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Tuesday 21 Nov 2017

जान बी उर्फ रणछोड़ की ठकुरायत


गिरिराज किशोर
11 / 210, सूटरगंज
कानपुर-208001
मरहूम 'ठाकुर रणछोड़ सिंहÓ की ठकुरायत अब लगभग अब हर खूंट में फैल चुकी है। ठाकुर की ठकुरायत कब फैलनी शुरू हुई उसका कोई ज्य़ादा लंबा इतिहास नहीं। होगा कोई डेढ़ सौ, दो सौ वर्ष का। या दस-बीस-पचास साल ऊपर-नीचे का। उनके परदादा या छड़दादा का नाम ही जी रणछोड़ सिंह था। वे शिकारी थे। लोग तो कहते हैं लुटेरे भी थे। जहां पता चलता लूट तगड़ी मिलेगी बस वहीं जा पहुंचते। घर-बार बढ़ रहा था, धरती और धन कम पड़ रहा था। उधर उनके यहां शिकार मिलना बंद हो गया था। रोटी की किसको रूरत नहीं होती, चाहे कोई रणछोड़ सिंह हो या रण-जीत सिंह। तो वे अपने चंद लुटेरे साथियों के साथ बारास्ता जमीन घोड़ों पर सवार होकर इस खित्ते में पहुंचे थे। कुछ नाव और डोंगियों से भी आए। तब तो यह इलाका जंगली लोगों की बस्ती थी। कई-कई कोस पर दीया जलता था। शिकार की बहुतायत थी। चाहे इनका करो या उनका। इनके पास असलाह भी ऐसे थे कि वे किसी भी खूंखार से खूंखार जानवर का शिकार बड़ी आसानी से कर सकते थे। जानवरों का भी उन खतरनाक हथियारों से कभी साबका नहीं पड़ा था। इसलिए बचाव के तरीके से अभी अनजान थे। ऐसे टपकते थे जैसे ढेले मात्र से पके फल टपक जाते हैं। सारी जंगली बस्तियों में हड़कम्प मच गया था। उन्हें अपनी भाषा में वे देवदूत मान बैठे थे। मनुष्य जमीनी चीजों से डरकर भी नहीं डरता। ओपरे दरख्त से भी हौल खा जाता है। जहां हौल खाई, वहीं हिम्मत छूटी। छितरी बस्ती और हारी हिम्मत ने उन जंगलियों के औसान बिगाड़ दिए। वे उन लोगों को बांधते और गुलाम बना लेते। रणछोड़ सिंह को सपने में ख्याल नहीं था कि उसे ऐसी दुनिया मिल जाएगी जहां आदमियों की जगह गुलामों की दुनिया होगी। हालांकि उनके शरीर लोहे के थे, अगर एक बार हाथ उठा दें तो दस-बीस को ढाह दें। उनकी हिम्मत को रणछोड़ सिंह की चालाकी और उनके असलहों की धमक चाट गई थी। वे एक हांक से रस्सी की तरह बंंधे चले आते थे।
उन्हीं रणछोड़ सिंह के वंशज आज भी थे, जो रणछोड़ के बांक से जाने जाते थे। विलियम रणछोड़, जार्ज रणछोड़ वगैरह-वगैरह। इन रणछोड़ों के बुजुर्गों ने तो शायद ही कभी रणछोड़ा हो। उनके लिए तो वह मौत होती, पर उनकी संतान रण छोडऩे को स्ट्रेटेजी की संज्ञा देती थी। लडऩे जाते, तोड़-फोड़़ करते, और भाग आते। आजकल गद्दी पर पांचवीं-छठी पीढ़ी के जान बी रणछोड़ थे। वे सबको अपनी अड़दप में लिए थे। उनके बाप-दादों ने तो जो लूटमार की थी सो की ही थी। इन्होंने उसे सर्वसम्मत लूटमार का दर्जा दे दिया था। लोगों के हन में बैठा दिया था कि उनके