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Wednesday 22 Nov 2017

प्रतिप्रश्न


ममता कालिया
इस वक्त वह तिलमिलाती, झुंझलाती बिस्तर पर पड़ी थी। तिलमिलाहट लड़कों पर थी, झुंझलाहट अपने पर। कितना समझाया था सूरज बाबू ने ''पूरे दिन दफ्तर में काम किया है, जाओ आराम करो, अब कहां गोष्ठी में जाओगी?ÓÓ
''यही तो मेरी जिन्दगी है अंकल। रात को इतनी थककर घर पहुंचूं कि बिस्तर पर पड़ते ही नींद आ जाए। आपकी तरह मुझे वेलियम फाइव नहीं खानी पड़ती।ÓÓ
''क्यों नहीं, और सराहना टॉनिक का काम करते थे। दफ्तर में 'महागौरीÓ के लिए मैटर की जोड़तोड़ करते कब दिन तमाम हो जाता, पता ही न चलता। कभी फैशन पृष्ठ के लिए दौडऩा, कभी विजुअल का इंतजाम करने में मगज खपाना, सब उसके हिस्से के काम थे। कभी वह कला-विभाग से भिड़ जाती।ÓÓ इआस टी.पी. को कैसे नापास किया आपने। आपको पता नहीं यह भानुशाली की भेजी हुई है।
उसके तेवर से सब डरते।
उनके डरने का एक कारण यह भी था कि सूरज बाबू उस पर मेहरबान थे। 'महागौरीÓ के लिए सबको आदेश-निर्देश महिमा के माध्यम से ही मिलते। सत्रह साल की नौकरी में उसने अपने आपको पत्रिका के लिए अपरिहार्य बना लिया था, यों तो 'महागौरीÓ वैसी ही मासिक पत्रिका थी जैसी सब महिला-पत्रिकाएं होती हैं। हर अंक में दो कहानियां, कविताएं, लतीफे, सेन्टरस्प्रेड पर रंगीन फैशन-चित्र, जरा आगे व्यंजन विधियां, डॉक्टर की सलाह, कुछ नारी-जागरुकता से जुड़ा मैटर, एक हास्य व्यंग्य रचना, घरेलू नुस्खे और मासिक भविष्यवाणी।
इधर नई-नई बहुत सी महिला-पत्रिकाएं निकलने लगी थीं। इससे स्पर्धा बढ़ती जा रही थी। लेकिन शुक्र यह था कि बाकी पत्रिकाएं जितनी जल्द शुरू होतीं उतनी ही जल्द काल-कवलित भी हो जातीं। कहीं सम्पादकीय झगड़े, कहीं वितरण-विभाग की शिथिलता तो कहीं आर्थिक संकट पत्रिकाओं को ले डूबते।
महिमा यहां तब से थी जब 'महागौरीÓ का प्रवेशांक निकला। हालांकि वह अभी भी सम्पादक के पद पर नहीं पहुंची थी पर वेतन को लेकर उसे कभी शिकायत का मौका नहीं मिला। महागौरी प्रतिष्ठा के वेतनमान अन्य सभी जगहों से बेहतर थे। ठीक पहली तारीख को वेतन मिल जाता।
अकेली जान थी महिमा। शादी योग्य उम्र में उसे एकाध उपयुक्त पात्र मिला भी पर वह तय नहीं कर पाईं।
उन्हीं दिनों उसे यह नौकरी मिल गई। उसके मन में अनुकूल था यह काम। हिन्दी साहित्य के अध्ययन ने उसे और किसी काम के लायक छोड़ा भी कहां था।
दफ्तर से लौटकर भी दफ्तर के दृश्य-चित्र उसे स्पन्दित करते। सम्पादकीय विभाग में यह अकेली महिला थी। शायद इसीलिए उसकी सम्मति मानक भूमिका निभाती। अजब बात यह थी कि उसके जिम्मे कला संस्कृति और साहित्य के पृष्ठ थे जबकि स्त्रियोपयोगी सामग्री जुटाना, काटना-छांटना पुरुषों के जिम्मे। लतीफे और हास्य व्यंग्य, लेख और फुटकर मैटर देखने वाले अधेड़ मेहरोत्रा जी इसी काम में लगे अपने तीन चौथाई बाल और आधे दांत इसी दफ्तर को समर्पित कर चुके थे। वे मुंह में पान भरकर कहते, ''महिमा डी, डरा ये मैटर देख दीजिए, ठीक है न!ÓÓ जब महिमा उनके पृष्ठ देख चुकती वे धीरे से एक भदेस लतीफा मैटर में जोड़कर मैटर कम्पोज होने के लिए भेज देते।
