह तुम्हारे नाना के शागिर्द थे और अम्मा की एक झलक देखकर दास्तानी नायकों की तरह उन पर दीवाने हो गए थे। वह दीवानगी! $खानदानी दीवानगी! इस दीवानगी का इलाज उन्होंने अम्मा से शादी करके करना चाहा, हालांकि खुद तुम्हारे $ख्याल में दीवानगी की ज्य़ादा-से-ज्य़ादा सूरत-शक्ल बदली जा सकती है। इलाज संभव नहीं। किसी शायर ने कहा है- ''कर इलाजे वहशते दिल चारागर। ला दे इक जंगल मुझे बाजार से।ÓÓ यह भी खूब है! तो बाप ने अम्मा से शादी करने को, आम जानकारी के अनुसार, अपना दीनीं मसलक बदला जिसके नतीजे तुम्हारे दादा ने उन्हें आ$क करके जायदाद से बेद$खल कर दिया। नाना के आदेश पर बाप ने उस समय अविभाजित भारत के लाहौर शहर जाकर एक मदरसे की बुनियाद रखी, और तुम्हारी अम्मा को, जो तब गर्भ से थीं, तुम जो अब हो, गर्भ में थे, ननिहाल छोड़कर वापस लाहौर के मदरसे का संचालन करने लगे। हर्गिज न करते अगर उनकी एक समय अम्मा के लिए दीवानगी रूप बदलकर मदरसे की स्थापना की दीवानगी में न तब्दील हो चुकी होती क्योंकि मुल्क में हिन्दू-मुसलमान दुश्मनी का खेल पूरे शबाब पर था। बेचारा अंग्रेज जो खेल का रेफरी था, सीटी बजाते-बजाते बेहाल और पसीना-पसीना हो चुका था। इस हद तक कि सीटी तो मुंह में दबी थी लेकिन फूंक उसमें या तो वह जानकर नहीं डाल रहा था, या नहीं जानकर नहीं डाल रहा था। $खन्दक खुद रही थी, दीवार चुनी जा रही थी, बयान दिये जा रहे थे, बयानों से मुकरा जा रहा था, मूसा का चमत्कार यानी समुद्र जो एक था खुश्की की लकीर खींचकर विभाजित किया जा रहा था, और कर भी दिया गया। बंटवारा अर्थात् विभाजन, यानी डिविजन। आम जानकारी इस युगान्तर पर 15 अगस्त 1947, जब देश स्वतंत्र एक विभाजित और साबिर नईम नाना के घर पैदा हो रहा था, और उसके सगे पिता या तो समाप्त हो चुके थे या समाप्ति की प्रक्रिया से गुजर रहे थे, पहुंचकर $खत्म हो जाती थी। सो ऐसे तो लाखों समाप्त हुए थे इस प्रक्रिया में! सब्र के सिवा चारा नहीं, आम जानकारी ठंडी सांस लेकर दिलासा देती थी। सच क्या केवल इतना था?! कुछ लेना नहीं तुम्हारी चिन्ता और सरोकार से इस मजमे को। अपने सीने के रा•ाों का साझा तुमने किसी से किया तो मरियम से, और आज वह मरियम भी तुम्हारे खिलाफ है। उस शहंशाह का दुख जिसके मुल्क में एक भरोसे के लायक व्यक्ति हो, और वह भी शहंशाह के $िखला$फ हो। इस मजमे में कुछ लोग तो ऐसे हैं जो सीने में मस्जिद के सेहन की कल्पना और सब$क याद करते बच्चों का ताल्लुक तुम्हारी खुद की अधूरी शिक्षा से जोड़ देंगे। बाकी हंसने-हंसाने के पहलू तलाशेंगे। और अपनी कोशिश में किसी हद तक सफल भी हो जाएंगे।
यह इनका तुम्हारे साथ बैठने का जायज मेहनताना बनता है, शराब और कबाब के अलावा।
- पैदाइश और इन्तकाल के लिहाज से शहर में एक और आदमी तुम्हारी टक्कर का हुआ है, उन साहब ने फरमाया था जिन्हें बातों से विस्तार के कारण पीठ-पीछे लोग दास्तानगो कहा करते थे। - जिसने शहर में तालीम के लिए बड़ा काम किया है। पहले कोशिश करके एक स्कूल शुरू किया और फिर उसे कॉलेज बनाया। अगर वह कुछ और जिंन्दा रहता तो शायद यूनिवर्सिटी भी बनवा ही देता।
