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Saturday 18 Nov 2017

बाबा


हृदयेश
136/2, बक्सरिया,
शाहजहांपुर 242001
गुजरा हुआ वक्त हमको चीजों व लोगों से फासले पर ले जाकर खड़ा कर देता है और तब हम उनके बारे में तटस्थ बनकर बयान कर सकते हैं। फालतू व $गैर जरूरी को छोड़ते हुए। मुझे लगता है कि मैं अपने बाबा के बारे में अब ज्यादा सही ढंग से बता सकता हूं। कुछ चरित्र ऐसे होते हैं कि उनको केन्द्र में रखकर कुछ कहना एक कहानी सुनाने जैसा ही होता है।
अधिक उम्र के साथ जिन लोगों की दिमागी ताकत शिथिल होने लगती है और जो उचित-अनुचित, शोभनीय-अशोभनीय की निर्णय-बुद्धि खो बैठते हैं, उनमें एक मेरे बाबा भी हैं, मेरे पापा की अपने बाबूजी के बारे में ऐसी राय थी। बाबा सत्तर की सीढ़ी पार कर चुके थे। पापा बात-बात पर उनको लेकर कहा करते थे कि वह सठिया गए हैं, उनकी अक्ल मारी गई है और वह जो भी काम करेंगे, निराले ही होंगे। बात यह थी कि कई वर्षों से बाबा ने अपने में कुछ गंदी आदतें डाल ली थीं जो जब-तब घर वालों की झुंझलाहट का कारण बन जाया करती थीं। गुड़ से उन्हें इधर कुछ ऐसा प्रेम हो गया था कि वह दाल में भी उसका प्रयोग करने लगे थे। साफ कपड़े रखे रहते थे, पर वह बदलते नहीं थे, गंदे कपड़ों को ही तन से चिपकाए रहते थे। दिन भर उनका दंतहीन पोपला मुंह बूढ़ी बकरी की तरह जुगाली करता रहता था जो देखने में अति हास्यास्पद लगता था। घर की पुरानी चीजो , यहां तक कि इस्तेमाल के अयोग्य पुराने बर्तनों और कागज-पत्रों के बारे में कान में यह भनक पड़ते ही कि वे जुदा किए जा रहे हैं, वह उन्हें समेटकर अपने कमरे में रख लेते थे कि कोई कैसे भी, उन्हें वहां से निकलवा नहीं सकता था।
बाबा ने इसीलिए जब कबूतर का एक जोड़ा पाला तो घर वालों को कोई आश्चर्य नहीं हुआ था, बल्कि उन्होंने इसे उनका एक नया $खब्त माना था। पापा की जैसी कि आदत थी बाबा के इस नए $खब्त पर भी झुंझलाए थे। बढ़ी झुंझलाहट में वह बाबा से कुछ कहते-सुनते भी यदि मम्मी समझा-बुझाकर उनको रोक न देतीं। मम्मी का कहना था कि कहा-सुना उस शख्स में जाए जिस पर कुछ असर हो। बाबा परले दर्जे के जिद्दी है। करेंगे अपने मन की ही। उन्हें जग-हंसाई तक का ख्य़ाल नहीं।
ऐसा नहीं था कि बाबा को अपने प्रति घर वालों की नाराजगी और तिरस्कार की भावना का अहसास न हो। लेकिन चूंकि बाबा के मुंह पर कोई कुछ कहता नहीं था, पीठ पीछे, अपने कमरों में या अलग भले ही बड़बड़ा-भुनभुना लेता हो, इसलिए बाबा खामोश ही रहते थे। बाबा जिद्दी के साथ-साथ क्रोधी भी बहुत थे। उम्र बढऩे पर ये अवगुण घटने की बजाय बढ़े ही थे। गुस्सा होने पर बाबा कभी-कभी इतने जोर से ची$खते थे कि पूरा मोहल्ला गूंज जाता था। वह और भी कोई बखेड़ा खड़ा कर देते थे। गुस्सा भड़काने वाला बाबा का यह रौद्र रूप देखकर मैं अपने हथियार डाल देना ही अक्लमंदी समझता था। बाबा ने अपने कमरा बिलकुल अलग रखा था, जहां वह उठते-बैठते, खाते-पीते और सोते थे।
