Monthly Magzine
Sunday 19 Nov 2017

\'अक्षर पर्व\' में कई बात हैं, जो किसी अन्य पत्रिका में नहीं हंै। सम्पादकीय नहीं है पर सम्पादकीय से ऊँची बात है प्रस्तावना।

 

 'अक्षर पर्व' में कई बात हैं,  जो किसी अन्य पत्रिका में नहीं हंै। सम्पादकीय नहीं है पर सम्पादकीय से ऊँची बात है प्रस्तावना। प्रस्तावना ऐसी कि आईना की तरह सब कुछ दिखा देती है। धन्य हैं ललित सुरजन, जिन्होंने पत्रिका सम्पादन की परम्परागत शैली से आगे की विधा को आयाम दिया। और पत्रिका के अंत में उपसंहार। संभवत: यह प्रयोग किसी पत्रिका ने नहीं किया। सर्वमित्रा सुरजन की सुध-बुध ने पत्रिका की प्रस्तावना को सम्प्राप्ति की दिशा दी, यह सुफल संयोग है। तीसरी बात साहित्य की सर्वविधा के साथ पत्रिका के मध्य रम्य-रचना की रचनात्मक सुधी! अन्यत्र किसी पत्रिका में नहीं! तत्वत: अक्षर पर्व मनाने वाली पहली पत्रिका! साधुवाद!
डॉ. डी. एन. प्रसाद 

  प्राध्यापक महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय,  गांधी हिल्स, वर्धा