साबिर नईम के कान कॉलेज और यूनिवर्सिटी की बात चौकन्ना होकर सुनने लगे थे।
- दादा की बात कर रहे हो? दूसरे साहब ने दास्तानगो से सहमत होते हुए कहा था- कोई मिसाल नहीं उस आदमी की। सर सैयद को तो हमने देखा नहीं, मगर दादा को तो अपने बीच चलते-फिरते और काम करते देखा है।
- किस संघर्ष का जीवन बिताया उन्होंने, तीसरे ने कहा था- शहर में आज भी ऐसे लोग जिंन्दा है जिन्होंने उन्हें अपनी जिंदगी की शुरूआत कनस्तर से घासलेट का तेल बेचकर करते देखा था। फिर मेहनत करके बड़ा आदमी बनते और स्कूल-कॉलेज की स्थापना करते भी।
-बाकी सब छोड़कर मैं तो मह उनकी तालीम के लिए लगन की बात कर रहा हूं। आखिर के दिनों में भी जब उनकी सेहत इतनी बिगड़ गई थी कि सही मायने में उन्हें आराम करना चाहिए था, वह धूप में छाता लगाए साइंस लेबोरेटरी की बिल्डिंग बनवाते नर आते थे। बिल्ंिडग पूरी  होने के बाद ही उनका इन्तकाल हुआ, जैसे किस्से-कहानियों में पढऩे को मिलता है।
- था क्या एक माने में, दास्तानगो ने बात का सिरा फिर अपने हाथ में लेते हुए कहा था- आज जो इतना बड़ा कॉलेज नर आता है इसकी प्राइमरी क्लासे दरख्तों की छाया में लगना शुरू हुई थी। सिर पे सायबान तक नहीं था।
- कोई शुबह नहीं, किसी ने बात संक्ष्पित करने को कहा था। 'दादाÓ ने शहर के मुसलमानों के लिए बहुत कुछ किया। बात सिमटने के बजाय फैल गई थी। बोलने वाला रौ में ''शहर के मुसलमानÓÓ कह गया था जिस पर बा$की को ऐतराज था। नमत था कि दादा हिन्दू और मुसलमान के बीच फर्क नहीं करते थे। इसका सबूत कॉलेज में पढऩे वालों की संख्या से मिल सकता था। हिन्दुओं की संख्या मुसलमानों से अधिक थी।
- यह सूरतेहाल तो अब अलीगढ़ की भी होती जा रही है, संक्षेप में बात $खत्म करने में नाकाम रहने वाले ने दलील दी थी।  -तो क्या सर सैयद ने भी उसे मुसलमानों में नई तालीम के अलावा किसी म$कसद से शुरू किया था?
- वक़्त और माने का $फ$र्क भी देखो यार, दास्तानगो ने ओढ़ी हुई लाचारी से कहा था। -सर सैयद के जमाने का मुकाबला आज से कर रहे हो! और सर सैयद ने भी अपने कॉलेज के दरवाजे $गैर-मुस्लिमों के लिए बंद तो नहीं किए थे। -सर सैयद को मुसलमानों से हमदर्दी होना क्या गलत है। न हो तो मुझे उनकी ईमानदारी पर शक होगा।
अब यह लोग बात करेंगे शिक्षा और राजनीति की साबिर नईम! इतिहास का पहला पाठ जो कभी किसी परिस्थिति में किया था और अपने जीवन-अनुभव, कड़वे-मीठे, बुनकर यह अपनी, जीने की समझ को, एक परिकल्पना के रूप में एक-दूसरे के सामने रखने का प्रयत्न करेंगे। लौट-लौटकर यह सन् 1857 तक जाएंगे और हांफते हुए आज तक लौट कर आएंगे।
अंग्रेज ने 1857 की सजा देने को कैसे मदरसों, खानकाहो, हद तो यह कि मस्जिदों तक को घुड़सालों में बदल दिया था। इल्म के वह तमाम चराग बुझा दिए थे जिनसे रोशनी की उम्मीद बंधती। क्योंकि जो तुम्हारे लिए रोशनी होती वह दरअसल अंग्रेज के खिलाफ बगावत की हिम्मत होती : किस तरह की हिम्मत, एक बदले हुए युग में, जब माज•ो होना बंद हो चुके थे और जंगें नई ईजादों के सहारे लड़ी और जीती जाने लगी हैं, यह तुम सोचो, साबिर नईम! सोचो और मातम करो!! फिर लोग इसी पर बस नहीं