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Monday 20 Nov 2017

दोपहर का भोजन : कहां तो तय था चिराग हर घर के लिए


पल्लव
393 डीडीए, कनिष्क अपार्टमेंट्स
ब्लाक सी एंड डी
शालीमार बाग़,
दिल्ली-110088
अमरकांत की कहानी डिप्टी कलक्टरी पढि़ए तो मालूम होता है प्रेमचंद के पात्र नये नाम लिए सीधे चले आ रहे हैं। वैसा ही रंग-रूप, बोली-बानी, चिंताएं और भय। किसी कहानी और कहानीकार के लिए यह बहुत सम्मान की बात नहीं है लेकिन अमरकांत जस का तस वैसा ही वातावरण नहीं बनाते उनके यहाँ वैसा लगने पर भी नये तनाव और दबाव हैं जो कहानी को प्रेमचंद के युग से आगे ले जाने में सक्षम हैं। लेकिन क्या इतने भर से प्रेमचंद की परम्परा के असली वारिस बन जाते हैं अमरकांत? अमरकांत की कहानी दोपहर का भोजन में इसका उत्तर खोजा जा सकता है। स्वतन्त्र भारत की एक मामूली गृहस्थी का जैसा खिन्न और विषादपूर्ण चित्र यहाँ खींचा गया है वह सचमुच आपको अवसाद में डाल देता है। इस विषाद का कारण है गरीबी। देश आजाद हो गया, हम स्वाधीन हो गए लेकिन हाय यह गरीबी न गई। आगि बड़वागी ते बड़ी है आगि पेट की। मध्यकाल में तुलसीदास की देखी-भोगी यह आग अभी तक धधक रही है और हम कुपोषण की बातों से समय को चुभलाते हैं।
विडम्बना यह है कि मुंशी चन्द्रिका प्रसाद एक शहर में रहते हैं और उन्हें मध्यवर्गीय या निम्न मध्यवर्गीय ही माना जाता है। उनकी नौकरी थी जो छूट गई है और अब वे बेरोजगार हैं। महज पैंतालीस की वय में मुंशी चन्द्रिका प्रसाद का हुलिया तेजी से बूढ़े और लाचार आदमी में बदल गया है। कहानी की शुरुआत यह नहीं है। जहां कहानी शुरू हुई है वहां भूखी प्यासी सिद्धेश्वरी दोपहर के भोजन पर अपने परिवार की प्रतीक्षा कर रही है और तभी अचानक उसे मालूम हुआ कि बहुत देर से उसे प्यास लगी है। वह मतवाले की तरह उठी और गगरे से लोटा-भर पानी लेकर गट-गट चढ़ा गयी। यह क्यों हुआ? पेट की आग पानी से नहीं अन्न से ही बुझाई जा सकती है। पानी से बुझाने की कोशिश फि जूल है क्योंकि उससे खाली पानी कलेजे में लग गया और वह हाय राम कहकर वहीं जमीन पर लेट गयी। कलेजे में कटार तो लगती है और कभी-कभी वह मुंह को भी आता है लेकिन कलेजे में पानी लगना, बहुत अनहोनी बात है जिसे भूख और प्यास को दबाने वाला मनुष्य ही जान सकता है। यह सिद्धेश्वरी है। घर की लक्ष्मी। बाबू चन्द्रिका प्रसाद की अर्धांगिनी और तीन बेटों की माँ। सबसे बड़ा रामचन्द्र एक अखबार में अपनी मर्जी से प्रूफ ऱीडरी सीख रहा है। अमरकांत ने लिखा है - वह एक स्थानीय दैनिक समचार पत्र के दफ्तर में अपनी तबीयत से प्रूफ रीडरी का काम सीखता था। पिछले साल ही उसने इंटर पास किया था। यहाँ तबीयत का ऐसा प्रयोग दुर्लभ है जो बेरोजगारी के दंश को किसी तरह ढाँक कर रख देता है। दूसरा मोहन हाईस्कूल की प्राइवेट परीक्षा देने की तैयारी कर रहा है। तीसरा छह साल का है और बीमार लड़का नंग-धड़ंग पड़ा था। उसके गले तथा छाती की हड्डियां साफ़ दिखाई