नुस्खे से सारा जहां उनकी तरह अमीर और खुशहाल हो जाएगा। माल हम बेचेंगे तुम खरीदोगे। तुम बेचोगे हम खरीदेंगे। दोनों हालात में शर्तें हमारी होंगी। यही तुम भी करो। इसका नतीजा यह हुआ कि गरीब लोगों ने इस लालच में कि वे भी जान बी की तरह अमीर हो जाएंगे, अपनी जमा जोखिम भी निकालकर बा•ाार के घाट उतारनी शुरू कर दी थी। जो बनाया था वह सब भी जमा बढ़ाने के लालच में बेच रहे थे। जिनके पास कुछ था उनकी बात तो अलग थी, पर जो ठन-ठन गोपाल थे, वे क्या तो बेचें और क्या खरीदें। जो बेच रहे थे वे भी निरपेक्ष थे और जो खरीद रहे थे उनके तो क्या कहने।
एक और मुसीबत थी, जान बी रणछोड़ इतना हावी हो गया था कि सबको उस खरीद-फरोख्त में हिस्सा लेना पडऩा था और विज्ञापित अनगिनत आइटमों की सूची में से कुछ न कुछ खरीदना होता था। उसका कहना था उसी स्थिति में तुम समृद्धि का पहुंचा छू पाओगे। जो नहीं मान रहे थे जान बी रणछोड़ अपने कुत्तों को हुश कर देता था। वे सामना करते थे तो उनकी और डंडा-डोली करता था। एक-आध जगह ऐसा भी हुआ उसने अपनी सारी ताकत लगा दी, पर वे इतने बड़े गुरिल्ला निकले कि मुंह की खाकर लौटना पड़ा। कभी-कभी वह लोककथा वाले भेडि़ए की तरह भी व्यवहार करता था। बदला लेने या अपनी जमात में मिलाने के लिए वह किसी मेमने सरीखे आदमी को पकड़ लेता था और उससे कहता था तुमने मेरी इज्जत पर कीचड़ उछाली।
वह कहता कि ''सरकार मैं तो आपको जानता भी नहीं।ÓÓ
''तू मुझे नहीं जानता, तू मेरे सामने ही मेरी बेइज्जती कर रहा है। दुनिया में ऐसा कौन है जो मुझे और मेरी ताकत को जानता-समझता नहीं। अब तेरी $खैर नहीं।ÓÓ
वह गिड़गिड़ाता जान बी शर्तें रखता। वह नहीं मानता तो पंचायत में ले जाकर अपने पिट्ठुओं से खिंचाई कराता और उसे अलग-थलग करके उसका तरह-तरह उत्पीडऩ करता और कराता भी। यहां तक कि बच्चे भूखों मरने लगते। रोगार  में आग जाती। उत्पादन बंद हो जाता।
पता नहीं उसके बड़े रणछोड़ भी यही करते थे या उनमें कुछ दया-माया थी। सुनने में तो यही आया है कि उन्होंने जंगली लोगों का दमन आर्यों से भी ज्यादा किया था। बाद में उनके 19वीं सदी के अवतार आर्य वंश शिरोमणि हिटलर ने दूसरे धर्म मानने वालों का किया। उनके कंकाल लाखों की तादाद में मिले।
अब हम तो वहां थे नहीं, इसलिए यह कहना संभव नहीं किसने किसका दमन किया। पर रणछोड़ों की इस पीढ़ी को देकर यह जरूर लगता है कि तब तबाह करने के ढंग अब से ज्यादा क्रूर रहे होंगे। अब ज्यादा सभ्य और राजनीति सम्मत हो गए हैं। तब युद्ध होते थे। अपनी बहबूदी के लिए दुश्मन का नाश न्यायोचित समझा जाता था। अब कोई किसी का दुश्मन नहीं। सब समान हंै। समानों में कुछ ज्यादा समान हैं। वे समानता बनाए रखने की जिम्मेदारी