जिस दिन कबूतर आए थे, बाबा ने उसी दिन बढ़ई बुलाकर एक नई काबुक बनवा ली थी। यों पेंशन उनकी ज्यादा बनी थी, पर उसका एक खासा हिस्सा उन्होंने तब बेच दिया था जब पापा की शादी हुई थी और उनकी नई-नई वकालत थी। लेकिन बची हुई पेंशन भी बाबा के जेब-खर्च के लिए काफी थी। अब पापा की प्रेक्टिस बुरी नहीं चलती थी। इसलिए उन्हें बाबा के पेंशन के रुपयों से छेड़छाड़ करने की कतई जरूरत नहीं थी।
कबूतर का जो जोड़ा बाबा लाए थे, वह कोई खास नस्ल का नहीं था। कबूतरों का रंग काई लगी दीवार जैसा था। गोला यानी जंगली कबूतर और उनमें $फर्क बस इतना था कि इनकी आंखें हलकी काली थी जबकि गोला की सुर्ख होती हैं। बाबा ने आते ही उनके पर काट दिए थे। पर काटते हुए बाबा का हाथ कांप जाता था और कैंची हाथ से फिसलती थी। उनके चेहरे और सफेदी से धुंधलाई आंखों से लगता था कि पर काटने में वह कोई विवशता अनुभव कर रहे हैं।
बाबा का यह नया $खब्त उनका कुछ अधिक वक्त लेने लगा था। वह घंटों काबुक के पास बैठे रहते और कबूतरों का दाना चुगना देखते थे या उनका गर्दन फुलाकर गुटरूं-गूं करना सुनते थे। जब तक कबूतर बाहर रहते वह बराबर पास ही बने रहते थे। पर कट जाने से कबूतर उडऩे में असमर्थ हो गए थे और किसी भी समय बंदर या बिल्ली-कुत्ते द्वारा सहज ही नोंचे जा सकते थे। हम भाई-बहन, जो तब न बहुत छोटे थे न बहुत सयाने ही, अक्सर बाबा के इन क्रियाकलापों को छिपकर देखते थे और $िफर मजा लेते हुए मम्मी-पापा को उनकी रिपोर्ट देते थे। कभी-कभी मम्मी-पापा हंसते थे। कभी-कभी वे गुस्साते और बड़बड़ाते भी थे। मम्मी और पापा ने उनके इस नए $खब्त के प्रति अपना विरोध प्रकट करने के लिए कबूतरों का सारा का सारा काम बाबा पर डाल दिया था। कबूतरों की बीट बाबा ही साफ करते थे। वही उन्हें खोलते और बंद करते थे और वही रात के समय काबुक पर दो भारी गुम्मे रखते थे ताकि खोलने वाली पटरियां आसानी से न निकल सके।
मैं सोचता हूं कि बाबा अगर नौकर समले से वह सब काम करने को कहते तो समले शायद इनकार नहीं कर पाता और पापा-मम्मी बस बड़बड़ा भुनभुनाकर ही रह जाते। पर बाबा ने खुद ही यह पसंद नहीं किया था कि कबूतरों का काम उनके बजाय कोई और करे।
