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Saturday 18 Nov 2017

हंसिया, पानी और चांद


महेश कटारे
नराला नगर, सिंहपुर रोड
मुरार, ग्वालियर-474006
भादो के महीने का मेह जवानी के उ$फान सा होता है। आंखें मींचकर टूटता है...। नीचे क्या बन बिगड़ रहा है, आसपास हाय हाय है, कि त्राहि-त्राहि कुछ नहीं देखता। रेख मूंछ आते लड़कों और आईने के सामने छुप-छुप उभरते अंग निहारती लड़कियों ने ऐसी अटाटूट बरखा कभी न देखी थी।
गेंउड़े से लगकर बहती छोटी सी नदी जो पहले पलेवा में ही बियानी गाय सी निचुड़ जाती है, अगहन में झिरान के आसरे हो- पूस की फुसकार न पड़े तो माघ में रेत कंकड़ के दांत निकाल नंगी हो जाती है, वही ऐन कन्हैया आठे की रान गांव पर चढ़ दौड़ेगी और किरन उकसते उकसते आधे गांव को हिलाकर रख देगी; यह किसने सोचा था...।
कहावत है कि छुद्र नदी जरा से पानी में भी भर, इतरा जाती है और खल व्यक्ति थोड़ा धन पाने पर ही बौरा जाता है पर चूंकि दसियों साल से नदी और सूखी होती जाती थी। छह महीने तो उस पर तरस बरसता था इसलिए लोग इस तरफ से इतना निश्ंिचत हो गए कि उसके भराव तक में मकानों की दीवारें तान ली थीं। यंू भी ऊपर की लगातार बरसात से भरे-भरे बहते नाले पोखरों का बेतादाद पानी उसी ओर बहने से वह दिन दहाड़े ही किनारों से ऊपर हो गई थी... पर वही गफलत में पड़े रहने की आलसी आदत कि 'बस हो लिया, इससे ज्यादा क्या बढ़ाव होगा।Ó दिखाई दे रहा था कि कभी रिमझिम, कभी मूसलाधार पानी ऊपर से टूट रहा है पर आठे के लोग पकवान से पेट भर, टांगें तान सो गए। नींद तब टूटी जब खाट खटोले उतराने लगे।
सच है कि जितनी जल्दी बाढ़ आई, उतनी ही जल्दी उतरी भी- पर जितना ठहरी, उतने में ही गांव का हुलिया बिगाड़ के रख दिया। कच्चे तो क्या पक्के मकानों के भी ओने-कोने ढह गए। कुछ पुरानी हवेलियां जिनकी देहरी लांघते संकोच होता था और भीतर पहुंच आदमी अपने आपको गुम पाता था, वे भी जगह-जगह भसककर दरारें दे गईं। अब उनकी भी छत भरोसेमंद न रही थीं। उन्हीं छतों के नीचे पले-बढ़े लोग तब यह विचार बनाने लगे थे कि असुरक्षा की चिंता में लगातार जीते रहने से बेहतर है कि अपने हिस्से की ईंट-पत्थर निकाल, नए चूने गारे से अलग मकान बना लिया जावे।
इस गाज की लपेट में अंगूरी भी आई थी पर आधी। उसका पिछला मढ़ा ही नीचे-ऊपर की मार से धसका था... आगे की खपरैल बची रही। हुआ ये कि मढ़े ने भसककर ढूह की शक्ल ले ली और बाढ़ का पानी आगे न बढऩे दिया। यद्यपि गिरस्ती मिट्टी कूड़ी में दबी... पर समय मिलने पर वह उगारी जा सकती थी... टूटी-फूटी ही सही किन्तु उसके सहारे दिन दो-चार जिया सकता था... आगे तो अगर मारने के लिए कुदरत का कहर है तो जीने के लिए आदमी का हुनर भी है।
