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Wednesday 22 Nov 2017

जीवन चोट्टा

महेश अनघ
व्यंजना डी-12-बी,
फेस-2, गार्डन होम्स,
अल्कापुरी,
ग्वालियर-474006
पहले ही बता दूं कि 'चोरÓ का बिगड़ा हुआ रूप है- चोट्टा। मतलब, चोर जब अपने चौर्यधर्म से गिर जाता है तब वह चोट्टा कहलाता है।
अब हम यहां कुल जमा दो ही लोग हैं। जाहिर है, हम दो में से एक ही जीवन चोट्टा है। जब कोई आत्मरक्षा के लिए शत्रु को मार डाले या अपना जीवन सुरक्षित करने के लिए दूसरे की हत्या कर दे, तो उसे जीवन हरण करने वाला चोर या डाकू ही कहा जाएगा। मगर यहां वैसा नहीं, कुछ और तरह का ही हुआ। ठहरिए, पूरी बात बताता हूं-
बात अभी कुछ महिने पहले की है। जब नीम बेहोशी के बाद धीरे-धीरे होश में आया। हालात की हकीकत समझने के बाद, और यह अहसास होने पर कि मैं जीवित हूं, मैंने परिस्थिति की समीक्षा करना आरंभ किया। मेरे आसपास देखने के लिए केवल अंधकार था, लेकिन महसूस करने के लिए बहुत कुछ था। सबसे पहले तो यही कि मेरा दाहिना हाथ किसी पटिया के नीचे दबा हुआ है, शायद खून भी निकल रहा है। दाहिनी जांघ पर चोट लगने से दर्द कसक रहा है। मेरे पैर हिल सकते हैं और दाहिने हाथ को छोड़कर बाकी अंग भी आजाद हैं पर केवल छ: सात इंच तक ही। उसके बाद मैं पत्थरों, सीमेंट, लोहा आदि के मलबे से घिरा हूं। बच कैसे गया, यह एक अजीब संयोग ही है। पूरी स्थिति का पता तो तब लगेगा जब कुछ उजाला हो और मैं अपनी स्थिर अवस्था को देख सकूं। अभी तो मैं बिना हिले-डुले केवल सोच सकता हूं। मैं सोचने लगा-
रात करीब दो बजे मैं ट्रेन से उतरकर ऑटो रिक्शा में सीधा इसी होटल 'मंगलम्Ó में आया था। हमेशा यहीं आता हूं। सरकारी दौरे के सिलसिले में मुझे महीने-दो महीने में इस शहर में आना होता है और मैं हर बार इसी होटल में ठहरता हूं। इस होटल के मैनेजर और कर्मचारियों से मेरी अच्छी दोस्ती हो गई थी, इसलिए किसी भी वक्त पहुंचूं, मेरे लिए इस होटल का कमरा हमेशा खाली मिलता था।
मैं रात ढाई बजे यहां पहुंचा था। रिक्शे से उतरकर अटैची हाथ में ली, बीस रुपए का भुगतान किया और होटल के मुख्य द्वार पर कॉल बैल का बटन दबाया। यहां तक तो सब ठीक। अगले एक मिनिट में किसी ने दरवाजा खोला, टॉर्च जलाकर मुझे देखा, भीतर आने को कहा और काउन्टर के पास पहुँचकर लाइट जलाने के लिए स्विच बोर्ड पर हाथ रखा ही था कि धड़ाम-धड़ धड़ाम की आवाजों से कहर हो गया। जबरदस्त भूकम्प था। न मैं सम्भल पाया और न वह , जिसे मैंने टॉर्च की रोशनी में एक झलक देखा था कि वह कोई नया लड़का है। होटल में रात की ड्यूटी पर रहा होगा- बस, उसके बाद मैं दहशत के मारे चेतनाशून्य होने लगा था। अब पता नहीं कितने बजे होंगे- पता नहीं, भूकम्प ने कितनी तबाही कर दी है- पता नहीं, मेरे ऊपर मंगलम् का कितना मलबा है- पता नहीं, मैं अगला सूर्योदय देख सकूंगा या नहीं।।
और कुछ सोचूं इससे पहले एक व्यवधान हुआ। मेरे बहुत करीब से कराहने की आवाज आयी। यानी, और कोई भी जीवित है। कौन हो सकता है- वही लड़का, रात की ड्यूटी वाला। मैंने अविलम्ब पुकारा- कौन हो भाई, तुम्हारी हालत कैसी है? तुम किस जगह पर हो?
