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Thursday 23 Nov 2017

जो पढ़ेगा वही तो पढ़ाएगा

प्रभाकर चौबे
शुक्ला प्रोविजन स्टोर के पास, गोल चौक, रोहिणीपुरम, रायपुर, मो. 094255-13356
'हरि अनंत हरि कथा अनंताÓÓ की तरह शिक्षा पर चर्चा भी अनंत है। लेकिन शिक्षाविद् शिवरतन थानवी ने शिक्षा के प्रति अपनी चिंता जिन निबंधों में व्यक्त की है उन्हें पढ़ते हुए शिक्षा के प्रति उनकी प्रतिबद्धता उद्घाटित होती है। इन निबंधों को पढ़ते हुए लगता है कि थानवी जी शिक्षा पर केवल औपचारिक लेख नहीं लिखते। वे शिक्षा पर पूरी शिद्दत से अपनी पूरी बौद्धिक क्षमता तथा आत्मा की गहराई तक सोचते हैं- वे दिखावे के अकादमेशियन नहीं हैं और शिक्षा पर बौद्धिक आतंक प्रदर्शित करने नहीं लिखते वरन् शिक्षा पर सोचते हैं और किसी तरह के उपदेश देने से बचते हुए वे वही लिखते हैं जो जरूरी है।
थानवी जी की पुस्तक ''सामाजिक विवेक की शिक्षाÓÓ में 28 निबंध हैं। ''शिक्षक और मां-बाप गिजुभाई बने तोÓÓ में थानवी जी कहते हैं- ''जो पढ़ेगा वही तो पढ़ाएगाÓÓ मुझे लगता है यह शिक्षक कहलाने का सूत्र वाक्य है। शिक्षक को निरंतर पढऩा चाहिए। क्या पढऩा चाहिए- अपने इस निबंध में वे लिखते हैं- ''शिक्षक क्या पढ़ें, क्यों पढ़ेंÓÓ यह एक महत्वपूर्ण विचारणीय विषय है। पढऩे की आदत कई प्रकार से लाभकारी है। पढऩे की आदत ही नहीं हो तो शिक्षक क्या प्राप्त करेगा और क्या देगा। दरअसल शिक्षक कहलाना बड़ा श्रमसाध्य कार्य है। शिक्षकों की 'भर्तीÓ जब हो तो शिक्षक कितने हों यह खोज पाना बड़ा कठिन है। ऐसी भर्ती में शिक्षक नहीं शिक्षा के लिए कर्मचारी भर्ती होते हैं। पुस्तक का पहला ही निबंध 'शिक्षा, संवाद और जनतंत्रÓ में वे लिखते हैं- 'वस्तुत: अच्छे विद्यार्थी और अच्छे शिक्षक होने की पहली शर्त ही यह है कि हमारे चालक हम स्वयं हों और हमें जो काम समूह ने, समाज ने, शासन ने या राष्ट्र ने सौंपा है वह हमें निर्विघ्न रूप से पूरा करने का दिया जाए।Ó इसमें यह रेखांकित किया जाए- ''वह हमें निर्विघ्न रूप से पूरा करने दिया जाएÓÓ- क्या ऐसा हो रहा है? यह प्रश्न बार-बार उठता है। शिक्षक की स्वायत्तता को लेकर बड़े-बड़े सेमीनार होते रहे हैं। कोठारी कमीशन की रिपोर्ट को हर बार ऐसे अवसरों पर उद्धृत किया जाता रहा है। लेकिन स्थिति जरा भी नहीं बदली है। बहरहाल थानवी जी ने शिक्षा के हर पहलू पर गंभीरता से चिंतन किया है। शिक्षा को किस तरह बालकों के मस्तिष्क में एक 'डरÓ के रूप में न रहने दिया जाए वरन उसे पकडऩे लपक पड़ें, यह स्थिति आए, इसके प्रति भी श्री थानवी की चिंता साफ झलकती है। शैक्षिक पत्रिकाओं की ओर शिक्षकों की रुचि बढ़े इसके लिए क्या उपाय किए जाएं यह भी उन्होंने सुझाया है। एक समय मध्यप्रदेश में शिक्षकों के लिए 'पलाशÓ नाम से पत्रिका निकाली गई थी इसमें