Monthly Magzine
Tuesday 21 Nov 2017

कोई भी एक दिन

 

 मधुकर सिंह
धरहरा,
आरा-802301
लगभग साठ पार बाद
पता नहीं कैसे मेरे गद्य के भीतर से
अचानक फूटने लगी है कविता
साठ पार मर जाती है प्रजनन क्षमता
तब क्या कविता भी होती है निर्जीव
कंकाल
हड्डियां
श्मशान!
कविता नहीं रह जाती कोई सवाल
जैसे बंधुआ की खेती
कारखाने से भोंपू की पुकार
कोई हलचल
कोई उत्थान
कोई पतन
तब कविता की भी होती होगी कोई उम्र!
दोनों पहाडिय़ों से नीचे बहुत नीचे जैसे भूतल की अतल गहराई में अनजान उतर आए हैं और हमारी टेढ़ी-तिरछी पहाड़ी सड़क बहुत ऊपर छूट गई हो। दोनों को इसका ध्यान भी नहीं रह गया था, यहां तो पहाड़ी पेड़-पौधों और झुरमुटों जैसी कोई सरसराहट भी नहीं थी, मगर वैसे जड़ सन्नाटा भी कहीं से भयानक भी नहीं था; क्योंकि दोनों अभी तक एक-दूसरे के भीतर ही चल रहे थे।
सामने बिखरी मुर्दो के टीलों जैसी ऊबड़-खाबड़ एक बस्ती थी, जो शहर, कस्बा और कोई गांव भी नहीं थी। कहीं किसी आदमी जन्तु की गंध भी नहीं थी। हम आनंद के लिए एक पत्थर के टीले पर बैठे तो सांझ ओझल होने लगी थी।
''मैं इसी एकांतिकता का एहसास करना चाहती थी।ÓÓ मैं उसे अपनी भुजाओं में समाने लगा था और वह आसन की टहनियों की तरह खामोश थी।
''इस विशाल आसन वृक्ष को झांक रही हो, इसी की हॉकी स्टीक बनती है।ÓÓ
वह मेरे भीतर पसर गई थी, एकदम निस्पदन्द। ''परन्तु ये आदिवासी समाज के देवता हैं- आसन देवा। पता नहीं, प्रकृति के इस अनन्त में जाने कितने इनकी देवी-देवता हैं।ÓÓ
''यही तो इस समाज की विशेषता है। ये मूलत: संस्कृतिवासी हैं, जो हम नहीं हैं।ÓÓ मैं कर कुछ रहा था, सोच कुछ और रहा था। स्त्री-पुरुष की स्थिति इसी तरह की प्राकृतिक और उन्मुक्त होती है और मनुष्य तभी इस स्थिति से अलग होता है जब कोई उम्र, कोई रिश्ता जंजीर की तरह खडख़ड़ाने लगता है। मेरे और उसके बीच उम्र का फासला मामूली नहीं था, यही कोई साठ और पच्चीस से कम का नहीं था। परंतु मैंने पूछा तो वह बेहद खुश और आनंदित थी। मैं किसी ग्रंथ के उस श्लोक को याद कर अपने को संतुष्ट पाता हूं कि सदाचरण् का लाभ, जबकि उसके फल अनिश्चित हैं? उसकी इंद्रियों पर पडऩे वाले उसके अनाहूत प्रभावों से मुझे बेहद उल्लास मिला। नहीं पता, मेरी क्रियाओं से विक्षोभ या घृणा हुई या नहीं। क्योंकि वह अपनी खिलखिलाहट से पूरे सन्नाटे को तोड़ती हुई पूछने लगी, ''रात अचानक उतरने लगी है। अब तो नदी, पहाड़, पेड़, तल, अतल, सब कुछ बराबर लगने लगी है। हम डाक बंगला पहुंचेंगे कैसे?ÓÓ
''रातभर अगर इसी बस्ती की किसी झोपड़ी में गुजार लें, तो तुम्हें कोई एतराज है?ÓÓ
वह फिर से उन्मुक्त खिलखिलाई, ''मुझे क्या? मुझे तो हर तरह के मनुष्य के साथ जीने का अनुभव पाना है। उसमें आप भी एक मनुष्य हैं। चलिए, जहां इच्छा हो।ÓÓ उसने मेरी एक बांह पकड़ ली।
मेरी अतृप्त आकांक्षा को सहलाती जैसी लगी वह। ''कभी-कभी मनुष्य की अनिच्छा भी इच्छा बन जाती है और दो समान्तर पहाड़ भी मिलन-स्थल बन जाते हैं। वर्ना, कहां आप वर्षों से वनवासी, कहां मैं अपने प्रोजेक्ट के सिलसिले में वन में अचानक घुस आई। आपने डाक बंगले में शरण दी। इसे तो सहज संयोग ही कहूंगी।ÓÓ
बातूनी लड़की लगी वह। एक झोपड़ी के अंदर झांका तो कोई ढिबरी भी नहीं जली थी। मगर खडख़ड़ाहट हुई। एक छाया उठी और ढिबरी जला दी। उसने दोनों हाथ जोड़े, जैसे पहले से हमें जानता हो। संभवत: उसने मुझे कई बार देखा भी हो। स्वीकृति में उसका सिर ऊपर से नीचे हिल रहा था, जिसका मतलब था कि वह मुझे अच्छी तरह जानता है।
