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Sunday 19 Nov 2017

कैकेयी के बहाने एक आधुनिक स्त्री विमर्श


राहुल राजेश
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रामकिशोर मेहता का वाणी प्रकाशन से प्रकाशित उपन्यास पराजिता का आत्मकथ्य पढ़कर लगा, कह सकता हूँ एक उम्दा और बेहद रोचक उपन्यास पढ़ा। अपने कलेवर में तो यह उपन्यास महज एक सौ बाइस पृष्ठों का है, पर इसका कैनवास काफी बड़ा है। आत्मकथात्मक शैली में लिखा गया यह उपन्यास अनेक तीव्र और मंथर घटनाक्रमों के साथ, बिना किसी झोल-झाल के, आगे बढ़ता हुआ एक तार्किक परिणति के साथ समाप्त होता है और हमें बार-बार पढ़े-सुने-देखे रामायण की कथा को कैकेयी की नजरों से और वस्तुत: स्वयं अपनी नजरों से गुनने-परखने-तौलने को जाग्रत कर, हमें समय के उसी कालखंड में पहुँचा देता है। हम कैकेयी यानी अपूर्व यानी एक पराजिता के साथ हो लेते हैं और एक बार फिर राजा दशरथ के राजमहल के गलियारों में चक्कर लगाने लगते हैं और उन गलियारों में रचे गए षड्यंत्रों, गढ़े गए मिथकों, सच की शक्ल में प्रचारित किए गए झूठों, राजहित में छुपा ली गई सच्चाइयों और राजनीति में दफ्न कर दिए गए तथ्यों को परत-दर-परत उद्घाटित होता देखकर अवाक् और भौंचक्क होते जाते हैं!
दरअसल, रामकिशोर मेहता का यह उपन्यास यानी पराजिता का आत्मकथ्य कैकेयी यानी अपूर्व के बहाने न केवल रामायण के भीतर घटित हुए महाभारत का चकित कर देना वाला रहस्योद्घाटन करता है, बल्कि इसी के समानांतर एक आधुनिक स्त्री विमर्श की सोद्देश्य और सकारात्मक स्थापना भी करता है। अपूर्व, जो कैकेयी का मूल नाम है, इस आत्मकथात्मक उपन्यास की मुख्य पात्र है। इसके पिता यानी कैकय देश के राजा उसे अपरा कहकर पुकारते थे। लेकिन वह अपने आत्मकथ्य के एकदम आरंभ में यह स्वीकार लेती है कि मुझे इन नामों से कोई नहीं पहचानेगा। नाम होता है विजेता का। इस पुरुष वर्चस्ववादी समाज में स्त्री तो शाश्वत पराजिता है। उस पर विजय पाने के लिए कोई पराया नहीं आता। वह तो अपनों से ही विजित है। पराधीन है। पहले पिता के, फिर पति के, अंतत: अपने ही पुत्रों के भी! (पृ. 13) वस्तुत: वह ऐसा कहकर हमें यह स्पष्ट बता देती है कि तत्कालीन अयोध्या के समाज में और तत्कालीन राम राज में भी स्त्री की स्थिति वही और वैसी ही थी, जैसी आज है और उसे भी अपनी जगह तलाशने और अपनी जगह बनाने के लिए उतना ही संघर्ष करना पड़ा, जितना आज स्त्रियों को करना पड़ता है। और उसकी यह आत्मकथा भी उसी संघर्ष का, उसी छटपटाहट का एक हिस्सा है। (पृ. 13) इस अर्थ में यह सिफऱ्  अपूर्व या कैकेयी की ही नहीं, बल्कि अनेकानेक स्त्रियों की भी समवेत सामूहिक आत्मकथा है।
