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Monday 20 Nov 2017

पार्टनर


अलका सरावगी
धरती माता! तेरी पहाडिय़ां, हिम से ढके पर्वत और वन-उपवन मुस्करा रहे हैं। मैं तेरी सतह पर खड़ा हूं। मैं पराजित नहीं हुआ। मुझे कोई चोट नहीं पहुंची। मुझे घाव नहीं लगे। मैं पूर्ण हूं। मेरा कोई अंत नहीं कर सका।
उस छतनार पेड़ की छाया धूप में एक बड़ा गोल घेरा बनाती थी। लड़की उस घेरे के एक किनारे से दूसरे किनारे तक ऊपर देखती हुई चलती गई। फिर लौटकर वह वापस पहले वाली जगह पर आ खड़ी हुई। इतने में उसे पेड़ पर पत्तों में लगभग छिपा हुआ एक कमरख का फल दिखाई पड़ा। अपनी चुन्नी को कंधे पर टिकाती हुई वह ठीक उस फल के नीचे जा खड़ी हुई। 'वह नहीं मिलेगा। बहुत ऊंचा हैÓ -कहीं से आवाज आई। उसने देखा तो पेड़ जिस मकान से अपने फैलाव में सट रहा था उसकी बाहर बनी हुई सीढिय़ों पर बीच में एक चौदह-पंद्रह साल का लड़का खड़ा था। वह दुबला था और उसने चश्मा लगा रखा था। 'इधर सीढ़ी पर आकर देखिए, यहां से एक और कमरख दिखाई पड़ रहा हैÓ- उसने दोस्ताना अंदाज में कहा। वह सात-आठ सीढिय़ां चढ़कर उसके पास जा खड़ी हुई। 'आपको चाहिए कमरख? कल के तोड़े हुए से एक बचा है मेरे पास।Ó 'नहीं-नहीं। मैं तो बस पहचानना चाह रही थी कि यह कौन-सा पेड़ हैÓ- उसने जाड़े की पछुआ हवा में फहराती चुन्नी को रोकते हुए कहा। अब वे एक दूसरे को देख रहे थे। 'मैं कलकत्ते से आया हूं। मेरे दादाजी पिछले बीस सालों से हर साल जाड़े में यहां आते हैं और इसी मकान में रहते हैं। आप भी कलकत्ते से आई हैं न?Ó लड़के ने पहल करते हुए उससे पूछा। लड़की ने गरदन हिलाते हुए हामी भरी। 'आप क्या पहली बार आई हैं?Ó -लड़के ने और जानने की कोशिश की। 'नहीं, हम लोग भी प्राय: हर साल आते हैं और उस मकान में ठहरते हैं।Ó -लड़की ने पीछे की तरफ बने मकानों की तरफ इशारा करते हुए कहा। 'अच्छा, आपको पहले कभी देखा तो नहीं।Ó -लड़के ने हैरत जताई।
कलकत्ते से तीन सौ किलोमीटर दूर बने इस विश्राम-गृह में बूढ़ों, बच्चों, स्त्रियों-सभी का अपना-अपना मेला हर साल जाड़े में जुट जाता है। सबकी अपनी मंडली है- कहीं कीर्तन-भजन की, कहीं ताश-चौपड़ की, कहीं फिल्मी धुनों पर अंत्याक्षरी की। शहर में जो लोग अपने जान-पहचान वालों तक से बोलने-बतलाने में कतराते हैं, वे भी यहां की हवा के असर से अचानक मिलनसार हो उठते हैं। सबको मालूम है कि यह दोस्ती अस्थायी है, शहर में लौटने के बाद कोई किसी को याद तक नहीं करेगा, पर इस बात से उस छोटे से साथ में आत्मीयता में कोई कमी नहीं आती। कमरख के पेड़ के बगलवाले मकान के लड़के ने जाना कि लड़की का कॉलेज पूरा हो चुका है। उसने उम्र का अंदाज लगा लिया- मन में आया कि पूछा जाय- इसकी अभी तक शादी क्यों नहीं हुई। लड़की उसके सवालों के जवाब देती थी, पर अपनी तरफ से लड़के से कोई बात नहीं पूछ रही थी, मानो उसे उसमें कोई दिलचस्पी न हो। वह बार-बार कमरख के पेड़ की ओर देखने लगती थी। उसके अनमनेपन के बावजूद लड़के ने देखा कि वह अपने बारे में कुछ बताता तो लड़की पूरे ध्यान से उसकी बात सुनती थी। 'मुझे तो कलकत्ते में जाड़े की पहली-पहली हल्की शुरूआत होते ही यहां की मिट्टी की खुशबू आने लगती है और ट्रेनों की खडख़ड़ और सीटियां सुनाई देने लगती हैं।Ó -लड़के को लगा था कि वह उसकी इस बात पर जरूर चौकेंगी या कुछ जरूर कहेगी। सचमुच लड़की चौंक कर खुश हो गई और उसने कहा- 'अच्छा? सचमुच! इस बात से दोनों के बीच अचानक जैसे कुछ बदल गया।