देती थीं। उसके हाथ और पैर बासी ककडिय़ों की तरह सूखे और बेजान पड़े थे और उसका पेट हंडिया की तरह फूला हुआ था। उसका मुख खुला हुआ था और उस पर अनगिनत मक्खियां उड़ रही थीं। यह प्रमोद है जो पता नहीं कितने दिन जीने का योग लिखवाकर धरती पर आया है। सिद्धेश्वरी अपने पांच प्राणियों के परिवार को नष्ट होते देख रही है और अत्यंत भयभीत है। उसके भय अनेक हैं जिन्हें वह भरसक दबा रही है लेकिन ये रह-रहकर भय उसके चेहरे पर फू ट आते हैं। बड़े लड़के से मंझले के बारे में कहना- किसी लड़के के यहाँ पढऩे गया है, आता ही होगा। दिमाग उसका बड़ा तेज है और उसकी तबीयत चौबीस घंटे पढऩे में ही लगी रहती है। हमेशा उसी की बात करता है। पति बाबू चन्द्रिका प्रसाद के बड़े लड़के के सम्बन्ध में पूछने पर कहती है- हमेशा बाबूजी, बाबूजी किये रहता है। बोला- बाबूजी देवता के समान हैं। पागल नहीं हैं, बड़ा होशियार है। उस जमाने का कोई महात्मा है। मोहन तो उसकी बड़ी इज्जत करता है। आज कह रहा था कि भैया की शहर में बड़ी इज्जत होती हैं, पढऩे-लिखनेवालों में बड़ा आदर होता है और बड़का तो छोटे भाइयों पर जान देता हैं। दुनिया में वह सबकुछ सह सकता है, पर यह नहीं देख सकता कि उसके प्रमोद को कुछ हो जाए। यह झूठ उसके भीतर के गहरे डर की उपज है।
कहानी के विख्यात आलोचक विश्वनाथ त्रिपाठी ने अमरकांत की ही एक प्रसिद्ध कहानी हत्यारे के संबंध में लिखा है कि उसमें स्वतन्त्र भारत के भय का सर्वाधिक प्रामाणिक चित्र है तो क्या दोपहर का भोजन को स्वतन्त्र भारत के भय का सर्वाधिक प्रामाणिक पारिवारिक चित्र कहेंगे? इस स्त्री की विडम्बना इसके नाम में ही विद्यमान है-सिद्धेश्वरी। जो सब सिद्ध कर सकती है या सिद्ध करना जानती हो और असलियत यह है कि वह अपनी संतानों को पेट भर भोजन भी नहीं दे पा रही। विडम्बना यह भी है कि अपने पति और दोनों बेटों की मनुहार कर रही है कि वे और रोटी ले लें और वे  हैं कि भूख होने पर भी रोटी नहीं लेते। कहानी का अंत उसी के भोजन करने से हुआ है जब घर भर के लोग खा चुके तब वह बची हुई एक मोटी, भद्दी और जली रोटी का आधा टुकड़ा खा रही है। केवल आधा टुकड़ा। क्योंकि दूसरा टुकड़ा प्रमोद के लिए जो छोड़ दिया गया है। उसने पहला ग्रास मुंह में रखा और तब न मालूम कहां से उसकी आंखों से टप-टप आंसू चूने लगे। यह निरुपायता का चरम क्षण है। यहां आकर यह कहानी गरीबी, बेरोजगारी और भूख के साथ और उससे भी आगे एक स्त्री के दु:ख व पीड़ा का भयानक चित्र बन जाती है। स्त्री का यह भयानक चित्र जीवन के सबसे सच्चे सवालों से टकराकर बन रहा है इसलिए उसके रंग सादे, धूसर और चमकहीन हैं। अमरकांत इन सादे और निराश रंगों में जीवन की सारी सच्चाई का मनोसंधान कर लेते हैं। इस स्त्री के भय तो देखिए।