बाबा घर से बहुत कम निकला करते थे। अधिकतर वह ऊपर के अपने कमरे में ही बने रहते थे और घंटा-दो घंटे के लिए शाम को नीचे उतरकर बाहर लगी फुलवारी में आ जाते थे और वहां कुर्सी डलवाकर हुक्के का कश खींचा करते थे। बाबा का सारा का सारा वक्त बस हुक्का पीने, खांसने, बलगम थूकने या एक खाते में कुछ हिसाब लिखने या पुराना सामान इधर से उधर रखने या खोलने में ही बीतता था। लेकिन अब बाबा अक्सर बाहर भी निकलने लगे थे। सप्ताह में कम-से-कम एक बार वह बाजार अवश्य जाते थे। वह सीधे हाथ में एक मोटी छड़ी पकड़ लेते और बाएँ हाथ में झोला, जो कभी दादी ने धोती की किनारी जोड़कर सिला था। दादी को मरे पन्द्रह साल हो चुके थे, पर वह झोला बाबा के पास अब भी सुरक्षित था। बाबा इस झोले में कबूतरों के लिए दाना लाते थे।
एक दिन दाना शायद काफी गंदा था। बाबा उसे कमरे में रखी पुरानी टीन की ट्रे में फैलाकर बीनने लगे थे। मेरी छोटी बहन रेखा, जो किवाड़ के पीछे से झांक रही थी, मुझे और मेरे छोटे भाई को पढऩे की मेज से खींच ले गई थी कि चलो एक बढिय़ा तमाशा दिखाएं। बाबा की निगाह कम पड़ती थी। वह हाथ से टटोल-टटोलकर कंकड़ी ढूंढते थे और झुंझलाकर दूर फेंक देते थे। उनका टटोला बड़ा हास्यास्पद होता था। वह ट्रे से अपना चेहरा बिलकुल सटा लेते थे। रेखा की जब हंसी रोके न रुकी, वह अंदर कमरे में चली गई और हम लोगों को भी खींच ले गई। बाबा हमें देखते ही शरमा गए और कुछ क्षणों के लिए उनकी कान की लबें लाल हो गई।
'दाना गंदा हैÓ वह किसी बूढ़े बंदर की तरह आंखें कुचकुचाने लगे।
'बाबा, कबूतर खुद ही बीन लेंगे। दाना दाना चुग लेंगे और कंकड़ छोड़ देंगे।Ó रेखा हंसी दबाती हुई बोली। बाबा की फैली झुर्रियां कस गईं जैसे उन्हें रेखा का यों बहस करना अच्छा नहीं लगा था। वह उछाले गए सवाल को बचा गए, देखो, कितने बड़े-बड़े कंकड़ हैं। उनकी चुटकी में कंकड़ का एक बड़ा टुकड़़ा आ गया था।
बाबा को दाना बीनते छोड़कर फिर हम चले आए थे। ेरेखा काफी देर तक बाबा की विभिन्न मुद्राओं की नकल करती रही थी।
चंद ही दिनों बाद नौकर समले न जाने कहां से चीना कबूतर का एक जोड़ा ले आया और बाबा से बोला, ''इन्हें पालिएगा?ÓÓ
कबूतर का वह जोड़ा बहुत खूबसूरत था। कबूतर दुधिया रंग के थे और जगह-जगह उन पर भूरी चित्तियां पड़ी हुई थीं, बनी हुई किसी उम्दा डिजाइन की तरह। चोंच के पास हरे रंग के भी कुछ रोएं थे। चलते-फिरते खिलौने जैसे वे दिखते थे। रेखा गेंद सी कूदती हुई बोली थी, 'बाबा, इन्हें ंजरूर पालिए।Ó
बाबा समले से काफी देर तक पूछते रहे थे कि वह उन्हें कहां से लाया है किस नस्ल के हैं और ऐसी ही दूसरी तमाम बातें। हाथ में लेकर वह काफी देर तक उन्हें देखते भी रहे थे।
लेकिन इन कबूतरों ने पुराने कबूतरों से लडऩा शुरू कर दिया। बाहर निकलते ही वे काले कबूतरों को चोंच से मारते, उनके पर नोंचते। वे डरकर काबुक के अंदर दुबक जाते या कोनों-अंतरों में छिपने की जगह खोजते।
''नहीं, लड़ते नहीं नेकदिलों। मिलजुलकर रहो और दाना चुगो। हुश हुश! फिर लड़े? नहीं माने? पानी भी नहीं पीने दोगे? शैतानों, इस जोड़े ने तुम्हारा क्या बिगाड़ा है? ये भी तुम्हारे भाई-बिरादर हैं।ÓÓ