लड़की अब उससे उसके स्कूल के बारे में पूछने लगी- 'तुम्हें कौन-कौन से विषय अच्छे लगते हैं?Ó 'सबसे खराब तो भूगोल लगता है, इतना तो मैं जानता हूं।Ó -लड़के ने मौज में आकर कहा। लड़की का चेहरा उतर गया। वह अचानक पहले की तरह चुप हो गई और मुंह घुमाकर कमरख के पेड़ की तरफ देखने लगी। लड़के को कुछ समझ में नहीं आया। उसे लगा कि इस बदले हुए रुख का संबंध भूगोल से है, हालांकि यह बात असंभव ही थी। फिर भी उसने कहा- 'दरअसल भूगोल की हमारी टीचर ही कुछ ऐसी हैं। ऊंट जितनी लंबी है, पर बोर्ड पर मैप टांगने कुर्सी पर खड़ी हो जाती हैं और कहती हैं- काश मैं थोड़ी और लंबी होती। 'रÓ को 'ड़Ó बोलती है- खुद अपना नाम बताती है ड़ानी मुखडज़ी- यानी रानी मुखर्जी।Ó लड़की ने कमरख के पेड़ से आंखें हटाकर उसकी तरफ देखा। वह हंसी नहीं। उसने गंभीरता से कहा 'इससे क्या फर्क पड़ता है कि टीचर कैसी है? मैं तो अपने भतीजे को भूगोल पढ़ा ही नहीं पाती- नदियों के नाम पढ़कर ही पागल हो जाती हूं- कृष्णा, कावेरी, गोदावरी, तुंगभद्रा... मैं तो हर नदी से मिलना चाहती हूं। सबके पास जाना चाहती हूं।Ó लड़का उसकी बातें सुनकर उसे हक्का-बक्का होकर देखता रहा। अजीब लड़की है। वह फिर कमरख के पेड़ की ओर देख रही थी। 'क्या देख रही हैं आप इस पेड़ में? इसकी खट्टी-मीठी चटनी अच्छी लगती है न?Ó -लड़के ने कुछ सुस्त होकर कहा। कुछ नहीं देख रही हूं- मैं इसे पहचान लेना चाहती हूं ताकि फिर कभी यह पेड़ दिखे तो इसके पत्तों से ही इसे पहचान लूं।Ó लड़के के दोस्त आ गए थे और उसे नीचे से क्रिकेट खेलने चलने के लिए आवाजें दे रहे थे। लड़का चुपचाप खड़ा रहा। लड़की ने कहा- 'अच्छा मैं चलती हूंÓ और सीढिय़ां उतरने लगी। अब तक लड़के के दोस्त ऊपर चढ़ आए थे और उसे बहरा-गूंगा बताकर हल्ला-गुल्ला मचाने लगे थे। लड़के ने देखने की कोशिश की कि लड़की कहां गई, पर वह गायब हो चुकी थी।
विश्राम गृह का परिसर बहुत बड़ा है- पीछे की तरफ तालाबों और खेतों और सामने छोटे-छोटे बगीचों के खुलेपन में छितरे कई एक मंजिलें सीधी छतों वाले और बरामदों वाले एक-से मकान हैं। सभी मकान बरामदों में छाई रहनेवाली जाड़े की उजली धूप को मानो वहां की लाल मिट्टी के संग घोलकर बनाए हुए पीले रंग से पुते हैं। सबकी सीढिय़ां मकानों के बाहर खुले में बनी हैं। तकरीबन ऐसे ही छोटे-बड़े पीले मकान इस पूरे इलाके में, बल्कि आसपास के कस्बों तक में इसी तरह लाल मिट्टी और ऊंची-नीची पहाड़ी धरती पर उगने वाले पलाश और खजूर के टेढ़े-मेढ़े पेड़ों के बीच बने हुए हैं। छोटी-छोटी पहाडिय़ां क्षितिज पर दूर कहीं-कहीं उगी दिखाई पड़ती हैं। ऐसा लगता है कि इस इलाके में समय आकर ठहर गया हो। हर साल जब शुद्ध हवा पानी के लिए आसपास के शहरों के लोग जाड़े की छुट्टियां बिताने पीढ़ी-दर-पीढ़ी आते हैं, विश्राम गृह के ठीक बाहर शिरीष का विशाल पुराना वृक्ष दूर-दूर तक छांह किए और टें-टें कर उड़ते तोतों को आश्रय दिए, वैसे ही खड़ा मिलता है। उसके