Monthly Magzine
Wednesday 22 Nov 2017

कमलेश का न रहना बौद्धिक क्षति है

राजकुमार कुम्भज
331, जवाहर मार्ग, इंदौर-452002,
फोन- 0731-2543380
महानगर का कवि और महानगर में कवि होना, दो भिन्न रचनात्मकता भिन्न संवेदनशीलता और भिन्न अनुभव-संसार की प्रस्तावना को जन्म देते हैं। महानगर की प्रेरणा और महानगर में प्रेरणा भी भिन्न ही होती है, यहां तक कि महानगर की जीवन-शैली, उसकी सामाजिकता और उसके सरोकार व संघर्ष भी भिन्न होते हैं, फिर भी अपने सकल मूल जनपद को बचाए रखते हुए सिर्फ कवि होना, दुर्लभ ही होता है, कमलेश ऐसे ही जनपद-संस्कारों और भारतीय-ज्ञान-परंपरा के निष्ठावान कवि, लेखक और चिंतक थे। वे गोरखपुर जनपद से आए थे और दिल्ली जैसे महानगर में अपना बसेरा बना बैठे थे। वे डॉ. राममनोहर लोहिया के सहयोगी, निजी सचिव और समाजवादी युवजन सभा के राष्ट्रीय नेताओं में से एक थे। उनमें अकथनीय, अतुलनीय और अद्वितीय आत्मीयता का अथक भंडार था। 27 जून 2015 शनिवार तड़के दिल्ली में दिल का दौरा पडऩे से कमलेश का निधन हो गया। कुछ दिनों से उन्हें सांस लेने में तकलीफ हो रही थी।
कमलेश अपने निधन के वक्त अठ्ठहत्तर बरस के थे। कमलेश का पूरा नाम कमलेश शुक्ला था। उनके परिवार में सिर्फ एक विवाहित पुत्री है। कमलेश का निधन भारत के हिन्दी समाज में बौद्धिकता की विरल परंपरा का अवसान है। वे बुद्धि और सृजन के मूर्धन्य विद्वान थे; क्योंकि कमलेश हिन्दी के शीर्षस्थ कवि होने के साथ ही साथ, अथक पुस्तक-प्रेमी और ज्ञानात्मक संवेदना के अनुसंधानकर्ता भी थे। उनकी विद्वता का आग्रह यह था कि वे राजनीति, समाज-विज्ञान, संस्कृति, दर्शन, हिन्दी-अंग्रेजी-संस्कृत साहित्य और इतिहास इत्यादि की नई से नई पुस्तकें खरीदकर पढ़ते थे और याद भी रखते थे।  कमलेश का हिन्दी के अलावा अन्य भारतीय भाषाओं के लेखकों, कवियों, विद्वानों और विचारकों से भी निरंतर लंबा, किन्तु विचारोत्तक संवाद-संपर्क बना रहता था। बांग्ला, तमिल, कन्नड़, ओडिय़ा, तेलुगू, मराठी, असमिया आदि भाषाओं के बड़े कवि-लेखक उनके मित्र थे। यू.आर.अनंतमूर्ति उनके परम आत्मीयों में से एक थे। उन्हें संगीत, नृत्य और चित्रकला की भी गहरी समझ थी। बहुपठित किन्तु अल्पभाषी कमलेश, जीवनभर गहन-गंभीर-संवेदना के अल्पभाषी कवि इस अर्थ में बने रहे कि उन्होंने कम लिखा, लेकिन कभी कमतर नहीं लिखा। उन्होंने जितना भी लिखा उसमें हमेशा एक तरह से विश्व-दृष्टि की सक्रियता साफ-साफ दिखाई देती है। उनकी कविता में रो•ामर्रा की नागरिक-छवियां और स्मृतियां जिस सहज भाव से उपस्थित होती हैं, उसी सहजभाव से जनपद की छवियां और स्मृतियां भी आती हैं। पंडित कमलेश शुक्ल की कविताओं में पांडित्यपूर्ण बोझिलता नहीं है।
