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Monday 20 Nov 2017

कानपुर। जनसंस्कृति मंच, कानपुर इकाई के तत्वावधान में जनकवि कमल किशोर श्रमिक भाग-2 का विमोचन पूर्व संासद एवं सीपीएम पोलित ब्यूरो सदस्य सुभाषिनी अली के द्वारा सम्पन्न हुआ।

कानपुर। जनसंस्कृति मंच, कानपुर इकाई के तत्वावधान में जनकवि कमल किशोर श्रमिक भाग-2 का विमोचन पूर्व संासद एवं सीपीएम पोलित ब्यूरो सदस्य सुभाषिनी अली के द्वारा सम्पन्न हुआ। इस अवसर पर उन्होंने श्रमिक जी के साहित्य को मजदूर आन्दोलन एवं जन संघर्षों की उपज बताते हुए उन्हें एक क्रान्तिकारी कवि घोषित किया। उन्होंने गुटों में बंटे हुए जन साहित्यिक संगठनों की एकता पर जोर दिया और कहा वर्तमान समय में देश की फासीवादी राजनीति (संस्कृति) साम्प्रदायिकता का उन्माद बढ़ाकर लोकतान्त्रिक मूल्यों की हत्या कर रही है। ऐसी विषम स्थिति में हर जनवादी संगठन एवं साहित्यकारों को मिलजुलकर लोकतान्त्रिक मूल्यों की रक्षा के लिये संगठित होकर संघर्ष करना चाहिये व अन्यथा बिखराव के त्रासद परिणाम आमजन को भुगतने होंगे। इस अवसर पर लेखिका डॉ. प्रभा दीक्षित ने विषय प्रवर्तन करते हुए श्रमिक के जीवन और साहित्य को एक दूसरे का पूरक बताते हुए कहा कि श्रमिक ने अपना जीवन हार्नेस गवर्मेंट फैक्ट्री के श्रमिकों के साथ आरम्भ किया था। उन्होंने आम क्रान्तिकारी कवियों की रचनाओं से श्रमिक की कविताओं की अलग पहचान बताते हुए कहा कि उनकी रचनायें एकांगी नहीं है बल्कि निचले पाये के आदमी के जीवन के व्यापक संदर्भों को स्पर्श करती हुई अपने लक्ष्य को पूर्ण बनाने वाली प्रतिरोध की संस्कृति गढ़ती है और विकल्प के रूप में समाजवादी व्यवस्था की स्थापना का संकेत देती है। मुख्य अतिथि के रूप में पधारे व जनसंस्कृति मंच के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष एवं प्रदेश अध्यक्ष कौशल किशोर ने श्रमिक की रचनाओं को समय की आवश्यकता बताते हुए कहा कि कठिन काव्य की दुरूह हवाई कला के बरक्स श्रमिक की कवितायें सरल सहज शब्दावली में गम्भीर जनवादी अभिव्यक्ति देती है क्योंकि उन्होंने आम मजदूरों का जीवन जीते हुए जन आन्दोलनों के दौरान अपनी रचनाओं का सृजन किया है। वे एक पूर्णकालिक कवि और लेखक हंै। श्रमिक की कवितायें इन्कलाब के सपने जगाती हैं और व्यवस्था परिवर्तन के क्रान्तिकारी  रास्ते पर चलने का आह्वान करती हैं।
इस अवसर पर डॉ. राकेश शुक्ल ने कहा कि जनकवि श्रमिक की कविताएं यथार्थ की जमीन पर पसीने की स्याही एवं अनुभव की कलम से उकेरी गई वे क्रान्तिकारी रचनायें हैं जो दीर्घकालीन संघर्षों को दिशा प्रदान करती रहेंगी। उनकी शायरी का चिन्तन सामाजिक सरोकारों को हल करने में सहयोग की जगह टकराव पसन्द करता है। वे कई बार वैचारिक अतियों को स्पर्श करते हैं किन्तु यह भी उनकी ईमानदाराना अभिव्यक्ति है। इस अवसर पर प्रताप साहनी, अमरीक सिंह दीप, डॉ. गायत्री सिंह, सुनील बाजपेई, प्रमोद तिवारी, राधा शाक्य, मीरा दुबे, नारायण दास वर्मा, अनीता वर्मा ने भी अपने विचार रखे।
अंत में कमल किशोर श्रमिक ने समस्त वक्ताओं व श्रोताओं का आभार व्यक्त करते हुए कहा कि उनके जीवन को कानपुर की जनता पिछले 50 वर्षों से देख रही है जिसमें किसी आदर्श का जुड़ाव नहीं है उन्होंने व्यक्तिगत सफलता व असफलता को तरजीह न देते हुए विराट जनता की असफलता को सफलता कर प्रतीक बताया उन्होंने कहा कि आगे बढ़ती हुई मानव जाति पीछे नहीं लौटेगी। साम्राज्यवाद विराट जनता पर एक आर्थिक युद्ध थोप रहा है। इसका प्रतिरोध उनके साहित्य का केन्द्रीय लक्ष्य है। अपनी अन्तिम इच्छा व्यक्त करते हुए 78 वर्षीय जनकवि ने कहा कि उक्त युद्ध के प्रतिरोधी स्वरों में अपना स्वर मिलाते हुए वह चिर निद्रा में सो जाना चाहता है।
     प्रस्तुति: कविता तिवारी