सामने सड़क के पार रेल-लाइन के किनारे-किनारे पीठ किए वही मूड़ीवाले, पुचका-चाटवाले, पानवाले और चायवाले हर बार उसी तरह इंतजार करते मिलते हैं। उनके पीछे से पास के शहर को जाने वाली कोयलेवाली ट्रेन के लिए हर एकाध घंटे में लाइन मैन रास्ता बंद कर देता है। और दूसरी तरफ विश्राम-गृह के पीछे से मेन लाइनों पर रेलवे की सारी मुख्य रेलें दिन-रात हार्न बजाती हुई उसी तरह गुजरती रहती हैं। कभी कुछ नहीं बदलता- यहां तक कि रेल-लाइन के पार गांव में रहने वाली पुतली की मां हर साल अक्षर प्रौढ़ावस्था के लिए घर के काम करने के लिए मौजूद रहती है। न उसकी उम्र उसके गहरे काले रंग और पीली डोरेदार आंखों में बढ़ती नजर आती है और न उसकी बेटी पुतली के सलोने यौवन में ही कोई बदलाव आता है। बस पुतली के दोनों लड़के बड़े हो गए हैं और नाक टपकाते बचपन की जगह शहरातियों  की फैशनेबल उतरनें पहनकर बाल काढ़े हुए युवास्था की ओर बढऩे के लिए आतुर दिखाई देते हैं। उन्हीं की उम्र के शहरी लड़के-लड़कियों के बीच बहुत सारे प्रेम-संबंधों के पनपने की संभावना हवा में हर समय मौजूद है और वे इससे बेखबर नहीं है। हर साल कोई न कोई किस्सा चर्चा में रहता है, अलबत्ता किसी किस्से का सचमुच कोई परिणाम निकला हो, ऐसा सुनने में नहीं आया। यहां जो भी सहज आकर्षण पैदा होता है, शायद वह शहर की दूषित हवा खाते ही मर जाता है। यहां सभी शहरी जीवन की दफ्तर-घर या स्कूल-घर या फिर वानप्रस्थावस्था की घर-ही-घर की बंधी-बंधाई दिनचर्या को तोडऩे के लिए आते हैं और बिना यूरिया की ताजी सब्जियां खाकर, तेल मालिश करवाकर, खेल-कूदकर दोस्तियां करके लौट जाते हैं। हर साल नई-नई जगह घूमने वाले यात्री को इस तरह एक नई जगह लौट आने का सुख मालूम ही नहीं हो सकता।
सुबह उठते ही कमरख के पेड़ को देखकर लड़के को उस लड़की की याद आई। कल रात को सामने की तरफ बने चारों ओर से खुले गोलघर में देर तक फिल्मी गीतों पर अंत्याक्षरी का कार्यक्रम चला था। ढेर सारे लड़के-लड़कियों के बीच उसने कई बार उस लड़की को खोजना चाहा था, पर वह नजर नहीं आई थी। इस बार कलकत्ते से हर साल आने वाली एक बहुत फैशनेबल लड़की के साथ उसकी चचेरी बहन भी आई थी और उन्होंने हर जगह अपनी फकाफक अंग्रेजी, चुस्त कपड़ों और लटको-झटकों से अपना सिक्का जमा रखा था। पिछले साल उस लड़की के साथ इस लड़के की कुछ झड़प हो गई थी और इस बार वह उससे बदला लेने के लिए अपनी चचेरी बहनों के साथ मिलकर उसका मजाक बनाने में लगी थी। उनके इतराने का एक दूसरा बड़ा कारण यह था कि पिछले पच्चीसों वर्षों से ज्यों के त्यों बन रहे विश्राम-गृह की साधारण, एक जैसी स्तरीयता को तोड़ती हुई एक लाल सफेद बंगलानुमा ढलुवां छत वाली कोठी, पीली सपाट छतों वाले मकानों के बीच खड़ी हो गई थी। इस कोठी की सीढिय़ां भी उसके अंदर थीं। ये लड़कियां उसी कोठी में ठहरी थीं और अपने को बाकी लोगों से एक दर्जा ऊंचा समझ रही थीं। लड़के ने रात का किस्सा याद कर मुंह बिचकाया। पास के छोटे कस्बे से आई एक लड़की के कपड़ों और उसके बैडमिंटन खेलने के प्लास्टिक के सस्ते, बच्चों के से रैकेट पर ये लड़कियां पागलों की तरह हंसती रही थी। लड़के से रहा नहीं गया था और उसने कह दिया था- 'अच्छे रैकेट खरीद लेने से भी क्या होता है- उसे पकडऩा तक तो आता नहीं तुम लोगों को।Ó इसके बाद तो उन लोगों पर हंसी का दौरा पड़ गया था और उन लोगों ने उस सीधी-सादी लड़की को 'उसकी होने वालीÓ करार कर खूब म•ााक बनाया था। लड़के ने सुबह-सुबह निश्चय किया कि आज से वह उनकी तरफ देखेगा भी नहीं। रात की तिलमिलाहट उसे अब भी महसूस हुई।
