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Monday 20 Nov 2017

वीरो


भीष्म साहनी
आज वे फिर आए थे, छैने-करताले बजाते हुए। अभी पौ भी नहीं फूटी थी कि उनकी गान-मंडली के स्वर दूर से सुनाई पडऩे लगे थे। सलीमा अभी उनींदी में थी, जब उसकी नींद में उनके सुर-ताल घुलने लगे थे। मीठे-मीठे स्वरों की फुहार जैसी उसके अन्तस्तल पर पडऩे लगी थी। उन्हें सुनते हुए वह पुलक-पुलक गई। गीत के बोल अस्पष्ट थे, पर सुर जाना-पहचाना था, दूर बचपन के दिनों में ही अन्तरतम में रच-बस गई थी।
सहसा ही सलीमा पलंग पर से उठ बैठी और उन्हीं कदमों भागती हुई छज्जे पर जा पहुंची और चिलमन के पीछे खड़ी बाहर की ओर झांक-झांक कर देखने लगी। बड़ी उम्र की औरत और इतनी उतावली, इतनी बेचैन।
चिलमन के पीछे सुबह की ठंडी-ठंडी हवा माथे को सहला रही थी। बाहर, प्रभातबेला के झुटपुटे में चांदी घुलने लगी थी। गायकों के मनमोहक स्वर निकट, और निकट आते जा रहे थे।
टोली आज फिर कस्बे में पहुंच गई थी।
यह आज की बात नहीं थी, यह तो साल-दो-साल में ऐसा ही चला आ रहा था। बैसाख के इसी दिन हर साल गायकों की टोली कस्बे में पहुंचती थी। बस, इस समय स्टेशन की ओर से आ रही है, तो शाम होने पर, फिर से छैने-करताल बजाती, सलीमा के दिल को मथती हुई, स्टेशन की ओर लौट जाएगी। उनके गीतों की स्वर लहरियां धीरे-धीरे हवा में खो जाएंगी, डूब जाएंगी, फिर से मौन सा छा जाएगा, और धीरे-धीरे, समय बीतने पर, उनका आगमन, सपना सा लगने लगेगा।
चिलमन के पीछे खड़ी सलीमा की आंखें, उत्तरोत्तर नजदीक आती टोली पर मानो गड़ी हुई थीं। उसका दिल जो पहले स्पंदित सा महसूस कर रहा था, अब मानो उमड़ आया था, और गर्म-गर्म आंसू उसकी आंखों से बह चले थे। यह भी साल दर साल से चला आ रहा था। बैसाख महीने के इस दिन, पहले उसे अपार सुख का फिर अथाह बेचैनी का अनुभव होता, सोये-सोये ही गर्म गर्म आंसू उसकी आंखों के कोरों से फूट पड़ते। फिर वह, आहत सी, उठ बैठती और लपक कर छज्जे पर जा पहुंची।
टोली नजदीक आ पहुंची थी। उसके घर के सामने से गुजर ही थी। तब तक अंधेरे की एक और परत झरकर गिर चुकी थी और आकृतियां बहुत कुछ साफ न•ार आने लगी थीं।
आगे-आगे, सिर से पांवों तक, लम्बे नीले रंग के चोगे पहने और सिर पर पीले रंग के दस्तार लगाए, हाथ बांधे, पांच सरदार चले आ रहे थे। सभी बड़ी उम्र के, किसी की खिचड़ी दाढ़ी, किसी की रेशम जैसी सफेद दाढ़ी। उनके पीछे साजिंदों की पांत थी। एक के गले में ढोलक, दूसरे के गले में हारमोनियम बाजा, एक के हाथ में चमचमाते छैने तो दूसरे के हाथ में करताल। सभी गाने में मगन थे। उनके पीछे, बीस-पच्चीस यात्रियों का टोला था। कस्बे की सड़क पर उनके कदमों से हल्की-हल्की धूल उड़ रही थी। किसी ने हाथ जोड़कर रखे थे, तो किसी ने हाथ पीठ पीछे बांध रखे थे। अधिकांश अधेड़ उम्र के लोग थे, जो जवान थे, वे अलग से हंसते-हंसते बतियाते, दायें-बायें कस्बे का जायजा लेते चले जा रहे थे।
सलीमा का सारा शरीर उत्सुकता और आशा के बीच झूल रहा था। एक घड़ी, आधी घड़ी, आधी से भी आधी, देखते देखते टोली आगे बढ़ जाएगी। जिनके चेहरों पर उसकी आंखें लगी थीं, वे कुछ ही क्षणों में पीठ मोड़ लेंगे, और दिल में से हूक सी निकलने लगेगी, और मन पर अवसाद छा जाएगा।