''हम रात भर के लिए आपके पास रहना चाहते हैं।ÓÓ मैं बोला वह अंदर से खाट ले आया और बाहर रख दी। मैंने ढिबरी बुझा दी और दोनों खाट पर निढाल धंस गए।
''रोशनी की क्या जरूरत है? फौरन चांद निकलने वाला है, उधर देखो, कुलबुला रहा है, रातभर बड़ा मजा आएगा।ÓÓ
''रोशनी में सांप-बिच्छू का डर नहीं होता?ÓÓ
''निश्चिंत रहो, जंगली सांप-बिच्छू निर्दोष को कभी नहीं काटते, दोस्ती कर लेते हैं।ÓÓ
मगर लड़की शहरी थी। डरी हुई थी। ''लेकिन रात बहुत बाकी है अभी।ÓÓ
''मुझसे ऊब रही होÓÓ उससे ज्य़ादा मैं रोमांटिक हो रहा था।
''आपकी आकांक्षाओं से घबरा रही हूं।ÓÓ लड़की बोली। देर तक किसी शेर के दहाडऩे की प्रतीक्षा करती रही वह। मगर एक बिल्ली की म्याऊं भी नहीं सुनी उसने। कम अचरज की बात नहीं थी उसके लिए। जंगल का मतलब उसके लिए किताब का भूगोल, इतिहास था। मैंने पूछा, ''तुमने जंगल में कभी शेर देखा?ÓÓ
वह सिहरती हुई मुझसे चिपक गई, ''नहीं। कभी नहीं। सिर्फ सर्कस छोड़कर।ÓÓ
''पहले पहल सर्कस में देखकर बहुत डरी थी?ÓÓ
''बहुत डरी थी। तब मैं दस साल की थी।ÓÓ
मैं उसकी क्लास लेने लगा। ''सर्कस में तुम्हें कौन ज्यादा क्रूर लगा- शेर या वह रिंग मास्टर?ÓÓ
''क्या मतलब?ÓÓ
''तुम्हें नहीं मालूम कि लोग कैसी निर्दयता से बाघ, शेर, चीता, हाथी को पकड़कर ले जाते हैं। पिंजड़े में बंद शेर को देखकर तुम्हें कभी दया आई?ÓÓ
''अब आ रही है।ÓÓ
''मगर जंगल में तुम्हें उनके साथ प्यार आएगा। उनके साथ तुम्हें दोस्ती करने की इच्छा होगी। सर्कस में लड़की हाथ में चाबुक लेकर शेर की सवारी करती है। मगर तुम मेरे साथ कुछ दिन और रह जाओ तो शेर स्वयं तुम्हें अपनी पीठ पर बिठाकर पूरा जंगल घुमाएगा।ÓÓ
लड़की फिर मुक्त होने लगी थी, ''इसी तरह की मुझे और भी जंगल की कहानियां सुनाइए। मेरी नींद उचट गई है।ÓÓ
चांद हमारे ऊपर खिल गया था।
''प्रकृति मनुष्य को जीवंत बनाती है।ÓÓ लड़की बोली।
''जीवन्त या अमर?ÓÓ
''दोनों एक ही शब्द हैं।ÓÓ
वह उठकर बैठ गई।
''क्या विचार है?ÓÓ मैंने पूछा।
''और अंदर तक धंसे?ÓÓ
''कहां?ÓÓ
''जंगल में।ÓÓ
''कितनी दूर?ÓÓ
''जितनी दूर हम हिम्मत कर सकें।ÓÓ
वह खाट से मेरा हाथ पकड़े-पकड़े खड़ी हो गई थी।
''चलिए न?ÓÓ
''चलो।ÓÓ
वह निडर हो गई। बेधड़क। जंगल की गुमनाम लड़की जैसी।
मुझे बेमतलब लग रहा था जंगल-जंगल इस तरह घूमना। वह भी रात में। जिस प्रकार रात का आखिरी पहर आलस्य भरा होता है, उसी प्रकार उस लड़की के लिए स्फूर्तिदायिनी थी। वनवासी अपने-अपने धंधों के लिए शुरू हो चुके थे। औरतें नदी में कलरव के बीच से घड़ों में पानी भर-भर लौट रही थीं। अंधेरा हल्का-हल्का सफेदी में बदलने लगा था। पक्षी वृक्षों के घोंसले छोडऩे लगे थे। सुदूर से वनवासिनियों के स्वर हमें रह-रहकर छूने लगे थे।
सोनेरो रूप रूपेरो रूप
सोनेरो रूप लेका गातेय मेनाम
गातेय दिस भरे सोना मुन्दोम, गातये दूइहर जिवीदांलो कातिआ
''क्या सोचती हो? मैंने पूछा।ÓÓ
''डाक बंगला लौटना चाहिए अब।ÓÓ
''थक गई हो।ÓÓ
''मत पूछिए।ÓÓ
वह बदन उमेठने लगी। उसके जोड़़ों से हल्की आवाज हुई।
हम लौटे तो उसी खाट पर बैठ गए।
रात वाला आदमी संभवत: हमारी प्रतीक्षा में था। वह झटके से बाहर निकला। उसके हाथों में अंजुरी भर फूल थे।
''क्या है यह?ÓÓ मैंने जानकर भी पूछा।
''जंगली फूल। आपकी बेटी के लिए।ÓÓ
हम तनिक भी नहीं दुखे। साथ-साथ सरल मन से हंसे।