कुछ निश्चय करके लड़का पीछे के मकान की तरफ चल पड़ा। कमरख वाली लड़की ने अपने घर का नम्बर नहीं बताया था और इस तरफ कम किराए वाले एक-एक कमरे के साथ रसोई वाले घर बने हुए थे। वह लड़की उनमें से किसी कमरे में होगी, ऐसा माना जा सकता था। वह उन सारे कमरों के सामने से गुजर गया। निराश-सा होकर वह लौट रहा था कि तालाब की सीढिय़ों के पास बने चबूतरे पर वह एक कोने में बैठी नजर आई। उसने भी लड़के की तरफ देखा और मुंह पर अंगुली रखकर आवाज न करने का इशारा किया। लड़की की निगाह का पीछा करते हुए लड़के ने वहीं रुककर देखा कि लाल आंख वाली एक काली कोयल पपीते के पेड़ पर टेढ़ी लटककर बहुत सफाई से एक बड़े हरे पपीते को एक-एक पीली रसदार फांक की तरह काटती हुई खा रही थी। बहुत देर तक वे दोनों अपनी-अपनी जगह से कोयल को पपीता खाते देखते रहे। कोयल के उड़ जाने पर वह चबूतरे के पास आया। 'कितने बढिय़ा ढंग से खा रही थी पपीताÓ- लड़के ने चबूतरे पर बैठना चाहा। 'अरे-अरे देखो, उस पौधे  को मत छुओ नहीं तो खुजली होगी पूरे शरीर मेंÓ -लड़की ने हंसते हुए कहा। लड़के ने देखा कि उसकी हंसी में एक अद्भुत खुलापन है, जो उसे बहुत आकर्षक बनाता है। 'अच्छा तो क्या आप यहां के सारे पेड़ों के नाम जानती हैं?Ó -लड़के ने चकित होकर पूछा। 'ऊं हूं, सबके तो नहींÓ - लड़की ने खुश दिखते हुए कहा। 'हां, जैसे कमरख के पेड़ से तो कल ही पहचान हुई है न आपकी। मैं तो उस पेड़ को बचपन से पहचानता हूं। एक और चीज मैं आपको दिखा सकता हूं, जो आपने कभी नहीं देखी होगी। यहां मंदिर के पास एक पौधा है जिसमें काले मुंह के कड़े-कड़े लाल दाने होते हैं छीमियों में।Ó -लड़का बहुत खुश था कि वह लड़की को कोई नई ची•ा दिखा सकेगा। लड़की अचानक उदास होकर बुझ गई। उसने गरदन नीचे झुका ली और बोली- 'ओह, काले मुंह वाली लाल चिरमठी? तुम्हें मालूम है कि सबका वजन एक रत्ती होता है? मेरी दादी सुनहले सितारों का वजन करने के लिए सिलाई के डब्बे में रखती थी।Ó वह कुछ देर चुप रहकर बोली- 'मेरी दादी चिरमठी के बारे में एक गीत गाती थी जिसमें लड़की की मां लड़की के पिता को कहती है कि हमारे आंगने में तो सिर्फ चिरमठी का पौधा है, लेकिन हमारी लड़की के ससुराल में हमारे समधी के आंगन में केवल केवड़ा फूलता है- यानी कि चिरमठी तो हुई एक मामूली चीज- छोटा सा पौधा- सिर्फ रत्ती उगाए- जबकि केवड़ा है एक खुशबूदार फूल, जिसे एक बड़ी जगह में ही उगाया जा सकता है। इतना कहकर वह चुप हो गई और कुछ सोचने लगी। लड़के का मन हुआ कि उससे पूछे कि उसकी अभी तक शादी क्यों नहीं हुई। पीछे लंबी सांस छोड़कर घड़ी में समय देखते हुए कहा- 'अमृतसर मेल थी।Ó 'क्या आपको सब ट्रेनों का समय भी मालूम है?Ó -लड़के ने आश्चर्य से पूछा। 'हमारे यहां पुतली की मां काम करने आती है न, वह ट्रेन के पहियों की आवाज से ट्रेन का नाम बता देती है।Ó -लड़की हंसी और उठ खड़ी हुई। 