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Sunday 19 Nov 2017

खल्क खुदा का, हुक्म सरकार का

शशिकांत सिंह 'शशि'
जवाहर नवोदय विद्यालय
शंकरनगर, नांदेड़
महाराष्ट्र -431736     

मो. 7387311701                                            
खल्क खुदा का, मुल्क जनता का और हुक्म सरकार का। सभी आमोखास को सूचित किया जाता है कि सरकार देश का सम्पूर्ण कल्याण करने का मन बना चुकी है। उसके हुक्म को न मानने वाले कृपया समुद्र में डूब मरें। जिंदा रहने की जिद हो तो अगली गाड़ी से पाकिस्तान चले जायें। सरकार ने तय किया है कि देश में प्राथमिकता के आधार पर कृषि, शिक्षा और संस्कृति का कल्याण किया जायेगा। उसके बाद स्वत: सम्पूर्ण कल्याण हो जायेगा। शिक्षा और संस्कृति किसी भी देश का मेरूदंड होते हैं। अत: सरकार ने अपना पूरा ध्यान इन्हीं पर केंद्रित किया है। सरकार से जो सेवा शेष रह जाती है उसे मनसबदार पूरी कर देते हैं। क्षत्रपों की कोई कमी नहीं है। दो हजारी से लेकर पांच हजारी तक मनसबदार हैं। प्रधानमंत्री सबके मन की बात जानते हैं। कहां बोलना है , कहां चुप रहना है इसे बेहतर समझत हैं। योगी आदमी हैं। देश के लिए सोलह घंटे काम करते हैं। उनकी सरकार ने प्राथमिकताएं तय कर रखी हैं।
कृषि का विकास सत्तर सालों से नहीं हो रहा था। किसान गरीब के गरीब ही रह रहे थे। सरकार ने ध्यान दिया कि इसकी जड़ में हैं-किसान के खेत। यदि किसान से खेत ले लिये जायें तो वह तरक्की के सिवा और क्या करेगा ? वह शहर में जायेगा। किसी कल-कारखाने में नौकरी करेगा। परिवार सुखी होगा। उन्होंने सबसे पहले जो काम किया वह है भूमि अधिग्रहण बिल लाने का। संसद में जो विघ्नसंतोषी लोग हैं उन्होंने टांग अड़ा दी। उन्होंने कहा कि यह कारपोरेट के फ ायदे के लिए है। यहीं प्रतिपक्ष मात खा गया। बंधुओं, कोई भी व्यापारी या उद्योगपति यदि कारखाना खोलेगा तो उसमें मजदूरी कौन करेगा? किसान ही न। सरकार को याद आया कि भई सड़केें बनानी है; रेलवे लाइन बिछानी हैं; नहरें खुदवानी है ;जमीन तो चाहिए ही। जमीन ली गई और किसान कोर्ट में चला गया तो.......। कोर्ट का रास्ता बंद किया गया। किसान यदि कोर्ट में जाये तो बेचारे के पैसे बरबाद होते हैं। अदालत का कीमती समय जाया होता है। सरकार तो मानेगी ही नहीं तो इन कवायदों से क्या लाभ? जाहिर है कि सरकार हमेशा किसानों के भले के लिए ही सोचती है। पहले किसान और सरकार दोनों का समय खराब होता था। एक एरिये की जमीन लेनी है तो कम से कम अस्सी प्रतिशत किसानों की सहमति चाहिए। इस हटा दिया गया। क्यों सहमति ले सरकार बहादुर !! वह जमीन लेगी तो लेगी। किसान मुआवजा ले और दफ ा हो जाये। मुआवजा देने में तो कोई कोताही नहीं बरती जा रही न। बस हो गया। यदि संसद इसे पास नहीं करेगी तो अध्यादेश का रास्ता तो है ही। घर में दो दरवाजे क्यों होते हैं? सदर दरवाजे से नहीं निकल सके तो पिछले से निकल लिए। सारांश यह कि सरकार अब किसानों के कल्याण के लिए कमर कस चुकी है। आत्महत्या करने वाले किसानों को सरकार पर भरोसा करना चाहिए कि मरने के और भी रास्ते हैं। जिंदगी है तो जायेगी ही। आज नहीं तो कल आप खुद ब खुद मर जायेंगे। तेल अम्बाणी जी के हाथ में दे दिया गया है। जाहिर है सस्ता तो नहीं ही करेंगे। खाद पर से सब्सीडी कभी भी खत्म हो सकती है। सरकार इतनी तत्पर है फि र भी किसान मरने के लिए खुद प्रयास कर रहा है। सरकार ने धन-जन योजना लागू की ताकि धन रहे न रहे खाता तो बैंंक में रहे आदमी