यही हाल डॉक्टरी सलाह पृष्ठ का था। सम्पादक, मैटर देख लेने के बाद मेहरोत्रा जी से कहते ''भई बड़ा डल पेज जा पड़ा है अबकी बार। एकाध सवाल को थोड़ा चटका दें।ÓÓ मेहरोत्रा जी सवाल को चटखारेदार बना देते। कभी-कभी सवाल भी खुद बना देते। इसी क्रम में कभी वे झांसी की सुनीता बन जाते तो कभी बाराबंकी की विनीता। माना यह जाता कि इन सभी के अथक परिश्रम पर महागौरी मार्केट में टिकी हुई है।
इस सत्रह साल में काम करते-करते महिमा का व्यक्तित्व 'महागौरीÓ के साथ ऐसे घुल-मिल गया था कि वह अलग से अपना वजूद बस इतना देख सकती थी कि कभी-कभार वार्ता प्रसारण के लिए आकाशवाणी चली जाती या सभा-गोष्ठियों में शिरकत करती । इसी से साहित्य की जब तब उठने वाली हुड़क शांत हो जाती। लेखन जगत के गंभीर सवालों से टकराने का सामथ्र्य कम होता जा रहा था।
दफ्तर में महागौरी का सर्कुलेशन न गिरे, इस पर निगाह वह हरदम रखती। उसी ने पता लगाया था कि शुक्ला, छद्म नाम से 'सुन्दर संसारÓ नामक महिला-पत्रिका में लिखता है; कि 'महागौरीÓ के माध्यम से सरीन एक-दूसरे राष्ट्रीय अ$खबार में छलांग लगाने की कोशिश में है; कि वर्मा चेक बनाने में जानबूझकर देर करता है। इन बातों पर महिमा की दृष्टि बिल्कुल विजिलेंस इंस्पेकटर की थी।
दफ़्तर में कुछ अधेड़ और बुढ़ऊ पत्रकार भी थे। जो समय-समय पर पत्रिका के लिए लिखते। वे महिमा की खुशामद करते कि उनकी रचना लेटेस्ट अंक में शामिल हो जाए। वे कहते, ''महिमा इतनी कम उम्र में तुमने इतना अनुभव बटोर लिया है, किसी राष्ट्रीय पत्र में होती तो कहां से कहां पहुंच जातीं।ÓÓ
महिमा कहती ''हम इसी को राष्ट्रीय पत्र बनाकर दम लेंगे दादा।ÓÓ
कम्प्यूटर विभाग में शकुन अग्रवाल और मिसेज खन्ना काम करती थीं। लंच टाइम में वे और महिमा इकट्ठा बैठतीं। मिसेज खन्ना शकुन जी से काफी पहले नियुक्त हुई थीं, पर अभी युवतर दिखतीं। इसके पीछे उनकी बहुत सी मेहनत थी। खाली वक्त मिलते ही वे पर्स से क्रीम निकालकर हाथों में मलतीं, लिपस्टिक ठीक करतीं या नाखूनों को शेप देती रहतीं जबकि मिसेज अग्रवाल के आगे के बाल सफेद हो चुके थे। मिसेज खन्ना ने ही बताया था कि मर्द औरतों की उम्र जानने को क्या-क्या जतन करते हैं जब वे आई थीं लोगों ने पूछा, ''आपने पढ़ाई कब खत्म की? आपकी शादी कौन से सन् में हुई? बच्चे किस क्लास में पढ़ते हैं?ÓÓ
मिसेज अग्रवाल ने कहा, मुझसे बात करते समय उनके प्रश्न बदल जाते हैं। वे पूछते हैं, ''आपको रिटायर होने में कितने साल बाकी हैं?ÓÓ महिमा ने कहा, ''मिसेज खन्ना जब आप रिटायर होंगी, लोग कहेंगे क्या आपने ऐच्छिक अवकाश ले लिया?ÓÓ
''यानी हर सूरत में वे आपकी उम्र पता लगाएंगे जबकि उनकी उम्र के विषय में हम औरतों को उतनी जिज्ञासा नहीं होती।ÓÓ
पुरुषों की उम्र पता भी कहां चलती हैं,सब एक से लगते हैं। न उन्हें बच्चे पैदा करने होते हैं, न रोटियां बेलनी होती हैं, मिसेज अग्रवाल कहतीं।
