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Monday 20 Nov 2017

भीष्म जी के नाटक

 

 डॉ. कृष्णा शुक्ला
पी.एम.बी. गुजराती विज्ञान महाविद्यालय इन्दौर (म.प्र.)
मो. 9977746176
साहनी जी ने अपने सम्पूर्ण नाटकों में परिवेश को ही महत्ता दी है। उन्होंने परिवेश की अनिश्चितता, मूल्यों की संदिग्धता, भय, आशंका, तनाव, विरोध, विसंगति एवं विडम्बनाओं को अनुभूत किया। उनके द्वारा रचित छ: मौलिक नाटक अतीत की घटनाओं और परिचित चरित्रों को लेकर रचे गए है परन्तु न तो वे इतिहास की गौरव गाथा हंै और न ही अतीत का स्मरण करा देने वाला रचना रूप । नाटक 'हानूशÓ में एक ओर जहाँ कलाकार के रूप में सामान्य मनुष्य, उसकी कलात्मक संवेदना, सृजनात्मक व्यक्तित्व की छटपटाहट, उसका पारिवारिक तनाव, घरेलू सम्बन्ध और सहज परिस्थितियां हैं, तो वहीं दूसरी और व्यवस्था की कपट नीति, स्वार्थ और छल, आज भी मौजूद हैं। कलाकार के जिन पारिवारिक तनावों का अंकन 'हानूशÓ में है वे पांच शताब्दी पहले भी थे । हानूश एक साधारण-सा कुफ्लसाज अन्त तक संघर्ष करते हुए अपनी कला को साकार करता है पुरस्कार में सम्मान की खुशी, लेकिन एवज में मन तो टूट गया। उसके आर्थिक हालात सुधर जाते हंै लेकिन जीवन में कालिमा-छा जाती है। वह अपनी आंखों से नहीं देख सकेगा। एक साधारण से कलाकार का क्या यही पुरस्कार और सम्मान है ? क्या पुरस्कार का मूल्य इतना क्रूर कि वह तिल-तिल कर मरता है ? यही कटुता उसके संवादों में दृष्टव्य है - ''मैं भी कैसा पागल हूँ। अंधे लोग आँखों वालों से ज्यादा बचकाना सपने देखते हैं। क्या मैं नहीं जानता कि न मेरी आँखे लौट सकती हंै और न मैं घड़ी बना सकता हूँ ।ÓÓ समाज के ठेकेदार एवं सत्ता पर आसीन सत्ताधारियों ने मिलकर उसकी जिन्दगी को बदरंग बना दिया। आज हमारे समाज में भी ऐसे न जाने कितने गुमनाम हानूश मौजूद हंै जो अपनी कला के लिए सम्मानित तो दूर बल्कि अभाव से भरा जीवन जीने को मजबूर हैं। मशहूर शहनाई वादक 'भारत-रत्नÓ से सम्मानित उस्ताद बिस्मिल्लाह खां, कवि प्रदीप के दर्द को किसी ने नहीं जाना, 'पिंजरे के पंछी रे तेरा दर्द न जाने कोयÓ, जीते जी अपमानित, आर्थिक बदहाल जीवन जीने को मजबूर थे। नाटक में हानूश की पत्नी 'कात्याÓ के संवादों ने कई प्रश्न खड़े किए है - ''कात्या - उसमें पति वाली कोई बात हो तो मैं उसकी इज्जत करूँ। जो आदमी अपने परिवार का पेट नहीं पाल सकता, उसकी इज्जत कौन करेगी? वहीं फटेहाल हानूश के माँगे हुए कपड़े और फटे जूते देख कहती है- ''ये जूते पहनकर जाओगे? मेरी नाक कटवाओगे? कल जूतों का इन्तजाम क्यों नहीं किया ।ÓÓ हानूश सामाजिक परिवेश की बुराइयों के विरूद्ध संघर्ष करता है कभी मुखर होता है और कभी नहीं भी, पर वह समकालीन समाज के छटपटाते व्यक्ति को संघर्ष का रास्ता अवश्य दिखाता है। हानूश (आश्वस्त भावों से) ''इस लम्बे सफर का एक और पड़ाव खत्म हुआ कात्या, न जाने अभी कितने पड़ाव बाकी हंै, पर तुम चिन्ता न करो कात्या, घड़ी चलने लगी है। घड़ी की टन-टन् सुनता है उसकी अंधी आंख में आँसू चमकता है और मुस्कुराता है कि सबसे बड़ी बात यही है कि आविष्कार जीता रहे ।