उधर से दर्द में डूबी आवाज आयी - मैं यहां हूं, काउन्टर के अंदर। आप शायद काउन्टर के उस तरफ  हैं। मुझे बहुत दर्द हो रहा है अंकल, कमर के नीचे के हिस्से पर कोई भारी पत्थर रखा हुआ हैं केवल सिर हिला सकता हूँ। कुछ दिखाई नहीं दे रहा। टॉर्च भी जाने कहां छूट गयी। आप कैसे हैं?
उसने मुझे अंकल कहा, तो मैं समझ गया कि वह नई उम्र का लड़का ही है। मैंने उसे अपनी हालत बता दी और अंकल धर्म का पालन करते हुए, उसे धैर्य रखने, हिम्मत से काम लेने और ईश्वर पर भरोसा रख कर प्रतीक्षा करने की सलाह दी। वह कुछ आश्वस्त हुआ। बोला- बहुत जोरदार भूकम्प आया है। मंगलम् की पूरी बिल्डिंग गिर गयी है, लगता है, हमारे ऊपर तो एक ही मंजिल का मलबा गिरा है, बाकी कमरों में सो रहे कस्टमर तो चकनाचूर हो गये होंगे। तीन चार मंजिलें गिरी होंगी। आपको क्या लगता है, अंकल, क्या हम बच जाएंगे?
ऐसा ही सोचना चाहिए- मैंने कहा- सबको पता चल गया होगा। सरकारी अमला हरकत में आया होगा। राहत और बचाव कार्य शुरू होंगे, कोई इधर भी आएगा और हमें मलबे से निकालेगा। तब तक धैर्य और प्रतीक्षा के अलावा हम और क्या कर सकते हैं?
बातचीत कर सकते हैं- उसने सुझाव दिया, हालांकि दर्द बहुत हो रहा है, मुझसे बोला नहीं जा रहा, लेकिन मुझे डर लग रहा है कि ऐसे ही चुपचाप पड़ा रहा तो फिर से बेहोश हो जाऊंगा, या मर जाऊंगा। आप कुछ कहिए अंकल, कहाँ से आये हैं आप?
मैंने अपने बारे में दो चार बातें बता दी, जितनी उसकी समझ के दायरे में थीं। मेरे कामकाज और आभिजात्य जीवन के बारे में वह लड़का क्या समझता? फिर उसने अपने बारे में बताया कि उसका नाम रवि है। जाति नाई, उम्र उन्नीस साल। अभी बीस दिन पहले ही इस होटल में नौकरी पर लगा है। इंटर तक पढ़ा है, इसलिए मैनेजर ने उसे काउन्टर पर नाइट ड्यूटी पर रख लिया था। सौतेली माँ है, बाप नहीं है, यानी एक तरह से अनाथ। लेकिन अपने बल पर जीने की तमन्ना है।
परिचय हो जाने के बाद हम दोनों फिर खामोश हो गये। मैं विचार करने लगा- बचना मुश्किल है। मौत की काली छाया सामने ही मंडरा रही है। मैं यह भी जानता हूं कि भूकम्प का झटका आने के बाद थोड़ी-थोड़ी देर में और भी कई झटके आते हैं। अब यदि दूसरा झटका आया तो मेरे ऊपर लटके हुए पत्थर गिरेंगे और सबकुछ खत्म हो जाएगा। कायदे से अब मुझे ईश्वर का स्मरण कर लेना चाहिए। पर न जाने क्या बात है, कि मुझे ईश्वर याद नहीं आ रहा। परिवार की थोड़ी चिन्ता हो रही है, कि मेेरे बाद मेरा बेटा आजाद हो जाएगा और बुरी संगत में