सलीमा बेगम का मन हुआ, भागकर सीढिय़ां उतर जाए और टोली के सामने जाकर खड़ी हो जाए और उनसे सीधा पूछे : ''बोलो सरदार जी, तुम में तो मेरा भाई नहीं है? या कोई नाती-रिश्तेदार? क्या तुम उन्हें जानते हो? क्या वे भी कभी तुम्हारे साथ मेरी खोज खबर लेने आए हैं? हर साल, साल-दर-साल से मेरी आंखें उन्हें ढूंढ रही हैं।ÓÓ लेकिन यह कैसे हो सकता था? खाते-पीते परिवार की पर्दादार स्त्रियां कब सड़कों पर नंगे पांवों और नंगे सिर भागी हैं और वह भी अनजाने, परदेसी यात्रियों की टोली के पीछे? अब तक यात्रियों की टोली दूर जा चुकी थी। अब वह ढक्की पार करेगी। बस्ती-धीरे-धीरे पीछे छूटती जाएगी, फिर गुरुद्वारे का चमचमाता गुम्बद सामने आ जाएगा, सूर्योदय के प्रकाश में झिलमिलाता और गाते-बजाते, कीर्तन करते सरदारों की टोली गुरुद्वारे में प्रवेश कर जाएगी।
सलीमा को फिर से छलावे का सा भास होने लगा। आज की ही बात रही हो तो कोई कहे, ऐसा उसके साथ हर साल होता रहा है। और आगे भी होता रहेगा। और वह इसी तरह रोती-बिलखती दुनिया छोड़ जाएगी, अपने बेचैन, छटपटाते दिल को झूठी ढाढस बंधाते हुए। मैं किस मृगमरीचिका के पीछे पागल हुई जा रही हूं?
सहसा सलीमा के पीछे आहट हुई। उसने पलटकर देखा। पिछले कमरे की दहलीज पर सलीम खड़ा था, उसका छोटा बेटा।
''क्या है मां? यहां क्यों खड़ी हो?ÓÓ
कुछ नहींतो। सिक्खों की टोली हिंदुस्तान से आयी है। वही जो हर साल आती है। उसी को देखने चली आयी।
तुम तो रो रही हो मां, रो क्यों रही हो?
''मैं भला क्यों रोऊंगी? रोए मेरे दुश्मन...। हवा में खड़ी थी ना, इसीलिए...।ÓÓ और सलीमा ने अपने पल्ले से आंखें पोंछ लीं, और अपनी झेंप छिपाने के लिए अपने बेटे को बांहों में भर लिया।
''मेरा लाल बेटा जुग-जुग जिये, मैं क्यों रोऊंगी। चल अंदर।ÓÓ
और दोनों छज्जे पर से हट गए।
उस वक्त तो सलीमा अपने आंसू छिपा गई, पर उसी दिन दोपहर को वे अनायास ही फिर से झर झर बहने लगे।
उस वक्त सलीम आंगन की दीवार पर टांगे लटकाए किताब हाथ में लिए किसी कविता की पंक्तियां कंठ कर रहा था, और आंगन के बीचों-बीच बैठी उसकी मां, सलीमा घुटने पर कढ़ाई का कपड़ा फैलाए, उस पर मुकैश टांक रही थी। मां के कान बेटे की कविता पर लगे थे। इसे उसने पहले भी कई बार सुन रखा था। और हर बार उसे सुनने पर उसका दिल जाने कैसा-कैसा हो जाता था।
उस कविता में एक कहानी कही गई थी : एक बार, सारस पक्षियों की टोली, आकाश में उड़ती, अठखेलियां करती अपने घर को जा रही थी जब नीचे जमीन पर खड़े किसी शिकारी ने उन पर गोली दाग दी। बाकी सारस तो बचकर निकल गए, पर एक मादा सारस घायल होकर, नीचे जमीन पर जा गिरी। और जहां वह गिरी वहां न•ादीक ही किसी साधु की कुटिया थी। साधु ने देखा तो द्रवित होकर सारस को अपनी कुटिया में ले आया और उसकी सेवा-सुश्रुषा करने लगा।
कविता की पंक्तियां दोहराता हुआ उसका बेटा सलीम जब उस प्रसंग तक पहुंचा जहां फिर से एक बार सारसों की टोली उड़ती हुई आकाश में जा रही है और जिसे देखकर जख़्मी सारस व्याकुल होकर उन्हें सम्बोधन करती है, तो सुनती हुई सलीमा फिर से बेचैन हो उठी :
''इक रो•ा फिर इक $का$िफला
देखा कहीं जाता हुआ,
सारस ने की ऐसी सदा
जिससे कि हिल जाए जमीं,
'ऐ सारसों कह दो यही
तुम में तो मेरा दिल नहीं?