ÓÓ क्रांति, सृजन, मनुष्य और उसके भविष्य में विश्वास नाटक का मूल बिन्दु है। यही है हानूश यानि एक संवेदनशील कलाकार का सत्य। नाटक में प्रस्तुत व्यवस्था की कूटनीति, क्रूरता, स्वार्थपरकता, दुर्बल मानसिक स्थिति आधुनिक समय में भी मौजूद है। कलाकार के साथ घटी विडम्बनापूर्ण दुर्घटना को पूरी तरह गहराई के साथ अनुभव किया। यह व्यक्तिगत दुर्घटना नहीं थी यह थी एक सामाजिक विडम्बना । नाटक ''कबिरा खड़ा बाजार मेंÓÓ मध्ययुगीन वातावरण में संघर्ष कर रहे कबीर को उनके पारिवारिक और सामाजिक संदर्भों सहित आज भी प्रासंगिक बनाती है। अतीत को वर्तमान के अभिनिवेश से जीवित बनाया है और वर्तमान को अतीत के सहारे सूझबूझ से पहचाना है। देश और समाज में नवजागरण के प्रतीक नाटक के नायक कबीर ही नहीं बल्कि नवयुग के भी नायक हंै। वह जन-मन का उद्घोषक है। कबीर की फक्कड़ाना मस्ती, निर्मम अक्खड़ता और उनकी युग प्रवत्र्तक सोच पूरी जीवन्तता के साथ मौजूद है। देश में चारों ओर फैली विषमता, असमानता, धार्मिक-संकीर्णता, जातिगत वैमनस्यता कबीर के समय से चली आ रही है, वर्तमान में भी इनसे मानव-जाति क्षुब्ध है। धर्म के नाम पर साम्प्रदायिकता का जहर घोल कई लोगों को मौत के घाट उतारा गया और वर्तमान में यह सिलसिला थमा नहीं है । 'गोधरा हत्याकाण्ड या फिर अयोध्या-राम मंदिर निर्माण आज भी ज्वलन्त प्रश्न के रूप में मुँह बाए खड़े हैं। कबीर के समय में साधु-महन्त पर अछूत का साया नहीं पड़ सकता था, क्या 21 वीं सदी के आधुनिक भारत में इस तरह की मानसिकता कायम नहीं है? आज हमारे विचार आधुनिक बनने का ढ़ोंग रचते हंै लेकिन हमारी सोच में मानसिक संकीर्णता का ढर्रा वही है। सामाजिक-कुरीतियां जस-की-तस मौजूद हंै। चाँद पर पहुँचने वाला मनुष्य वहीं-का-वहीं खड़ा है। सिकन्दर लोधी द्वारा बंधक बनाए जाने पर धर्म और समाज की लड़ाई में सिर्फ उनके इकतारे और वाणी की ललकार है। वाणी में इतनी सामथ्र्य है सत्संग में टोली का मजमा लगता है, वाणी कुप्रथाओं पर गहरी चोट करती है। वर्तमान में महात्मा सन्तों की वाणी में सामथ्र्य नदारद है, बाह्याडम्बर का ढ़ोंग ज्यादा प्रचलित है। नाटक में अखाड़े के महन्त, साधुओं के स्नान के पश्चात् ही भक्त पवित्र जल में स्नान करते हैं। क्या पवित्र जल में स्नान से पाप धुल जाते है ? फिर तो धरती पर न जाने कितनी पुण्यात्मा अवतरित हो जाती कबीर का यह कटाक्ष कितना सटीक है - ''माला फेरी तिलक लगाया, लम्बी जटा बढ़ाता है । अन्तर तेरे कुफर कटारी, यो नहीं साहिब मिलता है ।ÓÓ नाटक ऐतिहासिक होते हुए भी अत्यन्त आधुनिक हैं अर्थवान हैं। कथावस्तु बेहद सामयिक एवं प्रासंगिक है। हमारा समाज कबीरकालीन कुरीतियों में आज भी जी रहा है। नाटक 'माधवीÓ में समकालीन समाज की स्त्री के यथार्थ को चित्रित किया है। माधवी द्वारा उठाए गए प्रश्नों के लिए आधुनिक समाज आज भी अनुत्तरित है । ''आज मां होती तो क्या वह भी मुझे इस तरह दान में दे देती? मैं क्या चाहूँगी? मेरे चाहने से क्या होता है, मैं तो तुम्हारी गुरूदक्षिणा का निमित्त मात्र हूँ।