पड़कर बर्बाद हो जाएगा। घर की आर्थिक स्थिति चौपट हो जाएगी। बेटी बहुत रोएगी। अकेली वही तो है जिससे मुझे सचमुच स्नेह है। बाकी तो धर्म और कत्र्तव्य से बंधे रिश्ते हैं। परिवार के अलावा मुझे एक और चिन्ता सता रही है कि मेरी लायब्रेरी में रखे 'गोदानÓ उपन्यास के अंदर मेरे अघोषित रुपये के पते ठिकाने वाली पर्ची रखी है। उसके बारे में परिवार के किसी व्यक्ति को बता नहीं पाया हूँ। इन सबके ऊपर, सबसे बड़ी चिन्ता है - मरने की। मैं अच्छी तरह जानता हूं कि मौत क्या होती है, फिर इस तरह की अकाल मौत? मैं मरने के लिए बिल्कुल तैयार नहीं हूँ। जीवन का मोह मेरे अंदर हलचल मचा रहा है। हाथ में दर्द तो है ही अब तो दिल भी जोरों से धड़क रहा है। पता नहीं, अगले पल क्या होगा। डूबते को तिनके के सहारे की तरह मैंने रवि को पुकारा अब कैसे हो रवि, तकलीफ  ज्यादा हो रही है?
हां- अंकल- वह कराहते हुए बोला- पैर की शायद हड्डी टूट गयी है। पर आप चिन्ता न करें, मैं सह लूंगा।
अच्छा रवि, मेरा एक काम करोगे?
काम? इस समय?
हाँ, अभी कह देना ठीक है, अगले पल का भरोसा नहीं। सुनो, अगर मैं मर जाऊँ और तुम जीवित निकल जाओ तो मेरा यह काम कर देना। यहीं कहीं मेरी अटैची पड़ी होगी। उसमें मेरे घर का पता और फोन नंबर है। सबसे पहले मेरे घर पर फोन करके इस हादसे की सूचना देना, फिर अटेची अपने कब्जे में कर लेना। पुलिस वालों का भरोसा नहीं। कुछ रुपए रखे हैं, तुम ले लेना। फिर हो सके तो मेरे घर चले जाना और मेरी बेटी से कहना कि मैं उसी की याद करता हुआ मरा था। मेरी पत्नी को धीरज दिलाना और कहना कि वह गोदान उपन्यास जरूर पढ़ लें।
-सुन रहे हो न।
-सुन रहा हूं। लेकिन अंकल, आप मरेंगे नहीं।
-क्यों, ऐसा क्यों?
-इसलिए कि आप तजुर्बेकार बुजुर्ग हैं। आपको संकट से बचने के हजारों उपाय मालूम होंगे। पढ़े लिखे होने के कारण आप बहुत सारे तरीके सोच भी सकते हैं।
-सोच तो तुम भी सकते हो।
-मैं तो अंकल, सिर्फ  इतना जानता हूं कि या तो सुबह तक सरकारी बचाव दल आकर मुझे इस मलबे से निकाल लेगा, या फिर उससे पहले मैं चुपचाप मर जाऊंगा। मुझे तो पता भी नहीं कि मरना क्या होता है, फिर सोचना कैसा।
-अच्छा अब यह बताओ कि अगर हम दोनों ही मर गये तो क्या होगा।
-तो क्या। फिर होने के लिए रहा ही क्या। फिर तो जो करना है, बची हुई दुनिया ही करेगी। आपका तो परिवार भी है, मेरे लिए तो कोई रोने वाला नहीं। चिन्ता किस बात की।
-और यदि सौभाग्य से चौथी स्थिति रही, यानी हम दोनों ही बच गये, तो?