तेरह दिन की झमाझम और कड़क गरज के बाद सूरज और धूप कल ही दिखाई दी थी। सभी अपने बचे-खुचे को सहेजने-संवारने में जुट गए। अंगूरी भी जुटी। पांच साल की बिटिया और तीन बरस के बेटे के साथ गाय और बछड़े को मिलाकर छोटी सी गिरस्ती तो है... अंट जाएगी खपरैली में। आदमी पेट छोटा कर ले तो थोड़े में भी गुजर हो जाती है, बढ़ाओ तो फिर दुनिया भी कम है। बचा भी कम ही था- खेतों की मेड़ मिट्टी तक बहा ले गया था पानी। होंस में आसमान की ओर पत्तों के कान किए खड़ी फसल लोटकर धरती से चिपक गई थी। आदमी के आध से तो गई ही, पत्तियों व तनों पर लदोर की ऐसी रेत चढ़ी कि चौपाए भी मुंह न डाले। सुबह पसलियां चमकाते खूंटे से छोड़े जाते और दिनभर भटक-भटक कर शाम को दांत किर्राते लौट आते।
अंगूरी कल से ही मढ़ा की माटी हटाने में लग गई थी। सबसे पहले उसने कुठीला खोला। बच्चे दो दिन से मांगे के चावल और करील की टेंटी वाले साग के सहारे पेट भर रहे थे। गाय के थन भी सूखे थे कि दूध का ही आसरा होता। बछड़ा बां-बां रंभाकर जी हलकान किए रहता। आज एक बकौटा ज्वार के पत्ते धोकर उसके सामने डाले थे तब चुप हुआ। बच्चों के चूसे हुए आम से चेहरे देख करेजे में हूक उठ आती है... उनके लिए रोटी जरूरी है पर सील और ऊपर के बोझ से कुठीला भी तिरक गया। जतन से रखे गेहूं भीगकर फूल उठे औार चने अंखुआ उठे थे। सभी को धूप की जरूरत था और धूप निकली तो ऐसी चिलचिला कि पखेरू भी पनाह मांगें।
नीचे कीचड़ ऊपर घाम। हवा ने सांस साधी तो फावड़े मारते ही उबकाई के साथ कलेजा बाहर आने को मचल उठे। पर उपाय भी तो नहीं कुछ। जीते-मरते सामान को खोद निकालना ही था। संझा तक देह भर आई थी... पोर-पोर में वो टूटन जैसे नसों से लहू निचुरकर बह गया हो। हड्डियों में चीटियां रेंगने लगी थीं...। लगे जुटे पहर रात चढ़े खटिया पर देह सीधी कर पाई है अंगूरी।
अब मन हो रहा है कि कोई हड्डियों को कूट मरोड़ रख दे तो चैन आए। यह कोई वाला सवाल ढाई साल से उसके सिर पर टंगा है। जबसे उसका पति पन्ना यानी पन्नालाल महते याने गांव का गम्मतिया, रामलीला का कलाकार, नेता हाकिम के कायदे की बात करने वाला गरीब गुरबा के सुख-दुख में शामिल होकर भी अपने घर-बार को रमकर पोसने वाला अचानक चला गया.. तब से आज तक वह तय नहीं कर पाई कि उसकी जगह किसे दे? दूसरा आदमी बनाना, उसकी बिरादरी में मनाही नहीं है..। जानती है कि उसकी देह में वह चमक है कि अच्छे खाते-पीते और खाए-पिए विधुर ही नहीं, उससे कम उम्र वाले भी नेह-गेह जोडऩे तैयार हैं... पर जाने क्यों, वह अपने आपको तैयार नहीं पाती... गो कि मन जाने कैसे-कैसे, किधर-किधर दौड़ता, भटकता है। देह कभी-कभी बेकाबू होती लगती है। बांटने की चाह में राई सी कसक पहाड़ हो जाती है। किसी सांत्वना के सपने में बार-बार डूबती उतरती है वह।
खरहरी खाट पर लेटी अंगूरी आसमान के नीचे चूनर में बेतरतीब टंके चंदा तारों में उलझ गई। बरसात के बाद आसमानी चीजें धुल-पुंछकर साफ हो गई थीं। चांद और उसके बीच हवा की घाटियों में बीते समय के साए कांप रहे थे... खपरैल पर स्मृतियों की कोंध जग रही थी... कोई धुंधली सी आकृति अनजाने और पहचाने से अनेक रूप धरती हुई जमीन, आसमान के बीच दौड़ लगा रही थी। अंगूरी का अस्तित्व इस माह में घिर गया कि दौड़ती-भागती छायाकृति उसके निकट आकर पच्चीस की उमर को इसी क्षण पर रोक-बांध दे।