करेंगे, अंग्रे और ईसाई की इस्लाम और मुसलमान दुश्मनी की व्याख्या करने यह और कुछ शताब्दियों की यात्रा करके बारहवीं-तेरहवीं सदी ईसवी तक जाएंगे, सलीबी जंगों और यूरोप-खासकर स्पेन से, मुसलमानों के सफाए की बात करने : कैसे आठ-सौ साल हुकूमत करने के बाद मुसलमान वहां से बेद$खल कर दिया गया था। बेदखल यूं ही नहीं, लड़ाई में शिकस्त खाकर, शहर की चाबी ईसाई $फातिहों को सौंपकर वहां लौट गया था, जहां मुसलमानों की हुकूमत थी। सब नहीं, वह मादूदे-चंदे जो जंगों में हलाक होने से बच गए थे और जिन्हें ईसाई होना $कबूल नहीं था। उनकी हिजरत का तसव्वुर यह था कि ऐसी हुकूमत में नहीं रहेंगे जिसका सरबराह मुसलमान न हो : 'दारुल-हरबÓ कहें जिसे, यानी 'एक ऐसा घर जिसके $िखलाफ धर्म-युद्ध घोषित हो।Ó यही सोच बदले जमाने में विकृत रूप धारण करके कारण बनी थी तुम्हारे अपने देश के विभाजन का- यह बात, यह आसपास जमा लोग, करने से गुरेजकरेंगे। कुछ सच्चाइयां खुद अपने खिलाफ भी जाती हैं, इसलिए! अंग्रेज की इस्लाम-दुश्मनी का उल्लेख ये बीसवीं शताब्दी में उसकी 'खिलाफ त तहरीकÓ के खात्मे में भूमिका को लेकर करेंगे और उसके बाद खास दुश्मन, यहूदी, की पीठ पर हाथ रखकर इस्राईल की स्थापना करने में। यह सब कहते हुए वह एक बात भूल जाएंगे कि इतिहास में जो हो चुका उसके लिए किसी के माफी मांगने की आशा मूर्खता है (हालांकि आजकल यह भी किया जाने लगा!) और आपस में बैठकर दूसरे समुदायों का शिक्वा, लानत-मलामत, उनकी चालाकी और खुद के छले जाने का मरसिया- क्या है यह सब! दुनिया में हुकूमत करने वाले होते आए हैं, और वह जिन पर हुकूमत की जाती रही है। हुकूमत करने वालों की परिभाषाएं बदल गई हैं लेकिन असलियत जो पहले थी, वह आज भी है। कमजोर का ता$कतवर इस्तेमाल करता आया है और कर रहा है। कल कोई चमत्कार हो जाए, यह संभावना भी नहीं। एक सम्प्रदाय की हैसियत से यहां मुसलमान कमजोर लोगों में शामिल है। ऊपर से सितम यह कि एक ऐसे महब को मानने वाला जिसकी शुरूआत इस देश में नहीं हुई। उसे अगर इम्तिहानों का सामना है तो हैरत कैसी। और अगर मुसलमान हालात से मुतमइन नहीं है तो काहे की हैरानी! कौन है जो कमजोर या $गरीब रहना पसंद करेगा? सब खुद को बदलना और ऊपर आना चाहते हैं। बराबरी की बात करने वाले अच्छी नीयत के कमसमझ लोग हैं। कुदरत ने दो चींटे तो एक-जैसे पैदा किए नहीं, इंसान कैसे बराबर पैदा कर देगी! और वह बुरी नीयत के कमसमझ हैं जो आज की समस्याओं का हल हिस्ट्री की उन किताबों में खोजते हैं जो उनकी मंशा के मुवा$िफक हों। जो महब तालीम के $िखला$फ हो उनमें जरूर कुछ ऐसा हो चुका है जिसकी वजह से उनका वक़्त के साथ बढऩा रुक चुका है। और वक़्त के साथ होने का मतलब यह कहां कि आप आंखें मूंदकर वह करें जो पश्चिम में हो रहा हो! बढऩा तो किसी का खुद की जड़ों पर ही होता है, सही खाद और मौसम के दूसरे तकाजो को नर में रखते हुए।
यह सब सोचते हैं आप, साबिर नईम! और करने के नाम पर बीवी और बेटी से समझौता तक नहीं कर पाते! पहाड़़ी पर अधूरे मकान में भांति-भांति के लोगों में बैठकर अकादमिक चर्चे सुनते हैं, हर एक से असहमत होते हुए भी!