-तो सबेरा होने पर सबसे पहले रजिस्टर में आपका नाम, पता और आने का समय दर्ज करूंगा। फिर मैनेजर से छुट्टी लेकर अपनी टांग का इलाज कराने चला जाऊँगा।
-मैं हंस पड़ा। उस भीषण स्थिति में भी रवि की बात पर मुझे हँसी आ गयी।
-तुम क्या सोचते हो, तुम्हारा मैनेजर जीवित बचा होगा? और मुझे देने के लिए मंगलम् का कोई कमरा सुरक्षित रहा होगा? नहीं रवि, तुम कल्पना भी नहीं कर सकते कि कितना बड़ा हादसा हुआ है। जरा अपने आसपास, ऊपर-नीचे टटोल कर देखो, कितना लोहा, पत्थर टूट कर गिरा है।
-कैसे टटोलू अंकल, मेरा तो सिर छोड़कर बाकी सारा शरीर दबा हुआ है।
-ओह हां, मुझे ध्यान नहीं रहा। मैं बाएं हाथ और पैरों से छोड़ा बहुत टटोल सकता हूं। बहुत बड़ा भूकम्प था।
मुझे तो अपनी पीर से पता चल रहा है कि हादसा तो विकट ही था। सच कहूं अंकल, आज से पहले मेरे बदन में कभी जरा सी भी पीर नहीं हुई। आज हुई तो ऐसी कि पूरी ताकत लगाकर भी सहा नहीं जा रहा।
-तब तो यहां से निकलकर तुम्हें सीधे अस्पताल ही जाना पड़ेगा।
-अब यहां से तो सरकार के आदमी ही निकालेंगे। वे ही अस्पताल ले जाएंगे इलाज कराएंगे। दवा दारू का खर्चा भी तो सरकार ही उठाएगी।
-अच्छा, तो तुम्हें सरकार पर इतना भरोसा है।
हाँ जी, है। किसी अनजान आदमी पर भरोसा करने से तो सरकार पर भरोसा करना अच्छा है। सरकार जैसी दिखती है, काली-गोरी, वैसी ही होती भी है। आदमी का क्या भरोसा, जो शकल से राम दिख रहा है, वह करम से रावण निकले।
बच्चा है, मैंने मन ही मन सोचा- सरकार के मुखौटे अभी इसने देखे कहां हैं। फिर मैंने थोड़ा और कुरेदने के लिए, अथवा यो कहूं कि समय काटने के लिए कहा-
-तुम्हें नेताओं और सरकारी अफसरों के भ्रष्टाचार का कुछ पता है? अखबार तो पढ़ते होंगे, चारा घोटाला, यूरिया, बोफोर्स घोटाला, तेलगी घोटाला, सांसद-विधायक रिश्वत कांड के बारे में सुना होगा। और ये अफसर, जो आये दिन तमाम कल्याणकारी योजनाओं का पैसा डकारते रहते हैं, पता है तुम्हें। तुमको शायद विश्वास न हों, कि बाढ़, अकाल, सूखा, महामारी और भूकम्प से मरे-अधमरे लोगों को जो राहत राशि सरकार जारी करती है, उसमें से भी आधी से ज्यादा रकम ये सरकारी अधिकारी और कर्मचारी हड़प जाते हैं। मरने वाला तो चुपचाप मर जाता है, या फिर अपंग होकर जिन्दगी भर घिसटता रहता है। गरीब पर कोई दया नहीं करता, रवि, कोई नहीं। और फिर सरकार क्या है?  एक छाया है। सामने तो आदमी ही आता है, और आदमी है महाभ्रष्ट। जानते हो?
जानता हूं अंकल, पर क्या करूँ। मां-बाप हैं नहीं। भगवान कभी दिखा नहीं, तो सरकार ही तो बची, भरोसा करने के लिए। अब इसी हालत को देखिए, जहां नौकरी करता हूं, उसी मंगलम्  के मलबे में दबा पड़ा हूं। अगर मरा नहीं, तो मुझे कौन बचाएगा- सरकार ही न।  फिर सबसे बड़ी बात तो यह है अंकल, कि हम जैसे गरीब लोगों को चाहिए ही कितना। दो जून रोटी और दो जोड़ी कपड़ा। इसके बदले में हमारा सिर से पाँव तक बदन और चौबीस घंटे का वक्त सेवा में हाजिर रहता है। हम कोई कार-बंगला तो मांगते नहीं, जिसके लिए सरकार से झगड़ा करें। आह... ऊई मां...