खपरैल के आगे कहीं से कुत्ता आकर रोने लगा था। क्वांर लगने को है- इन दिनों कुकुर जाति की धमा-चौकड़ी रहती है- यह अकेला पड़ गया होगा। दोनों बच्चों की ओर उसने निगाह फेरी। वे बगल की खाट पर निश्चिंत सो रहे थे- अंगूरी ने भीगे गेहूं चने उबालकर, कच्ची प्याज में नमक-मिर्च की बुरकनी के साथ खिला दिए थे। बड़ा स्वाद आया था बच्चों को। वह अपने एकांत में मुस्कुराई- स्वाद पकवान में नहीं भूख में होता है।
खपरैल के कोने पर छाया सी लहराई... कुत्ता रोना छोड़ गुर्राने लगा था। अंगूरी ने सतर्क हो सिरहाने का हंसिया टटोला। यह उसका औजार भी है और अस्त्र भी। गांव भर में प्रसिद्ध है उसका हंसिया। खांड़़े की धारा-सा तेज। फसल काटते समय कांसे सा बजता है। दिनभर में घास का ढेर लग जाता है। साग-सब्जी चीरता है.... जरूरत पड़े तो गले पर भी चल सकता है। ...गहने की तरह संभाल के रखती है उसे।
हंसिया ले वह दबे पांव चारों कोने झांकी और आश्वस्त हो अपनी जगह आ गई- कुत्ते ने भी फिर से रोना शुरू कर दिया था।
पिछली साल इन्हीं दिनों दिन मुंदे घास लेकर लौट रही थी कि लीक पर भगवान लाल ने छेंक लिया- ''बोझ भारी है अंगूरी! कहे तो थोड़ा सहारा मैं दे दूं?ÓÓ
छिन भर के लिए अंगूरी के रोंगटे खड़े हो गए। दिन भर निराई में लगी रही। द्वार पर भूखी बंधी गाय के लिए चारा जरूरी था सो कुबेला चली आई हार में। तभी तक लिया होगा नासपीटे ने। इसकी बेशर्मी के बहुत से किस्से सुन रखे हैं उसने। हाड़-गोड़ तुड़वा चुका है... कोतवाली की हवा खाई है... लोग द्वार पर बैठाते अनखते हैं। पर कुचलन से बाज नहीं आता। बियाह हुआ नहीं। लठैत भाई खेती-बारी करते हैं, खुद भैंसे चराता है। दूध-घी मचोरकर गांव में सांड की नाई सन्नाता फिरता है।
भगवान लाल बगल में आ पहुंचा था। हालांकि खूब अंधेरा धमक आया था फिर भी कोई देख ले तो हिचंदी के परेवा बनाकर उडऩे लगेंगी। शताब्दी अगर दूध भी पिए तो लोग दारू से ही समझते हैं।
''मेरी बात पै हां, ना नहीं की अंगूरी!ÓÓ
अब उसे बोलना पड़ा- ''सुनो महाराज! रिश्ते में जेठ लगते हो हमारे इसलिए बस इतना ही जानो कि आगे कबहूं  गैल न काटना हमारी।ÓÓ
अंगूरी का हाथ आप से आप हंसिया के बेंठ पर कस गया। उसका आत्मविश्वास लौटने लगा गो कि भगवान लाल के हाथ में भी तेल से चिकनी पोरपसार लाठी थी।
''अरे तू तो गुस्सा गई। जोर जबरदस्ती थोरेई कर रये हैं। करें, तो को रोक लेगा? बोल! हम तो चाहत हैं, कभूं-कभार सत्संग। गंगा किरिया करवाये ले कि काहू को कुछ पता चले। कहे तो तेरी बाल बच्चों समेत जिम्मेदारी लेंय।ÓÓ
स्वर में भरसक मिठास और मुलायमी भर उसने आगे जोड़ा- ''चलन है चलूं सीधी तिराहे घरें...?ÓÓ
''हें हे... मजाक करती हैंÓÓ -भगवान लाल ने दांत चिपोरे।
''मजाक काये की। अपने घरें डर लगे तो मेरी बाखर में आय रहो, जमीन-जायदाद के संग।ÓÓ
''होय सकत। खान-पियन नहीं कर सकता।ÓÓ
''अच्छा देखेंगे- पहले मन तो मिले।ÓÓ कहते भगवान लाल ने हाथ पकड़ लिया।