अपूर्व आत्मविश्वास से भरी, स्वतंत्र सोच और आत्मसम्मान से लैस, वीर और युद्ध कौशल में दक्ष स्त्री थी। लेकिन राजा दशरथ से उसका विवाह, उसके जीवन का अप्रत्याशित अनचाहा मोड़ था, जहाँ सोलह वर्ष की एक स्वप्नदर्शी नवयौवना को साठ साल के बूढ़े और निर्वीर्य राजा दशरथ के श्रीचरणों में इसलिए चढ़ा दिया जाता है कि केकय देश का, उसके पिताश्री का घोड़ों का व्यापार फलता-फूलता रहे। केकय देश एक ताकतवर राजा का संरक्षण प्राप्त करता रहा। असुरों के आक्रमण से अपने आप को सुरक्षित अनुभव करता रहा। (पृ.73) यानी केकय राज्य के लिए एक बलि-पशु थी अपूर्व, जिसे स्वयं उसके पिता ने ही बलि चढ़ा दिया तथाकथित देशहित में! जंगल में संकट में फंसे दशरथ के प्राण बचाने का पुरस्कार मिला। उसी बूढ़े, निर्वीर्य कामांध पुरुष के साथ अनचाहा विवाह! उसी क्षण से कैकेयी राजा दशरथ के विरूद्ध घृणा और प्रतिशोध की भावना से भर जाती है और दशरथ के विरूद्ध लगातार, हर संभव षड्यंत्र और व्यूह रचने लगती है और राम के वनवास से लेकर दशरथ को गुप्त रूप से, पुत्रवियोग की आम धारणा के उलट, विष देकर मार देने और अपने ही गुप्तचरों द्वारा धोबी प्रसंग की अफवाह फैलाकर सीता को दुबारा वनवास भिजवा देने जैसी प्रतिशोधपूर्ण घटनाओं को अंजाम देती जाती है। यद्यपि कैकेयी का राम और सीता के प्रति कोई निजी द्वेष नहीं है, पर उनके बहाने दशरथ को आहत और पराजित करके वह क्रूर आनंद और प्रतिशोध की तृप्ति से भर उठती है। तथापि, एक स्त्री होने के नाते, वह राम और सीता के साथ हुए अन्यायों के प्रति अपराध-भाव से भी भर जाती है। इस तरह वह एक सौतेली माँ नहीं, वरन एक सौतेली पत्नी की भूमिका में कहीं अधिक संलिप्त रहती है।
जिस दिन अपूर्व दशरथ की तीसरी महारानी बनाकर अयोध्या के राजमहल में लाई जाती है, ठीक उसी दिन से राजमहल में षड्यंत्रों, चक्रव्यूहों, छलप्रपंचों, सच-झूठ, तथ्यों-मिथकों को रचने-गढऩे का राजनीतिक दुष्चक्र शुरू हो जाता है। एक तरफ  होती है कैकेयी के रूप में विद्रोहिणी अपूर्व और उसकी दासी के रूप में उसकी कूटनीतिज्ञ गुरुमाता तुल्य सहेली मंथरा, जिसे वह एकांत में केवल मन कहकर पुकारती है। दूसरी तरफ  होते हैं दशरथ के ज्येष्ठ पुत्र राम, जो स्वयं एक निपुण राजनीतिज्ञ और कूटनीतिज्ञ साबित होते हैं और कैकेयी की हर चाल और उसके पीछे की कूटनीतिक मंशा को पहले ही भाँप जाते हैं और कैकेयी को उनके आगे हर बार पराजित होना पड़ता है। कैकेयी की आत्मकथा पढ़ते हुए एकबारगी महसूस हो जाता है कि राम के राज में केवल सुराज नहीं था, बल्कि वहाँ चप्पे-चप्पे पर षड्यंत्र था, विद्वेष था, छल-कपट था, क्रूरता और हिंसा थी। राजमहल सुख-सुविधाओं का सेज नहीं, बल्कि घुटन, ऊब, घृणा, हताशा, भय, प्रतिशोध, व्यथा और नजरबंदी का एक दमघोंटू यातनाघर भी था!