-क्यों क्या हुआ। कोई पत्थर गिरा क्या?
-नहीं अंकल। पैर को मोडऩा चाह रहा था, मगर हिलता ही नहीं। कसक रहा है। लगता है, घुटने पर से हड्डी टूट गयी है।
-हिम्मत रखो। अब इस वक्त और क्या हो सकता है। दर्द तो मुझे भी बहुत हो रहा है। मेरा दाहिना हाथ जो फंसा है। मैं ही तुम्हारी मदद करना चाहूं तो कैसे करूं। फिर सहने की शक्ति भी मेरी अपेक्षा तुममें ही ज्यादा होगी। तुम्हारा तो चढ़ता खून है। जबकि मैं अगले महीने तिरपन का हो जाऊंगा-जीवित रहा, तो।
-नहीं अंकल, आप मेरी चिन्ता छोडि़ए। कायदे से मुझे ही आपकी सेवा करना चाहिए। मैं मंगलम् का नौकर हूं और आप मेहमान हैं। फिर आप मेरे बुजुर्ग भी हुए। अच्छा, अभी तो मैं कुछ नहीं कर सकता, मगर वादा करता हूं कि यहां से निकलकर मैं ठीक ठाक रहा तो आपके बदन की मालिश मैं ही करूंगा। बिलकुल मुफ्त। आखिर खवास का बेटा हूं। हजामत और मालिश करना तो माँ के पेट से सीख कर आया हूँ।
-आज तुम्हें माँ की बहुत याद आ रही होगी, क्यों रवि।
वह चुप रहा। फिर मुझे आभास हुआ कि जैसे वह धीरे-धीरे सिसक रहा है। उसके सिसकने में आह-उई-ओह की ध्वनियां भी शामिल हो रही थीं। मुझे उस पर तरस आने लगा। साथ ही इस शहर की प्रशासनिक व्यवस्था पर क्रोध भी आया। यह क्या मजाक है, इधर दो आदमी जिन्दा दफन हुए जा रहे हैं और राहत कर्मचारी चादर तान कर सो रहे होंगे। मंगलम् के ध्वसत होने की खबर प्रशासन को न हो, ऐसा तो संभव ही नहीं। इतनी बड़ी बिल्डिंग गिर गयी कि आसपास के लोग भी हिल गए होंगे। मैं सोच तो गया, मगर तुरंत ख्याल आया, पता नहीं बाहर कैसी स्थिति है। यदि शहर की ज्यादातर बिल्डिंग गिरी होंगी तो छोटे मकान, कच्चे घर तो बचे ही नहीं होंगे। ऐसी स्थिति में प्रशासन भी क्या-क्या करेगा। अब तो सुबह होने पर ही कुछ पता चलेगा, और तभी हम दोनों के जीवन-मरण का निर्णय भी होगा।
रवि की सिसकारियां अचानक रुक गयी। कराहना बंद हो गया। वह एकदम खामोश था। मेरे मन में एक आशंका उभरी, कहीं बेचारा रवि....। मैं भीतर से दहल उठा- हे ईश्वर। रक्षा करना, अब तेरा ही सहारा है- मैंने मन ही मन पुकारा। इस डर का कारण शायद यह भी था कि यदि रवि नहीं रहा, तो इस खण्डहर के तले दबा हुआ मैं तो घबराहट से ही मर जाऊँगा। कैसी भी असहाय हालत में हो, फिर भी रवि का मुझे सहारा है। मैंने आशंकित भाव से एक बार धीमी आवाज में पुकारा-'रविÓ!
कोई उत्तर नहीं आया। मैंने थोड़ी और ऊंची आवाज दी-'रविÓ!
