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Monday 20 Nov 2017

व्यंग्य-परंपरा में एक नया माइलस्टोन

 

 डॉ.रमेश तिवारी
64-बी , फेस-2 , डीडीए फ्लैट, कटवारिया सराय, नयी दिल्ली-110016
मो. 09868722444
'कल्लू मामा जिंदाबादÓ सुभाष चंदर का सद्य: प्रकाशित व्यंग्य संग्रह है। भावना प्रकाशन, दिल्ली ने इस संग्रह को प्रकाशित किया है। प्रस्तुत संग्रह में कुल 22 व्यंग्य रचनायें हैं। इस संग्रह के आरंभ में ही डॉ.हरीश नवल ने 'तब भी बनता है श्रेष्ठता का तमगाÓ शीर्षक से प्रस्तावना के रूप में इस कृति पर अपनी टिप्पणी लिखी है और 'भूमिका के बहाने सेÓ भूमिका-सा कुछ सुभाष चंदर ने स्वयं लिखा है।
इस संग्रह की सर्वप्रमुख विशेषता यह है कि यह संग्रह पठनीयता की दृष्टि से पूर्णत: सफल है।  पाठक जब एक बार इस संग्रह को पढऩा शुरू करता है तो रचनाएं स्वयं उसे बांधती आती हैं और वह उनसे बंधा पढ़ता चला जाता है। मुझे पूरा यकीन है कि आप भी रचना पढऩे के बाद मेरी बातों से सहमत होंगे। इस संग्रह को पढ़ते हुए कुछ रचनाएं मुझे अत्यधिक प्रभावशाली प्रतीत हुईं। ऐसी रचनाओं में - 'एक भूत की असली कहानीÓ, 'अमेरिकी एयरपोर्ट और नंगों की बारातÓ, 'कबूतर की घर वापसीÓ, 'उस्तादी की टाइमिंगÓ, 'माया का त्यागÓ, 'कविता और क्रांतÓ, 'बूढ़ा पी.एफ. और श्रवण कुमारÓ, 'दानं परमो धर्म:Ó, 'बाबू साहब की नाकÓ, 'सावधान अपराध कम हो रहे हैंÓ आदि प्रमुख हैं।
इस संग्रह में जिन विषयों को सुभाष चंदर ने व्यंग्य का लक्ष्य बनाया है वे सभी दैनंदिन जीवन से लिए गए हैं। पहली ही रचना की बात करें तो कैसे एक जीवित युवक को उसके ही परिवार के सदस्य प्रेम-विवाह करने के कारण परिवार से बहिष्कृत ही नहीं करते बल्कि भाइयों द्वारा उसे मृत घोषित कर उसकी पैतृक संपत्ति को भी हथिया लेते हैं। पंच, पुलिस कोई उसकी नहीं सुनता। इस प्रकार की घटनाएं आज भी समाज में, हमारे आसपास देखी जा सकती हैं। भाइयों द्वारा अपने जीवित भाई का फर्जी मृत्यु प्रमाण पत्र बनवाकर और उसे मृत बताकर उसके हिस्से को हथिया लिया जाता है। और तो और अपना हक़ मांगने के लिए जब वह पीडि़त भाई सरपंच, पटवारी, थाने आदि के चक्कर लगाता है तो हर जगह उसके मृत होने का सवाल खड़ा होता है। जीवित व्यक्ति कैसे अपने मृत्यु प्रमाणपत्र से लडऩे को मजबूर है और व्यवस्था उसका साथ देने को कतई तैयार नहीं है। ऐसे में फंसा व्यक्ति क्या करे, कहां जाये, यह जानना है तो 'एक भूत की असली कहानीÓ व्यंग्य-रचना जरुर पढिय़ेगा। आज वक्त का तकाजा यह है कि हर ईमानदार आदमी को अपनी ईमानदारी का, अपने होने का प्रमाण देना है, अपनी बात को कागजात के दम पर साबित करना है। इसी व्यवस्थाजन्य विद्रूप को लेखक ने इस संग्रह की पहली रचना 'एक भूत की असली कहानीÓ में उठाया है और भली-भांति उठाया है।
आज हम आधुनिक-उत्तर आधुनिक युग में जी रहे हैं। धर्म के ये स्वयंभू धर्म पर अपना एकाधिकार चाहते हैं। और जनता को 'अपना मालÓ समझने लगे हैं। कमोबेश सभी धर्मों में ऐसी ही स्थिति है। लेखक ने धर्मान्तरण की इसी प्रवृत्ति पर व्यंग्य किया है। कबूतर की घर वापसी धर्मांतरण की प्रवृत्ति पर करारा व्यंग्य प्रहार है। धर्म के चन्द ठेकेदार कैसे अपने ही धर्म को दुकान, और भोली-भाली नेता को ग्राहक के रूप में इस्तेमाल करते हुए अपना उल्लू सीधा करते हैं, यह जानना हो तो इस रचना को पढऩा अनिवार्य होगा। हालांकि साहित्य जगत में इस तरह से लिखने के अपने खतरे भी हैं, अभिव्यक्ति के खतरे यही हैं। इसी बात को अपने •ामाने में मुक्तिबोध ने उठाते हुए लिखा था- ''अभिव्यक्ति के खतरे उठाने ही होंगे/ तोडऩे होंगे सब गढ़ और मठ।