दरअसल, राजमहल में सत्ता और शक्ति के लिए ठीक वैसा ही संघर्ष, वैसी ही राजनीति चल रही थी, जैसा आज घटित होता देख रहे हैं हम सब! और तभी हम दंग रह जाते हैं यह देखकर कि रामायण के अंदर कितने अनदेखे-अनजाने महाभारत चल रहे थे और हरेक घटनाएं, हरेक मिथक, हरेक सच के पीछे कितने-कितने षड्यंत्र, कितने-कितने झूठ सक्रिय थे! इसका एक उदाहरण यह देखिए कि जिस दिन राम चौदह वर्ष का वनवास काटकर अयोध्या लौट रहे थे, उस दिन पूरे अयोध्या में नए तोरणों, नए पथों, नई वीथियों आदि का निर्माण करवाकर और हर तरफ घी के दीपक जलाकर पूरे अयोध्या को धूमधाम से इसलिए नहीं सजाया गया था कि इस तरह उत्सव मनाकर राम का स्वागत किया जाये, बल्कि ऐसा सिफऱ्  इसलिए किया गया था ताकि पूरा राजकोष खाली हो जाए और राम को लुटा-पिटा राज्य ही हाथ लगे! यहाँ तक कि राम की चरणपादुका का भरत द्वारा राजसिंहासन पर विराजित करवाना भी कैकेयी द्वारा रचा नाटक ही था, भरत को जनता की नजरों में सम्मान्य बनाये रखने का और जनता के विद्रोह को शिथिल करने का! कैकेयी कहती है- एक जीवंत नाटक का पटाक्षेप हो चुका था। हर पात्र ने अपनी भूमिका, जो उसके लिए हमने नियत की थी, चाहे उसे ज्ञात था या नहीं, बखूबी निभाई। (पृ.67) यहाँ तक कि स्वयं भरत भी इस नाटक से अनभिज्ञ थे! लेकिन इस नाटक में कैकेयी और मंथरा के साथ थे स्वयं अयोध्या के महामंत्री राजकुलगुरु राजपुरोहित ब्रह्मर्षि वसिष्ठ! तो ऐसी होती है राजनीति राजमहलों की! कैकेयी स्वयं एक जगह कहती है- हाँ, यह बिल्कुल सच है कि उस समय दशरथ की हत्या करना मेरी राजनीतिक आवश्यकता थी। उसका जीवित रहना मेरे लिए राजनीतिक आत्महत्या थी। (पृ. 74)
ये तो कुछ उदाहरण थे कैकेयी के राजनीतिक, कूटनीतिक, हिंसक और प्रतिशोधात्मक जीवनपक्ष के। लेकिन कैकेयी के अंदर की अपूर्व एक स्वतंत्रचेता स्त्री भी थी। वह स्वयं कहती है- एक स्त्री होने के नाते मेरे मन में भी कोमल भावनाएँ थीं। परंतु उससे भी कहीं अधिक एक स्त्री होने का भाव था। एक स्त्री पक्षधरता का भाव था। मैं अपने समाज में स्त्री की स्थिति को खुली आँखों से देखती थी। पुरुषों के रचे विधान से स्त्री को देखना मुझे स्वीकार नहीं था। (पृ.72) और इन सब सोच के पीछे थी मेरी माँ। मैं अपनी विद्रोही माँ की विद्रोही पुत्री थी। (पृ.72) वह कोसल नरेश की पुत्री कौसल्या से सर्वथा भिन्न थी। कौसल्या यहाँ कोसल की संस्कृति में रची-बसी थी, जहाँ स्त्री में दास्य-भाव संस्कारों में ही डाल दिया जाता था। केकय (राज्य) में स्त्रियों में स्वतंत्रता का बहुत प्रबल भाव था। (पृ.89) लेकिन कैकेयी की नजरों में सुमित्रा बहुत समझदार स्त्री थी। उसने लक्ष्मण को राम के साथ और शत्रुघ्न को भरत के साथ जोड़कर उनका भविष्य सुनिश्चित कर दिया था। (पृ.94)