-हां अंकल - वह बोला। मैं आश्वस्त हुआ।
-क्या रो रहे हो?
-हां अंकल, बहुत रोना आ रहा है। कोई एक बार मेरे सिर पर हाथ रख दें, तो मैं फौरन आराम से मर जाऊँ।
-यह क्या कहते हो? हिम्मत से काम लो। मैं भी क्या करूं, मेरा एक हाथ दबा हुआ है और दूसरा हाथ बहुत दूरी पर है। मैं तुम्हें छू भी नहीं सकता। तुम्हारी तकलीफ  मैं समझ रहा हूँ। बस, थोड़ा और इंतजार करो, सुबह होने में अब ज्यादा देर नहीं है। अभी मैं हूं न तुम्हारे साथ, तुम्हारे पिता की तरह। बस जरा सी हिम्मत और बांधे रहा मेरे कहने से। सुन रहे हो न.....
-सुन रहा हूं। आप न होते तो क्या अब तक जिन्दा रहता? बड़े बुजुर्ग इसी काम के तो होते हैं कि वे संकट के समय बच्चों को हिम्मत बंधाते रहे, और नैया पार लग जाए।
-ठीक कहते हो। अच्छा अब ऐसा करो, कोई भजन या फिल्मी गीत याद हो तो धीरे-धीरे गुनगुनाते रहो, वक्त कट जाएगा।
जी अंकल, कोशिश करता हूं- उसने कह तो दिया, मगर मैं जानता था कि इस हालत में वह गाने की सोच भी नहीं सकता। वह फिर खामोश हो गया, और मैं चिन्तामग्न।
नहीं मालूम हमें कितना समय बीता होगा। मौत से संघर्ष करता हुआ आदमी समय की निगरानी कैसे कर सकता है। मेरे जीवन में छोटे-मोटे हादसे और दुर्घटनाएं कई बार हुई है, लेकिन ऐसा हादसा पहली बार हुआ है जिसने मुझे जिन्दगी का मूल्य समझा दिया। अब मैं महसूस कर रहा हूं कि दुनिया की सारी चीजों से, सारे सिद्धांतों से ऊपर है आदमी का वजूद। और सारे अपनों से भी ज्यादा अपना है, अपना खुद का जीवन। दुनिया के सुखों की कीमत उन्हें भोगने के समय होती है मगर जीवन की कीमत होती है, मौत के समय। आज मेरा सारा वैभव, सारी बुद्धि और सारी चतुराई मेरे सामने आंैधी पड़ी है। मैं केवल जीवित रह पाने की जुगाड़ सोच रहा हूँ। आदमी का अध्यात्म इससे अलग और क्या होगा।
अपने आप में डूबा हुआ मैं सोच ही रहा था, कि अचानक एक आशा की किरण दिखाई दी। मेरी खुली आँखों के सामने कुछ धुँधला सा दिखाई दिया। यानी सबेरा हो रहा है, और सुबह का उजाला इस मलबे को पार करके हम तक पहुँच सकता है। इससे ज्यादा खुशी की बात और क्या हो सकती है। अब मैं पूरी आँखें फाड़ कर उसी धुंधले से धब्बे की ओर देखने लगा। ध्यान लगा कर एकटक देखते रहने से अंधेरे में भी कुछ-कुछ दिखाई देता है, जबकि यह तो उजाले की शुरूआत है। सबेरा हो रहा है तो उजाला बढ़ेगा ही।