ÓÓ वर्चस्वशाली ताकतों के खिलाफ़, उनकी विसंगतियों-विद्रूपताओं के खिला$फ किसी न किसी को तो लिखना ही होगा। आप उसे बुराई कहें, विद्रूप कहें, अमानवीयता कहें, कुछ भी कहें; लेकिन समाज की बेहतरी के लिए उनके खिलाफ़ लिखना और पाठकों तक उनकी असलियत पहुंचाना प्रत्येक दशा और काल की अनिवार्य आवश्यकता है। अत: किसी न किसी को इन प्रवृत्तियों के खिला$फ लेखनी के माध्यम से ही सही, खड़ा तो होना पड़ेगा।
मैं आज के व्यंग्य लेखन पर दृष्टिपात करते हुए यह बड़ी शिद्दत से महसूस करता हूं कि आज व्यंग्यकार तो बहुत हैं लेकिन वो ऐसे व्यंग्यकार हैं जिनके लिए व्यंग्य लेखन 'खाला का घरÓ है। ऐसे व्यंग्य लेखक अपनी सुविधा के हिसाब से व्यंग्य लिखते हैं, वो एक तीर से अनगिनत शिकार करना चाहते हैं। 'बिहार पर मत हंसोÓ व्यंग्य-संग्रह के रचनाकार गौतम सान्याल ने भूमिका में लिखा है कि 'व्यंग्य मेरे लिए विधा तो है मगर 'सुविधाÓ नहीं हैÓ। मुझे लगता है कि एक व्यंग्यकार को कहां खड़ा होना चाहिए, किसके साथ खड़ा होना चाहिए, समाज में जहां विषयों की इतनी बहुलता है, विविधता है, उनमें से कौन-सा विषय व्यंग्य के लिए चुना जाये इसकी समझ बहुत जरुरी है। प्राय: लेखक इसी स्थान पर चुक जाते हैं। इसीलिए उनके व्यंग्य में वो पैनापन, वो धार नहीं आ पाती है जिससे लोक में व्याप्त अहितकारी शक्तियों के वर्चस्व को, उनकी ताकत को कुंद किया जा सके, चुनौती दी जा सके। बहरहाल! 'कबूतर की घर वापसीÓ रचना का अंत कितना दारुण है! जब कबूतर अपना धर्म त्यागने की घोषणा कर देता है तो वह 'अधर्मीÓ कहा जाता है! मंदिर, मस्जिद, गिरजाघरों में बैठे धर्म के ठेकेदारों में कोहराम मच जाता है। उन्हें अपने धर्म-कर्म का वजूद ही खतरे में दिखाई पड़ता है। इससे पहले कि उनके धर्म पर आंच आये वे सब मिलकर उस 'अधर्मीÓ कबूतर के लहू से धरती लाल कर देते हैं।
सुभाष चंदर के इस व्यंग्य संग्रह की एक अन्य महत्वपूर्ण रचना है- 'उस्तादी की टाइमिंगÓ। बहुत सूक्ष्म व्यंग्यदृष्टि के साथ रचनाकार द्वारा इस रचना को अंजाम तक पहुंचाया गया है।  इस रचना में एक अपराधी के मनोविज्ञान का भी लेखक ने जबरदस्त खाका खींचा है। शारीरिक कद-काठी में रज्जन दादा जब अपने से मजबूत विनोद की ओर से विरोध की गुंजाइश देखता है तो बड़ी समझदारी से काम लेते हुए ऐन वक्त पर अपने कट्टे का प्रदर्शन कर देते हैं जिससे विरोध के लिए तत्पर विनोद के पांव स्वत: वापस हो जाते हैं। लेखक इस रचना का अंत एक व्यंग्यपूर्ण सबक से करता है ''उस रात मुन्नू ने एक सबक सीखा कि उस्ताद बनना हो तो टाइमिंग अच्छी होनी बहुत जरुरी है।ÓÓ इस तरह के सबक देने में सुभाष जी का जवाब नहीं है। 'लालाजी और अंग्रेजी-राज का दारोगाÓ व्यंग्य रचना में पुलिस के पैंतरों से परेशान लाला जी और उनके परिवार के सदस्यों के साथ-साथ पाठकों के लिए भी यह सबक बड़े ही काम का है- शेर और पुलिस दोनों सामने से आ रहे हों तो शेर की तरफ भागना चाहिए। शेर से आदमी कभी-कभी बच भी जाता है। 'अमेरिकी एयरपोर्ट और नंगों की बारातÓ रचना के द्वारा लेखक ने अमरीकी सुरक्षा जांच की व्यवस्था को अपने व्यंग्य का विषय बनाया है। इसी प्रकार 'माया का त्यागÓ शीर्षक रचना में धर्म और अध्यात्म की शरण में जानेवालों का साक्षात्कार धर्म-अध्यात्म का मुखौटा ओढ़े संतों के असली चरित्र से कराया गया है।