अपने कंधों पर संभाले रखते हैं। वे तय करते हैं कौन किस पर अत्याचार करता है। वह मानव विरोधी व्यवहार को दंडित करने के लिए अपने आदमियों को लैस करके पहले उनसे कान उमेठवाते हैं। अगर इतने के बाद भी वह नहीं मानता तो जन बच्चा कोल्हू में पिलवा देते हैं। आर्थिक प्रतिबंधों से खतरनाक जन बच्चा कोल्हू और क्या होगा। उसके बावजूद वह नहीं मानता तो फतवा जारी कर देते हैं- यह मानव विरोधी है, इसलिए उससे कोई किसी प्रकार का ताल्लुक न रखे। सब उस पर पत्थर फेंके। जो नहीं फेंकेगा वह मानवता का शत्रु और उन दमनकारियों का दोस्त माना जाएगा। यह फतवा और कोई जारी नहीं करता, बल्कि रणछोड़ों का वारिस जान बी रणछोड़ करता है।
उसके बाद तो वे सब भी वही भाषा बोलना चालू कर देते हैं, जो अपने को मानवता का सांस्कृतिक अवतार करार देते नहीं थकते। बल्कि सबसे पहला पत्थर वे ही फेंकते हैं।
एक दुस्साहसी और मानव विरोधी दुर्घटना जान बी के यहां घटी। उसने दुनिया को हिला दिया। जब सबको संभालने की जरूरत पड़े तो दंड देने की जिम्मेदारी अपने सिर पर टोप की तरह पहने था। उनके बारे में माना जाता था कि जब सारी दुनिया डूब जाएगी तब भले ही रणछोड़ों की रियासत पर जबाल आए। करनी ऐसी हुई कि सारी दुनिया साबुतों-सालिम थी और उसका तिजारती केन्द्र, जो सारी दुनिया की नाड़ी थी, और रक्षाई इदारे तहस-नहस हो गए। हर कोई खौफदा हो गया। जब एक आदमी की गुगली पर दुनिया का सबसे मजबूत  विकेट गिर गया तो हमें कौन बचाएगा। जैसे मीन पर कील, जिस पर वह घूमती है, वैसा ही रणछोड़ के द्वारा दुनिया को दिया गया सुरक्षा का वायदा था। उसकी अपनी ही सुरक्षा पर संकट था तो अब कौन बचा था जो बचाता। लोगों को लगा या तो यह आसमानी कहर है या फिर प्रलय का लम्हा आ गया।
उस हादसे के दो दिन बाद तक जान बी रणछोड़ का नहीं पता नहीं था। मीडिया पुरानी पीढ़ी के रणछोड़ों के जमाने में तो कुछ भी नहीं था। वे शिकार खोजते और मीन हड़पने के लिए मारे फिरते थे। अब तो मीडिया का एकछत्र राज्य था। बाजार तक उसके दम पर फल-फूल रहा था। दरअसल अब बाजार धरती से ज्यादा महत्वपूर्ण हो गया था। अगर बाजार पर कब्जा तो सब कुछ अपना।
इस बीच मीडिया बराबर रिपोर्ट कर रहा था कि जान बी रणछोड़ अपना विला खाली करके अंडरग्राउंड हो गए हैं। इस खबर से लोगों के हाथों के तोते उड़ गए थे। जब एक दरोगा की तरह दुनिया की सुरक्षा का जिम्मा लेने वाला अलंबरदार रणछोड़ ही छिप गया तो हमारा क्या होगा। लेकिन दो दिन बाद जान बी रणछोड़ प्रकट हुआ तो उसका अंदाज ही निराला था। लग रहा था शेर मांद में था। अभी निकला है। वह किसी को नहीं छोड़ेगा। भंभोड़ डालेगा।