या तुमने देखा हो कहीं
मुद्दत से मैं हूं मुन्त•ार।ÓÓ
सलीमा फिर से भावोद्वेलित हो उठी थी।
''तुम्हें कोई दु:ख है मां, जो इस नज़्म को सुनकर रोने लगती हो।ÓÓ
बेटे की मसें भीग रही थीं। कितना प्यारा लग रहा था सलीम। कुछ देर तक अपनी भीगी आंखों से उसके चेहरे को सहलाती रही फिर अपने आप ही बोल पड़ी :
''आज तक जो बात तुम सबसे छिपाती रही हूं वह आज बता दूंगी। घर के सभी लोगों को बता दूंगी।ÓÓ फिर धीरे से बोली :
''मैं जन्म से सिक्खणी हूं, बेटा।ÓÓ
क्षण भर के लिए सलीम की आंखें फैल गई, पर शीघ्र ही उसके होंठों पर हल्की सी मुस्कान फैल गई :
''तो क्या हुआ मां? इसमें छिपाने की क्या बात है?ÓÓ
मां तनिक हैरान हुई। उसने सोचा था कि वह सुनकर बेटे को धक्का सा लगेगा, पर ऐसा कुछ नहीं हुआ।
''जब पाकिस्तान बना तो मैं कहीं खो गई थी, मेरे मां-बाप और सगे संबंधी बसों में चढ़कर चले गए थे। मैं भीड़ में कहीं खो गई थी। तब मैं बहुत छोटी थी।ÓÓ
सलीम के होंठों पर अभी भी मुस्कान खेल रही थी। मां, जिसके बालों में सफेद रेशे, झलकने लगे हैं, कभी छोटी बच्ची भी रही होगी, रास्ता भटक जाती रही होगी।
''कहां खो गई थी, मांÓÓ सलीम ने हंसकर कहा।
''यहीं, इसी हसन अब्दाल में।ÓÓ
सलीम की उत्सुकता कुछ कुछ बढऩे लगी थी।
''तुम लोग किस मुहल्ले में रहते थे? किस गली में?ÓÓ
''मैं क्या जानूं बेटा, किस गली में ंरहते थे। कभी देखूं तो शायद पहचान लूं?ÓÓ
''तब तेरा नाम क्या था, मां?ÓÓ
''मुझे वीरो-वीरो कहते थे।ÓÓ
सलीम हंस पड़ा। ''यह क्या नाम हुआ मां?...फिर तेरा नाम सलीमा बे$गम किसने रखा?ÓÓ
''मैं क्या जानूं बेटा, जिसने पनाह दी होगी, जो मुझे अपने घर ले गया होगा उसी ने रखा होगा।ÓÓ
इस पर दोनों मां-बेटा हंस दिए।
''तब तो तू बड़ी गुडि़य़ा सी रही होगी। छोटी सी, चुलबुली सी, गलियों में भागती फिरती होगी। बालों में रिब्बन लगाती होगी।ÓÓ बेटे ने हंसकर कहा।
ढलती उम्र की मां के चेहरे में दूर बचपन की आकृति कहीं ढूंढे भी नहीं मिल सकती थी। सलीम के लिए सच्चाई वही थी, जो आंखों के सामने थी।
सलीमा निराश सी होने लगी। जो बात उसके दिल को वर्षों से मथ रही थी, उसके बेटे के लिए उसका कोई अर्थ नहीं रह गया था। तो क्या उसका मेरे लिए भी कोई अर्थ नहीं रह गया है? मेरा सगा-संबंधी कोई मिल भी जाए तो क्या होगा? मेरी •िांदगी बदल तो नहीं जाएगी। फिर मैं यों ही रोती-मरती क्यों रहती हूं?