बड़ा बेटा रामचन्द्र घर आकर थकान के मारे लेट गया है। सिद्धेश्वरी की पहले हिम्मत नहीं हुई कि उसके पास आए और वहीं से वह भयभीत हिरनी की भांति सिर उचका-घुमाकर बेटे को व्यग्रता से निहारती रही। किंतु, लगभग दस मिनट बीतने के पश्चात भी जब रामचंद्र नहीं उठा, तो वह घबरा गई। पास जाकर पुकारा- बड़कू, बड़कू! लेकिन उसके कुछ उत्तर न देने पर डर गई और लड़के की नाक के पास हाथ रख दिया। सांस ठीक से चल रही थी।
बड़े बेटे के सबसे छोटे बेटे के बारे में पूछने पर सिद्धेश्वरी फि र झूठ बोल गई, आज तो सचमुच नहीं रोया। वह बड़ा ही होशियार हो गया है। कहता था, बड़का भैया के यहां जाऊंगा। ऐसा लड़का.. पर वह आगे कुछ न बोल सकी, जैसे उसके गले में कुछ अटक गया। कल प्रमोद ने रेवड़ी खाने की जिद पकड़ ली थी और उसके लिए डेढ़ घंटे तक रोने के बाद सोया था।
मंझले लड़के के खाने का दृश्य है- मोहन अपनी मां की ओर देखकर फीकी हंसी हंस पड़ा और फिर खाने में जुट गया। वह परोसी गई दो रोटियों में से एक रोटी कटोरे की तीन-चौथाई दाल तथा अधिकांश तरकारी साफ  कर चुका था। सिद्धेश्वरी की समझ में नहीं आया कि वह क्या करे। इन दोनों लड़कों से उसे बहुत डर लगता था। अचानक उसकी आंखें भर आईं। वह दूसरी ओर देखने लगी।
सिद्धेश्वरी की समझ में नहीं आ रहा था कि क्या कहे। वह चाहती थी कि सभी चीजें ठीक से पूछ ले। सभी चीजें ठीक से जान ले और दुनिया की हर चीज पर पहले की तरह धड़ल्ले से बात करे। पर उसकी हिम्मत नहीं होती थी। उसके दिल में जाने कैसा भय समाया हुआ था।
भोजन के दृश्य भी ध्यान से देख लें-   
पहले बड़े लड़के का उल्लेख है, रामचंद्र ने खाने की ओर दार्शनिक की भांति देखा। कुल दो रोटियाँ, भर-कटोरा पनियाई दाल और चने की तली तरकारी।
अब मंझले बेटे के भोजन का दृश्य है जब वह भोजन समाप्त कर चुका है। सिद्धेश्वरी ने चौंकते हुए पूछा, एक रोटी देती हूँ?
मोहन ने रसोई की ओर रहस्यमय नेत्रों से देखा, फिर सुस्त स्वर में बोला, नहीं। सिद्धेश्वरी ने गिड़गिड़ाते हुए कहा, नहीं बेटा, मेरी कसम, थोड़ी ही ले लो। तुम्हारे भैया ने एक रोटी ली थी। मोहन ने अपनी माँ को गौर से देखा, फिर धीरे-धीरे इस तरह उत्तर दिया, जैसे कोई शिक्षक अपने शिष्य को समझाता है, नहीं रे, बस, अव्वल तो अब भूख नहीं। फिर रोटियां तूने ऐसी बनाई हैं कि खाई नहीं जातीं। न मालूम कैसी लग रही हैं। खैर, अगर तू चाहती ही है, तो कटोरे में थोड़ी दाल दे दे। दाल बड़ी अच्छी बनी है।
और यह रहे पतिदेव मुंशी चन्द्रिका प्रसाद के भोजन का दृश्य- दो रोटियाँ, कटोरा-भर दाल, चने की तली तरकारी। मुंशी चंद्रिका प्रसाद पीढ़े पर पालथी मारकर बैठे रोटी के एक-एक ग्रास को इस तरह चुभला-चबा रहे थे, जैसे बूढ़ी गाय जुगाली करती है। फिर आगे भोजन समाप्ति का दृश्य भी दर्शनीय है- सिद्धेश्वरी ने पूछा, बड़का की कसम, एक रोटी देती हूँ। अभी बहुत-सी हैं।