बाबा दहलीज पर बैठे-बैठे झिड़के। लेकिन वे कबूतर परले दर्जे के ढीठ थे और झिडऩा कान नहीं देते। तीसरे दिन बाबा ने नए कबूतरों को वापस कर दिया, ''ये लड़ाकू बहुत हैं।ÓÓ
कबूतरों को आए हुए एक पखवाड़ा गुजरा होगा कि उन्होंने अंडे दिए। पहले एक, फिर एक दिन के अंतराल से एक और। बाबा के चेहरे की सिलवटें उन दिनों फैल-फैल जाती थी। वह दाना अब काबुक के पास ही डालने लगे थे ताकि कबूतर और कबूतरी को अंडों से दूर न जाना पड़े।
बाबा को इस बात में काफी रस मिलता था कि कबूतर-कबूतरी ड्यूटी बांधकर अंडे सेते हैं। ऊपर के खाने से कबूतर आकर कबूतरी को निकालता और दो-एक घंटे सेता रहेगा। फिर कबूतरी आकर चोंच के ठेंगे से इशारा कर कबूतर को निकाल देगी और खुद सेने लगेगी। चोंच के ठेंगों से ही उनकी परस्पर जरूरी बातचीत भी हो जाती थी। बाबा के कमरे के आगे थोड़ा-सा खुला सहन था। बाबा ने काबुक वहीं एक कोने में रख छोड़ी थी। रात में वह काबुक के ऊपर दो गुम्मे रखना भूलते नहीं थे। एक रात न जाने वह बंदर था या बिलौटा कि उसने काबुक खोलने की कोशिश में काबुक उलट दी। आवाज सुनकर बाबा हड़बड़ाते हुए बाहर आ गए। काबुक मुहाने के बल गिरी थी। कबूतर बड़ी जोर से गुटरूं-गूं गुटरूं-गूं कर चीखने लगे थे। बाबा ने कांपते हाथों से काबुक सीधी की, बड़बड़ाते हुए उसे अंदर खींच लाए और दीवार से सटाकर उसे रख दी। वहीं पास ही उनकी खाट पड़ती थी। काबुक गिरने से कबूतरों के कोई चोट नहीं आई थी, लेकिन अंडे बेकार हो गए थे। अंडों के फूट जाने से बाबा को न जाने कितनी तकलीफ हुई थी। कई दिनों तक उनके चेहरे पर मनहूसियत का साया थक्के बन लिथड़ा रहा था। उस दिन से बाबा काबुक कमरे के अंदर रखने लगे थे। कमरे में थूक, बलगम, राख तथा दूसरी अलाय-बलाय चीजों की गंदगी वैसे ही रहती थी अब बीट की भी रहने लगी।
मम्मी एक दिन अंदर झांककर बड़बड़ाई थी, 'कुत्ता-बिल्ली, मुर्गा-मुर्गी और पाल लें। गंदगी में जो कसर रह गई है, वह पूरी हो जाएगी। बुढ़ापा सब पर आता है, पर इनकी तरह मत किसी की नहीं हर लेता है।Ó कबूतरों के कटे हुए पर निकल रहे थे। वे फुदकने लगे थे। दाना चुगकर अक्सर वे बाबा की जांघों, कंधों और सर पर बैठ जाते। बाबा तब उन्हें झिड़कते, 'उतरो, उतरो शैतानों। पंजे गड़ते हैं। उतरो। ज्यादा खिजाया नहीं करते। नहीं माने?Ó बाबा फिर उन्हें हौले से पकड़कर उतार देते, लेकिन वे फिर फुदक कर बैठ जाते।
हम भाई-बहन कबूतरों की ढिठाई में उतना रस नहीं लेते जितना बाबा की झिड़कियों में। कबूतरों को भी ऐसे डांटते हैं जैसे वे बच्चे हों और डांट को समझते हों। बाबा नादान हैं कि हम लोग।