इस वक्त मेरी सारी सोच गायब हो गई। यहां तक कि मैं यह भी भूल गया कि थोड़ी ही दूर पर एक लड़का दर्द से कराह रहा है। मेरी सारी इन्द्रियां उस धुंधले आकार पर केन्द्रित हो गयी थीं। जल्दी ही उजाला बढऩे लगा। कुछ ही मिनिट बाद मैं अपनी वास्तविक परिस्थिति को देखने में सफल हो गया।
मैंने देखा कि एक टूटा हुआ भीमकाय कंक्रीट का खम्बा ठीक मेरे ऊपर लटका हुआ है। दिशा का सही ज्ञान तो उस समय नहीं था, फिर भी अंदाज से यह मान लें कि मेरा सिर दक्षिण दिशा में और पैर उत्तर में थे, तो यह खम्बा ईशान दिशा से नेऋत्य दिशा की ओर लटका हुआ थ। यह अपने मध्य भाग में एक दूसरे छोटे खम्बे पर टिका हुआ था, और तराजू की डंडी जैसी संतुलित अवस्था में था। इसके दोनों छोर पर लोहे के सरिये झांक रहे थे जिनके बीच में सीमेंट से बंधी हुई ईंटें गुंथी हुई थीं। मेरे दाहिनी ओर टूटा हुआ रिसेप्शन काउन्टर था, उसी के एक पटिये से मेरा हाथ दबा हुआ था। इसके साथ ही, मेरे अगल-बगल एवं ऊपर ढेर सारा मलबा पड़ा हुआ था। ऊपर लटके खम्बे के ईशान भाग की ओर से उजाला आ रहा था, इसका मतलब था कि इसी हिस्से से बाहर निकलने की जगह बनायी जा सकती है। लेकिन इसके लिए खम्बे को थोड़ा हटाना पड़ेगा। खम्बा भारी है और उसका दूसरा सिरा काउन्टर के उस तरफ  लटका हुआ है।
उस तरफ...! अब मुझे ख्याल आया कि उस तरफ  तो रवि है। रवि को वहीं होना चाहिए। हां, मुझे उसके पैर दिख रहे हैं। यानी वह भी उत्तर-दक्षिण में ही लेटा हुआ है। उसका सिर से जांघों तक का हिस्सा मुझे नहीं दिख रहा, क्योंकि बीच में काउन्टर का टूटा हुआ ढेर पड़ा है। सारी स्थिति को समझकर मैंने रवि को पुकारा-
-देखो रवि, उजाला हो गया। अब मैं तुम्हें देख सकता हूँ। मुझे तुम्हारे पैर घुटनों तक दिख रहे है। नंगे पैर है। तुम्हारा रंग साँवला है और तुम हट्टे-कट्टे युवक हो, -ठीक है न...।
हां, अंकल। थोड़ा सिर उठाकर देखने से मुझे भी आपके पैर दिख रहे हैं। आपने काला पेट पहना हुआ है और पैरों में काले ही जूते हैं। काले रंग के अलावा आपके शरीर का कोई भी हिस्सा मुझे नहीं दिख रहा। अब तो खूब उजाला हो गया, अब हम क्या करें, अंकल?
-अभी कुछ नहीं कर सकते। हमें दूसरों की मदद चाहिए। जल्दी ही कुछ लोग इधर आयेंगे। हां, तब तक हम जोर से आवाज लगाकर मदद के लिए पुकार सकते हैं- तैयार हों?