''रोटियां बेलते नहीं पर कमाते तो हैं, यह कहीं ज्यादा मुश्किल काम है।ÓÓ
''क्यों औरतें भी तो दफ़्तर जाती हैं, वे तो कोई अकड़ नहीं दिखातीं?ÓÓ
''सच तो यह है कि शादी के बाद मर्दों को इतनी सस्ती, सुन्दर और टिकाऊ सेवा हासिल हो जाती है कि वे निखरते जाते हैं, औरत बुझती जाती है।ÓÓ
उन दोनों की बातों से महिमा को अविवाहित रहने की अपनी स्थिति वरदान स्वरूप लगती। वैसे भी वह एक अदद पुरुष की सेवा में अपने जीवन का सम्पूर्ण समर्पण सोच भी नहीं सकती थी। उसे विवाह की संरचना सामंती दिखाई देती जिसमें पति-पत्नी का रिश्ता स्वामी-सेविका का था।
काफी दिनों तक महिमा अपना जन्मदिन, उत्सव की तरह मनाती रही थी। उसी दिन वह दोस्तों और दफ्तर के सहकर्मियों को चाय पर आमंत्रित करती। मां सबेरे से रसोई में जुट कर छोले, समोसे और दही-बड़े बनातीं। मिठाई बाजार से आ जाती। भाभी कमरा साफ कर कुर्सियां करीने से लगा देती। कुछ वर्षों बाद जब एक पत्रकार मित्र ने जिज्ञासा दिखाई ''महिमा, मोमबत्तियों के बिना तुम्हारी उम्र का अंदाजा नहीं लग पाता। आखिर कितने साल की हो गई हो?ÓÓ ''सोलह की दूनीÓÓ महिमा ने शरारत से कहा और उम्र के चार साल चालाकी से चबा गई। धीरे-धीरे मां का हौसला पस्त होने लगा, भाभी, गर्भ और गोद के बच्चों में व्यस्त हो गई और खुद महिमा को लगा कि इस आयोजन में जो$िखम बढ़ता जा रहा है। उसने यह सालना उत्सव खारिज कर दिया। अब तो वह खुद भी याद नहीं रखना चाहती अपनी जन्मतिथि। घर और दफ़्तर में सब उससे उम्रदराज हैं, यही उसके लिए काफी है। नाम के पहले लगा कुमारी शब्द हर समय उसे यौवन का अहसास देता है। कभी अपने को विगत यौवना समझने की नौबत नहीं आती। इस माहौल में उसके लिए कोई असुरक्षा नहीं थी न ही चुनौती।
लेकिन आज शाम समकालीन लेखन की गोष्ठी में पहुंचने पर उसने पाया वहां माहौल अजनबी हो चला है। कितने ही लड़के जो कल तक विद्यार्थी थे, आज कलम चलाकर युवा लेखक बन रहे हैं। दो-चार लड़कियां भी कविता के क्षेत्र में सक्रिय हैं। वे भी मंच पर आसीन थीं। कॉफी ब्रेक के समय ये सब उसे बड़ी दीदी संबोधन दे रहे थे। हालांकि दीदी संबोधन में काबिले एतराज कुछ भी नहीं था। वह थोड़ी बुझ गई। गोष्ठी के उत्तराद्र्ध में उसका मन नहीं लगा। हाल में भारतीय पद्धति से बैठने की व्यवस्था थी। जहां वह बैठी थी, पीछे थोड़ी जगह खाली थी। तभी पीछे से किसी ने कहा, ''आंटी, थोड़ा सरक जाइए तो दरी ठीक कर लें।ÓÓ
महिमा ने मुड़कर देखा। युनिवर्सिटी के कुछ छात्र उससे आगे खिसकने का अनुरोध कर रहे थे। दरी का कुछ हिस्सा उसके बैठने से दब गया था, इससे पीछे बैठने वालों को असुविधा हो रही थी।
महिमा के अंदर दरी के साथ-साथ बहुत कुछ सरक गया। उसे लगा समय चक्र बड़ी तेजी से घूम चुका है, यहां युवाओं की भीड़ में वह दीदी है, आंटी हैं, मैडम है, बस महिमा नहीं है।