तीसरे सप्ताह कबूतरों ने फिर दो अंडे दिए। बाबा इस बार पुलिस जैसी सतर्कता बरतने लगे। जरा सी भी आहट होती, उनके कान खड़े हो जाते। वह चारों ओर निगाह दौड़ाते कि कहीं कोई काबुक के निकट जा तो नहीं रहा है। रात को वह अपनी खाट काबुक से और भी सटाकर डालने लगे थे। वे अंडे वाले खाने में झांकते और फिर हिसाब लगाते कि कितना समय हो गया है, फूटने में कितनी देर है और किस अंडे से नर निकलेगा और किससे मादा।
बीसवें दिन जब अंडे एक-एक करके फूटे तो बाबा को न जाने कितनी खुशी हुई। उनका चेहरा जैसे हंस रहा था और अंगों से उत्साह चुआ पड़ता था। पापा ने अपने कमरे में मम्मी से मजाक किया था, ''बाबूजी के असली पोता-पोती अब हुए हैं।ÓÓ हम लोगों को इस मजाक में काफी मजा आया था।
रेखा ने बच्चों को देखना चाहा। बाबा ने मना किया कि अभी बहुत छोटे हैं। पर जब रेखा ने ज्यादा इसरार किया, बाबा ने काबुक खोल दिया।
बच्चे, जो मांस के लोथड़े जैसे थे, कबूतरी के परों के नीचे छिपे थे और रेखा को दीख नहीं रहे थे। रेखा ने जब कबूतरी को परे हटाने के लिए हाथ बढ़ाया तो बाबा ने हाथ झिंझोड़ दिया, ''कहीं ऐसे देखा जाता है?ÓÓ
हाथ झिंझोड़ दिए जाने से रेखा खिसियाकर कमरे से बाहर चली गई और उस स्वर में बड़बड़ाने लगी कि बाबा भी सुन लें। पर बाबा पर उसकी बड़बड़ाहट का कोई असर नहीं हुअआ। रेखा भले ही बिगड़े, वह कबूतर के बच्चों की भेंट उसके खिलवाड़ पर थोड़े चढ़वा देंगे।
बाबा अब कबूतर-कबूतरी का बच्चोंं की चोंच से चोंच डालकर हवा भरना, दाना और पानी देना और बच्चों का चें-चें कर अपनी मां से चिपटना देखते और इस देखने में उनको न जाने कितना रस मिलता था।
बच्चों वाले खाने में बीट इकट्ठी होकर सडऩे लगी थी। बाबा ने किसी से सुन रखा था कि बच्चे बीट पर ही पलते हैं। अगर बीट साफ कर दी जाए तो उसके पैर टेढ़े हो जाते हैं। कमरे भर में बदबू फैलती रहती है और बाबा वहीं उठते बैठते, लेटते-सोते थे। बाबा ने बीट तब तक साफ नहीं की जब तक बच्चे बड़े नहीं हो गए।
कबूतरों के पर अब तक पूरी तरह जम आए थे। वे ऊंची उड़ानें भरने लगे थे। बच्चे भी बड़े होकर साथ देने लगे। जब वे आकाश में ऊपर उठ जाते और चक्कर काटते तो बाबा गर्दन उठाकर भौंहों के ऊपर आड़ी हथेली रखकर देखने की कोशिश करते यद्यपि निगाह कमजोर होने के कारण वह देख नहीं सकते थे। जब हममें से कोई बताता कि बाबा कबूतर बिलकुल बादल को छू रहे हैं तो उनका चेहरा खिल जाता और वे जोर से आवाज लगाते आओअ्अ्अ-आओअ्अ्अ-आओअ्अ्अ। कुछ देर बाद कबूतर नीचे उतर आते। बाबा तब उनके आगे दाना छितरा देते और जब वे दाना चुगने लगे, वह नरमी से उन पर हाथ फेरते और जगह-ब-जगह उठ गए रोमों को बैठालते।