चिहुंक कर सिर के घास का गड्डा फेंक दिया अंगूरी ने- ''ऐ भगौने! और के धोख़े न रहियो! खस्स कर देऊंगी।ÓÓ उसने हंसिया तान लिया।
तेवर देख भगवान लाल घबरा गया। चोर के पैर कमजोर होते हैं। खांसने भर से भागता है।
हाथ छोड़ खिसिया सा बोला- ''बड़ी सती सावित्री हो रई है।ÓÓ
''नई! अंगूरी हूं और मालूम है कि तू भगवान लाल है। हाथ पांव चलाए तो मार देऊंगी या मर जाऊंगी।ÓÓ-अंगूरी की आवाज ऊंची हो गई।
''चिल्लाय मत! मेरा का है... तेरी ही बदनामी होगी।ÓÓ
''सौगंध है तोय ! असल बाप का होय तो छू के देख अब खसिया बनाय में न  छोड़ा तो अपने बाप के मूत से नहीं।ÓÓ
अंगूरी ललकार उठी।
''देखूंगा तोय।ÓÓ कहता भगवान लाल लीक से हट मेड़ पकड़ गया।
अंगूरी बोझा उठा अस्फुट गालियां बड़बड़ाती हुई तेजी से गांव की ओर बढऩे लगी। संझा बरिया आवाज की फेंक बढ़ जाती है। इन दिनों हर मोहल्ले में मुफ्त में बिजली के डैक सज गए हैं। जो जाने कहां-कहां के गीत चीखते रहते हैं। एक शोर हरदम गांव पर छाया रहता है फिर भी दिसा फरागत वालों ने अंगूरी की आवाज सुन ली है और टोह रास्ते पर खड़े हो थे।
''का हो बहू? को हतो। ये पुजारी कक्का थे जो संझा पूजा से पहिले कुएं पर निपटने-नहाने आते थे।ÓÓ
''मैं अंगुरी... कक्का! जिनावर आ गया था रस्ते में।
''इक्कड़ रहा या झुण्ड? रात बिरात का ध्यान रखा करो बहू।ÓÓ
पुजारी का उपदेश सुनते हुए अंगूरी आगे बढ़ गई। आप बीती सामने किसी को न सुनाई थी पर ऐसी फुसफुसाहटें फैली कि चलते फिरते छैला उससे निगाह बचाने लगे।
कुत्ते के रोने में कुछ और आवाजें मिल गई थीं... श्वास कोरस शुरू हो गया था द्वार पर। कहते हैं कि खर सियार और कुकुर का रोना असगुन होता है पर अंगूरी पर खुद और गांव पर पहले ही इतना घट चुका था कि आगे के लिए कम ही गुंजाइश बची थी। हां अपने बच्चों के बारे में जरूर भय जागा। अनमनी सी खड़ी हुई वह; खपरैल की किंवरिया खोल दो- तीन ढेले ऊपर की ओर मुंह उठाकर सुर साधते कुकुर दल पर उछाल दिए।
कुत्तों को तितर-बितर कर वह फिर आ लेटी। चांदनी पीली पडऩे लगी थी। बादलों के कुछ टुकड़े धुएं के बगुलों की तरह आसमान में उड़ रहे थे जिनके बीच से बीमार चांदनी धरती पर झर रही थी।
अंगूरी का मन मथनिया होने लगा। महीने, पन्द्रह दिन के अंतराल पर रई सी घूमने लगती है और मथने लगती है मन के संग तन को भी। पोर-पोर अचीन्ही पीड़ा से भर जाती है, बेचैनी सम्हाले नहीं संभलती। रात की हरारत में सुबह देर तक शरीर कसकता रहता है।
भरे मन से टहलपात में लगी थी कि चौकीदार आ गया- पंचायत भवन पर इकट्ठे होने की सूचना देते।
''काहे को दद्दू?ÓÓ -अंगूरी ने पूछा।
''राहत बंटेगी। पटवारी आय गए हैं, रात ई। तहसीलदार साब आयबे वारे हैं, स्यात् कलट्टर हू आवे।ÓÓ
''ऐसे में...? गैल खुदी परी है... पुल टूट गई है। मोटर कार दो कोस दूर छोडऩी परेगी।ÓÓ
''पायन चलके आयेंगे वे?...ÓÓ अंगूरी हंस पड़ी।