-नहीं अंकल, मुझसे चिल्लाया नहीं जाएगा।
-और मुझे चिल्लाना आता नहीं। तो फिर प्रतीक्षा ही करें।
हम फिर खामोश हो गए। मेरी निगाह पुन: खम्बे के ईशान कोण पर अटक गयी, यह मेरे पैरों के ठीक ऊपर है। यदि मैं अपना एक पैर ऊपर उठाकर खम्बे को धक्का दूं तो वह दूसरी ओर लुढ़क सकता है और इसके हटते ही मुझे बाहर निकलने का रास्ता मिलने की उम्मीद है। लेकिन अरे, यह मैं क्या सोच रहा हूँ। दूसरी ओर तो घायल रवि पड़ा हुआ है। इस खम्बे का दूसरा सिरा- मेरा अनुमान है कि रवि के सिर पर ही लटक रहा होगा। यदि खम्बा जरा भी हिला, तो या तो इस तरफ मेरे पैरों के ऊपर गिरेगा, या फिर उस तरफ  रवि के सिर पर गिरेगा। नहीं, मुझे यह खतरा नहीं उठाना चाहिए।
तो फिर? ऐसे कब तक पड़ा रहूंगा। यदि सहायता के लिए कोई न आया, यदि ऊपर से कुछ और पत्थर मेरे ऊपर गिर पड़े, यदि भूकम्प का दूसरा झटका आ जाए, या डर से मेरा दिल ही बैठ जाए... ऐसे तमाम, 'यदिÓ मेरे भीतर हलचल मचाने लगे - यदि मैं मर गया तो? नहीं, मैं मरना नहीं चाहता। अभी मेरी उम्र ही क्या है। कितनी तो जिम्मेदारियां बाकी पड़ी है। और फिर मौत की भयावहता, वह भी इस हालत में? कहते हैं कि दुर्घटना से और आत्महत्या से मरने वालों की मुक्ति नहीं होती। ऐसे लोगों की आत्मा भटकती है और सैकड़ों वर्षों तक प्रेत योनि भोगनी पड़ती है। कैसा वीभत्स लगता होगा, प्रेत बनकर अपने मरणस्थल पर, या अपने घर में, या मुहल्ले में किसी पेड़ पर लटके रहना, आते जाते लोगों को डराना, उन्हें पकड़कर उनका खून पीना और छटपटाना। शरीर पाने के लिए व्याकुल होकर इधर-उधर भटकना। क्या यह सब मैं करूंगा? नहीं, नहीं, मुझे नहीं मरना है। किसी भी कीमत पर मुझे जीवित रहना होगा। मैं प्रेत बनकर अपनी पत्नी को विधवा वेश में देखना नहीं चाहता। मेरा बेटा नाबालिग है, बेटी अनब्याही है, मैं इन बच्चों को अनाथ नहीं देख सकता। मैं अभी जीवित हँू,अभी मेरे हाथ न सही, पैर तो हिल सकते हैं, फिर मैं क्यों मरूं... क्यों मरूं...।
अचानक, जाने किस आवेश में, जाने क्या हुआ, कि मैंने बाएं हाथ की पूरी ताकत लगा कर दाहिने हाथ पर लदी पटिया हटा दीं तभी मेरा एक पैर ऊपर उठा और पूरे जोर से खम्बे के सिरे पर जा लगा।
फिर एक 'धड़ामÓ की आवाज हुई। धड़ाधड़ कुछ पत्थर गिरे, धूल-मिट्टी गिरी और मुख्य द्वार की ओर से बाहर निकलने का संकरा सा रास्ता खुल गया। तब मैं डूबते 'रविÓ को भूलकर फुर्ती से उगते सूरज की ओर भागा।
बाहर सन्नाटा पसरा हुआ था। मंगलम् के मलबे से कोई आवाज नहीं आ रही थी। थोड़ी दूर पर कुछ हलचल थी, लोग इधर से उधर भाग रहे थे। सरकारी गाडिय़ां दौड़ रही थीं। उसमें कुछ एम्बुलेंस भी थी। दूर से देखने पर पता चल सकता था कि मंगलम् होटल के मुख्य द्वार के ऊपर वाली सिर्फ एक मंजिल ही गिरी थी, बाकी हिस्सा सुरक्षित था।
तीन दिन अस्पताल में उपचार कराने के बाद अब मैं अपने घर पर आराम कर रहा हूं। पुस्तकालय की अलमारी में गोदान उपन्यास सुरक्षित रखा हुआ है, और सरकार सक्रिय है। मंगलम् की बिल्डिंग फिर से बन ही जाएगी, वहां का मैनेजर रात की ड्यूटी के लिए किसी नई उम्र के लड़के को नौकरी पर रख ही लेगा। मैं भी अगले सरकारी दौरे पर फिर उसी शहर में जाऊंगा ही।
लेकिन, उस दिन 'धड़ाम धड़ धड़Ó के बाद फिर क्या हुआ था, वह सब बताने की स्थिति में नहीं हूँ। क्योंकि उस दिन हम दोनों से एक 'आदमीÓ मर गया था। दूसरा जो बच गया था, वह कहलाएगा