पाकिस्तान बनने से पहले यह कस्बा कैसा रहा होगा, सलीम कुछ नहीं जानता था। उसके लिए इसकी कल्पना कर पाना ही कठिन था। जब हिन्दू भी यहां रहते थे और सिक्ख भी तो यह कस्बा कैसा रहा होगा? हिन्दू और सिक्ख औरतों बिना मुंह-सिर ढंके सड़कों पर जा रही है, और कहीं पर हिन्दू की दुकान है तो कहीं पर सिक्ख की और कहीं पर मुसलमान की। उसे यह सब बड़ा अनोखा सा लगा करता था।
''पर मां, इसमें रोने की क्या बात है? तू रो क्यों रही थी?ÓÓ
मां अपनी जगह हैरान थी कि बेटा उसके दिल के दर्द को समझ क्यों नहीं रहा है।
''हर साल जब सिक्खों की टोली गुरुद्वारे में माथा टेकने आती है तो मेरी आंखें उस टोली में अपने भाई को ढूंढती रहती हैं।ÓÓ
सलीम मां के चेहरे की ओर इकटक देखे जा रहा था।
''तेरा भाई टोली में आता है?ÓÓ
सलीमा ने सिर हिल दिया। ''मैं क्या जानूं आता है या नहीं आता। पर मेरा मन कहता है कि शायद आता हो। आखिर तो उसकी बहिन यहां खो गई थी ना।ÓÓ कहते-कहते सलीमा फिर से भावविह्वल हो उठी।
''जिस तरह मैं उसे याद करती हूं क्या मालूम वह भी मुझे याद करता हो, और घरवाले भी याद करते हों।ÓÓ
''और बरसों से, जब भी वह टोली आती है चिलमन के पीछे खड़ी तेरी आंखें उसे ढूंढती रहती हैं?ÓÓ
''हां, तो।ÓÓ
''मां, तू कैसी बहकी बहकी बातें करने लगी है। सिक्खों को यहां से गए दसियों साल हो चुके हैं। तेरे भाई को यहां आना था तो वह पूछ नहीं सकता था कि उसकी बहिन कहां रहती है।ÓÓ
''वह पूछे भी तो कौन बताएगा? कोई नहीं बताएगा।ÓÓ फिर, तनिक रुक कर बोली- ''क्या मालूम आया हो, क्या मालूम पूछा हो। उसे क्या मालूम अब मैं कहां रहती हूं।ÓÓ
बात तो सलीम की समझ में कुछ कुछ आ गई थी, पर उसके पीछे उसकी मां की बेचैनी उसकी समझ में अभी भी नहीं आई।
''तू समझती है चिलमन के पीछे खड़ी तू उसे पहचान लेगी? तीस बरस बाद?ÓÓ
सलीमा के मन में आया उसे कह दे : ''हां मेरा दिल पहचान लेगा, मेरा रोम-रोम पहचान लेगा।ÓÓ पर वह कुछ नहीं बोली।
सलीमा ने एकटक बेटे की ओर देखा। बेटा ज्य़ादा समझदार है। वह मेरी स्थिति की विडम्बना को झट से समझ गया है, पर मैं फिर भी इस भुलावे में डूबी रहना चाहती हूं।
इस पर सहसा ही सलीम बोल उठा।
''मां, अगर वह आज तुझे पहचान ले तो तू उसके साथ चली जाएगी?ÓÓ
मां को धक्का सा लगा। बेटा क्या पूछ रहा है।
''हाय, मैं क्यों जाऊंगी, मेरा घर-बार यहां पर है, मेरे जिगर-जान बच्चे यहां पर हैं।ÓÓ
''पर तू रोती जो रहती है।ÓÓ
''रोती हूं उन्हें एक न•ार देख पाने के लिए।ÓÓ
पर सलीमा मन ही मन घबरा गई। यह क्या बेटे ने पूछ लिया है? बेटे को तो शक हो सकता है ना। किसी को भी हो सकता है। जैसे मां तन्द्रा से जागी हो।
अब सलीमा के मन में दूसरी तरह की छटपटाहट शुरू हो गई। इससे तो बखेड़ा उठ खड़ा हो सकता है। घरवाले सोचेंगे, मैं यहां रहना नहीं चाहती हूं। हाय, यह मैं क्या कर बैठी? मैंने क्यों सलीम को दिल की बात बता दी?
