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Saturday 18 Nov 2017

विशाल हृदय के \'सुमन\' (सुमन-शताब्दी)


जीवन सिंह ठाकुर
422, अलकापुरी, देवास (म.प्र.) 455001
फोन- 07272-227171
यह सवाल कितना बेमानी है कि कोई व्यक्ति क्यों याद आता है? वह हमारी स्मृतियों का हिस्सा क्यों है? कुछ बातें तर्कों की कसौटी पर नहीं कसी जा सकती। तर्क, बुद्धि का पता तो देते हैं लेकिन स्नेह, प्यार अपनेपन की गहराई और सच्चाई से परहेज भी कर जाते हैं। मध्यम मार्ग से चलें तो तर्क, प्यार, आस्था को साथ चलना होगा, तब उस तक पहुंच सकते हैं, फिर तर्क, प्यार फैसला कर लें।
सुमन जी कई मायनों में ऊपर लिखित बातों से परे भी थे, और उसका हिस्सा भी थे। पांच अगस्त 1915 को जन्मे 'सुमनÓ यदि आज होते तो सौ वर्ष के होते। हर कोई चाहता है कि उसका अपना प्रिय शतायु हो या शास्त्रों के अनुसार पूरे सवा सौ बरस जिये। डॉ. सुमन के जो भी संपर्क में आया उसने उनके साथ दीर्घ जीवन यात्रा की कामना की है। उनका व्यक्तित्व, उनकी वाणी, ज्ञान, जानकारियां जहां अद्भुत थी, वहीं गहरी विनम्रता का विशाल 'वटवृक्षÓ भी था। कहते हैं विशाल वृक्ष की छाया में अन्य पौधे पनप नहीं पाते। इस कहावत को 'सुमनÓ जैसे विशाल व्यक्तित्व के संदर्भ में 'झूठÓ सिद्ध होना पड़ा है। आज के दौर में जब रिश्ते-नाते सूली पर चढ़े हैं। संबंधों को घोर आत्मकेन्द्रित व्यवस्था लील रही है। प्रतियोगिता, प्रतिद्वंद्विताओं में बदल गई है। एक ऐसा निजाम गढ़ा जा रहा है जहां इंसान तमाम रिश्तों से खारिज होकर सिर्फ 'नर और मादाÓ रह जाए। इस निजाम का बवंडर तमाम चकाचौंध के साथ, हमें स्वीकृति में हाथ बंधे स्वागत की मुद्रा में ले आया है।
ऐसे में डॉ. सुमन, याद आते हैं। उनका आत्मीय व्यक्तित्व याद आता है। मुझे उनका सान्निध्य पाने का अवसर मिला है। लम्बी-लम्बी चर्चा के मौके मिले हैं। हर भेंट के साथ उनका कद बढ़ता जाता था। लेकिन सामने बैठे व्यक्ति में बौनापन नहीं आता था। वे अकेले दौड़कर रेस का खिताब जीतने वालों में से कभी नहीं रहे। वे 'सहयात्रीÓ रहे तमाम सुख-दुख साथ निभाते, अपनेपन की दौड़ में आगे-आगे और अव्वल रहते।
जो भी सुमन जी से मिला, जिन्होंने भी उन्हें सुना है वे सभी जानते हैं कि सुमन जी ने सदैव अन्य कवियों, लेखकों की रचनाओं को 'कोटÓ किया। उन रचनाओं की श्रेष्ठता को तहेदिल से व्यक्त किया। जहां तक मुझे याद है उन्होंने कभी आगे बढ़कर, स्वयं अपनी रचनाओं के उदाहरण नहीं दिये।
उज्जैन शहर उसकी गलियां, उसके लोग, वहां की सड़कें 'सुमनÓ की गंध से भरी है। मुझे याद है उन दिनों प्रेमचंद पीठ पर स्व. शमशेर बहादुर सिंह जी थे। मैं तथा मेरे चित्रकार, कहानीकार मित्र प्रभु जोशी देवास से उज्जैन शमशेर जी से मिलने पहुंचे। शमशेर जी ने ही बताया कि बाबा नागार्जुन भी आए हुए हैं। वे सुमन जी के घर हैं। हम वहां पहुंचे, नागार्जुन जी से मिले, थोड़ी देर बाद ही ऑफिस से सुमन जी (सुमन जी, उन दिनों विक्रम विश्वविद्यालय के कुलपति थे) आ गये। हम सभी पारिवारिक चर्चा करते रहे। वहां से हम सभी यानी नागार्जुन जी, सुमन जी, प्रभु जोशी तथा मैं शमशेर जी के निवास पर आ गए थे। वह दिन इतनी आत्मीयता, इतने अपनेपन से लबरेज था कि उसका स्वाद आज भी उतना ही तरोताजा और यादों का हिस्सा बना हुआ है।
