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Tuesday 21 Nov 2017

संधि


चन्द्रकिशोर जायसवाल
गुरुद्वारा रोड, महबूब खां टोला,
पूर्णिया-854301
जिसकी पूछ कलासी के हर घर में थी, उसकी किसी एक घर में जरा भी पूछ नहीं, यह बात तो सखीचंद भगत को पहले से ही कचोटती रही थी, मगर जब उसने जाना कि राजनाथ भगत ने गांव के ही कुछ लोगों के सामने उसे 'लुच्चा सखीचन्दÓ कहा है, तो उसका पारा गरम हो गया। गुस्सा तब बढ़ता ही चला जब उसने जान लिया कि उसका नाम गांव में चल पड़ा है और लोग परोक्ष में उसे 'लुच्चा सखीचन्दÓ बोलने लगे हैं। एक दिन किसी बात पर उसने भी कई लोगों के सामने यह घोषणा कर दी कि वह इस अहंकारी राजनाथ भगत को अपनी औकात बता देगा।
घोषणा सुनने वालों में राजनाथ भगत का पड़ोसी महावीर साह भी था। वे दोनों लगभग रोज ही मिलते थे और गांव का हालचाल एक-दूसरे को सुनाते रहते थे। महावीर साह ने सखीचन्द भगत की हुंकार से राजनाथ भगत को अवगत करा दिया।
राजनाथ भगत बिफर उठे, ''यह पिद्दी मुझसे टकराने चला है। मैं चालीस बीघे जमीन का जोतदार और इस कंगला के पास कुल तीन बीघे जमीन। उस पर कंगला दो बेटियों का बाप। अभी तो कंगले को यह चिन्ता करनी थी कि बड़ी बेटी जो ब्याह योग्य हो गई है उसका ब्याह बिना तिलक-दहेज के कैसे होगा। शामत आई है उसकी। मैं चुटकी में मसल दूंगा।ÓÓ
''यह तो मैं जान रहा हूं कि वह पहाड़ को धक्का मारने चला है,ÓÓ महावीर साह ने सुनाया, ''मगर है तो आदमी नंगा, और नंगों से तो परमेश्वर भी डरते हैं। जब इस नंगे ने कसम खा ली है कि वह राजनाथ भगत को चालीस से तीन बीघे पर लाकर छोड़ेगा, तब तो कुछ न कुछ खुराफात तो वह करेगा ही, और आपको उसकी खुराफातों से बचने के लिए सावधान रहना पड़ेगा।ÓÓ
''सावधान तो रहूंगा ही,ÓÓ राजनाथ भगत कुछ सिकुड़े, ''मगर आप भी मेरी कुछ मदद कीजियेगा। वह आपके पास तो बराबर आता ही रहता है। आप टोह लेते रहियेगा कि यह मेरे विरुद्ध कब क्या कदम उठाता है।ÓÓ
महावीर साह ने हंसकर कहा, ''वह तो मैं बिना आपके कहे भी करता।ÓÓ
सखीचन्द भगत सिर्फ बोलकर नहीं रह गया। उसने राजनाथ भगत पर अपना निशाना साध लिया।
सखीचन्द के पास राजनाथ भगत के मुकाबले जगह-जमीन नहीं थी; एक छोटी सी दुकान थी जो अक्सर बंद ही रहती थी, मगर इसके बाद ऐसा बहुत कुछ था कि वह राजनाथ भगत का मुकाबला करने की हिम्मत रख सकता था।
वह लम्बे समय से नेतागिरी कर रहा था और लगभग हर राजनैतिक दल का सक्रिय कार्यकर्ता बन रहा था। नेतागिरी के बल पर उसने इलाके में अच्छा नाम कमा लिया था, ऐसा नाम कि हर गांव के दस-पांच आदमी उसे जानने-पहचानने लगे थे। वह गरीबों-मजदूरों का नेता और किसी भी समय उसे दुखिया गरीबों-मजदूरों से घिरा पाया जा सकता था। गांव वालों ने उसे कितनी ही बार इलाके के नामी नेताओं के अलावे इलाके के नामी चोरों के साथ भी देखा था। हल्ला-हंगामा तो वह किसी के विरुद्ध कभी भी करने-करवाने की ताकत रखता था।
राजनाथ भगत को चित करने के लिए वह अपनी खुटचाल पर उतर आया; दुश्मन के खेत और खेती पर तरह-तरह की चोट करने लगा।