बाबा का ममत्व कबूतरों के प्रति बराबर गहराता जाता था। अधिकतर अब वह उनसे उसी लहजे और स्वर में बातचीत करते, जिनमें अपनों से किया जाता है। बाबा को सांस की शिकायत थी। वह रात में प्राय: उठकर खाट पर बैठ जाते, खांसा करते और उखड़ी सांस को शांत किया करते। बाबा का खांसना सुनकर कबतूर अपने दड़बे के खानों में से आवाज लगाते, ''गुटरूं-गूं गुटरूं-गूं। बाबा क्या तकलीफ है?ÓÓ खांसी ठहरने और सांस लौटने पर बाबा बतियाते, 'अरे, मैं तो सांस का रोगी हूं। मेरी नींद तो खराब होगी ही, तुम अपनी क्यों खराब करते हो। चुपचाप सोओ।Ó
'गुंटरू-गूं गुटरूं-गूं। अच्छा बाबा, हम सो रहे हैं, अब आप भी सोइए।Ó कबूतर फिर खामोश हो जाते।
रात में पेशाब के लिए मोरी पर जाते हुए मैंने अक्सर बाबा और कबूतरों का इस तरह का संवाद सुना था। सुनकर बाबा के बढ़ते पागलपन पर कभी-कभी खीज भी उठती थी और कभी-कभी उनके स्नेह-रस में भीग-भीग भी जाता था।
बाबा बाजार से अक्सर अब चावल के कण और गेहूं लाने लगे थे। कण और गेहूं कबूतरों को विशेष प्रिय थे और वे उनका एक-एक दाना चुग डालते थे। बाबा की पेंशन के एक बड़े हिस्से पर अब कबूतर काबिज हो गए थे।
दो अंडे और हुए, फिर दो बच्चे। फिर दो अंडे और, और दो बच्चे फिर।
पापा खीझे थे- देखना कुछ दिनों में घर भर में बस कबूतर ही कबतूर और उनकी बीट नजर आएगी।
लेकिन बाबा कबूतरों की बढ़ोतरी से वैसे ही प्रसन्न थे जैसे कोई अपनी वंशबेलि फलते-फूलते देखकर होता है। वह हमें बताते कि देखा दो के चार हुए, चार के आठ, आठ के सोलह होंगे, सोलह के बत्तीस...। वह संख्या को द्विगुणित कर इतना बढ़ाते जाते कि रेखा का मुंह आश्चर्य से फैल जाता- 'बाबा, इतने सारे।Ó
बाबा की ओंठ की कोरों पर मुस्कराहट उभर आती- 'मैंने एक-एक जगह पांच-पांच सौ कबूतर देखे हैं।Ó
किन्तु बाबा की प्रसन्नता की इस धूप पर जल्द ही एक काली बदली घिर आई। किसी की समझ में न आया कि वह कैसे हो गया। सुबह जब बाबा ने काबुक खोला तो सबसे पुराना वाला कबूतर मरा निकला। फिर कुछ देर बाद उसी खाने में रहने वाली कबूतरी भी बाहर आकर मर गई। समले का कहना था कि अक्सर कबूतरों को ऐसी बीमारी हो जाती है या यह भी होता है कि उन्हें सांप सूंघ जाता है।
बाबा दोनों कबूतर लिए काफी देर तक गम की प्रतिमा बने बैठे रहे। उनके चेहरे की सिलवटें बहुत पास-पास खिंच  आई थी और आंखों से पीड़ा जैसे टपकी पड़ रही थी। हम सब बाबा के गिर्द सिमट आए थे। बाबा का दुख हमारे हृदयों को मथ रहा था और हम साहस न जुटा पा रहे थे कि बाबा से कुछ कहें।
बाबा कबूतरों को लिए हुए ऊपर कमरे से नीचे उतर आए। फिर डगमगाते कदमों से बगीची में आ गए। एक खुले स्थान पर आकर वह रुक गए। हम सब पीछे-पीछे थे। हमारी समझ में नहीं आ रहा था कि बाबा क्या करेंगे। हमें उनके इरादे का तभी भान हुआ जब उन्होंने समले से खुरपी लाने को कहा। फिर खुरपी लेकर वह गड्ढा खोदने लगे।
'लाइए, मैं खोद दूं।Ó समले को भी बाबा का दुख मथ रहा था।