'अच्छा मैं चलती हूं। आज मां की तबियत ठीक नहीं है, मैं नहीं रहती तो और चिंता करती है।Ó 'आप रात को अंत्याक्षरी में नहीं जाती गोलघर में?Ó लड़के ने पूछा। 'नहीं, मैं जल्दी सो जाती हूं। रोज सुबह उगता हुआ सूरज देखने की मुझे आदत है। यहां बाहर सड़क पर मिशनरी स्कूल के सामने की चट्टान से उगते हुए सूरज का बहुत सुंदर दृश्य दिखता है- धरती फाड़कर निकलता लाल सूरज का गोला। तुमने कभी ऐसा सूरज देखा है?Ó लड़का वहीं देर तक चबूतरे पर अकेला बैठा हुआ सोचता रहा। उस रात गोलघर में चल रहे टी.वी. के धारावाहिकों को मूक अभिनय के जरिए पहचानने के कार्यक्रम में उसका मन न लगा। बीच में ही वह कार्यक्रम छोड़ उठ आया। इतनी जल्दी अपने आप सोने के लिए घर आने पर मां के आश्चर्य को बढ़ाते हुए उसने कहा- 'मुझे कल उगता हुआ सूरज देखना है।Ó
जब दूर-दूर तक धरती का फैलाव हो और बीच में कोई पेड़-पौधा तक उस फैलाव में बाधा न डालता हो तो धरती के किनारे से निकलते लाल सूरज के गोले को देखना जीवन का शाश्वत अन्त कालक्रम को देखना है- लड़के ने इस बात को बिना शब्दों के लड़की के साथ अगली सुबह के सूरज को देखते हुए जाना। उसके बाद हर सूर्योदय और हर सूर्यास्त को देखते हुए वह बार-बार इस बात को नई गहराई के साथ जानता रहा। पूर्णिमा के चांद को उसने सांझ ढलते ही पूर्व दिशा में देखा और सूर्योदय के पहले उसे पश्चिम में अस्त होते हुए। विश्राम गृह के हर उम्र के चलने-फिरने वाले लोग शिरीष के पेड़ से दो किलोमीटर दूर तक आश्रम को जाने वाले रास्ते में हर सुबह और शाम को सैर करने जाते थे। लड़का भी इसी रास्ते को बचपन से हर सुबह मित्रों की टोली के साथ नापता आया था। पर अब उसने उस रास्ते से फूटते अनेक-अनेक दिशाओं की ओर जाते रास्ते को जाना। वे दोनों जब सुबह की सैर कर लौटते थे, तो सूरज काफी ऊपर चढ़ आया होता और चाय-नाश्ते की दुकानवाले भी सुबह की बिक्री सलटाकर आराम कर रहे होते थे। इस अनमेल जोड़ी को कई जोड़ी आंखों के विस्मय और संदेह का सामना करना होता था। उन दोनों को पार्टनर की संज्ञा न जाने लड़की के घरवालों ने दी या लड़के के घरवालों ने। पर अब वे एक-दूसरे को पार्टनर के नाम से ही संबोधित करने लगे थे।
रेल लाइन को पार कर दूर दिखते पहाड़ तक जाने के लिए बीसियों खेतों, चट्टानों, नदियों की पतली धाराओं को पार करते हुए उन दोनों ने रास्ता बनाया। रास्ते में चौड़ी नदी मिलने पर लड़के ने लड़की की तरफ निराशा से देखा तो उसने देखा कि वह अपने जूते उतारकर हाथ में लेकर पानी में घुस रही थी। दोनों ने नदी पार कर बालू में बैठकर पत्तों से पांवों का पानी झाड़कर जूते पहने। पहाड़ की तलहटी में उगे, तेंदू के पत्तों और दोने बनाने के लिए पत्ते चुनते आदिवासियों को देखकर वे साथ-साथ मुस्कराए। लड़की ने केले के लाल फूल की एक पंखुड़ी को लड़के को तश्तरी की तरह इस्तेमाल करने के लिए दिया जिसमें उन्होंने चिडिय़ों के पंख, कई रंग के पत्थर और जंगली फूल इकट्ठे किए। रेल-लाइन के नीचे बनी गुंबदनुमा सुरंग से गुजरते हुए उन्होंने ऊपर चलती रेल की घड़घड़ाहट सुनी और एक-दूसरे को नाम लेकर पुकारा। लड़के ने लड़की के साथ कल्पना की कि पलाश के सूखे मटमैले पत्तों की जगह जब होली के पास पलाश के फूल