राजनाथ भगत की दो बेटियों के बाद दो बेटे हुए थे। बेटियों के ब्याह हो गए, मगर बेटे अभी भी बच्चे ही थे, बड़ा बेटा अठारह साल का आर छोटा उससे तीन साल छोटा। हालांकि उनके पास खेत-पतार की देखभाल के लिए अनन्दी दास जैसा कड़ा सिपाही था, मगर सखीचंद की खुटचाल के आगे वह भी बेबस हो गया था। पढ़ाई कर रहे बेटों को पहरे पर लगाया नहीं जा सकता था और यह राजनाथ भगत की शान के खिलाफ था कि वे घर-द्वार छोड़कर दिन-रात खेत-पतार को अगोरते रहें।
अब यह लुच्चा भगत कांटा की तरह चुभने लगा था। इस कांटे को काबू नहीं कर पा रहे थे राजनाथ भगत। उसके आगे घुटने तो नहीं टेके जा सकते थे, और लुच्चा चुटकी में आए, तब तो मसलें उसे।
बात खेत-पतार तक ही नहीं रही थी, सखीचन्द भगत ने राजनाथ भगत का जीना हराम कर दिया था।
बगीचे में गाछ कब कटा, यह पता नहीं चला अनन्दी दास को, मगर गाछ की चोरी का पता लगा लिया उसने। वह मालिक से आकर बोला, ''गाछ धनेसर टोला के शंकरवा ने काटा है। उसका बाप मर गया था। लाश जलाने के लिए गाछ काटकर ले गया।ÓÓ
''किससे पूछकर ले गया?ÓÓ मालिक के तलवे में आग लग गई, ''अभी बुलाकर लाइये उसे।ÓÓ
शंकरवा आया और मालिक के सवाल का जवाब दिया, ''बाबू अचानक मर गये। पहले से लकड़ी जमा कर रखी नहीं थी मैंने। लकड़ी के लिए दौड़धूप कर रहा था, तो सखीचन्द बाबू मिल गये और वे मुझे लेकर आपके बगीचे में चले आए; एक सूखा गाछ दिखाया और उसे काट लेने को कहा।ÓÓ
''सखीचन्द बाबू ने कहा।ÓÓ तलवे की आग और ऊपर चढ़ गई, ''कहां का बाबू वह सखीचन्द! लुच्चा-लफंगा के कहने पर मेरा गाछ कटवा लिया, मुझसे पूछा तक नहीं?ÓÓ
''आप गांव में नहीं थे, मालिक।ÓÓ
''अनन्दी दास तो था?ÓÓ
''एक बार उन्हें ढूंढा तो था; वे मिले नहीं।ÓÓ
''नहीं मिला, तो किसी का गाछ काट लोगे?ÓÓ
''किसी का नहीं, किसी और का नहीं काटता,ÓÓ शंकरवा ने जवाब दिया, ''सखीचंद ने कहा कि राजनाथ बाबू दानी-धरमी आदमी हैं; लाश जलाने के लिए बिना उनसे पूछे भी गाछ काट सकते हो। उन्हें तो खुशी ही होगी कि लाश जलाने के लिए एक गाछ का दान किया उन्होंने।ÓÓ
राजनाथ भगत कुछ ठमक गये तो शंकरवा बोल गया, ''मैंने गलत किया, तो एक गाछ का पैसा मैं धीरे-धीरे दे दूंगा, मालिक।ÓÓ
''भागो,ÓÓ गुस्सा उतर गया दानी-धरमी का, ''लाश जलाकर आए हो और अब मैं गाछ का पैसा वसूलूं!ÓÓ
शंकरवा इस तरह भागा कि गांव के गरीब बूढ़ों के चेहरे खिल गए। अब यह चिंता नहीं रही कि बूढ़े को मरने पर बेटा लकड़ी के अभाव में ठीक से लाश जलाएगा भी या नहीं। राजनाथ बाबू दानी-धरमी आदमी हैं। लाश के लिए गाछ फ्री!
कई बूढ़े तो झटपट राजनाथ बाबू को और भी फूलने-फलने का आशीर्वाद देने आ गए।
जाड़ा के घुसते अनन्दी दास ने मालिक को खबर कर दी, ''मैं गिनती करके आ गया हूं। सात बूढ़े ऐसे हैं जो अगला जाड़ा खेप नहीं पाएंगे। किसी एक के घर वाले ने भी अभी से जलावन का कोई बंदोबस्त नहीं कर रखा है।ÓÓ
मालिक ने कुछ सोचकर कहा, ''कोई गाछ सूखा हो तो अभी ही कटवा लीजिए।ÓÓ
''गाछ तो वह भी सूखा नहीं था,ÓÓ अनन्दी ने सुना दिया, ''जिसे शंकरवा काटकर ले गया था।ÓÓ
बगीचे से बाहर आ रहे अनन्दी दास से सखीचन्द की मुलाकात हो गई, तो वह पूछ बैठा, ''बगीचे में आम की मंजरी देखने गए थे, दास जी?ÓÓ
''हां, यही देखने गया था,ÓÓ दास जी ने जवाब दिया, ''इस बार आम की अच्छी फसल होगी। मालिक से कहकर दवा का छिड़काव करवा देता हूं।ÓÓ
''बेकार होगा कुछ खर्च करना,ÓÓ सखीचन्द बोल गया,  ''इस बार आपके मालिक अपने बगीचे के आम नहीं खा पाएंगे।ÓÓ
किसी ज्योतिषी ने बताया है आपको?