- आप तो, किसी ने दास्तानगो की लंबी बात से थकते हुए कहा था- मौका मिलते ही क्लास लेने लगते हो!
- जाहिर-सी बात है, दास्तानगो ने $खन्दापेशानी कबूल किया था। मुदर्रिस हैं और क्लास लेने की ही खातें हैं। $िफलहाल मैं दादा की बात कर रहा था- क्योंकि वह खुद तालीम नहीं पा सके थे इसलिए नौजवानों और बच्चों की तालीम को अपनी जिंन्दगी का मिशन बना लिया था। नवाबों या राजे-महाराजों को तो अपना भला ही आम लोगों की जहालत में नजर आता था, मगर दादा ने यह काम कर दिखाया जो इस शहर के बड़े-बड़े रईस और नवाबजादे नहीं कर पाए। मियां, आप बताएं ना, सबको अपना तजुर्बा।
मियां 70 साल से ऊपर, एक जागीरदार खानदान के ऐसे व्यक्ति थे जिन्होंने आजादी की लड़ाई में नवाबी हुकूमत का खुलकर विरोध किया था। न वह शराब पीते थे, न ही राजनीति से अब उनका कोई संबंध रहा था। किसी के शब्दों में वह बीते जमानों का ऐसा अचार थे जो जितना पुराना पड़ता जाता है,उतना ही जायकेदार होता जाता है! दास्तानगो के साथ कभी-कभी वह भी शाम की मह$िफलों में शामिल हो जाते थे और ज्य़ादा समय $खामोशी से दूसरों की बातें सुनते रहते थे।
'सन् 39-40 की बात है,Ó लोगों के इसरार पर मियां शुरू हुए थे- मैं अलीगढ़ में बी.ए. के पहले साल में था जब नवाब साहब वहां कॉन्वेकेशन में शिरकत के लिए आए। उस जमाने में अलीगढ़ में औलाद को पढ़ाना किसी कम-हैसियत खानदान के बूते की बात नहीं थीं। अमीरजादे पढ़ते थे या फिर ऐसे लोग जिन्हें रियासत की तरफ से वजीफा मिले और पढ़-लिखकर भी वह खुद को स्टेट का $खादिम समझते रहें। हमारे अब्बा ने अपने $खर्चे पर हमें अलीगढ़ भेजा था। स्टूडेन्ट्स का एक डेलिगेशन नवाब साहब से मिलने जा रहा था। हमें खासतौर से उसमें इसलिए शामिल किया गया कि हमारा ताल्लुक नवाब साहब की अपनी रियासतसे था। सर्दियों की एक सुबह थी। हम लोग पहुंचे तो हिज हाइनैस लॉन पर धूप सेंकते नाश्ते पर हमारा इंतजार कर रहे थे। बहुत तपाक से हमारा स्वागत किया गया। नवाब साहब यूनिवर्सिटी के उन ओल्ड-ब्वाइज के बारे में बात करते रहे जिन्होंने मुल्क और समाज में नाम कमाया था। खुद उन्होंने जो वक्त वहां स्टूडेन्ट की हैसियत से गुजारा था, उसे याद करते रहे। फिर सबको अपनी अपनी रियासत आने की दावत देते हुए $फरमाया- कभी आप लोग हमारे मेहमान बनकर देखिए, हिन्दुस्तान के उस इला$के में जो अपनी खूबियों नहीं, खामियों की वजह से जाना जाता है, जमीन के एक $िखत्ते- अपनी रिसायत को, हमने चमन की तरह संवार कर रखा है। आपको यह महसूस होगा  कि जमीन पर जन्नत में आ गए। वहां के पहाड़, वहां के तालाब और इमारतें, सब अपनी नजीर आप हैं। आपका स$फर यादगार रहेगा। नवाब साहब की बात, जो उन्होंने बहुत लहक कर की थी, सुनकर मैं खड़ा हो और कहा- आला हजरत को जानकर खुशी होगी कि उनकी जन्नत का एक