ऐसा नहीं कि कवि, कुलपति, वक्ता, विचारक, डॉ. सुमन को बौद्धिक और साहित्यिक लोग ही जानते-पहचानते थे। मुझे वह दिन अच्छी तरह याद है, हम सुमन जी के साथ माधव कॉलेज के सामने वाली सड़क से मालीपुरे की तरफ जा रहे थे। क्या दुकानदार, क्या ठेलेवाले, रस्ते चलते लोगों से 'नमस्तेÓ, 'आइये सरÓ, 'पधारो साबÓ की पुकारें आ रही थी। सुमन जी मुस्कुराते आगे बढ़ रहे थे। घूंघट खींचती औरतें, ओरले पर बैठी बहन बेटियां,दबे स्वर में एक-दूसरे को कह रही थी ''देख री सुमन जी जइरिया हे, देखो नीं सुमन जी जइरिया हेÓÓ ये वे लोग थे जो कभी 'कॉलेजÓ नहीं गए थे। वे सुमन जी के काव्य से उस तरह परिचित नहीं थे जिस तरह साहित्य के लोग होते हैं। लेकिन कवि 'सुमनÓ की गंध गलियों में लोगों की आंखों में उनके प्रेम से दमकते चेहरों में न•ार आती थी। कवि ने अपना आत्मतत्व रिश्तों की आंच में पकाया था। रोटी की गंध, फूलों की खुशबू, होठों पर मुस्कानों, आंखों में आए जलजलों (नमीं) में 'सुमनÓ का घर था। सुमन वहीं बस गए थे।
हम मालीपुरे से नहीं गुजरे थे। हम 'सुमनÓ के दिल से यात्रा कर रहे थे। एक कवि की इस तरह की स्वीकारोक्ति इसे क्या कहेंगे? कहने की जरूरत भी क्या है? मालवा की तासीर है अपने में रचा-बसा लेना। बिना किसी दिखावे के। सुमन जी ने ''कटे अंगूठों की बन्दनवारेंÓÓ रचना में लिखा है-
''न जाने क्या कशिश है, मालवा तेरे शबिस्तां में
कि हम शामें-अवध, सुबह बनारस छोड़ आए हैं...ÓÓ
क्या पता कालिदास के मेघ ने 'सुमनÓ का क्या संदेश दिया था। उस गोपनीय संदेश में जरूर उज्जैन यानी मालवा आने का कहा होगा। बैसवाड़े से रीवां, रीवां से ग्वालियर, ग्वालियर से बनारस, सुमन जी को गंगा के पवित्र जल में कहीं क्षिप्रा का आह्वान भी सुनाई पड़ा होगा 'हे कालिदास के वंशज तुम्हें तो उज्जयिनी में होना थाÓ
सुमन जी ने लिखा है :
मैं शिप्रा सा तरल-सरल बहता हूं
मैं कालिदास की शेष कथा कहता हूं।
सुमन आजीवन कालिदास की शेष कथा में हमारे आपके दुख-दर्द, सुख-सुकून के गीतों में अपना दायित्व निभाते रहे।
सुमन जी मूलत: प्रगतिवादी कवि हंै लेकिन उनका 'वादÓ इंसानी और जनकल्याणकारी इंसानी भाव संसार का है। वे वाद की गठरी होते नहीं वरन उसे आत्मीय आंच में पकाकर प्रेम-स्नेह, समाज, देश, काल, स्वतंत्रता की बहुआयामी संघर्ष यात्रा का साथी बनाते हैं।  कहा जाता है वे तारीफ करने में अति कर जाते थे। लेकिन उनकी तारीफ महज शाब्दिक नहीं होती थी। वे उस व्यक्ति या रचना का श्रेष्ठ बाहर निकाल कर उसे सामने रखते थे। दिल की विशालता में संकुचित कृपणता, ओछापन सुमन जी में कहीं नहीं था। हर व्यक्ति रचनात्मक संसार की बेहतरी का रचनाकर्मी था। वैसे भी दूसरों की तारीफ करना हर किसी के लिए संभव है? प्रशंसा करने के लिए बेहद बड़ा दिल चाहिए, वह सुमन जी का था। इस विशाल हृदय की दुनिया में सभी समाहित थे। लेकिन अपनी रचनाशक्ति के साथ।