शिक्षकों के रचनात्मकता के उद्घाटन को प्राथमिकता दी जाती थी। बहुत पहले (1936-37 में)  रायपुर डिस्ट्रिक्ट कौंसिल से शिक्षकों के लिए एक पत्रिका प्रकाशित की थी। इस पत्रिका का नाम 'सद्भावनाÓ था और प्रसिद्ध शिक्षाविद् व साहित्यकार पं. सुंदरलाल त्रिपाठी ने कई वर्षों तक इसका सम्पादन किया था। उन्हीं दिनों पं. जवाहरलाल नेहरू कांग्रेस के काम से रायपुर प्रवास पर आए तो डिस्ट्रिक्ट कौंसिल के सभाकक्ष में उन्होंने इस पत्रिका का अवलोकन किया और टिप्पणी की कि पत्रिका बहुत अच्छी है, भाषा और सरल की जाए। बहरहाल थानवी जी द्वारा समय-समय पर शिक्षा संबंधी निबंध इस संग्रह में हैं और हर निबंध शिक्षा के प्रति उनके सरोकार को दर्शाता है- वे केवल शिक्षा किस तरह दी जाए या कैसे पढ़ाएं, पर ही बात नहीं करते, वे शिक्षा को लेकर समग्रता में सोचते हैं। शिक्षक-प्रशिक्षण को लेकर उनकी कुछ स्थापनाओं से असहमत भी हुआ जा सकता है वे ''क्या जरूरत है बी.एड. केÓÓ निबंध में कहते हैं... ''फिर क्यों माना जाए कि शिक्षक बनने के लिए अलग से प्रशिक्षण की जरूरत है?ÓÓ उनके इस कथन से असहमति हो सकती है। लेकिन प्रशिक्षण आवश्यक है। प्रशिक्षण एक डिसीप्लीन लाता है। बहुत पहले मध्यप्रदेश में ग्रेजुएट के बाद उच्च श्रेणी शिक्षकों को दिए जाने वाले प्रशिक्षण को बी.टी. कहा जाता था अब बी.एड. कहते हैं। पुराने मध्यप्रदेश में प्रशिक्षण के तीन स्तर थे- प्राथमिक स्कूल के शिक्षकों के लिए नार्मल स्कूल की ट्रेनिंग। नार्मल ट्रेनिंग में प्रवेश के लिए प्रवेश परीक्षा होती थी- बड़ी कठिन परीक्षा थी वह। व्याकरणाचार्य पं. कामता प्रसाद गुरु नार्मल स्कूल में शिक्षक रहे। सुप्रसिद्ध कथाकार जहूर बख्श भी नार्मल स्कूल में शिक्षक थे। नार्मल ट्रेंड शिक्षक ''पूरा शिक्षकÓÓ बनकर आता। मिडिल स्कूल के शिक्षकों के लिए डी.एड. कोर्स था दो-दो वर्ष का होता और खंडवा में ट्रेनिंग स्कूल था। बी.टी. का कोर्स एक वर्ष (मतलब 9 माह) का था। ऐसी ट्रेनिंग कि 9 माह में वजन कम हो जाता। यह सही है कि अब प्रशिक्षण संस्थाएं व्यावसायिक हो गई है। यह इस पूंजीवादी व नव उदारवादी आर्थिक नीतियों के कारण हो रहा है। पूरी शिक्षा का ही व्यापारीकरण हो गया है। गहन चिंतन को सरल भाषा, प्रवाहवान शैली में प्रस्तुत किया गया है और इसी से पता चलता है कि शिक्षा को, उसके विभिन्न आयाम को लेकर निबंधकार की सोच एकदम साफ है- कहीं भी अस्पष्टता नहीं है। अलग-अलग शीर्षक पर लिखे गए ये निबंध शिक्षा को केन्द्र में रखकर उसके हर अंग की बेहतर चीरफाड़ करते हुए, निबंध कर बताते चलते हैं कि कहां क्या कमजोरी है और इस अंग को किस तरह मजबूत बनाकर शिक्षकों, छात्रों व समाज तथा पूर्ण शिक्षा को उपयोगी बनाया जा सकता है। ये निबंध शिक्षक-प्रशिक्षण संस्थाओं में पाठ्य पुस्तक के रूप में पढ़ाई जानी चाहिए।