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Saturday 18 Nov 2017

अक्षर पर्व का जून-2015 अंक रचना वार्षिकी जो भीष्म साहनी जन्मशती विशेषांक के रूप में प्रकाशित हुआ है आज ही उसका पाठ पूरा हुआ है।

 

हितेश व्यास

, 1-मारुति कॉलोनी,

पंकज होटल के पीछे,

नयापुरा, कोटा-324001 (राजस्थान)

अक्षर पर्व का जून-2015 अंक रचना वार्षिकी जो भीष्म साहनी जन्मशती विशेषांक के रूप में प्रकाशित हुआ है आज ही उसका पाठ पूरा हुआ है। ललित सुरजन की प्रस्तावना से सर्वमित्रा सुरजन के उपसंहार तक, जो कि नदी के दो पाटों की तरह हैं, भीष्म साहनी का सृजन प्रवाह है, लगभग सवा सौ पृष्ठों में भीष्म साहनी का कोई पक्ष और पहलू अछूता नहीं रहा है। अजय चंद्रवंशी, प्रो. दिनेश कुमार चौबे, जवरी मल्ल पारख (मेरे शहर जोधपुर के वासी मेरे पूर्व पाठी, हसन जमाल की गली में रहने वाले), प्रो. आलोक भल्ला (अनुवाद- पंकज सिंह), और स्वयं भीष्म साहनी ने तमस को खंगाला है। अंक की यह एक खासियत है कि कोई रचना अतिदीर्घ नहीं है, प्रो. पारख का आलेख इसलिए लंबा है कि उसमें उपन्यास व फिल्म दोनों की समीक्षा है। आलोक भल्ला के प्रश्न बहुत तीखे हैं।  यह कथन कि सरलता के सामने कुटिलता विचलित हो जाती है, भीष्म साहनी पर अक्षरश: लागू होता है। आनंद स्वरूप श्रीवास्तव, माताचरण मिश्र ने नाटक वांड्चू पर चर्चा की है। मिश्र ने वांड्चू की तुलना में मंटों की टोबा टेकसिंह को उचित रखा है। हेमलता, तरसेम गुजराल और डॉ. विश्वनाथ त्रिपाठी ने उपन्यास मय्यादास की माड़ी का विवेचन किया है। मंजू कुमारी ने नाटक हानूश का आकलन किया है। सरिता कुमारी ने 'बसन्तीÓ का, डॉ. श्यामबाबू शर्मा ने 'चीफ की दावतÓ कहानी का मूल्यांकन किया है। शेषनारायण सिंह ने नाटक 'कबिरा खड़ा बाजार मेंÓ की अंतर्कथा कही है, डॉ. वंदना शर्मा ने 'मुआवजेÓ की प्रासंगिकता सिद्ध की है। इस सारे मूल्यांकन के बीच भीष्म साहनी की कहानी 'मैं भी दिया जलाऊंगा, मांÓ का पाठ उनकी भाषा भंगिमा की बेहतरीन न•ाीर है। इस अंक की एक विशेषता यह है कि इसमें हिन्दुस्तान भर के लेखक हैं। इसी अंक की एक खूबी यह है कि लेखकों में विख्यात और अल्पज्ञात सभी भांति के हैं। अजय कुमार शर्मा और परीक्षित साहनी ने भीष्म साहनी और बलराज साहनी दोनों के व्यक्तित्वांतर पर प्रकाश डाला है, अर्चना जैन, चंचल चौहान,जीवन सिंह ठाकुर, कमल कुमार (भीष्म साहनी से बातचीत), केवल गोस्वामी, राजेन्द्र शर्मा, डॉ. रामविनय शर्मा, राजकुमार दुबे, संध्या प्रेम, सेवाराम त्रिपाठी ने समग्र मूल्यांकन किया है। सूर्यबाला का संस्मरण आत्मीयता से लबरेज है। ब्रजकुमार पांडेय ने प्रलेस व इप्टा के संदर्भ में भीष्म की भूमिका रेखांकित की है।