ÓÓ पिता ने मुझे सौंपकर अपना कत्र्तव्य निभा दिया और मुनिकुमार ने घोड़े बटोरकर। एक दानवीर बन गया दूसरा आदर्श शिष्य और माधवी? यदि यह दुर्बल नारी बीच में से निकल जाए गालव तो क्या होगा ।ÓÓ ''मैं इतनी कुरूप हो गई हूँ क्या? और तुम सौन्दर्य के उपासक कब थे ? क्या मैं सचमुच कुरूप हो गई हूँ ? अब किसलिए गालव? कौन-सी मर्यादाएँ गालव? तुम किस मर्यादा का उल्लंघन कर रहे हो? यौवन और रूप तो मिल जाएँगे पर इस अपने दिल का क्या करूँगी जो छलनी हो चुका है ?ÓÓ माधवी के इन प्रश्नों में आज की नारी, जिसे आधुनिक स्वनिर्भर उपमाओं से सुशोभित किया है उसकी भी यही पीड़ा है। माधवी पौराणिक नारी होते हुए भी आधुनिक नारी का प्रतिनिधित्व करती है। पुरूष नीति द्वारा उसके साथ किए अपमान का वह अन्तत: विरोध करने का साहस जुटा पाती है। वासना और प्रेम के इसी द्वन्द्व को समकालीन परिवेश से जोडऩे की सफल कोशिश की है। कुछ अपवादों को छोड़कर आज भी पुरूष की मानसिकता यही है कि नारी मतलब मात्र उपयोग की वस्तु । पिता के रूप में राजा ययाति पिता कम यश लोलुप नरेश ज्यादा हंै। वर्तमान में भी कई ऐसे पिता हैं जो अपनी बेटी का सौदा कर बेचने में नहीं हिचकते। ऋषि कहलाने वाले विश्वामित्र भी बिकाऊ माधवी की इज्जत पर हाथ डालते हैं। आज भी ऐसी न जाने कितनी माधवी मौजूद हैं जिनकी पीड़ा माधवी की पीड़ा है। इस पुरूष प्रधान समाज में अन्तत: उसका मूक मुखर होता है और स्वाभिमान की रक्षा करते हुए गालव का प्रस्ताव ठुकरा देती है। नाटक में स्त्री के प्रति सहानुभूति व्यक्त करने की इच्छा नहीं है बल्कि स्त्री के शोषण की स्थितियों को बुनकर स्त्री के अस्तित्व की लड़ाई को सशक्त समर्थन दिया है। नाटक 'मुआवजेÓ में समाज के आज की बदली हुई मूल्य व्यवस्था की तस्वीर पर एक सार्थक टिप्पणी है। समाज में रहने वाले नागरिक से लेकर पुलिस महकमा, व्यापारी वर्ग, राजनेता सभी भ्रष्टाचार के जाल में लिप्त हंै। दंगों के दौरान इन सारी गतिविधियों में लिप्त सभी पात्रों को आज समाज में आसानी से देखा जा सकता है । इन भ्रष्ट लोगों की जड़ें इतनी गहरी समाज में पैठ गई हंै कि छोटे से लेकर बड़े तक सभी एक ही थाली के चट्टे बट्टे हैं। मुआवजे की राशि को ये नेता या समाजसेवी संस्थाएं हड़प लेती हैं, घोटाले-ही-घोटाले, पेंशन अपात्र लोगों को बांट दी जाती है। कुछ घोटालों की फाइलें खंगालने की कोशिश लेकिन ज्यादातर जांच का काम मृतप्राय है। बेगुनाहों को मरवाना, फर्जी केस करना, बीस सेकण्ड में मौत का सौदा, पुलिस वर्दी पहनकर दलाली करना, थाने में मौत का सौदा, डरा धमका कर वसूली करना, गलत काम को सफाई से करना, ईमानदारी की दुहाई देना, पुलिस वर्दी में डकैती, अपहरण, चोरी, फर्जी केस करने में ये सारे घृणित कार्य किए जाते हैं, इन सभी बातों की सच्चाई की नग्नता का कच्चा चि_ा खोला है। भ्रष्टाचारी के संदर्भ में 'सुथराÓ के संवाद कितने सटीक है - ''दुनिया में सबसे बड़ी ताकत कौन-सी है। हुकूमत, दौलत, सेवा, स्वार्थ ये सब छोटी ताकतें हैं, सबसे बड़ी ताकत बेईमानी की। 