कमलेश मूलत: उस पीढ़ी के कवि थे, जो सन् साठ के दशक में उभरी थी। यह वैचारिक आग्रहों का दौर था, तब साहित्य में भी आग्रहों के आशय उफान पर थे। हिन्दी कविता अपने नए आकार-प्रकार और नए आग्रहों के स्वीकार-अस्वीकार की तरफ बढ़ रही थी। किन्तु कमलेश अपनी ही तरह से लिख रहे थे। उनका आग्रह अपनी रचनात्मक-उपस्थिति से ही अधिक रहता था। उन्होंने कभी नहीं चाहा कि अपने वैचारिक-आग्रह के चलते, वे कोई हो-हल्ला मचाते हुए विप्लव कर दें, ऐसा कुछ म$कसद उनका कभी नहीं रहा; क्योंकि उनकी समझ सिर्फ साहित्य तक सीमित नहीं थी। उनके लिखे में जिस विश्व-दृष्टि का संकेत मिलता है, वह शायद इसीलिए कि उनकी दृष्टि, अंतरराष्ट्रीय राजनीतिक क्षेत्रों और संबंधों पर भी समान गति से पैनी बनी रहती थी। एक कवि के ज्ञान में राजनीति के ज्ञान की कितनी और कैसी जगह होनी चाहिए, ये बात कमलेश बेहतर जानते थे। अपने ज्ञान का प्रदर्शन करना उनकी $िफतरत नहीं थी, लेकिन जितना उन्होंने पढ़ा था, उसका ह•ाारवां हिस्सा भी वे अपनी रचनाओं में साझा नहीं कर पाए।
वे गोष्ठियों-समाजों-उपसभाओं की बहसों को विचारोत्तेजक बना देने में सिद्धहस्त थे। यह एक दुर्लभ अवधारणा है कि विवाद में भी संवाद संभव हो सकता है। विवाद में संवाद एक लोकतांत्रिक-कला है, लेकिन किसी भी विवाद में, बिना किसी को आहत किए संवाद संभव कर दिखाना, एक राजनीतिक-कला है। इस संवाद-क्षमता को अस्वाभाविक-बौद्धिकता का स्वाभाविक-अवदान भी कह सकते हैं, संभवत: यही वह केन्द्रीय-ऐन्द्रियता है जो कवि कमलेश में मूलत: रची-बसी थी। अपनी सूझ-समझ से किसी को चौंका देना अथवा धाक जमा देना उनका क्रियाकलाप नहीं था, लेकिन जब वे बोलते थे तो बेझिझक प्रामाणिकता से और आग्रहपूर्वक ही बोलते थे। सभी उनका सदा सम्मान करते थे। समाजवादी राजनीति और राष्ट्रीय राजनीति के शीर्षस्थ लोगों के बीच उनका गहरा आदर था। जॉर्ज फर्नांडी•ा, रवि राय, मधु लिमिये, मधु दंडवते, सुरेन्द्र मोहन इत्यादि उनसे आदरपूर्वक ही संवाद करते थे। डॉ. लोहिया का वरदहस्त और स्नेह तो उन्हें प्राप्त था ही, ओमप्रकाश दीपक और किशन पटनायक उनके समअध्ययनशील मित्र थे। सातवें दशक में 'दिनमानÓ से लेकर अब तक उनके लेख कई प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होते रहे। पिछले त$करीबन पांच बरस से वे 'समासÓ पत्रिका में निरंतर लिख रहे थे। डॉ. लोहिया के निकटस्थ रहे कमलेश, उनकी पत्रिका 'जनÓ और 'मेनकाइंडÓ के संपादक थे। जयप्रकाश नारायण के संपूर्ण क्रांति आंदोलन में भी वे सक्रिय रहे थे। बाद में वे जॉर्ज फर्नांडीज की पत्रिका 'प्रतिपक्षÓ के संपादक बने। 'प्रतिपक्षÓ के अलावा कमलेश ने 'कल्पनाÓ, 'फर्कÓ और 'इंगितÓ पत्रिकाओं का भी संपादन किया था। उन्हें निर्मल वर्मा के बाद भारत भवन में निराला सृजन-पीठ का निर्देशक बनाया गया था। गौरतलब है कि भारत भवन में तब तक अज्ञेय ने कभी पैर तक नहीं रखा था। कमलेश के सौजन्य पूर्ण आग्रह से ही यह संभव हो सका था कि अज्ञेय पहली बार भारत भवन में आयोजित, आलोचकों के 'समवायÓ में पहुंचे थे।
कमलेश के अनेक राजनीतिक मित्रों को उनके कवि होने का पता नहीं था, लेकिन वे कई पुराने समाजवादी कार्यकर्ताओं की जरूरत आने पर उदारतापूर्वक आर्थिक-सहायता करते रहते थे। उन्हें अपने मित्रों और समाजवादी कार्यकर्ताओं की जैसी चिंता रहती थी, वैसी इधर कुछ कम ही देखी जाती है। 1964 में जब मुक्तिबोध बीमार हुए थे, तब उनसे मिलाने के लिए, कमलेश ही डॉ. लोहिया को लाए थे। तब कमलेश बिलकुल छरहरे थे। कालांतर में वे दोहरे बदन, स्थूलकाय होते गए और फिर जीवनपर्यंत वैसे ही स्थूलकाय बने रहे। तिहाड़ सेंट्रल जेल में नजरबंद रहने के वक्त भी वे वैसे ही स्थूलकाय देखे गए थे। बड़ौदा डायनामाइट कांड के सिलसिले में सी.बी.आई. ने कमलेश को भी उक्त साजिश का हिस्सेदार बना दिया था।