सचमुच कैकेयी यानी अपूर्व में स्त्रीचेतना बहुत प्रबल थी। तभी तो वह पुत्र और पुत्री में कोई अंतर न मानते हुए किसी स्त्री को आशीर्वाद देते हुए पुत्रवती भव! की जगह संतानवती भव! कहती थी। तभी अपूर्व के मन में हमेशा यह प्रश्न उठता रहता है कि मेरा कौन सा कुल है, वह कुल जिसने त्याग दिया या वह कुल जिसने कभी अपनाया ही नहीं। (पृ.73) कैकेयी के मन में सीता के लिए भी सदैव कोमल और मातृभाव रहे। वह कहती है- सीता जैसी स्त्रियाँ समाज में विरले मिलती हैं। यद्यपि चौदह वर्ष के वनवास, विराध से लेकर कबंध, फिर खरदूषण के युद्ध, मारीच के छल से रावण द्वारा उसे अपहृत करने में कहीं न कहीं मेरा प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष हाथ होने की जानकारी सीता को थी, फिर भी अयोध्या के साम्राज्य की महारानी बनने के बाद वह मेरे चरणस्पर्श करने आई थी। अयोध्या का महाराज बनने के बाद स्वयं राम भी आए थे मेरे चरणस्पर्श करने, परंतु उनका चरणस्पर्श एक राजनीतिक चरणस्पर्श था। परंतु सीता के चरणस्पर्श की बात ही कुछ और थी। (पृ.18) वह स्वीकारती है कि सीता को उन पापों का, अपराधों का दंड मिला, जो उसने किये ही नहीं थे। (पृ.16) शैशव में उसके असली माता-पिता ने त्याग दिया था, यौवन में स्वयं उसके पति राम ने। कैकेयी का राम से भी कोई व्यक्तिगत विरोध नहीं था, बल्कि वह उसके उदात्त, धीर-गंभीर, मर्यादित व्यक्तित्व की स्वयं प्रशंसक थी और उसे युगप्रवर्तक मानती थी।
उपन्यास के अंत में कैकेयी और राम के बीच एक पारदर्शी और उदात्त संवाद भी होता है, जो उन दोनों के बुढ़ापे और अकेलेपन की पृष्ठभूमि में घटित होता है। कैकेयी कहती है- इस राजमहल में अपने समय के दो प्रतिद्वंद्वी मैं और राम शेष बचे हैं। हाँ, अब कोई प्रतिद्वंद्विता शेष नहीं है। अब हम दोनों के पास शेष है बुढ़ापा और अकेलापन। राम बेचैन होगा। मैं भी बेचैन थी। अब हम दोनों के पास खोने-पाने के लिए कुछ शेष नहीं था। (पृ.105) इस अंतरंग संवाद में दोनों की कई स्वीकारोक्तियाँ हैं। राम स्वीकारते हैं कि- न मैंने लक्ष्मण के लिए अयोध्या छोड़ी और न सीता के लिए। (पृ.113) राम यह भी स्वीकारते हैं कि हमवयस्क होने के कारण, लक्ष्मण के मन में भी सीता के प्रति वे ही कोमल भाव थे, जो मेरे मन में उपजे थे, जो उसे धनुष पर प्रत्यंचा चढ़ाने को प्रेरित कर रहे थे। पर गुरूदेव ने लक्ष्मण को बैठ जाने को कहा और बड़ा होने के नाते मुझे उस धनुष पर प्रत्यंचा चढ़ाने की आज्ञा दी। (पृ.119) शायद यही कारण रहा कि सीता और लक्ष्मण के बीच भाभी-देवर का सहज-स्वाभाविक रिश्ता कभी नहीं बन पाया। राम कहते हैं. उसके बाद मैंने लक्ष्मण को कभी सीता की तरफ  आँख उठाकर देखते नहीं पाया। उनके बीच कभी देवर-भाभी सरीखी हँसी-ठिठोली नहीं देखी। वे लक्ष्मण के संयम-शोधित संस्कार थे। (पृ.120) राम के एक प्रश्न के उत्तर में कैकेयी भी अपना मन खोलकर रख देती है- तुमसे अब झूठ बोलना मेरा अभिप्रेत नहीं है। हाँ, मेरे मन में किसी (विभूति) के प्रति कोमल भाव था और यही कारण था कि दशरथ मेरे मन को कभी नहीं भाये। मैं उन्हें कभी प्रेम नहीं कर सकी। (पृ.115)