21 वीं सदी की ओर जाना है तो अभी से तैयारी करो । रिश्वतखोरी असल में मशीन का तेल है।ÓÓ ईमानदार की गाड़ी मालगाड़ी की तरह होती है। आज मनुष्यों की कीमत नैतिक मूल्यों से नहीं आँकी जाती बल्कि मूल्यहीनता ही आज का मूल्य बन गई है जिसे हम अच्छाई कहते हंै वह बुराई है और जो बुराई है वही अच्छाई का रूप धारण कर चुकी है । दंगों में खत्म होने वाली जिन्दगियों का मुआवजा तो हमारे पास है लेकिन मानवीय नैतिक मूल्यों, कोमलताओं, संवेदनाओं के खत्म हो जाने का मुआवजा हम कहाँ से देंगे? 'नाटक रंग दे बसन्ती चोलाÓ में देश-प्रेम के जज्बे का चित्रण एवं आजाद भारत की तस्वीर को उघाड़ा है। स्वतंत्रता के 68 वर्षों के पश्चात् भी भारत गुलामी की मानसिकता से उबरा नहीं है। ब्रिटिश शासनकाल में भारतीय गुलाम थे परन्तु आजाद भारत में हम ऐसी साँस ले रहे हैं जहाँ नियन्त्रण रेखा के पार जाना है तो सैनिक टुकडिय़ों का काफिला हमारी सुरक्षा में रहेगा। क्या यही है हमारी स्वतंत्रता? ऐसी आजादी किस काम की जहाँ हम अपनी शक्लों सूरत देखकर डर जाते हैं। आज सम्पूर्ण आजादी की बात करना भी बेईमानी है। लोगों को छोटी-छोटी आजादियाँ नसीब नहीं है। वह उसी तरह पिस रहा है जब हम परतंत्र थे। राष्ट्रभक्ति का सुर अब डिजिटल क्रांति में शरीक हो गया है। आकर्षक पैकेजिंग में देशभक्ति आपकी बाट जोह रही है। आजादी तो मिल चुकी सो क्या करें? देशभक्ति का व्यापार करें 'देश प्रेम खड़ा बाजार मेंÓ। आज हम तिरंगे को लेकर नौटंकी कर रहे हैं। नई अर्थव्यवस्था के नये दौर में बात-बात पर पार्टियाँ देने की शौकीन पीढ़ी के लिए पांच सितारा होटलों में खाने-पीने की मेज पर तिरंगा है, रेडीमेड-वस्त्र, जेवर, कंघी, चूडिय़ाँ, चप्पल, बिंदी, थैलों से गांव की गलियों में बिकने वाली पतंग और यहाँ तक कि पान-मसाला भी तीन रंगों में डूबा है। विनोबा भावे ने बहुत पहले कहा था - ''पहले भारत आजाद गांवों का गुलाम देश था, अब यह आजाद देश के गुलाम गांवों का देश है। जो भी चीजें हमारे जीवन को चलाती है वे एक-एक करके विदेशी सौदागरों के हाथों नीलाम होती जा रही है और ये सौदागर भी उन्हीं देशों के है, जिन्होंने कभी हमें गुलाम बनाया था ।ÓÓ 'नाटक आलमगीरÓ मुगल कालीन ऐतिहासिक परिवेश की घटना सम्पत्ति के लिए अर्थ, ताकत, साम्राज्य, तख्तो-ताज के लिए भाई-भाई के बीच खूनी संघर्ष का कथ्य है। इस कथ्य की साम्यता समकालीन समय में भी उतनी घृणित, दुष्कृत्य रूप में उजागर होती है। आज भी 100 में से 99 परिवार इस घिनौने पारिवारिक संघर्ष से पीडि़त हैं। सम्पत्ति का बंटवारा प्राचीन काल से लेकर आज भी कहीं न कहीं सुनने में आता है। क्या गरीब क्या अमीर दोनों ही स्तर पर सम्पत्ति हक की लड़ाई के लिए पारिवारिक कलह से पीडि़त हैं। उन्होंने अपने सभी नाटकों में विभिन्न परिवेशजन्य विडम्बनाओं एवं विषमताओं को उघाडऩे की कोशिश की है । उनके समस्त नाटकों में देश की आत्मा बोलती है ।