आपातकाल के दौरान बड़ौदा डायनामाइट कांड के सिलसिले में कमलेश पर भी द$फा 302 लगाई थी। षड्यंत्र रचने का आरोप था। इंदिरा-शासन के विरुद्ध युद्ध की घोषणा और डायनामाइट विस्फोट से सरकार में दहशत पैदा करना। जॉर्ज फर्नांडी•ा मुख्य आरोपी थे। के. विक्रमराव के साथ कमलेश भी पकड़े गए। कमलेश का अपराध सिर्फ इतना था कि उनके पास उस संदूक की चाबी मिली थी, जिसमें डायनामाइट रखे गए थे। प्रतिज्ञा यही थी कि इंदिरा-शासन उखाड़ फेंका जाए। अगर मुकदमा विधिवत और अंत तक चलता तो कमलेश दो-चार महीनों में ही सरलता से छूट भी जाते। बाकी को तो फांसी तय थी, लेकिन रायबरेली की जनता ने इंदिरा गांधी को हरा दिया। देश से तानाशाही और इमरजेंसी का अंत हो गया। जनता पार्टी का शासन आ गया और सभी रिहा कर दिए गए। कमलेश सज्जन, किन्तु निडर और दिलेर थे। उन्होंने जीवन और कविता में एक भिन्न तरह का मिजाज बनाया था, उनकी कविताओं का अपना एक अलग ही रंग है।  कमलेश ने अपना पहला-कविता संग्रह 'जरत्कारुÓ अपने प्रयासों से नहीं छपवाया था। उनकी अड़तालीस कविताओं का यह संग्रह 1971-72 में 'पहचान-2Ó श्रृंखला के अंतर्गत अशोक बाजपेयी ने छापा था। इलहाबाद से छपकर आया चालीस पृष्ठों का 'जरत्कारुÓ कविता-संग्रह बरसों तक कमलेश का एकमात्र संग्रह बना रहा। तीस-पैंतीस बरस का लंबा अंतराल बीत जाने के बाद उनका दूसरा कविता-संग्रह 'खुले में आवासÓ  आया और उसके बाद तीसरा संग्रह 'बसावÓ रहा। अब कमलेश के ये ही तीन व्यवस्थित कविता-संग्रह हैं।
अन्यथा नहीं है कि कमलेश ने अपने संपादन में समाजवादी विचार को उचित महत्व दिया, किन्तु भिन्न विचारों के लिए भी उनके यहां खुलापन था। 'जनÓ की मासिक गोष्ठियां दिल्ली में होती थी। उन्हीं में से एक गोष्ठी में कमलेश ने अपना एक अत्यंत ही गंभीर और महत्वपूर्ण आलेख 'लोहिया की क्षमता और लोहियावाद की अक्षमताÓ पढ़ा था। हालांकि बाद में उन्होंने दक्षिण पंथ को भी समझने का प्रयास किया; रामेश्वर मिश्र पंकज के मुताबिक कमलेश कई बातों में गुरु गोलवलकर के प्रशंसक थे, तब किशन पटनायक ने कहा था कि वहां कुछ खतरनाक प्रवृत्तियां भी दिखाई देती हैं : अगर उधर जाते हो तो $िफलहाल हमारा रास्ता अलग होगा।
कमलेश प्रतिबद्ध व समर्पित कवि, लेखक थे और साहित्य के क्षेत्र से ही अधिक संबंध रखते थे, उनकी कविताओं में किसी $खास किस्म के राजनीतिक विचार होने के संकेत और प्रमाण ढूंढ पाना कठिन है। 'जरत्कारुÓ की अनेक कविताएं मिथकों के माध्यम से अपने अर्थ खोलती है, जबकि 'खुले में आवासÓ और 'बसावÓ की कविताएं परिवेश की पहचान का प्रामाणिक-प्रमाण प्रस्तुत करती हैं। कमलेश का न रहना बौद्धिकता की अपूरणीय क्षति है। कवि कमलेश की ये पंक्तियां गौरतलब है ''जब सारी चिडिय़ाएं गुम हो जाती हैं /Ó रात का भार सहने से विकल / पूछता है कोई अंधेरे में / खोजते हो क्या / अपने होने का अर्थ?Ó कमलेश जीवनभर अपने होने का अर्थ खोजते रहे।