लेकिन बाबा ने गर्दन हिला दी और खुद ही गड्ढा खोदते रहे। ऊपर सूरज चमक रहा था। उसकी किरणें सीधी पड़ रही थी। बाबा का चेहरा सुर्ख पड़ता जा रहा था और पसीने की बूंदें चेहरे से होती हुई गर्दन को भिगो रही थीं। पर बाबा कांपते हाथों से गड्ढा खोदते रहे। उनके ओंठ जैसे सिल गए थे या उनकी बोलने की शक्ति जाती रही थी। वह बिना मुंह से एक शब्द निकाले गड्ढा खोदते रहे। दूसरा भी खुद जाने पर उन्होंने कबूतर और कबूतरी को अलग-अलग गड्ढों में रख दिया और पिर धीरे-धीरे उन पर मिट्टी डाल दी। वहां ऐसी गंभीरता और दुख की छाया मंडराती रही, जैसी श्मशान भूमि में मंडराया करती है।
मम्मी ने रोज की तरह दोपहर में बाबा का खाना कमरे में भिजवाया, मगर बाबा ने लौटा दिया- आज भूख नहीं है।
दूसरे दिन भी बाबा उन गड्ढों के पास गए और जब उन्होंने वहां दो गुलाब की कलमें रोप दीं, तो मुझे लगा कि बाबा ने बड़ा ही भावुक, नाजुक और दर्द भरा हृदय पाया है। आज सोचता हूं कि कवि न होते, हुए भी उनके पास एक कवि का मन था। मैं बड़ी देर तक सोचता रहा था कि बाबा के हृदय में कलमें रोपने की भावना कैसे उठी। कहां से इसके लिए उन्होंने प्रेरणा पाई।
अब बाबा के लिए एक नया कार्य यह भी हो गया कि सुबह-शाम वह ऊपर कमरे से उतरकर अपने हाथों से उन दोनों कलमों को पानी दें। उनके कमरे की एक खिड़की बगीची की ओर खुलती थी और बाबा उस खिड़की से उन पौधों की निगरानी किया करते थे। वैसे उन्होंने उनके चारों ओर झिंझरीदार एक घेरा खड़ा कर दिया था। आठ के छह रह गए कबूतर तीन महीने में ही बढ़कर दस हो गए। कलमों में भी फूल आ गए थे, गहरे सुर्ख रंग के रेशमी। मेरे छोटे भाई कैलाश ने एक दिन फूल को तोडऩा चाहा था। बाबा जो उस समय खिड़की पर थे, उसका इरादा भांपकर जोर से चीखे- ''कैलाश फूल में हाथ न लगाना।ÓÓ उनकी चीख में इतनी कड़क मैंने पहली बार पाई थी। बाबा खुद फूलों को तोड़ते नहीं थे। जब कभी भी वह उन्हें छूते थे तो इतने आहिस्ते से कि एक पंखुड़ी भी न टूटने पाए। पानी देकर वह पौधों के करीब कुछ देर के लिए खड़े हो जाते थे। हवा के झोंके से जब पौधे सिहरते थे तो बाबा की आंखों में एक चमक पैदा हो जाती थी। ऐसा लगता था कि उन्हें अहसास हो रहा है कि कबूतर का वह जोड़ा उनसे कुछ कह रहा है। वैसे बाकी बचे कबूतरों को वह वैसे ही कंधों और सर से उतारते थे, झिड़कते थे, उडऩे पर 'आओअ्अ्अ्-आओअ्अ्अ्Ó की आवाज लगाकर वापस बुलाते थे और रात में गुंटरू-गूं करने पर उनसे सो जाने के लिए कहते थे।