तसल्ली तो कर सके कि ललित मोदी के बैंक अकाउंट हैं तो मेरे भी हैं। उसपर बीमा की व्यवस्था है। यानी कि किसान अब निश्चिंत होकर मर सकता है। जिंदगी में न सही मरने के बाद उस लाभ होने वाला है। आजतक किसी सरकार ने इतनी गहराई से किसानों की समस्या पर विचार नहीं किया था। प्रधानमंत्री गरीबी देख चुके हैं। उन्हें पता है कि गरीब एक छोटी सी खुशी देखकर ही चार साल काट देगा। वह अपने पासबुक और एटीएम कार्ड को देखकर ही फ ूला नहीं समायेगा। कृषि के बाद शिक्षा ही सरकार की प्राथमिकताओं में सबसे ऊपर है। मंत्री महोदया की डिग्री के विवाद में अपने को पडऩा ही नहीं है। असली हो या नकली, क्या फ र्क पड़ता है। डिग्री पर नहीं मंशा पर जाइये। सरकार ने बजट में पूरे तीन प्रतिशत खर्च करने का मूड बनाया है। साधुवाद। यही अनुपात 1974 से चला आ रहा है। शिक्षा में विद्यालय, शिक्षक, तकनीक या रोजगार की उतनी जरूरत नहीं है जितनी योग की। सतत प्रयासों से सरकार ने पता लगाया है कि बच्चे यदि सूर्य नमस्कार करने लगें। गीता का ज्ञान दिया जाये तो देश से शिक्षा की समस्या अपने आप समाप्त हो जायेगी। गीता का निरंतर अध्ययन करने के बाद बालकों में नौकरी की भूख समाप्त हो जायेगी। क्या लेकर आया है और क्या लेकर जायेगा ? तेरा क्या था जो खो गया, जो था यहीं का था। यहीं रह जायेगा। कर्म कर फल की इच्छा मत कर। बंदा बी ए तो कर लेगा लेकिन उससे किसी प्रकार की इच्छा नहीं रखेगा। वह नौकरी क्यों करेगा ? किसके लिए करेगा ? बंधु-बांधव, नाते-रिश्तेदार सब एक माया है। जन्म से पहले ये कहां थे कौन जानता है ? मरने के बाद भी नहीं रहेंगे। केवल बीच के कालखंड के लिए क्या हाय-हाय करना। बच्चे जब इतने संतोषी हो जायेंगे तो उन्हें सारे खर्च माया लगने लगेंगे। यही सोचकर संभवत: सरकार के नीतिकारों ने बजट 2015-16 में  बच्चों की किताबों, स्वास्थ्य और भोजन पर किये जाने वाले खर्च में कटौती कर दी। इसकी आपूर्ति योग से होगी। बच्चों को योग की शिक्षा दी जायेगी। योगी भूखा भी रह सकता है। भूखे पेट योग अधिक अच्छा होता है। रोटी, कपड़ा, मकान की समस्या हो आदमी केवल अनुलोम-विलोम कर ले। भांति-भांति के कपालभांति कर ले।  शिक्षा को प्राचीन काल की संस्कृति से जोडऩे का प्रयास चल रहा है। दिनचर्या संभवत: इस प्रकार होगी। प्रार्थना के दौरान बालक खुले मैदान में सूर्य नमस्कार करेंगे। सरकारी स्कूलों में अधिकांश वही बच्चे आते हैं जिनका पेट सुबह खाली ही रहता है। रात में अलबत्ता कुछ खा लिया हो तो कहा नहीं जा सकता। फ टी पतलून और फ्राक में बच्चे सूर्य नमस्कार के लिए लेटेंगे तो नजारा बिल्कुल प्राचीन युगीन हो जायेगा। उसके बाद बालक गीता की कक्षा में जायेंगे। उन्हें कर्म, अकर्म का भेद बताया जायेगा। उन्हें बताया जायेगा कि भृकुटी के बीच में ध्यान केंद्रित करने से कुंडलिनी जागृत हो जाती है। बालक प्रयास करेंगे तो भूख भड़क जायेगी। ध्यान तो भृकुटी पर ही केंद्रित करेंगे लेकिन ध्यान जायेगा पेट पर। गुरुजी खाये-पीये अघाये रहेंगे तो उनका ध्यान लग जायेगा। आत्मा की नश्वरता के बारे में बतायेंगे तो बालक विश्वास कर लेंगे। उनकी आत्मा भूख से कुलबुलाती रहेगी। नये कपड़े धारण करने के लिए पुराने को छोड़कर। परीक्षा में प्रश्न आयेंगे- आत्मा की अमरता पर प्रकाश डालें।....क्या आप इस बात से सहमत हैं कि नाते-रिश्तेदार कोई किसी का नहीं होता ?...अनुलोम-विलोम के समय सांस कितनी बार अंदर और कितनी बार बाहर करनी चाहिए। तर्क सहित उत्तर दें।.  