''तुम्हें ढूंढने कोई आया भी होगा तो शुरू-शुरू में आया होगा, अब कौन आएगा? बेकार में मत रो, मां।ÓÓ
सलीमा कुछ देर तक चुप रही, फिर धीरे से बोली :
''उनके छैने-करताल सुनकर मेरा दिल कैसा हो आता है। यह मैं छोटी सी थी तब सुना करती थी। और कोई बात नहीं।ÓÓ
पर सलीम, हैरान सा, अब भी मां के चेहरे की ओर देखे जा रहा था। उसके लिए यह समझ पाना बड़ा कठिन था कि किन बारीक, अदृश्य तंतुओं से हम अपने अतीत के साथ जुड़े रहते हैं। वर्षों बीत जाने पर भी, और सब जानते-समझते हुए भी सलीमा अपने को उससे छुड़ा नहीं पाती।
कौन जाने इसका भाई जिंदा भी है या मर खप गया है। मां की अपनी जवानी ढल रही है वह तो जरूर बूढ़ा हो चुका होगा। उसके झुर्रियों भरे चेहरे में क्या इसे अपना भाई नजर आ जाएगा?
सलीम अभी भी मां के चेहरे की ओर देखे जा रहा था। मां से उसे बड़ा प्यार था। परिवार के सभी लोग मां से बड़ा प्यार करते थे। मां सभी को दुलारती थी। आज मां ने उसे ऐसी भेद की बात बताई थी जिसे वह अपने भाई-बहनों को इठला-इठला कर सुना सकता था। किसी को क्या मालूम कि वह जन्म से सिक्खणी थी, मेरे भाइयों को तो मालूम नहीं होगा, पर अब्बाजान को तो मालूम होगा, हमारी फूफियां भी जानती होंगी, पर हमें ंतो आज तक किसी ने नहीं बताया।
शाम के साए उतरने लगे थे जब फिर से छैने-करताल बजने की आवाज सुनाई दी। टोली लौट रही थी, स्टेशन की ओर जा रही थी। पर अब की बार सलीमा नहीं उठी। उसके मन को दूसरी ही चुभन परेशान करने लगी थी। जो कुछ मैं करती हूं निपट बेवकू$फी थी। इससे बखेड़ा उठ खड़ा हो सकता है। भावना के जिस कच्चे धागे से बंधी मैं वर्षों से झूल रही थी, वह निपट पागलपन था, इसमें कोई सार नहीं था।
यात्रियों की टोली जैसी धूल उड़ाती आई थी, वैसे ही धूल उड़ाती लौट गई।
सलीमा के मन में अतीत की यादों के अनगिनत टुकड़े जैसे बिखरे पड़े थे। कभी कोई उभरकर सामने आ जाता, कभी कोई। कुछ देर के लिए सामने आता तो बड़ा मनमोहक लगता, पर फिर कहीं डूब जाता। इन बिखरे टुकड़ों का अस्तित्व केवल उसके मन में था। मन में भी वे छायामात्र थे। अजीब बात है, जिनका कोई अस्तित्व नहीं, जो अपनी सारी सार्थकता खो चुके थे, वे भी सलीमा को इतना बेचैन कर सकते थे, करते रहे थे।
यात्री लौट गए। सलीमा धीरे-धीरे फिर से भावनाओं के भंवर में से निकल आई, धीरे-धीरे दूर बचपन के सगे संबंधी अतीत के धुंधलके में फिर से खो गए, और सलीम, महमूद, र$फीक और बिटिया मकसूदा जैसे भागते हुए आए और अपनी मां को घेर लिया। मकसूदा तो सीधा मां की गोद में आ बैठती थी। ... भरे पूरे घर में वह हर तरह संतुष्ट थी। दिन बीतने लगे, सलीमा का दिल ठिकाने आ गया, वह फिर से हंसने बोलने लगी।
बेटे अपने अपने कारोबार में लगे रहते। छोटा बेटा सलीम अपने इम्तहान की तैयारी में लग गया। उसका एक भाई काबुल से व्यापार करता था, मेवे, किशमिश मंगवाता था, मंझला खेती-बाड़ी देखता था। इम्तहानों के बाद सलीम कभी भाई के साथ काबुल चला जाता, कभी लाहौर जा पहुंचता। सभी अपने-अपने काम में उलझे रहते। सलीमा अपनी बेटी के विवाह की तैयारी में व्यस्त हो गई। दिन-महीने बीतते पता ही नहीं चले।