गोष्ठी की समाप्ति पर वह बिना किसी से बतियाए सीधी घर आई और बिस्तर पर पड़ गई। लग रहा था जैसे वहां जाकर उसकी तौहीन हो गई। ये लड़के-लड़कियां अपने आपको क्या समझते हैं। दुनिया में युवा बस ये ही हैं बाकी सब बुजुर्ग हैं। उसे तत्कालीन बनाकर ये समकालीन कहलाना चाहते हैं। साहित्य में समकालीनता दस वर्ष में नहीं, पचासों वर्ष में निर्धारित होती है।
जंजीर की तरह सुख और निराशा, उसका गला कस रहे थे। इसी में याद आए वे लम्हें जब जीवन की दिशा बदली जा सकती थीं।
वह बी.ए. फाइनल में थी। आशु उसका सहपाठी था। क्लास के बाद वह महिमा को छोडऩे उसके घर तक आता, अपनी साइकिल पैदल घसीटते महिमा कहती ''बेकार परेशान हो रहे हो, मैं खुद चली जाऊंगी।ÓÓ
आशु कहता, ''बस उस खूबसूरत मोड़ तक साथ चलने की इजा•ात दे दो।ÓÓ
नवाब युसुफ रोड के मोड़ पर 'खूबसूरतÓ नाम का ब्यूटीपार्लर था जहां से उनके रास्ते अलग होते थे। एक बार आशु के बहुत इसरार करने पर वह उसके साथ 'सिलसिलाÓ फिल्म देखने गई। पूरी फिल्म में न उसे अमिताभ दिखा न रेखा, वह टकटकी लगाकर दरवा•ो की तरफ देखती रही कि कहीं पापा उसकी तलाश में अंदर न आ जाएं। सिनेमा से तीन बजे की चिलचिलाती धूप में जब वे निकले, आशु की साइकिल में पंक्चर था। धूप में खड़े-खड़े पंक्चर बनवाना कोई सुखद काम नहीं था। परिचितों द्वारा देखे जाने का खतरा अलग।
महिमा ने कहा, ''तुम पंक्चर बनवाओ, मैं चलती हूं।ÓÓ
आशु ने कहा, ''दोस्ती धूप-छांह इकट्ठे झेलने में होती है।ÓÓ महिमा ने उसकी बात जानबूझकर अनबूझ कर दी और चल पड़ी। उसे इस तरह के असमर्थ आशिकों से चिड़ थी जो दोस्ती में इतनी दारुणता डाल दें।
आशु ने उससे संजीदा बातचीत की एकाध कोशिश और की। आ•िाज आकर महिमा ने कह दिया, ''देखो, तुम्हारे पास न नौकरी न चाकरी, यानी अभी अपनी •िान्दगी का इन्तजाम नहीं और मेरी •िान्दगी सेत में मांग रहे हो?ÓÓ
''साथ-साथ संघर्ष करने में तुम्हारा यकीन नहीं, आशु ने आहत आवाज में पूछा।ÓÓ
''मुझे निरुपायता से न$फरत है, मैं एक कामयाब जिन्दगी चाहती हूं।ÓÓ महिमा ने अपना जीवन-दर्शन उसे चंद शब्दों में जता दिया था।
उसके बाद आशु तटस्थ हो गया। अब तो वह दो बच्चों का पिता है, कभी दिख जाता है तो उसे पहचानता भी नहीं।
पारम्परिक विवाह के लिए पिता ने एक बार वर ढूंढा। पर महिमा को इस प्रस्ताव में भी कई शंकाएं थीं- ''लड़का बत्तीस साल तक अविवाहित क्यों है? सर्विस कच्ची है या पक्की, प्रमोशन की गुंजाइश कितनी है, इसकी मां-बहनें झगड़ालू तो नहीं है।ÓÓ उसके सवालों से खीझकर पिता ने कह दिया, ''ऐसा लग रहा है मैं अपनी लड़की के लिए नहीं, तेरी लड़की के लिए रिश्ता ढूंढ रहा हूं। इतनी जांच पड़ताल करनी है तो अपने आप ही वर ढूंढना।ÓÓ
उसकी नौबत ही नहीं आई। यह नौकरी जो मिल गई। दफ़्तर के जाने-पहचाने दायरे में सुरक्षित समाए रहना कहीं ज्यादा सम्माननीय था और आरामदेह। यहां अपने आप से होने वाली मारक मुठभेड़ें भी नहीं थीं। यहां काम करने वाला हर आदमी उसकी जन्म-तिथि से दस बारह साल पहले पैदा हो चुका था। यहां उसका यौवन चिर-स्थायी था। यही बेहतर था। ठ्ठ