''नहीं, समय-काल देखकर ऐसा बोल रहा हूं मैं।ÓÓ
इस सूचना ने राजनाथ भगत की चिन्ता को बढ़ा दी। दो दिनों तक सोच-विचार करते रहने के बाद मालिक ने दासजी से कहा, ''आम की अच्छी फसल आई है, तो इस पर चोर-चुहाड़ों की नजर लगी ही रहेगी। बगीचे की दिन-रात की चौकीदारी आपसे पार नहीं लगेगी। आम की फसल खरीदने के लिए हर साल व्यापारी आते हैं इस इलाके में। मैं किसी व्यापारी के हाथ अपना बगीचा ही बेच देता हूं। हम उससे ही खरीदकर खा लेंगे, मगर खायेंगे अपने बगीचे का आम ही। लुच्चे की बात को हम झूठा साबित कर देंगे।ÓÓ
अनन्दी दास ने अपनी निगरानी और भी तेज कर दी है, मगर तब भी खेत की फसल चरी चली जाती है, कभी इस बहियार के खेत की। यह तक पता नहीं चलता कि किस भैंसवार ने फसल चराई। सखीचंद के पास तो कोई भैंस भी नहीं है कि अपने खेत की बजाय सखीचंद के भैंस पर नजर रखी जाए। रात के बारह बजे आती होगी बगल के किसी गांव की भैंस और दो-ढाई बजे रात तक साफ कर जाती होगी खेत का एक कोना।
मालिक आदेश देते हैं दास जी को, ''आप बहियार में ही मचान बनाइये और रात में ही सोइये।ÓÓ
''किस बहियार में?ÓÓ दास जी पूछ बैठते हैं।
कुछ तो पहले से थे ही, इधर इलाके के कुछ और नामी डकैत जेल से छूटकर आ गए हैं और उन्हें कलासी हाट में सखीचंद के साथ अकेले में बैठते-बतियाते देखा गया है। सखीचंद तो उन डकैतों को झूठ-सच बताता ही होगा कि किस दिन मालिक घर में नहीं है और किस दिन घर में अच्छी-खासी रकम मौजूद है।
महावीर साह पड़ोसी के हित में डकैती की खोज-खबर लेने लगा है। राजनाथ बाबू को सूचित करने में वह जरा भी विलंब नहीं करता। कभी वह शाम में ही आकर खबर कर जाता है, ''आज कलासी हाट में रघुआ की चाय दुकान पर सिरसी के खिरना डकैत को देखा गया है; यहीं तो वह अपने संगी-साथियों के साथ मिलने आया करता है; रात जगकर सोना पड़ेगा।...ÓÓ कभी रात के घुसते ही, ''पक्की खबर है कि मेवालाल के बगीचे में कुछ लोग छिपकर बैठे हुए हैं; अभी और कौन रहेंगे उस बगीचे में सिवा डाकुओं के! सावधान रहना पड़ेगा।ÓÓ ... और कभी आधी रात को, ''लगता है डाकू धावा बालेंगे; मैं पेशाब करने के लिए उठा तो पूरबी बहियार में टॉर्च की रोशनी देखी, जलती-बूझती जलती-बूझती...ÓÓ
रोज रात को जगकर सोने की नौबत आ गई। एक संथाल को बहाल कर लिया गया तीर-धनुष के साथ रातभर जगकर पहरेदारी करने के लिए।
राजनाथ भगत को अब रह-रहकर अफसोस होने लगा था कि बेवजह उन्होंने किसी को लुच्चा बोलकर इल्लत मोल ले ली। मगर जो हो गया सो हो गया; अब यह तो नहीं हो सकता कि वे लुच्चा भगत के घर जाकर सुलह कर लें, ''मुझे माफ कर दो, सखीचन्द; मैं तुम्हारी औकात नहीं जान रहा था।ÓÓ
अपने हेकड़ी बरकरार रखते हुए राजनाथ भगत अपने दिन काट ही रहे थे कि अचानक गंभीर रूप से बीमार पड़े। कलासी के डॉक्टरों ने उन्हें इलाज के लिए पूर्णिया जाने की सलाह दे दी।
ऐसा पहले कभी नहीं हुआ था कि उनकी कोई बीमार कलासी के डॉक्टरों की समझ में नहीं आई हो और उन्होंने इलाज के लिए बाहर जाने की सलाह दी हो। उन्हें पक्का विश्वास हो गया कि बीमारी जानमारू है और वे किसी भी क्षण बाल-बच्चों को बिलखते छोड़ इस दुनिया से विदा हो सकते हैं।
उन्होंने अपने सारे दामादों को खबर कर दी और अपनी पत्नी और बेटा सदानंद को साथ लेकर पूर्णिया भागे। पूर्णिया में इलाज कराते हुए भी उन्होंने मौत को कभी अपने पास से खिसकते नहीं देखा। गंभीर बीमारी के बाद गंभीर चिंता के शिकार हो गए राजनाथ भगत। अपनी मौत की बगल में उन्हें हर क्षण लुच्चा सखीचंद भगत नजर आने लगा। वे जान रहे थे कि इस लुच्चे का इलाज उनके दामादों के पास नहीं है। क्या होगा उनके मरने के बाद? लुच्चे ने कसम खाई थी कि उन्हें बर्बाद करके ही दम लेगा। उनके मरने तक कुछ नहीं कर पाया, मगर मरने के बाद छोड़ देगा क्या? कसम खाई थी लुच्चे ने!