अबकी बार जब बैसाख महीने में सिक्ख यात्रियों का टोला आया तो बेटों में से कोई भी घर पर नहीं था। सलीमा के पति तो पहले ही रेलवे की नौकरी में कभी एक स्टेशन तो कभी दूसरे स्टेशन पर रहते थे, केवल गाहे-बगाहे ही घर पर आते।
अब की बार फिर टोला आया, वैसे ही छैने करतालें बजाता, सलीमा की नींद में रस घोलता। अब की बार भी सलीमा उनींदे में पुलक-पुलक गई। पर उसने करववट बदल ली। कहीं मन में बात बैठ गई थी कि अतीत के रिश्तों का मात्र एक छलावा सा रह गया है, वे अपना सार कब से खो बैठे हैं। उनसे चिपटे रहने से कोई लाभ नहीं, और इससे घरवालों के दिल में शक और शुबहा उठ सकते हैं।
पर जब छैने-करताल की आवाज घर के ऐन निकट पहुंची तो सलीमा फिर से उठ बैठी, और छज्जे पर जा पहुंची और चिलमन के पीछे खड़ी वर्षों से जाना-पहचाना दृश्य फिर से देखने लगी। प्रभात बेला के झुटपुटे में फिर से चांदी घुलने लगी थी जब टोला छज्जे के निकट पहुंच रहा था। नीले वस्त्रों से सज्जित निहंगों की टोली, वही पीले रंग के दस्तार सिर पर बांधे आगे-आगे चली आ रही थी। इसके पीछे वही गान मंडली, ढोलक, हारमोनियम छैने-करतालों से लैस। पर यह क्या? सड़क के किनारे-किनारे, सरदारों की टोली के साथ-साथ उसका बेटा सलीम चला आ रहा था, धीरे-धीरे चलता हुआ, टोली के ही किसी ऊंचे-लंबे वयोवृद्ध सरदार के साथ बतियाता हुआ।
यह क्या कर रहा है? अनायास ही सलीमा का दिल धक्-धक् करने लगा। वह सिर से पांव तक झन्ना उठी। सलीम किसके साथ बातें कर रहा है? यह ऊंचा-लंबा सरदार कौन है?
कुछ ही देर बाद, छज्जे के नीचे, बाहर खुलने वाली बैठक में घर-परिवार के लोग बैठे थे। न जाने तीनों भाई कहां से पहुंच गए थे। बड़े बेटे की बहू और छोटी मकसूदा भी और घर के और लोग। एक ओर को कुर्सी पर अधेड़ उम्र का मुदब्बर सा दिखने वाला सरदार, एक तरफ से दबी हुई पगड़ी, नीची न•ार किए चुपचाप बैठा था।
सलीमा के अंदर आने पर सरदार की नजरें ऊपर को उठीं। वह उठ खड़ा हुआ, उसकी आंखें सलीमा के चेहरे पर लगी थीं, जबकि परिवार के लोगों की आंखें सरदार पर लगी थीं कि कब उसकी आंखों में पहचान की चमक आएगी। पर उसे अधेड़ उम्र की औरत में नन्हीं वीरो के नाक-नक्श ढूंढे को भी नहीं मिल रहे थे। दूर पार की झलक भी नहीं मिल रही थी।
यही स्थिति सलीमा की भी थी।
सलीमा जब बैठ गई तो सरदार हाथ बांधकर बोला : ''हम भी यहीं के रहने वाले हैं जी। बंटवारे के समय मेरी छोटी बहिन •ारूर खो गई थी, हमने बहुत ढूंढा भी, हिंदुस्तान से भी ढूंढने आए थे, पर वह नहींमिली। मेरा नाम कुलबीर सिंह है जी, मेरी छोटी बहिन जो खो गई थी, उसका नाम कुलवंत था।ÓÓ
इस पर सलीम झट से बोला : ''पर मां, आप तो कहती थीं, आपका नाम वीरो था।ÓÓ
''हां, तो।ÓÓ सलीमा ने उत्तर दिया।
''कई घरों में वीरो कहकर बुलाते हैं जीÓÓ सरदार बोला- ''हम भी अपनी बहिन को वीरो ही कहकर बुलाते थे। हम यहां से थोड़ी दूर पिछवाड़े के एक मुहल्ले में रहते थे। फिर हाथ बांधते हुए उसने सलीमा से पूछा : ''आप अपना अता-पता बताओ जी, आपके पिता का नाम?ÓÓ
''दार जी!ÓÓ सलीमा ने झट से कहा।
सरदार मुस्करा दिया।