इस आत्मकथ्य में कैकेयी पुत्रेष्टि-यज्ञ के पीछे के रहस्यों और तथ्यों का भी रहस्योदघाटन करती है, जिनके बारे में कई मिथक गढ़े जा चुके हैं और बहुत कुछ संसार से छुपा लिया गया है। वस्तुत: इस यज्ञ का अधिष्ठाता ऋषि श्रृंगी को चुना गया था और तीनों महारानियाँ यज्ञ-शक्ति से प्राप्त देव-प्रसाद फल से नहीं, बल्कि ऋ षि श्रृंगी से निषेचित हुई थीं। पर पुत्रेष्टि-यज्ञ के पूर्व तीनों महारानियों को सख्ती से सचेत कर दिया गया था कि इसे संतानोत्पत्ति की यांत्रिक, पशुवत प्राकृतिक क्रिया मात्र मानें, जिसमें तन का सुख अथवा किसी भी प्रकार का जुड़ाव अनैतिक है! यानी महाभारत की तरह ही रामायण में भी नियोग से संतानोत्पत्ति हुई थी! पर इसको बड़ी चालाकी से यज्ञ-शक्ति से प्राप्त फल या खीर के रूप में गढ़े मिथक के आवरण में छुपा लिया गया था। लेकिन कैकेयी एक विद्रोही माँ की विद्रोही पुत्री थी। वह स्पष्ट स्वीकारती है कि महर्षि श्रृंगी के साथ बिताया समय मेरे मन में जीवन के स्पष्टतम चित्रों में अंकित है। सच कहूँ तो यह व्यक्ति मेरे लिए याच्य पुरुष नहीं था। पर मेरे याच्य के निकट अवश्य था। ठीक उसकी तरह का पुरुष।...मेरे लिए वे बड़े ही आत्म-विस्मृति के दिन थे। मैं, मैं नहीं थी। मैं केवल एक स्त्री थी, एक पुरुष के संसर्ग को जीती हुई... बस संपूर्ण स्त्री। मैं उस समय अनुभव करती थी कि मैं प्रेम हूँ, छंद हूँ, राग हूँ, गीत हूँ, धुन हूँ! (पृ.77.78)
इस पूरे उपन्यास में शंबूक-वध, अहल्या के शाप जैसे कई प्रसंगों से जुड़े एवं राजहित में गढ़े गए मिथकों और छुपा ली गई सच्चाइयों, उनके पीछे निहित स्वार्थों, राजनीतिक-सामाजिक अंतर्विरोधों एवं मानवीय अंतद्र्वंद्वों का भी रहस्योदघाटन किया गया है। पर इसके लिए पराजिता का आत्मकथ्य पढऩा नितांत जरूरी होगा। इस उपन्यास में भावपाश्र्व, विभूति, न्यायधीश अशोक, व्याघ्रपाद वसिष्ठ, सेनापति युधाजित जैसे कई पात्र मिलेंगे, जिनके असली रूपों और असली भूमिकाओं से आप शायद पहली बार अवगत होंगे! आपको इस उपन्यास में एक सूत्रधार लेखक भी मिलेगा, जो उपन्यास के आरंभ में अवतरित होता है और हमें कैकेयी से मिलाकर स्वयं नेपथ्य में चला जाता है। वह फिर उपन्यास के अंत में अवतरित होकर यह कहते हुए विदा लेता है कि शायद मेरा संप्रेषण उतना प्रभावी नहीं हो सका, जितना अपूर्व चाहती होगी। (पृ.122) उपन्यास के आरंभ और अंत में इस सूत्रधार लेखक के अवतरित होने से सहसा यह भ्रम पैदा होता है कि यह उपन्यास किसी काल-कवलित कृति की पांडुलिपि की पुनप्र्रस्तुति तो नहीं है, जैसा कि सूत्रधार लेखक हमें आरंभ में बताता है। लेकिन असल में इस उपन्यास के लेखक रामकिशोर मेहता इस सूत्रधार का इस्तेमाल एक शिल्पगत कवच के रूप में करते हैं।
कुल मिलाकर, पराजिता का आत्मकथ्य एक रोचक, पठनीय और कसी हुई कृति है। इसका न केवल पौराणिक महत्व, वरन् सामाजिक महत्व भी पाठकों को आकृष्ट करेगा। उपन्यास में मुद्रण-त्रुटियाँ अपेक्षाकृत कम और क्षम्य मात्रा में हैं। इस लिहाज से वाणी प्रकाशन अपने समकक्ष प्रकाशनों से बेहतर साबित हुआ है!