वह अखबार के हर पृष्ठ पर मौजूद था। हर स्क्रीन पर दहाड़ रहा था-''मनुष्यता के इन दुश्मनों को अगर जड़ से समाप्त न किया गया तो मानवता का खात्मा हो जाएगा। ये रणछोड़ों की अस्मिता पर हमला नहीं यह पूरी दुनिया के अमनपसंद और जनतांत्रिक लोगों को चेतावनी है। आज रणछोड़ रक्षा इदारा क्षतिग्रस्त हुआ, कल आप सबके घरों में यह वबा घुसकर एक-एक को हलाक करेगी। आप हमारे साथ नहीं तो उनके साथ हैं जो इंसानियत के दुश्मन हैं। इंसान के इन दुश्मनों का इस मीन पर कोई काम नहीं। हमें इसका मुकाबला मिलकर करना होगा। अपनी इस दुनिया से इस अमानवीयता को अलविदा कहने के लिए तैयार हो जाओ। वरना तुम्हें अलविदा कह दिया जाएगा।ÓÓ
लोगों ने 'अपनी दुनियाÓ का मतलब तमाम दुनिया समझा। $कबीलों के लोग सज-सजकर जान बी रणछोड़ के साथ एकजुटता दिखाने और अपनी दोस्ती की शपथ खाकर जाानिसारी का य$कीन दिलाने के लिए जाने लगे।
जान बी हर $कबीला ची$फ को गले लगाकर कहता था- ''खुदा न करे, आप पर ऐसी मुसीबत आए, ऐसे में आप हमें अपने बराबर में खड़ा पाएंगे।ÓÓ लोग गदगद। पता नहीं जान बी ने उन्हें क्या दे दिया।
इसी तरह सारा साल गुर गया। लोग अपनी बरबादी स्वयं भोगते रहे। इस बीच जान बी ने हवा अपने पक्ष में बहती देख कई एक $कबीलों की शिनाख़्त की और उनको अपने बदले का शिकार बनाया। जिन कबीलों की दोस्ती का दम भरा था उनमें से एक बहुत बड़े कबीले की पंचायत पर हमला हुआ। वह हमला जान बी के इदारों पर हुए हमले से किसी कद्र कम नहीं थी।
उस हमले के पीछे माना जा रहा था कि जान बी के पिता के जमाने से उनके अनुयायी एक शत्रु कबीले का हाथ है। जान बी, उसके कारिंदे यही कहते रहे कि यह गलत हुआ, हम उसे रोकेंगे। लेकिन जितना हमले के शिकार कबीले के लोग जा-जाकर $फरियाद करते थे और जान बी जितनी जोरदारी से आश्वासन देता था, उतना ही हमलों में इजाफा होता था पर वे मूर्ख जान बी के मुस्कुराकर आश्वासन दे देने मात्र से तब तक फूले-फूले घूमते जब तक फिर बिल्ली की तरह दबे पांव आकर वे अगला हमला नहीं कर देते थे।
बच्चों, औरतों, बूढ़ों, जवानों, पंचायतों और मंदिरों पर लगातार हमले हो रहे थे। लोग परेशान थे। इस बीच कबीले का हर शीर्ष व्यक्ति जान बी के तकिए की जियारत कर आया था और मानता मान आया था। पर हर बात का एक ही जवाब था- ''नहीं हम इस बात से पूरी तरह मुतमईन हैं कि बिना हमले रुके दोनों कबीलों में शांति नहीं हो सकती। हम दूसरे $कबीले पर भी जोर डाल रहे हैं कि वे इस तरह का आक्रमक रुख कतई बंद करे।ÓÓ