''यह तो कोई नाम न हुआ जी, सिक्खों के घरों में तो पिता को दारजी ही कहकर बुलाते हैं।ÓÓ
''भाई का नाम?ÓÓ
''वीर जी!ÓÓ
सरदार फिर मुस्करा दिया।
''सिक्खों में बड़े भाई को वीर जी ही कहकर बुलाते हैं। अपने घर का कुछ अता-पता बताओ जी।ÓÓ
पर सलीमा को न तो अपने मुहल्ले का नाम मालूम था, न अपनी गली का।
''वहां गली सिरे पर पत्थर की बुत्ती थी, और पास वाले घर में हरे रंग के दरवाजे खिड़कियां थीं, एक शीशा टूटा हुआ था।... हमारे घर के बाहर भैंस बंधी रहती थी और वहीं कहीं मैदान में एक पेड़ था।ÓÓ
देर तक अता-पता ढूंढने पर भी कोई बात पकड़ में नहीं आ रही थी। उधर दोपहर ढलने लगी थी, और कुछ देर में यात्रियों की टोली फिर से छैने-करताल बजाती लौटने लगेगी। अधेड़ उम्र का सरदार शंकित सा हो उठा और कुछ-कुछ बेचैन होने लगा। घंटे भर में सांझ हो जाएगी। अपनी टोली के साथ निकल जाने में ही बेहतरी है। मैं यहां क्योंकर चला आया? इस लड़के की बातों में आ गया। दोनों की आंखों में दूरी उतर आई थी। सलीमा समझे बैठी थी कि भाई पर नजर पड़ते ही उसका रोम-रोम खिल उठेगा और वह झट से उसे पहचान लेगी। पर यहां रगों में हरकत तक नहीं हुई। दो अजनबियों की तरह वे एक दूसरे के सामने बैठे थे।
तभी गुरुद्वारे की ओर से छैने-करताल बजने की आवाजें आने लगीं। सरदार ने चैन की सांस ली, और उठ खड़ा हुआ।
''मुझे तो कुछ भी याद नहीं पड़ता जी, इन्हें कुछ याद हो तो बताएं।ÓÓ
सरदार उठ खड़ा हुआ। तनिक झुके हुए कंधे, माथा रेखाओं से अटा हुआ। सलीमा सोच रही थी, मेरे वीर जी का चेहरा तो कैसा दमकता था, वह तो कभी पेड़ों पर चढ़ता, कभी छलांगे लगाता, चलता तो भी कुलांचे भरता हुआ।
उधर सरदार भी सोच रहा था, कहां उसकी छोटी सी, चुलबुली बहिन वीरो, और कहां यह ढलती उम्र की महिला, जिसके चेहरे की मांसपेशियां ढीली पड़ रही हैं।
सरदार ने सलीम को संबोधन करते हुए कहा : ''बरखुरदार, तुम्हें मुगालता हुआ है। मेरी बहिन तो जरूर गलियों में खो गई थी पर अब वह न जाने कहां पर है।ÓÓ और बाहर चलने को हुआ।
सलीमा को इस बात का कटु अहसास होने लगा था कि अतीत का दामन पकड़े रहने से धूल-मिट्टी ही हाथ लगी है। मानो एक विकराल सत्य उसकी आंखों के सामने खुलने लगा था।
यात्रियों की टोली छैने-करताल बजाती और निकट पहुंच गई थी। सरदार ने सड़क की ओर खुलने वाले दरवाजे का रुख किया। सलीमा की ओर उसने पीठ मोड़ी ही थी जब सलीमा झट से बोली : ''जरा रूको, सरदार जी।ÓÓ सहसा ही सलीमा के मुंह से निकला।
सरदार रुक गया।
''एक बात पुछूं?ÓÓ सलीमा ने कहा।
''कहो बहिन।ÓÓ
''कभी बचपन में आप पेड़ से गिरे थे? हमारे घर के पीछे मैदान में एक पेड़ था। उस पर मेरे वीर जी बहुत चढ़ते थे।ÓÓ
''गांव में, बहिन जी, सभी लड़के पेड़ों पर चढ़ते हैं। मैं भी चढ़ता रहता था।ÓÓ
सलीमा झेंप गई, पर बचपन के दिनों का एक दृश्य उसकी आंखों के सामने घूम रहा था।
''एक बार मेरे वीर जी पेड़ पर से गिरे थे और उनका पैर नीचे पड़ी किसी चीज से कट गया था। बहुत खून बहा था। घरवालों ने मेरी चुन्नी फाड़कर उनका •ाख्म बांधा था। मुझे याद है। बहुत खून बहा था।ÓÓ