बेटा सदानंद तीन बीघे का जोतदार बनकर जिन्दगी गुजारेगा?
उसके बाद भी...
अब क्या हो?
बीमार राजनाथ भगत का दिमाग तेजी से घूमने लगा। उन्होंने बेटे से कहा, ''घर जाओ और महावीर साह को साथ लेकर आओ।ÓÓ
महावीर साह पूर्णिया से राजनाथ भगत से मिलकर आए, तो अब उन्हें सखीचन्द भगत को साथ लेकर राजनाथ भगत के पास जाना पड़ा था।
महावीर साह ने कलासी आकर सखीचंद भगत से जो कुछ कहा, वह खुशखबरी थी सखीचंद भगत के लिए। महावीर साह को घर पर रोककर वह बाजार से मिठाई ले आया, महावीर साह को मिठाई खिलाई और देर तक खुशी मनाते रहने के बाद उनसे महावीर साह को सुनाया ''ऐसा कुछ बोलना नहीं है कहीं, मगर आपको भी तो ऐसा लग रहा होगा कि राजनाथ भगत झुक गए मेरे सामने?ÓÓ
''हां-हांÓÓ हंसकर जवाब दिया मगर महावीर साह ने, ''लग रहा है, लग रहा है; किसी को भी ऐसा लगेगा। किसी ने भी ऐसा नहीं सोचा होगा कि राजनाथ भगत इस तरह झुक जाएंगे आपके सामने।ÓÓ
''अब इतना झुक गए हैं वे,ÓÓ सखीचन्द भगत ने हंसकर कहा, ''तो मैं भी अपनी कसम तोड़ देता हूं।ÓÓ
राजनाथ भगत पूर्णिया से स्वस्थ होकर जिस दिन कलासी पहुंचे, उसी दिन महावीर साह उनके पास आ पहुंचा और कुशल-मंगल पूछकर पूछा, ''विवाह की कोई तिथि तो सोचकर आए होंगे? जब लड़के का छेंका इतनी जल्दबाजी में पूर्णिया में हो गया, तो अब ब्याह भी जल्दी ही हो जाए।ÓÓ
''यह आप अपनी ओर से बोल रहे हैं,ÓÓ हंस पड़े राजनाथ भगत, ''या लुच्चा भगत की ओर से?ÓÓ
''अरेरेरे, अब तो उसे लुच्चा मत कहिए,ÓÓ महावीर साह ने जवाब दिया, ''अब तो वह आपका समधी हुआ।ÓÓ
''हां समधी हुआ, ऐसा समधी जो कभी दुश्मन बना फिरता था और जिसे मैंने साध लिया।ÓÓ
''हां, साध तो लिया।ÓÓ
''उसे पता ही नहीं था कि मेरे तरकश में कैसे-कैसे तीर हैं। बेटा सदानंद भी तीर बनकर ही तो था मेरे तरकश में। चलाया तीर और दुश्मन को लाचार कर दिया। अब करे मुझे बर्बाद। अब तो छटपटा रहा होगा कि वह अपनी कसम का क्या करे!ÓÓ
''अब तो लोग हंस रहे हैं उस पर,ÓÓ महावीर साह हंसकर बोला, ''गांव में निकलता है वह, तो आंखें चुराकर चलता है।ÓÓ
''इसे कहते हैं चुटकी में मसलना,ÓÓ महावीर साह की आंखों में आंखें डालकर बोले राजनाथ भगत और फिर पूछा, ''कहते हैं या नहीं?ÓÓ
''हां-हां यही तो हुआ चुटकी में मसलना,ÓÓ महावीर साह अपनी आंखों में चमक लाकर बोला, ''और किसे कहा जाएगा चुटकी में मसल डालना!ÓÓ ठ्ठ