लद जाते होंगे, तो भूरा उजाड़ दिखने वाला जंगल कितना चटख हो उठता होगा। रेल-लाइन पर चलते हुए उन्होंने रेल-लाइन पर कान रखकर सुना कि कहीं रेल पीछे से तो नहीं आ रही और रेल के नीचे दस पैसे के सिक्के को दबाकर उसे चपटा बनाया। कभी कोई जंगली फूल या पत्ता या कोई अजीब आकृति का पत्थर या कोई नीली-पीली चिडिय़ा दिख जाती, तो लड़की उमंग में आकर लड़के का हाथ पकड़ लेती थी। लड़के को दुनिया का एक-एक अणु रहस्यमय और अद्भुत लग रहा था- ऐसे क्षणों में उसका संसार एक दिव्य आलोक से भर उठता। उसने विश्राम-गृह की धरती में कपूर, तेजपत्ता, दालचीनी, सीताफल, राधाचंपा, नागचंपा- न जाने कितने पेड़-पौधों को उनकी खुशबुओं, पत्तों, तनों और शक्लों से जाना, आकाश में उसने सप्तर्षि तारों को, शुक्र ग्रह को, चांद के पूर्णिमा के बाद रोज क्रमश: देर से उगने को जाना।
विश्राम-गृह में उनके बारे में हर उम्र में टोलियों के स्त्री-पुरुषों, लड़कियों-लड़कों में जिक्र हो रहा था। इस बार की चर्चा में कौतुक ही अधिक था क्योंकि दोनों के बीच किसी निंदा करने लायक आकर्षक की संभावना को लड़की-लड़के के बीच उम्र का अंतर और लड़की की गंभीरता खारिज कर देती थी। लड़के के दोस्तों ने भी एक बार उन दोनों के साथ घूमकर उन चिडिय़ों पेड़ों-पत्थरों को देखा, जो उन दोनों के लिए अपूर्व आनंद को स्रोत थे, पर उन्हें ऐसे सिरफिरेपन से ऊब और झल्लाहट ही हुई। रात को गोलघर में आने के आमंत्रण- 'दीदी, आप पार्टनर को लेकर आज- 'तोल मोल के बोलÓ- प्रतियोगिता में जरूर आइएÓ - को लड़की ने अचरज भरी आंखों के साथ हंसकर टाल दिया- 'लेकिन मैं तो किसी चीज का दाम जानती ही नहीं।Ó उसकी इस बेतुकी बात पर पार्टनर की हंसी उसके दोस्तों को बहुत अखर गई और उन लोगों ने उसका बायकाट करने का फैसला कर लिया। लड़के की इकलौती बहन, जो परीक्षा के कारण काफी बाद में विश्राम-गृह में आई थी अपने भाई के बदले हुए रुख से काफी हैरान थी। वह बार-बार कहने पर भी भाई को पिछले साल की टोली के साथ पिकनिक पर ले जाने में सफल नहीं हुई। बहन का परिचय अपनी पार्टनर के साथ उसने इन शब्दों में करवाया था- 'यह मेरी बहन है। इसे एक बार टी.वी. वालों की तरफ से इनाम मिला था- यह बताने के लिए कि 'ताराÓ सीरियल में तारा ने किस 'एपिसोडÓ में कौन से रंग के कपड़े पहने थे।Ó इस बात पर दोनों पार्टनरशिप में हंस पड़े थे। इसमें हंसने की क्या बात थी, नाराज होकर बाद में भाई ने पूछने पर उसने कहा था- 'नहीं बात तो दरअसल रोने की है। पार्टनर कहती है कि टी.वी. वाले हमें इतना मूर्ख समझते हैं कि वे हमसे ऐसी ही मूर्खतापूर्ण प्रश्न पूछते हैं कि किसने कब क्या कपड़े पहने थे, किसने किसके साथ कौन-सा गीत गाया था, किस पंखे का बाजार में कितना दाम है। वे चाहते हैं कि हमारे दिमाग इसी तरह की बकवास से भरे रहे।Ó मां को शिकायत करने पर मां ने कहा- 'तुम्हें क्यों उनकी दोस्ती से तकलीफ हो रही है। अच्छी लड़की है। उसे इतिहास, भूगोल सब पढ़ा रही है। अच्छी लड़की है। पहले यहां आता था, तो रोज कहीं चोट लगा लेता था, किसी से झगड़ आता था। अब इस बार कितनी अच्छी तरह रह रहा है।Ó