इस बात से यह कभी नहीं लगा कि वे अकेले उसी $कबीले को दोषी ठहरा रहे हैं। लेकिन वे थे कि इसी वाक्य को अपनी समर्थक बात मानकर जश्न मनाना शुरू कर देते थे। कभी अपने देशवासियों को भी दुरदरा देते थे। जो हमारे साथ नहीं वह हमारे दुश्मन के साथ हैं, भले ही वे बेचारे दुश्मन का हदुदर्बा भी न जानते हों। यह ठीक वैसी ही बात थी, जो इदारे टूटने पर जान बी ने अपने कबीले के लोगों और दुनिया के दूसरे कबीलों को धमकाने और डराने के लिए कही थी। यह कबीला जान बी के कबीले के लोगों जैसी शक्ल बना पाने और उनके नेताओं की तरह रहने, खाने, कमाने के अलावा उनकी नकल में सब कुछ उसी तरह करने पर उतर आया था। यहां तक की अपना बाजार भी उसी रवायत में ढाल रहा था। उसका नतीजा था कि गरीबों का रास्ता और दुशवार होता जा रहा था। निकलते सूरज की किरणें जैसे पहले आसमान में ही रहती हैं, बाद में जमीन पर उतरती है, वैसे ही उन लोगों की नजरें भी नीचे नहीं उतर रही थीं। बातें जरूर जमीनी सच्चाई की की जा रही थीं।
एक साल बाद फिर वही तारीख आई, जब जान बी रणछोड़ के इदारे टूटे थे तो जान बी ने बरसी मनाने की घोषणा की। इस एक साल में जान बी ने दुश्मन को पकडऩे, मारने, उसका घर बर्बाद करने की हर कोशिश की थी, पर शत्रु के मालूम होने के बावजूद कहीं कुछ नहीं हो पाया था। जान बी लगातार उसके दमन की घोषणा, स्टेशन पर गाडिय़ों की आवाजाही के एनाउन्समेंट की तरह अखबारों और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के माध्यम से कर रहा था।
इस बरसी पर भी उसने वही घोषणा कुछ डरावने ढंग से की- ''हमें मालूम है, हमारा दुश्मन कौन है, हम उसकी तलाश में हैंं।ÓÓ बरसी पर भी दुनिया भर के कबीलों के वे सब प्रमुख मौजूद थे जो इदारों की बर्बादी के मौके पर एकजुटता साबित करने के लिए आए थे। वे सब गुड्डों की तरह सिर हिला रहे थे। उस दिन जान बी ने अपने उन एक-दो पुराने दुश्मनों के नाम भी जोड़ दिए जिनसे वह अपनी पूरी ताकत के साथ जोर आजमाइश कर चुका था और मुंह की खा चुका था। इसी के साथ वह उन्हें भी निबटा देना चाहता था। इसका विरोध दबी जबान से हो रहा था। पर वह बेपरवाह था।
इसी संदर्भ में जिस कबीले की जातीय पंचायत पर पड़ोसी $कबीले ने हमला कराकर उसकी स्वायत्तता को चुनौती दी थी, उसने भी जान बी से कहा कि हम कब तक इंतजार करे, हमें भी कुछ करना होगा। जान बी ने जो संदेश दिया मानवीय भावना से ओतप्रोत था- ''तुम्हारा $कबीला शांति को सर्वोपरि मानता रहा है। उसने सदा धैर्य दिखाया है। तुम ऐसा नहीं करोगे। ऐसा करोगे तो संसार क्या कहेगा।ÓÓ
जब यह सवाल आया कि आप कह चुके हैं कि जहां भी इस तरह की घटनाएं होंगी, वहां आप एकजुट होकर लड़ेंगे तो जान बी ने दार्शनिक अंदाज में कहा- ''हम आपकी स्वायत्तता के लिए भी लड़ रहे हैं। कोई लड़ाई बातचीत के द्वारा लड़ी जाती है, कोई दबाव बनाकर लड़ी जाती है, कोई संसाधनों पर अंकुश लगाकर लड़ी जाती है, कुछ दुश्मन इतने शातिर होते हैं सजा दिए बिना बाज नहीं