मुंशी जी ने पत्नी की ओर अपराधी के समान तथा रसोई की ओर कनखी से देखा, तत्पश्चात किसी छंटे उस्ताद की भांति बोले, रोटी? रहने दो, पेट काफी भर चुका है। अन्न और नमकीन चीजों से तबीयत ऊब भी गई है। तुमने व्यर्थ में कसम धरा दी। खैर, कसम रखने के लिए ले रहा हूं। गुड़ होगा क्या? सिद्धेश्वरी ने बताया कि हंडिया में थोड़ा-सा गुड़ है। मुंशी जी ने उत्साह के साथ कहा, तो थोड़े गुड़ का ठंडा रस बनाओ, पीऊंगा। तुम्हारी कसम भी रह जाएगी, जायका भी बदल जाएगा, साथ ही साथ हाजमा भी दुरूस्त होगा। हां, रोटी खाते-खाते नाक में दम आ गया है। यह कहकर वे ठहाका मारकर हंस पड़े। निराला की कविता पंक्ति है-वह हंसी बहुत कुछ कहती थी, फि र भी अपने में रहती थी, सबकी सुनती थी, सहती थी, देती थी सबके दांव, बंधु! मुंशी चन्द्रिका प्रसाद का यह ठहाका असल में बहुत कुछ कह रहा है। बहुत कुछ सह रहा है। कहानी में एक बार और हंसी का दृश्य है जब सिद्धेश्वरी मंझले को भोजन करवा रही थी- सिद्धेश्वरी वहीं बैठकर पंखा डुलाती हुई इस तरह बोली, जैसे स्वप्न में बड़बड़ा रही हो, बड़का तुम्हारी बड़ी तारीफ  कर रहा था। कह रहा था, मोहन बड़ा दिमागी होगा, उसकी तबीयत चौबीसों घंटे पढऩे में ही लगी रहती है। यह कहकर उसने अपने मंझले लड़के की ओर इस तरह देखा, जैसे उसने कोई चोरी की हो। मोहन अपनी मां की ओर देखकर फ ीकी हंसी हंस पड़ा और फि र खाने में जुट गया। वह परोसी गई दो रोटियों में से एक रोटी कटोरे की तीन-चौथाई दाल तथा अधिकांश तरकारी साफ  कर चुका था। यह मोहन की फ ीकी हंसी है जो बड़ों को दांव देने वाली है। बड़े बेटे का दार्शनिक की भांति भोजन को और मोहन का रहस्यमय नेत्रों से रसोई की तरफ  देखना ऐसा है जो व्यंजक है। आगे पतिदेव का अपराधी की तरह रसोई की ओर कनखी से देखना भी आया है।  हंसना-देखना दोनों क्रियाएं यहां जिस अवसाद को उत्पन्न कर रही हैं उसका जन्म गरीबी से हुआ है। बाबू चन्द्रिका प्रसाद की छंटनी हो गई थी लेकिन आज के हिन्दुस्तान में ऐसे कितने परिवार हैं जो नौकरी की आस में एक कठोर प्रतीक्षा कर रहे हैं। उनकी कहानी क्या इससे भिन्न हो सकती है? यहाँ यह भी अनायास नहीं है कि प्रमोद की देह की तुलना ककड़ी और हांडी से की गई है। अर्थात भोजन के ही उपादानों से। बड़े लड़के रामचन्द्र की रोटी के बचे आखिऱी कौर की पान के बीड़े से, एक-दो क्षण बाद रोटी के टुकड़े को धीरे-से हाथ से उठाकर आँख से निहारा और अंत में इधर-उधर देखने के बाद टुकड़े को मुँह में इस सरलता से रख लिया, जैसे वह भोजन का ग्रास न होकर पान का बीड़ा हो। रामचन्द्र का बिगड़कर अपनी मां से कहना-अधिक खिलाकर बीमार डालने की तबीयत है क्या? तुम लोग जरा भी नहीं सोचती हो। बस, अपनी जिद। भूख रहती तो क्या ले नहीं लेता? ऐसा करूण व्यंग्य है जो स्वातंत्र्योत्तर भारत के सभी भरे पेट वाले नागरिकों को कठघरे में ला पटकता है। यथार्थ का जादू ऐसी सादगी से ही पैदा होता है बादलों, परिंदों, पाजेबों या एकांतों में नहीं। वह घर के भीतर से नहीं बल्कि घर के बीचों बीच से आता है और हमें लाजवाब कर देता है जबकि सिद्धेश्वरी रो रही है, भूखा प्रमोद जागकर रोना शुरू करने वाला है, नौकरी से हाथ धोकर बाबू चन्द्रिका प्रसाद औंधे मुंह सोये पड़े हैं और सारा घर मक्खियों से भन-भन कर रहा है।