इस पार्टनरशिप से परेशान लोगों ने राहत की सांस ली जब वह लड़की बिना अपने पार्टनर को अपना पता-ठिकाना दिए एक दिन अचानक सुबह अपने मां-बाप के साथ जो यहां आने के बाद अस्वस्थ ही रहे रहे थे और बहुत कम बाहर निकलते थे- वापस कलकत्ते लौट गई। उसके जाने के बाद दो दिन तक दूर दिखते तेंदू के पत्तों वाले पहाड़ को दिन भर और उसके पीछे डूबते सूरज को शाम देर तक देखकर लड़का भी कलकत्ते चला गया। कई लोगों ने उसके जाने के बाद अपने अंतर्मन में छुपाकर रखे गए ऐसे कई किस्से एक-दूसरे को सुनाए जिनमें इस तरह के अनमेल लड़के-लड़की के बीच भी प्रेम-संबंध पनप जाता था। कई लोगों के पास बड़ी उम्र की औरतों द्वारा छोटी उम्र के लड़कों को फंसाने की दास्तानें निकल आई। एक सप्ताह तक ऐसा सिलसिला रहा फिर ऊब कर लोग दूसरे-तीसरे किस्सों की बातें करने लगे। गोलघर रोज रात को देर तक लड़के लड़कियों के हुल्लड़ और फिल्मी गीतों से गुंजार रहता था। बड़ी उम्र के लोगों में ताजी सब्जियों- गाजर, मूली, गोभी की चर्चा रहती थी आरै तरह-तरह के पकवानों की, जो एक-दूसरे को दावत पर बुलाने के लिए पकाए जाते थे। विश्राम-गृह के बाहर मूड़ी-पुचके-चाय की दुकानों पर सुबह-शाम तिल रखने की जगह नहीं रहती थी और इन सबके बीच आगे की तरफ कोयलेवाली रेल और पीछे की तरफ मेन लाइन पर राजधानी जाने वाली रेलों की सीटियां हमेशा की तरह गूंजती रहती थीं। पीछे के तालाब में मछली खाने वाली नीली चिडिय़ा तीर की तरह डुबकी मारकर पानी से मछली पकड़कर ले जाती थी और सोनपाखी 'कहां होÓ, 'क्या कहूंÓ जोर-जोर से बोलती हुई मंदिर से ऊपर बेल के पेड़ में घुस जाती थी। सूरज का लाल गोला रोज धरती से अनदेखा निकलता और पहाड़ी के पीछे जाकर उसे सोने के पहाड़ से बदलता धरती के दूसरे छोर पर सुबह करने चला जाता था। कलकत्ते लौटकर लड़के ने पाया कि दुनिया बहुत बदल गई है। गाडिय़ों की गडग़ड़ाहट से कुर्राते और उनके धुएं में हवा के लिए छटपटाते शहर में लौटकर उसे कोई शिकायत नहीं हुई क्योंकि उसने पाया कि शहर का आकाश निराले रूप से सुंदर है। उसने देखा कि सूर्योदय और सूर्यास्त को यहां भी खोजा और पाया जा सकता है। उसने अपने पार्टनर का अता-पता ढूंढने की कोई कोशिश नहीं की। वह उन सारी बातों को इकट्ठा करने में लगा रहा, जो जीवन और प्रकृति उसे तरह-तरह से सिखा रही थीं। उसने अपने सोने की जगह बदल ली और पूर्व दिशा की ओर मुंहकर सोने से उसने तारों की कनात को रात को धीरे-धीरे ऊपर की ओर खिसकते पाया। कभी खिड़की पर रात तीन बजे शुक्र तारा उसे आकर जगा गया। अमावस्या के पहले दिन तब वह सूर्योदय के ठीक पहले चांद की पतली लकीर को देख लेता था। उसने शहर के हरेक स्थान को घूम-घूमकर देख लिया, जहां पुराने पेड़ थे। वह हर जगह आदमियों को न देखकर पेड़ों को पहचानता चलता था। शहर के पास के इलाकों में वह उन जगहों पर घूम आया जहां तालाब-ही-तालाब थे और उनके बीच चलने को एक संकरी पगडंडी मात्र थी। कहीं उसे  जलकुंभी के नीले मोरपंखी फूलों का फैलाव मिल गया, कहीं उसे अचानक शत-शत कमल के फूलों से भरा सरोवर मिल गया और कहीं सुर्ख लाल कुमुदिनी से भरा तालाब। उसने हर ऋतु को पहली बार जाना : बसंत ऋतु में आते नए पत्तों ने उसमें उल्लास की हिलोर भर दी, तो कभी इस सोच से वह सिहर उठा कि गर्मी के बादल काले मेघ बंगाल की खाड़ी से चले आएंगे। शरद ऋतु में उसे अनायास कास के सफेद लहराते वन मिल गए और कहीं-कहीं पतझड़ आरंभ दिखाई पड़ा। उसके अंदर एक विचित्र वेदना और उल्लास एक साथ घुले-मिले थे, जिसका कोई कारण वह नहीं बता सकता था। हर क्षण उसे लगता था कि न जाने कब और कहां कुछ नया मिल जाएगा। हर घड़ी यह किसी खोज में था। इतने में जाड़े की पहली हवा चल पड़ी और उसे ट्रेन की सीटियां याद आने लगी।