''पाय न तो का मूंड के बल आएंगे। ऊपर के औडर हैं। चुनाव आय गये... टालमटूल करी तो सरकार हार न जाएगी। खुद ई देखो- रात पटवारी आय गए। महीने मायके रह के बिजली आय गई सेबेरे। बाढ़ के सामने के कंभा उखर गए तो अंजीनियर बगल के जिले होके ले आया है। अब चुनाव को रोज आंख मटकेगी बिजली रानी की तरह। ÓÓ
 चौकीदार जनखा किस्म का है। जनाने हावभाव, जनानी बोलबानी, जनानी खबरें। भीतर घुसते कोई नहीं रोकता उसे। पनिहा सांप में विष नहीं होता- कहीं भी सरकता रहे, कोई खतरा नहीं। जनानियां भी उससे हंस-हंस कर बतियाती हैं।
''आज जल्दी में हूं... आय जाना जरूर। जो मिले सो झटको, फिर तो जो जीतेगा सो राजधानी पहुंच जाएगा और अपुन रह जाएंगे टपटपाता।ÓÓ फिर मुसुका कर बोला- ''बस नेंक पटवारी के मुसकाय देना और तेहसीलदार से नैन-सैन कर देना... रकम बढ़ जाएगी। हां कलट्टर राजा होता है ऊंकी जो मरजी होय...।
''बुढ़ाती बेला तुम और बिगर गये हो रद्दा।ÓÓ अंगुरी ने हंसकर डांटा।
''अरे दुलहनिया! अब का बनबौ बिगरबौ। जे ई है कि- हंसि खेलि बखत कांटे जायगौ- जानें को कितको हटि जाएगौ।... खैर ग्यारा बजे... जरूर।ÓÓ
चौकीदार आगे बढ़ गया। वह अपनी धौ की नकुटिया में घुंघरी पोये रहता है- उसके आते-जाते गैल गली में छन्न-छन्न होती है।
वही उबले दाने बच्चों के पेट तक पहुंचाकर, नहा-धो अंगूरी ठीक समय पर भवन पहुंच गई। कोई कामकाज न होने से इकट्ठा में पूरा गांव जुड़ा था। माथे पर हल्का सा घूंघट ले वह भी एक कोने में सिमटी औरतों में शामिल हो गई। पटवारी कागज-पत्तर की धरा-उठाई पर लगा था। बगल में सरपंच डटा था। अहलकार अभी पहुंचे न थे। हर आने वाला पटवारी सरपंच को रामजुहार करने के बाद अपना नाम बोलता। पटवारी सरपंच की ओर ताकता, सरपंच आसामी की ओर। आसामी सिर हिलाकर किसी समझौते पर सहमति जाहिर करता और फर्द में दर्ज हो जाता। अंगूरी तखत तक नहीं गई थी, उसका काम चौकीदार ने संभाल। सरपंच व पटवारी ने घूंघट के नीचे चमकती अंगूरी का नाक, ओंठ, गर्दन पर निगाह फेरकर उसे दर्ज कर लिया था।
गांव की भीड़ उत्सुकता से कुछ होने की हरकत में कसरत देख, सुन रही थी। क्या होना चाहिए, यह पटवारी लिख रहा था। क्या करना है यह तहसीलदार और कलेक्टर के हाथ था जो अभी तक पहुंचे न थे। कयास लगने लगे थे कि साहबों को खांसी, जुकाम हो सकता है। जरूरी में राजधानी की तरफ दौडऩा, उडऩा पड़ सकता है। नामर्जी हो तो सौ कानूनी बहाने हैं- पर जनता डटी थी। अनुभव ने सिखाया है कि चुनाव आया है तो देर-अबेर सही-उन्हें आना है।
अंगूरी भी कुछ इसी तरह का सोचते, सुनते समय काट रही थी। कुछ दिन पहले बरसते पानी में भी चौकीदार खोयला ओढ़कर आया था। कुछ कर पाने की हैसियत न होने पर भी वह दुख तकलीफ बांटने पहुच जाता है।
हंसते हुए उसने पूछा था- ''बाढ़ और चुनाव संग-संग आय रहे हैं- तू कौन कू चुनेगी?ÓÓ
''इकले वोट से का होना जाना है दद्दा। -अंगूरी की आवाज भारी हुई।
अरे मैं तो ऊ से ई पूछ रहो। चल जान दे!ÓÓ