आज का युग अर्थ प्रधान है, इससे शायद ही किसी को आपत्ति होगी। इस प्रवृत्ति के विस्तार से छीजते रिश्तों को 'बूढ़ा, पी.एफ. और श्रवणकुमारÓ शीर्षक व्यंग्य रचना में दिखाया गया है। पिता को सेवानिवृत्ति के उपरांत मिले धन पर बेटों की गिद्ध दृष्टि की प्रवृत्ति भी हमारे समाज में कोई नयी बात नहीं है, बल्कि अब तो यह इतना आम हो गया है कि इसे गलत कहे या समझे जाने को ही बड़े आश्चर्य से देखा जाता है। सेवानिवृत्ति के बाद पिता को मिले रुपये को हासिल करने के लिए बेटे-बहुएं उनकी सेवा का ढकोसला करते हैं और पैसा हाथ में आते ही रफूचक्कर हो जाते हैं। अब उन्हें अपने पिता से कोई मतलब नहीं रह जाता है। 'बूढ़ा,पी.एफ.और श्रवणकुमारÓ रचना में लेखक ने इस प्रवृत्ति पर करारा व्यंग्य किया है। 'कविता और क्रांतिÓ शीर्षक रचना आज के साहित्यकारों और सत्ता-व्यवस्था पर व्यंग्य-प्रहार है। इसमें प्रसंगवश प्रकाशकों की भी पोल खोलने का काम लेखक ने बखूबी किया है। ''प्रकाशक दयालु किस्म का था। प्रकाशक अक्सर दयालु ही पाये जाते हैं। उसने साहित्यिक योगदान दिया और अस्सी प्रतिशत छूट देकर मात्र बीस रुपये में ही किताब दे दी।ÓÓ किताबों और प्रकाशकों का खेल भी गजब है। इसे अपने पाठकों को लेखक बहुत सुरुचिपूर्ण तरीके से बताता है। ''प्रकाशक दयालु भी था और सहयोगी भी। सारा फलसफा समझाया। बता दिया कि प्रकाशक लोग कविता की बहुत ज्यादा कापियां छापते हैं। थोड़ी बहुत नहीं पूरे साढ़े तीन सौ। इनमें से दो सौ सरकारी पुस्तकालयों में लग जाती हैं। सिर्फ तीस से पचास प्रतिशत कमीशन देना पड़ता है। वहां की दीमकें किताबें पढ़ती हैं फिर गुनती हैं और फिर क्रांति करती हैं। सारे पुस्तकालय उनकी क्रांति के दस्तावेज हैं।ÓÓ इसके आगे का व्यंग्य दर्शनीय और पठनीय है- ''गुप्तचर की समझ में सब आ गया। उसने महानता का तत्व ज्ञान लिया। वो जान गया था कि ये कमबख्त पचास किताबें और दस से भी ज्यादा श्रोता ही सरकार का तख्ता पलटते हैं।ÓÓ
जैसा कि सर्वविदित है- प्रवृत्तिपरक व्यंग्य व्यक्तिपरक व्यंग्य से अधिक उपयोगी और प्रासंगिक होता है क्योंकि उसमें प्रवृत्तियों को केंद्र में रखकर व्यंग्य-रचना की जाती है। वास्तव में किसी भी विषय पर हमारा विरोध या असहमति प्रवृत्तियों के आधार पर ही होती है। समस्या तब होती है जब हम प्रवृत्ति से शुरू हुए इस विरोध को भूलकर व्यक्ति का विरोध करने लगते हैं। तमाम परेशानियां इसके बाद ही शुरू होती हैं। सुभाष चंदर का यह संग्रह इस दृष्टि से भी बड़े ही महत्व का है। बड़े दिनों बाद एक ऐसा संग्रह पाठकों को मिला है जिसमें बड़ी ही निष्ठापूर्वक प्रवृत्ति-आधारित रचनात्मक दृष्टिकोण के साथ व्यंग्यों की रचना की गयी है। एक पाठक के रूप में मैंने जैसे-जैसे इस संग्रह को पढ़ा है उसके अनुरूप मुझे यह व्यंग्य संग्रह 'व्यंग्य-परंपरा में एक नए माइलस्टोन जैसाÓ दिखाई देता है। उम्मीद है पाठक इस महत्वपूर्ण व्यंग्य-संग्रह को हाथोंहाथ लेंगे। मैं इस व्यंग्य-संग्रह के लिए सुभाष चंदर को साधुवाद देता हूं।