अपनी उम्र का एक साल गुजारकर लड़का वापस शिरीष के पेड़ में टें-टें करते तोतों के पास लौट आया। उसने कमरख के पेड़ के तने को छूकर देखा और उसकी छाया में एक सिरे से दूसरे सिरे तक चलकर गया यह देखते हुए कि उसमें कितने कमरख लगे हुए हैं। अपना सामान घर में रखकर वह पिछवाड़े की तरफ के मकानों के सामने से गुजरता हुआ जब तालाब के पास पहुंचा तो उसे यह देखकर कोई आश्चर्य नहीं हुआ कि पार्टनर वहीं उसी तरह थी। यह कोई संयोग नहीं था। यह सिर्फ वैसी ही एक आयोजित घटना थी, जिस तरह चांद और तारे खुद उसे उठाकर उससे मिल लेते थे। वह जानता था कि वे भी उससे मिलने के लिए उससे कम उत्सुक नहीं हैं। उसने पपीते के पेड़ की तरफ देखा तो वहां यह देखकर उसे एक क्षण के लिए खिन्नता हुई कि वहां पपीते का पेड़ नहीं था। पार्टनर ने आज अभी तक उसे नहीं देखा था क्योंकि वह सिर झुकाए इस तरह बैठी थी जैसे जमीन में कुछ खोज रही हो। उसने लड़के के कदमों की आहट से सिर उठाया, तो लड़का एक मिनट के लिए चौंक गया। क्योंकि उसकी मांग में सिंदूर की लाल रेखा खिंची हुई थी। ''अच्छा, तो तुम आ गएÓÓ -लड़की ने मुस्कराकर कहा। लड़के को उसे बहुत कुछ कहना था, पर वह चुप रहा और लड़की की पीली सलवार-कुरती पर मंडराती पीली तितली को देखता रहा। एक क्षण के लिए उसके दिमाग में वे खेतों की मेडं़े, वे तालाबों के किनारे और नदियों की पतली धाराएं कौंध गई, जिन पर चलकर वे पहाड़ की तलहटी तक पहुंचे थे। 'तो आपकी शादी हो गई- हम लोगों को बिना बताए?Ó- उसने भरसक अपनी आवाज को सामान्य रखते हुए कहा। लड़की ने तितली को देखते हुए कहा- 'शादी तो मेरी दो साल पहले ही हो गई थी।Ó लड़का सांस रोके खड़ा रहा कि वह आगे बोले। लड़की ने उसके चेहरे की गंभीर जिज्ञासा को आंख भर देखा। 'मैं लौट आई थी मां के पास- अपनी मरजी से।Ó लड़की फिर नीचे जमीन में कछ देख रही थी। लड़के का मन हुआ कि पूछे- 'किसलिए?Ó तभी उसे चिरमठी और केवड़े वाला गीत याद आ गया जिसमें लड़की की मां लड़की के पिता से कहती है कि हमारे आंगन में तो चिरमठी का मामूली-सा पौधा है जबकि हमारे समधी के आंगन में केवड़ा फूलता है। उसने गीत के बोल मां से सीखकर याद कर लिए थे और केवड़े के झाड़ भी 'बोटेनिकल गार्डनÓ में देख आया था। उसे लड़की को चिरमठी का गीत बताते हुए उदासी सी याद आई। वह लड़की के साथ बिताया कोई क्षण नहीं भूला था। 'आपके वे नहीं आए यहां?Ó लड़के ने अपनी धड़कनों को अपने कानों में बजते सुना। उसके अंदर जैसे कोई प्रार्थना चल रही थी। उसके दिमाग में रेल लाइन पर हाथ पकड़कर साथ चलने का दृश्य कौंधकर गायब हो गया। 'आए हैं सो रहे हैं।Ó 'वे उगता हुआ सूरज नहीं देखते आपके साथ?Ó -यह कहते-कहते लड़के ने अपना चेहरा छिपाने के लिए पपीते के अदृश्य पेड़ की तरफ मुंह घुमा लिया। उसकी आंखें तालाब की तरह हो जाना चाह रही थीं।