शिक्षा के उपरांत सबसे महत्वपूर्ण प्रयास संस्कृति के क्षेत्र में किये जा रहे हैं। हर गली नुक्कड़ में हिन्दू धर्म के रक्षक मुस्तैदी से खड़े हैं। समाज में धर्म की दीवार न रहे। समाज एक हो जाये। संभवत: इसलिए Ó घर लौटेंÓ कार्यक्रम का आयोजन किये जा रहे हैं। गेरूआ वस्त्रधारी सांसदों के बयान काफी उत्साहवद्र्धक हैं। हमारे जैसे श्रद्धालु उन दिनों की प्रतीक्षा  में हैं जब यही प्रयोग जाति के मामले में भी किया जायेगा। समाज में जितने निम्न जाति के लोग हैं। उन्हें भी घर लौटने का मौका मिलेगा। एक बार धर्मध्वजधारियों को या धर्म संसद को इस बात पर भी विचार करना चाहिए कि निम्न वर्ग के लोग अपने घर लौटें अर्थात सवर्ण बन जायें। यदि इसमें कोई शंका हो तो वेदों के अनुसार ही संसद फैसला ले सकती है। वेदों की ओर जब लौट ही रहे हैं तो एक बार जातियों का पुनर्निर्धारण किया जाना चाहिए।  सरकार समाज की शांति पर काम कर रही है। सोचेगी ही। धर्म की वृद्धि के लिए संतानोत्पति की महती योजना पर भी सरकारी संत काम कर रहे हैं। साध्वी जी ने सलाह दी है कि हिन्दुओं को आठ बच्चे पैदा करने चाहिए। सरकार संस्कृति के मामले में शांति रखना पसंद करती है। अभी तक इस मामले में प्रधानमंत्री ने मन की बात नहीं की है। उनके ही संसदीय क्षेत्र में शंकराचार्य जी हैं। उन्होंने साई बाबा को मंदिरों से बेदखल कर दिया। शंकराचार्य जी को नाथूराम या मुलायम सिंह या सचिन के मंदिर मेें पूजे जाने पर एतराज नहीं है। साईं बाबा पर है। प्रधानमंत्री जी को संभवत: अपने संसदीय क्षेत्र को संज्ञान लेने की फुर्सत ही नहीं मिलती। संसार भ्रमण करना पड़ता है।
अभी चार साल का समय है। सरकार के पास प्रचंड बहुमत है। वह निश्चय ही ऐसा कर गुजरेगी जो पिछली किसी सरकार ने न किया हो। मोदी जी ने कहा भी था कि उन्हें साठ साल दिया हमें केवल साठ महीने दे दीजिये। हमने दे दिये। अब उनकी बारी है। देश की चौकीदारी पूरी मुस्तैदी से कर रहे हैं। यह अलग बात है कि ललित मोदी ने नाम का लाभ उठा लिया। अडाणी और अम्बाणी की चर्चा भी जलने वाले करते ही रहते हैें। पूरा फोकस सांस्कृतिक उत्थान पर है। संस्कृति जो सदियों से अनाथ थी। उसके नाथों की एक मजबूत सेना सक्रिय हो गई हैं। मुस्लिम, क्रिश्चियन तो एक बहाना है, बारी तो सबकी आयेगी ही। ऐसे में याद आते हैं जर्मनी के पादरी पॉस्टर निम्योलर जो लिखते हैं-
पहले वे कम्युनिस्टों को ढ़ूंढ़ते आये
मैं कम्युनिस्ट नहीं था
इसलिए मैंने कुछ नहीं कहा,
फि र वे सोशल डेमोक्रेटस को ढ़ूंढ़ते आये ,
मैं सोशल डेमोक्रेटस नहीं था
इसलिए चुप रहा
इसके बाद वे ट्रेड यूनियन वालों को ढ़ूंढ़ते आये
पर मैं ट्रेड यूनियन में नहीं था
और फि र वे यहूदियों को ढ़ूंढ़ते आये
लेकिन मैं यहूदी नहीं था इसलिए मैंने कुछ नहीं किया
और, अंत में जब वह मेरे लिए आये
तो वहां कोई नहीं बचा था जो मेरे साथ खड़ा हो सके।
     सांस्कृतिक उत्थान की यह सतत् प्रक्रिया कहां जाकर रुकेगी कहना कठिन है लेकिन अंत में दिनकर- जो तटस्थ हैं समय लिखेगा उनका भी इतिहास।