कवि का अपना संसार है। उसका गहरा अफसोस भी उसे कचोटता है। ये पंक्तियां क्या कह रही हैं :
''कवि की अपनी सीमाएं,
कहता जितना कह पाता है
कितनी भी कह डाले, लेकिन
अनकहा अधिक रह जाता हैÓÓ
सुमन जी की रचनात्मक दुनिया पर समीक्षकों के अपने-अपने पैमाने होंगे। लेकिन ''डॉ. शिवमंगल सिंह सुमनÓÓ ने जो जन छवि पाई थी वह अनोखी थी। वे प्यार के, रोमांस को व्यक्त करने वाले क्रांतिकारी कवि थे। वे स्वतंत्रता, संघर्ष, जनहित के, जीवनमूल्यों, सामाजिक संघर्ष से प्यार, रोमांस करते हैं। मुहब्बत का पैगाम देते हैं। उनके लगाव और विछोह का अद्भुत संगम व्यक्ति सुमन में भी रचनाकार सुमन में भी-
''मैं लोल अपांगों के सपने सेता हूं,
मैं शिप्रा का जल नयनों में लेता हूं
कवि कालिदास जिनके गजरों पर रीझे
मालीपुर की मालिनों, बिदा लेता हूंÓÓ
जिंदगी में रिश्तों को निभाना 'सुमन जीÓ के जीवन में गहरा सामाजिक मूल्य रहा है। एक घटना बताना चाहूंगा। वे देवास में एक कार्यक्रम में आए उनके नाम से ही हाल ठसाठस भर गया था। सुमन जी की वाणी तो सरस्वती के प्रवाह को मूर्तिमंत करती ही थी। मंत्रमुग्ध लोग। जब कार्यक्रम खत्म हुआ तो भीड़ से घिरे सुमन जी को मेरी पत्नी मधु ने घर पर चाय के लिए निवेदन किया वे बोले 'बहूरानी इस बार तो रहने दो अगली बार सबसे पहले तुम्हारे यहां आऊंगा।Ó
पूरा वर्ष निकल गया। सुमन जी को फिर एक कार्यक्रम में आना हुआ। वे सर्वप्रथम सीधे हमारे घर आए। आते ही कहा बहू! भई लाओ चाय जरा बड़ा मग्गा भरकर। उन्हें वादा निभाना खूब आता था।
कितना याद करूं सुमन जी को जितना याद करो उतना ही कम लगता है- यादों के क्षितिज खुलते जाते हैं।
27 नवम्बर 2002 को उस मनहूस खबर ने जैसे हम सभी को हतप्रभ कर दिया था। उज्जैन पहुंचे, आज उन्हें अंतिम यात्रा पर जाना था। उज्जैन की गलियां, वही मुहल्ले, घूंघट में औरतों के झुण्ड,बहन-बेटियों के ठट के ठट, रोती आंखें, मां! सुमन जी चलिया गिया, बाबूजी! सुमन जी गया... रुलाई और रुलाई थी... वे सभी के अपने थे... अपना था वो चल गया था... वही क्षिप्रा का घाट था। चक्रतीर्थ पर पार्थिव देह आई थी। हम सभी की आंखें देख रही थी। अभी ऐसा नहीं लग रहा था कि 'सुमनÓ अब सिर्फ देह है, सुमन की गंध हम सभी के चारों तरफ लिपट गई थी। शिप्रा से लगाव उनका था जैसे कह रहे हो-
मैं शिप्रा का जल नयनों में लेता हूं
कवि कालिदास जिनके गजरों पर रीझे
मालीपुर की मालिनों विदा लेता हूं।
सुमन जी ने विदा ले ली लेकिन जितना वे जिये उससे ज्यादा वे दूसरों में समा गये थे। हजार-हजार सुमन विशाल हृदय के सुमन,
कह रहे थे-
'बिखरी शक्तियों को फिर सहेज करो
कौम के कारवां की घंटियों को तेज करोÓ
मैं चक्रतीर्थ पर पीपल के नीचे खड़ा शिप्रा के तट पर शिप्रा का जल आंख में लिए सांदिपनी की भूमि पर, कृष्ण की ज्ञान भूमि में सुमन का मोक्ष होते देख रहा था। सभी यही देख रहे थे। उस दिन भी आंखें नम थी। और आज भी है।
''कितनी भी कह डालें, लेकिनÓÓ
अनकहा अधिक रह जाता है।