आते। आपका दुश्मन हमारे ख्याल से शातिर नहीं है। उसे समझाया जा सकता है। वह भी इस लड़ाई में हमारे साथ है। हम जानते हैं हम उसी की मदद से अपने दुश्मन को काबू कर सकते हैं। हम अपने एलची को आपके और उसके पास भेजेंगे। इसका हल बातचीत और सुलह-सफाई से ही निकलना चाहिए, वरना सारी दुनिया एक ऐसे हादसे का शिकार हो जाएगी कि उसे संभालना हमारे लिए भी मुश्किल होगा।ÓÓ
सब सवालों का जवाब एक साथ दे दिया गया था। अब इनके पास एक रास्ता था या तो वे यह कहें कि जो आप अपने दुश्मनों के साथ कर रहे हैं, वह हम क्यों नहीं कर सकते। आपके लिए आपका दुश्मन शातिर और खतरनाक है, हमारे लिए हमारा...। पर उन्होंने ऐसा कुछ नहीं कहा। घर आकर जरूर बयान जारी कर दिया कि हमें अपने सवाल अपने आप सुलझाने होंगे। इसी बीच अगला हमला हो गया। हमेशा की तरह बीसियों लोग हलाक हो गए। उन्होंने जान बी के पास फिर गुहार लगाई- ''इसे रोको, यह हमारे आदमियों को मार रहा हैा। हम इसे मारेंगे।ÓÓ
जान बी के प्रवक्ता ने कहा- ''वह गलत है, अगर वे अपने लोगों को नहीं रोकेेंगे और सीमा पार जाकर दूसरे कबीले पर हमला करते रहेंगे तो क्षेत्र में शांति कायम करना मुश्किल हो जाएगा।ÓÓ इस वक्तव्य से ये लोग संतुष्ट थे कि जान बी ने दुश्मन को फटकार लगाई। दिमाग ठिकाने आ गए। पर उसने भी वक्तव्य जारी कर दिया- ''एकदम झूठ,  इनके अपने लोग हैं, जो हमले कर रहे हैं। वे इनके जुल्मों से बाज आ चुके हैं। नाम हमारा लगाते हैं। हम यह हर्गिज बर्दाश्त नहीं करेंगे।ÓÓ
जान बी की तरफ से एक लाइन का वक्तव्य शाया हुआ- ''दोनों को बातचीत के जरिए अपने मतभेद सुलझाने चाहिए। हम इसके लिए वातावरण तैयार कर रहे हैं।ÓÓ
पंचायत पर हमले की बरसी उसी तरह मनाने का फैसला किया गया, जिस तरह जान बी ने अपने इदारों पर हुए हमले की बरसी मनाई थी। उधर जान बी अपने उन दुश्मनों पर हमले कर रहा था जिनको उसने दोबारा दुश्मनों की सूची में जोड़ा था। उसका नीम विरोध मानवीय आधार पर इनकी तरफ से हुआ था। अगले दिन समाचार पत्रों में छपा कि जान बी ने हमलावर कबीले को दस नायब लड़ाकू विमान बेचे। साथ ही यह भी कहा कि इन विमानों का इस्तेमाल हमारी लड़ाई में हिस्सेदारी कर रहे $कबीलों के खिलाफ नहीं किया जाएगा।
उस दिन एक बच्चे ने अपने पिता से पूछा- ''आप तो कह रहे थे जान बी अब हमारा अच्छा मित्र बन गया है।ÓÓ
पिता ने कहा- ''हां बेटा।ÓÓ
''तो उसने हमारे दुश्मन को विमान क्यों दिए?ÓÓ
''उसने कह दिया है न, कि जो कबीले हमारी लड़ाई में साथ दे रहे हैं उनके खिलाफ उनका इस्तेमाल नहीं किया जाएगा। हम भी उनके साथ हैं।ÓÓ
बच्चे ने पूछा- ''और वे...?ÓÓ
पिता सोचता रहा। जब समझ नहीं आया तो टालने की गरज से बोला- ''पता नहीं...।ÓÓ