सर्दी आने पर बाबा की दमे की शिकायत बढ़ जाती थी। अक्सर हाथ पैरों में सूजन आ जाती थी। उस साल ये शिकायतें और बढ़ गई। ज्यों-ज्यों सर्दी बढ़ती जाती थी त्यों-त्यों ये शिकायतें उग्र रूप धारण करती जाती थी। उस बार हाथ-पैरों के साथ-साथ उनका सारा चेहरा भी सूज गया था। सीने में बलगम भी काफी जमा हो गया था और सांस के साथ घर्र-घर्र कर बजता था। पर यह किसी ने भी नहीं सोचा था कि बाबा का अंतिम समय आ गया है, सो भी इतना निकट। शाम तक बोलते रहने वाले बाबा ने रात के दस बजे चोला छोड़ दिया। खांसी के साथ सांस कुछ ऐसी उमड़ी कि फिर वापस आई नहीं।
हम लोग बाबा को नीचे आंगन में ले आए। सुबह मोहल्ले वाले, आस-पड़ोसी उन्हें देखने आएंगे और लाश वहां से उठेगी।
सबेरा होते ही मुझे कबूतरों को याद आ गई। बाबा बहुत तड़के ही काबुक खोलकर दाना-पानी दिया करते थे। उनका कहना था कि पंछियों के दाना-पानी का यही समय होता है। बीमारी की हालत में भी वह उन्हें समय पर अपने हाथों से दाना-पानी देते रहे थे।
मैंने काबुक खोली तो कबूतर बाहर आ गए। लेकिन दाना छितराने पर किसी ने चुगा नहीं, इधर-उधर भरमाए से डोलते रहे। वे बार-बार गर्दन उठाकर मेरी ओर देखते थे, जैसे पूछ रहे हों कि तुम्हारे बाबा कहां है? कुछ ही देर बाद वे आकर सहन की मुंडेर पर बैठ गए। जब उन्होंने नीचे आंगन में बाबा को लेटे देखा, जिनका चेहरे खोल रखा गया था, तो वे सबके सब नीचे उतर गए और बाबा के चक्कर लगाते हुए गुंटरू-गूं की भाषा में पूछने लगे। 'बाबा जागोगे नहीं?Ó पशु-पक्षी मृत और जीवित, जड़ और चेतन को शायद जल्द ही चीन्ह लेते हैं। वे शीघ्र ही आगे-पीछे चारों ओर गुटरूं-गूं कर विलाप करने लगे। उनका स्वर करुण, भीगा और कुछ अमूल्य खो जाने वाला जैसा था।
मैं आश्चर्यचकित, भाव विमूढि़त खड़ा वह सब देख रहा था। पक्षी और मानव में स्नेह बंधन इतने दृढ़ भी हो सकते हैं, मेरी समझ में नहीं आ रहा था न बुद्धि इसको सहज ग्रहण कर रही थी कि पक्षी इतने संवेदनशील भी हो सकते हैं। किन्तु सब कुछ मेरी आंखों के सामने था। मैं घरवालों को बुला लाया। बाहर वालों का अभी आना शुरू नहीं हुआ था। वह दृश्य कुछ इतना करुण और छूने वाला था कि पापा, मम्मी, कैलाश, रेखा समले सभी की आंखें गील हो गई थी।
कबूतर कुछ देर बाद वहां से उड़कर मुंडेर पर बैठ गए, पिर मुंडेर से उड़कर ऊंची अटारी पर। दाना छितरा अनचुगा पड़ा रहा।
जब श्मशान-भूमि से लौटे, अटारी से उड़कर कबूतर न जाने कहां जा चुके थे। एक बार भ्रम हुआ कि वे बहुत ऊंचाई पर चक्कर काट रहे हैं। बाबा की तरह मैंने 'आओअ्अ्अ्-आओअ्अ्अ्Ó की आवाज लगाई, पर व्यर्थ। कबूतरों को न लौटना था, न वे लौटे ही।
कभी-कभी सामने उभरकर आने वाला सत्य इतना रहस्यमय और आश्चर्यजनक होता है कि यदि हम उसके साक्षी न बने होते तो हमारा हृदय कभी उस पर विश्वास न करता। बाबा को स्वर्गगामी हुई अभी दस दिन ही हुए थे कि गुलाब के वे दोनों पौधे सूखने लगे थे। बावजूद खाद और पानी देते रहने के वे हरियाए नहीं और काले पड़कर मर गए।