वासी उनके सामने खड़ा है। मैं उन्हें जमीन के इस $कदर खूबसूरत खित्ते का हाकिम होने पर अपनी दिली मुबारकबाद पेश करता हूं और साथ ही यह अर्ज भी कि शायद सियासत और हुकूमत की दीगर जिम्मेदारियों में उलझे होने की वजह से उन्हें अपनी प्रजा की कई परेशानियों की $खबर नहीं हो पाती। मेरी बात सुनकर नवाब की आंखों में चौकन्नापन घिर आया। जैसे जंगली जानवर खतरे को महसूस कर लेता है। नीची आवाज में उन्होंने ए.डी.सी. से पूछा यह कौन है! अपनी रिआया में से एक को वहां पाकर उनका मूड एकदम $खराब हो गया था। मैंने अपने त$फसीली तआर्रूफ के बाद कहा- मैं यहां आला हजरत की खिदमत में यूं आया कि रियासत में तो मुझ जैसे $ख्यालात के नौजवानों की रसाई हुजूर की जानिब में मुमकिन नहीं। इस पर मियां ने पुरानी यादों को उम्र के साथ बुझती आंखों में सजाते हुए कहा- आला हजरत का ए.डी.सी. हाथ नचा-नचाकर कहने लगा- आला हजरत सबसे टाइम देकर मिलते हैं।
और अपनी बात की जाने-कौन सी नजाकत याद करके वह फूट-फूट कर हंसने लगे थे।
- सोचिए! वह बदि$क्कतहंसी पर काबू पाकर बोले। - यह भी भला कोई कहने की बात थी कि आला हजरत सबसे टाइम देकर मिलते हैं। मैंने ए.डी.सी. की बात अनसुनी करते हुए कहा- आला हजरत से दरख़्वास्त है कि रियासत  में सलाहियतमंद नौजवानों के लिए तालीम का मुनासिब इंतजाम किया जाए। कॉलेज तो दूर, रियासत में किसी यूनिवर्सिटी से इम्तिहान देने का सेंटर तक नहीं। आला हजरत बखूबी वाकिफ हैं कि रियासत के $गरीब और मु$फलिस तालीम के लिए औलाद को बाहर नहीं भेज सकते। नवाब साहब का मूड पूरी तरह $खराब हो ही चुका था, फिर भी लहजे को काबू में रखते हुए उन्होंने ए.डी.सी. से कहा कि इनका नाम नोट कर लो और जब हमसे मिलना चाहें जरूर मिलवाना। फिर बा$की लोगों की तरफ मुड़ते हुए कहा-यू सी जेन्टलमैन समथिंग ऑलवेज रिमेन्स टू बी डन! यह आप नौजवानों से बेहतर कौन बता सकता है। सॉरी जेन्टलमैन, बट इट्स टाइम आई टेक युवर लीव! मेरा महाराजा बीकानेर से मिलने का टाइम तय है। ऑल द बेस्ट एंड इट्स बीन अ प्लेजर! जब आला हजरत यह कह रहे थे तो उनकी आंख का एक कोना मुझे धमकी दे रहा था कि अब जरा रियासत तो लौट के आ! और दूसरा ए.डी.सी. से इस लापरवाही का जवाब तलब कर रहा था कि डेलिगेशन में उनकी प्रजा का नुमाइंदा कैसे शामिल हो गया! यह रवैया था नवाबों-महाराजाओं का तालीम के बारे में। हो सकता है आज के बदले हालात में आप लोगों को मेरी बात में उतना वजन महसूस न हो लेकिन तालीम, बुनियादी तौर पर इंसान को आजाद होना सिखाती है। जो तालीम इसलिए हासिल कर रहे हैं कि अपने गुज रे ज मानों, तहजीब या मजहबी किताबों की वक्त से ताल बैठने वाली व्याख्या कर सके, वह आलिम और पंडित नहीं, अपने किए-धरे के सबसे बड़े गुलाम हैं। वह जिन्दगी की रफ़्तार को हवा में गांठ बांधने