''दद्दू! चलन तो जाति-बिरादरी के बोट का चल रहा है। हम हू सोई करें- पर हमारी काये की जाति, कौन सी बिरादरी? बस मोहताज मजूर हैं- अपने सो कोऊ दिखाए देय तो दे देंगे वा को। वैसे तो हमें सब नौटंकी वारे लगते हैं। वोट काटबे के टैम आय पहुंचता है, सूरतें बनाय-बनाय कें। सो जितनो टैम वोट के खरचेंगे, बितने में एक गट्टा चारा न काट लेयेंगे।ÓÓ
चौकीदार ने हूंका भरते हुए सिर हिलाया- ''बात तो तौनार की है पर हमरो चारों ही छिन जाय तब?ÓÓ
''तब...?ÓÓ
''हां तब।ÓÓ
''तब हम खाली हंसिया इनके मूंड़ पै दे मारेंगे। हम न रहे तो उनें ऊ न रहन देंगे। -अंगूरी का स्वर साफ और ठोस था।ÓÓ
''हाय राम! तू तो कतल-खून की बानी बोलती है... सीधी धारा तीन सौ दो। अरे चलें भैया- तो से डर लगन लगी है।ÓÓ चौकीदार हंसता हुआ घुंघरू बजाता चला गया था।
अंगूरी का सोच हल्ले से टूटा। आय गये... साहब लोग आय गये। लोग एक-दूसरे के सिर ऊपर से उचक-उचक कर देखने लगे थे जैसे साहब लोग आदमियों से अलग कोई विचित्र चीज हो। सरपंच-पटवारी अगवानी के लिए दौड़ पड़े। वे पैदल यात्रा से पस्त दिख रहे थे। उन्हें तखत पर लाकर बिठा दिया गया और पंखे की दिशा उनकी ओर फेर दी गई। चौकीदार पीछे खड़ा हो हथबिजना डुलाने लगा था। छाती के कुछ बटन खोल साहब रुमालों से पसीना पोंछते हुए फूंक मार रहे थे।
भीड़ की हलचल शांत हो कनफूसी में बदलने लगी थी- ''इन्हीं के हाथ हैं सब काला-पीला करना।ÓÓ
''ऐसा थोरे ई है जनता का राज है। इनके ऊपर भी बैठे हैं लोग।ÓÓ
''होंगे- तू बैठो है ऊपर?ÓÓ
सुनने वाले फिस्स-फिस्स हंस दिये थे। बड़े साहब ने ऊपर नजर घुमाई थी। लोग सिटसिटाल कर अपने में दुबक गए। अंगूरी उसी किनारे बैठी थी। वह भी मुस्काई थी... साहब ने उसे देख लिया था।
कलक्टर साब ने छोटे कलेक्टर को भेज दिया था। जो हों... इनका माथा भी सरकार होने का गौरव से भरा है।
सरपंच ने स्टील के नये गिलासों में पानी पेश किया तो साहब ने टाल दिया। गांव के पानी में प्रदूषण की पूरी संभावना होने से वे अपना पानी साथ लाए थे। अर्दली ने थैले से बोतल निकल कर उन्हें पकड़ा दी थी... वे घूंट-घूंट पानी पीने लगे थे।
''इनको पानी अलग होत है का?ÓÓ -बगल वाली ने अंगूरी से पूछा।
''मोय का मालूम...। उनईं से काये न पूछ लेब!ÓÓ
अंगूरी फिर मुस्कराई, ... साहब ने उसे फिर देखा और तहसीलदार से बुदबुदाये- ''जल्दी निपटाओ।ÓÓ
तहसीलदार ने सरपंच-पंटवारी से खुसुर-फुसर कर नाम छांट लिए और लिस्ट साहब के सामने रख दी।
''इसमें महिला तो कोई नहीं...। उनका प्रतिनिधित्व होना चाहिए।ÓÓ -साहब ने सूची लौटाते हुए एक नजर पुन:अंगूरी पर फेंकी। अंगूरी भी उधर ही देख रही थी... लगा कि साहब के चेहरे में भगवान लाल की आंखें चिपकी है। अचकचा कर उसने अपनी निगाह लौटा ली।
सूची से नाम पुकारा जाता और आसामी कृत कृत्य दिखता हुआ तखत के पास पहुंच दांत निकाल झुक जाता। अंगूठा हस्ताक्षर... रुपए, फोटो वाला वितरणकर्ता साहब के कई फोटो उतारता जाता। यह व्यवस्था तहसीलदार-पटवारी ने की थी। साहब अखबार में अपना फोटो देख संतुष्ट होते हैं।
सूची में अंगूरी का नाम पुकारा गया किन्तु अंगूरी उस भीड़ में कहीं नहीं थी।