सरदार ठिठक गया। उसकी आंखें फैल गई। वह बैठक में लौट आया और कुर्सी पर बैठकर अपनी दायीं टांग पर से सलवार का पाइंचा ऊपर को उठाया। टखने के ऊपर, •ाख्म के निशान, एक उभरी हुई रेखा सा, सचमुच मौजूद था।
''यह तो ठीक है। वीरो की चुन्नी फाड़कर घरवालों ने पट्टी बांधी थी।ÓÓ सरदार की आंखों में एक चमक सी आई, वह मुस्कराया और सलीमा की ओर देखने लगा।
''हमारे घर में एक टांगा भी था।ÓÓ सलीमा कह रही थी, ''उस पर बैठकर हम लोग बाहर झलारों पर जाया करते थे।ÓÓ
सलीमा के दिल में अकुलाहट सी हुई। पर उसका मन अभी भी उस वयोवद्ध सरदार को अपना भाई कबूलने पर तैयार नहीं था। पर उसकी पिण्डली पर खिंची पीली सी रेखा दिल को बुरी तरह कुरेदने लगी थी। उसकी आंखें कभी ऊंचे-लम्बे सरदार की ओर उठतीं, कभी पलकें झुक जातीं।
तभी उसके कानों में निकट आती छैने-करतालों की ध्वनियां पडऩे लगीं। उन्हें सुनते हुए उसका मन फिर से बेचैन होने लगा। यात्रियों की टोली घर के निकट आ पहुंची थी। सरदार फिर से उठ खड़ा हुआ। उसके मन में संशय अभी भी बना हुआ था। पर उसकी आंखों के सामने पेड़ पर से गिरने वाला दृश्य भी सजीव होकर उभर आया था। संशय की जकडऩ अभी भी ढीली नहीं हो पाई थी। सरदार ने हाथ जोड़ दिए।
''अब तो चलूंगा, बहिन जी, पर अगर मेरी बहिन मुझे मिल गई है तो मेरे धन्न भाग। वर्षों का बिछोड़ा...।ÓÓ कहते हुए उसकी आंखें छलक आई।
सलीमा भी उद्वेलित महसूस कर रही थी पर अपने को संयत किए हुए थी। अंदर से उसकी रग अभी तक नहीं फड़की थी। मन में अकुलाहट थी, पर साथ ही साथ यह विचार भी उठ रहा था कि क्या मालूम यह सब झूठ ही निकले, क्या मालूम यह भी छलावा ही साबित हो।
लगभग छ: महीने के बाद सलीमा और उसके परिवार के लगभग सभी सदस्य रेलगाड़ी में बैठे हंस-बतिया रहे थे। कुलबीर वीर जी का आग्रह था कि सभी लोग अमृतसर पहुंचेंगे। डिब्बे की सीटों के नीचे फलों, मिठाईयों के टोकरे रखे थे। दो बक्से उपहारों से भरे थे। सलीमा अपने हाथ से फुलकारी बना कर लाई थी। रेलगाड़ी के डिब्बे में मेले का सा समां था। लड़कियां हिन्दुस्तान देखने के लिए बेताब थीं।
कुलबीर वीर जी की छोटी बेटी की शादी थी।
''मैं तो शादी के बाद सीधा अजमेर शरी$फ की •िायारत करने जाऊंगा।ÓÓ मंझला बेटा कह रहा था... और वहां से सीधे आगरा।ÓÓ
 सभी अपने-अपने कार्यक्रम बना रहे थे।
एक ओर को सलीमा की बगल में बेटा सलीम, अपनी मां को सुना रहा था कि उसने कैसे अपने 'मामाजीÓ को ढूंढ निकाला था, कहां कहां गया था।
''मां तुम मानोगी नहीं, मुझे इनका पता अचानक ही मिल गया। मैं एक बस में बैठा था। मेरी बगल में एक बूढ़े सरदार जी बैठे थे। मैंने अचानक ही उनसे पूछ लिया कि कभी वह हसन अब्दाल (पंजा साहिब) की यात्रा पर गए हैं। वह पंजा साहिब की यात्रा पर तो नहीं गए थे, पर वह पास वाले कस्बे के रहने वाले थे। तुम मानोगी नहीं, मैं इतना थक गया था कि दूसरे दिन घर लौटने वाला था। उन बूढ़े सरदार जी ने कुलबीर मामाजी का पता बताया। कहने लगा उनकी बहिन खो गई थी। ''कुलबीर का बाप और मैं एक ही स्कूल में पढ़े हैं। तू उससे मिल ले। क्या मालूम उसकी बहिन ही तुम्हारी मां हो।ÓÓ
सलीम सुनाए जा रहा था, और उसकी मां की आंखें उसके चेहरे को सहला रही थी।