जैसा लाहासिल काम कर रहे हैं। लेकिन आजकल हर तालीम किसी न किसी तरह, अलग-अलग मज हबों की बॉडीगार्ड बनकर रहने पर मजबूर हैं। धर्म, जात या मुल्क-सतही नाम कुछ भी दिया जा सकता है। इस सबके बावजूद मैं पूरी ईमानदारी से कह सकता हूं कि हम बीते हुए कल के मु$काबले एक कहीं बेहतर आज में जी रहे हैं। कुछ लोग रियासत के ज माऩे को इस तरह याद करते हैं जैसे वह कोई सुनहरा दौर रहा हो। हर्गिज नहीं! सुनहरा वह उन गिनती के लोगों के लिए था जिन पर वक़्त मेहरबान था। हमारे-आपके लिए काहे का सुनहरा! मैं $कसम खाकर कह सकता हूं कि हम आज कहीं बेहतर हैं।
मियां को बोलता सुनते एक बोझिल सन्नाटा पड़ गया था।
-क्या तालीम और मजहब को, किसी ने कहने की हिम्मत जुटाई थी- इतनी आसानी से अलग-अलग $खानों में बांटा जा सकता है?
- जी नहीं! मियां ने लौटते जवाब दिया था।- उसके लिए खासी हिम्मत और मेहनत दरकार होती है। आप अगर एक मुसलमान की हैसियत से अपने हिन्दू दोस्तों को समझने का दावा करते हैं तो साहिल पर बैठकर तूफान का नजारा करते रहिए। ऐसा करते अभी तक कितने ही काम आ चुके हैं, जिनका नाम जानने वाला भी कोई नहीं।
-फिर किया क्या जाए?
-मियां किसी ने पूछा था- आपने पार्टीशन के बाद कभी पाकिस्तान जाने का नहीं सोचा?
-क्यों नहीं सोचा! मियां ने बेबाकी से कहा था- दसियों बार सोचा होगा और फिर अपनी सोच पर हंसा होऊंगा। मैं नाम का मुसलमान, पाकिस्तान के मोमिनों के बीच मेरे लिए कहां जगह! मास्को जा सकता था मगर जालिम जमाना फिलहाल उसे भी मिटाने पर तुला है! 'यूटोपियाÓ कहीं है नहीं, जन्नत ही की तरह। तो बेहतर यही है कि अपना ही घर सुधारने की कोशिश की जाए। करने पर ही होने की आस टिकी है।
-आप कम्युनिस्ट हैं?
-नास्तिक होने की हद तक! वैसे किसी सियासी पार्टी से मेरा कभी कोई ताल्लुक नहीं रहा। लेकिन तालीम में मेरा ईमान है और इसीलिए उन साहब के लिए दिल में इज्ज़त जिनकी अभी बात हो रही थी।
-लेकिन, किसी ने याद दिलाना चाहा था- साबिर की सालगिरह की बात तो बीच में ही छूट गई।
दास्तानगो अपनी आंखें यूं गोल-गोल घुमा रहा था जैसे पूछना चाहता हो- याददाश्त तुम्हारी बेहतर है या मेरी।  
-तुम तो हर बात में दखल देते हो। उसने बुरा मानने की एक्टिंग करते हुए कहा था- याद तो हमें भी रहता ही है।
-मगर आप बंबई से दिल्ली का स$फर वाया कलकत्ता-मद्रास करते हो!
-साबिर की सालगिरह, 15 अगस्त की ही दुहाई दी जा रही थी? दास्तानगो ने मुद्दे पर लौटते हुए कहा था। जिस पर मैंने दादा से मिलते-जुलते होने की बात कही थी।
-क्या दादा भी 15 अगस्त को पैदा होकर 26 जनवरी को खत्म हुए थे?
- जी नहीं, दास्तानगो का स्वर भारी हो आया था। - वह 26 जनवरी को पैदा होकर 15 अगस्त को $खत्म हो गए थे। इसीलिए मैंने उन्हें साबिर जैसा नहीं, साबिर की टक्कर का कहा था।