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Wednesday 22 Nov 2017

नागार्जुन का कवि कर्म: परिचर्चा में पुनश्च


प्रिय सर्वमित्रा जी
नागार्जुन का कविकर्म नामक मेरे लेख (अक्षर पर्व मई 2015) की परिचर्चा में यह पुनश्च जोडऩा जरूरी समझता हूँ ।  
शासन की बंदूक के मूल पाठ में संशोधन सुझाते हुए मैंने एक दोहा छोड़ दिया था क्योंकि जिस आतंक ने सत्य, अहिंसा, विनोबा आदि सबको मूक कर दिया हो, उसके ऊपर सबका थूकना व्यावहारिक नहीं प्रतीत हुआ था। आशा थी कि थूक जैसे उत्तम तुक के उपयोग का सुझाव कोई दे सकेगा पर सब ओर छाए सन्नाटे से विचलित हो मैंने ही उस दोहे को इस रूप में कविता का हिस्सा बनाना उपयुक्त समझा कि इस हिटलरी गुमान पर कोई सका न थूक, यहाँ-वहाँ, चारों तरफ  शासन की बंदूक। इसे कविता का पहला दोहा मानते हुए पूरी कविता इस भांति पढ़ी जा सकती है।
उस हिटलरी गुमान पर कोई सका न थूक, यहाँ वहाँ, चारों तरफ  शासन की बंदूक ।
सत्य स्वयं घायल हुआ, गई अहिंसा चूक, जहाँ तहाँ दगने लगी शासन की बंदूक
बढ़ी बधिरता दसगुनी, बने विनोबा मूक, सबको अन्धा कर रही, शासन की बंदूक
खड़ी हो गई चांपकर कंकालों की हूंक, नभ में विपुल विराट सी शासन की बंदूक
घने कुंज की ओट ले, रही कोकिला कूक, बाल न बांका कर सकी शासन की बंदूक।
मेरा सुझाव है कि यदि हिंदी प्रेमी इस पाठ से सहमत हों तो उन्हें किन्हीं संगीत रचनाकारों की सहायता ले इसे एक उद्बोधन गीत की भाँति प्रचारित-प्रसारित करना चाहिए । इसमें निहित यह संदेश महत्वपूर्ण है कि कोई भी तानाशाह कुछ समय के लिए सबकी और सब समय के लिए कुछ की बोलती भले बंद कर दे,  लेकिन ऐसा कोई भी तानाशाह नहीं हो सकता जो सब समय के लिए सबकी आवाज खामोश कर सके। घने कुंज की ओट ले शासन की बंदूक को चुनौती देने वाली कोयल का संदेश यही है। हम आप सभी जानते हैं कि कोयल हिंदी कविता में पारंपरिक रूप से आह्वान, ऊर्जा और क्रांति का संदेश देकर आती रही है।
माखनलाल चतुर्वेदी की अनेक कविताओं यथा कैदी और कोकिला में प्रतिरोध का तीखा स्वर बिलकुल स्पष्ट है। छापामार दस्ते जैसी मार करने वाली कोयल के मुकाबले शासन की बंदूक बेबस रह जाएगी, यह संदेश नागार्जुन के वास्तविक क्रांतदर्शी, विद्रोही स्वर को भलीभांति संप्रेषित कर सकेगा, इसमें कोई संदेह नहीं। कवि के मूल पाठ के साथ जो छूट यहां ली गई है, उसके औचित्य-अनौचित्य की चर्चा अलग से अवश्य हो सकती है। मैं समझता हूं कि यदि किसी असावधानी या जल्दबाजी के कारण कवि का कथ्य अपूर्ण या असंप्रेषित रह गया हो तो उसके पाठकों-प्रशंसकों का दायित्व होना चाहिए कि वे उचित रीति से कवि के संदेश को पुन: नियोजित कर सकें। कवि के प्रति उनकी भावना इस रूप में अभिव्यक्त होने में कोई हर्ज नहीं।  
आशा है, यह निवेदन आपके सौजन्य से नागार्जुन के सहृदय पाठकों तक पहुंच सकेगा । प्रस्तावित पाठ में कोई अन्य फेर बदल हो तो आशा है आपकी पत्रिका में उसके लिए भी जगह निकल सकेगी ।
सधन्यवाद आपका,  अजितकुमार