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Thursday 23 Nov 2017

मीरां लोक में बनती-बिगड़ती है


प्रो. माधव हाड़ा से गणपत तेली की बातचीत
गणपत तेली
393, डीडीए
 ब्लॉक सी एन्ड डी
कनिष्क अपार्टमेंट, शालीमार बाग
दिल्ली-110088
मीरां पर अपनी शोधपरक पुस्तक पचरंग चोला पहन सखी री के लिए आलोचक माधव हाड़ा इन दिनों चर्चा में हैं। उदयपुर के मोहनलाल सुखाडिय़ा विश्वविद्यालय में हिन्दी के आचार्य और विभागाध्यक्ष हाड़ा इससे पहले समकालीन कविता पर दो तथा मीडिया पर दो पुस्तकें लिख चुके हैं। उनसे मीरां के जीवन के सम्बन्ध में लम्बी बातचीत हुई। प्रस्तुत है मुख्य अंश:
कहते हैं कि मीरां के नाम से प्रचारित अधिकांश रचनाएं उनकी नहीं है। आपका क्या विचार है?
यह तय करना कि कौन सी रचना मीरां की है, बहुत मुश्किल काम है। मीरां की जो उपलब्ध कविता है वो दरअसल हमारे लोक की कामनाओं, इच्छाओं और सपनों की कविता भी है। लोक सदियों से मीरां की कविता में अपने सपनों और कामनाओं के अनुसार जोड़-बाकी करता रहा है। मीरां की प्रामणिक रचनाओं की तलाश का काम कई लोगों ने किया। इनमें सबसे महत्त्वपूर्ण काम हरिनारायण पुरोहित का है। उनकी संपादित पदावली राजस्थान प्राच्यविद्या प्रतिष्ठान, जोधपुर ने 1968 ई में प्रकाशत की। मीरां के पदों के कई पाठांतर, प्रपाठांतर, अवांतर और प्रक्षिप्त रूप मिलते हैं और इनके आधार पर कई संकलन भी प्रकाशित हुए हैं। इनमें से मीरां के मूल पदों की पहचान का बहुत मुश्किल और परिश्रमसाध्य काम हरिनाराण पुरोहित ने आजीवन किया। वे जयपुर राजघराने में जनाना ड्योढी के सुपरिटेंडेंट होने के साथ असाधारण किस्म के विद्याव्यसनी, साहित्य साधक और इतिहासकार थे। उन्होंने अपना संपूर्ण जीवन संत साहित्य के अन्वेषण, संग्रहण और संपादन-संशोधन में व्यतीत किया। उन्होंने वर्षों तक अनुसंधान कर सभी उपलब्ध स्रोतों से मीरां के पद एकत्र किए। इसके लिए उन्होंने साहित्य, भाषा और इतिहास के विद्वानों के अलावा मीरां के पितृपक्ष के वंशजों से लंबा पत्राचार किया और प्राप्त पत्रों और सामग्री की फाइलें बनाईं। पदों का बड़ा संग्रह हो जाने के बाद उन्होंने अपने शिष्य सूर्यनारायण चतुर्वेदी से विचार-विमर्श कर मीरां के मूल पदों की पहचान के लिए बारह कसौटियां तैयार कीं। इन कसौटियों पर खरे उतरने वाले 662 पदों को उन्होंने मीरां के असल पद मानकर विषयवार वर्गीकृत किया और फिर इनको अकारादि क्रम से पदावली में रखा। उनकी ये बारह कसौटियां अभी अज्ञात हैं। दरअसल अस्वस्थ सूर्यनारायण चतुर्वेदी ने इससे संबंधित सभी सामग्री अपने निधन से पूर्व प्राच्यविद् और इतिहाकार गोपालनारायण बहुरा को दी। बहुरा ने यह सामग्री राजस्थान प्राच्यविद्या प्रतिष्ठान के तत्कालीन निदेशक मुनि जिनविजय को दे दी। मुनिजी स्वयं इस पर कार्य करना चाहते थे, लेकिन उनकी व्यस्तता के कारण यह संभव नहीं हुआ और यह सामग्री प्रतिष्ठान से वापस चतुर्वेदी परिवार के पास चली गई। हरिनारायण पुरोहित साहित्यप्रेमी होने के साथ इतिहासकार भी थे इसलिए मीरां के पदों के अन्वेषण, संग्रहण और संपादन-संशोधन में उनका जोर तथ्यान्वेषण और अकृत्रिम प्रस्तुतिकरण पर ज्यादा था। उन्होंने अपनी इस पदवाली को बूझ-बुझक्कड़ मतलब आधार ग्रंथ की संज्ञा दी और कहा कि आगे भी मीरां के और पद मिलते रहेंगे। अपने अनुसंधान और एकत्रित सामग्री के आधार पर हरिनारायण पुरोहित अपने इस ग्रंथ की विस्तृत भूमिका लिखना चाहते थे, लेकिन वार्धक्य और अस्वस्थता के कारण यह संभव नहीं हुआ। पदावली केवल कामचलाऊ संक्षिप्त भूमिका के साथ प्रकाशित करनी पड़ी। हरिनारायण पुरोहित का यह काम अब राजस्थान प्राच्यविद्या प्रतिष्ठान, जोधपुर में है। इसके कुछ अंश गोपालनारायण बहुरा की टिप्पणियों के साथ परंपरा (सं. नारायणसिंह भाटी) के हरिनारायण पुरोहित पर एकाग्र अंक में प्रकाशित हुए हैं।
 मीरां की अलग-अलग कई छवियां हैं। ऐसा क्यों हुआ?
 यह सही है। मीरां की कई छवियां चलन में हैं। यह बहुत पहले से हो रहा है। मध्यकाल में मीरां के निधन के कुछ समय के बाद ही इसकी शुरूआत हो गई थी। यह इसलिए हुआ कि अपने-अपने नजरिए को सही ठहराने के लिए लोगों ने अपनी-अपनी मीरांएं गढ़ डालीं। इन नजरियों के अपने नाप-जोख और सांचे-खांचे हैं। इनकी जरूरतों के हिसाब से मीरां के जीवन से संबंधित जानकारियों में से या तो केवल कुछ चुनकर शेष दरकिनार कर दी गई हैं या कुछ नई गढ़ ली गई हैं। मीरां की प्रचारित भक्त और कवि छवि गढऩे वालों के पास शास्त्र में भक्ति और कविता के नाप-जोख और सांचे थे। मीरां की कविता इतनी विविध, सामवेशी और लचीली है कि उनको उसमें जैसा वे चाहते थे सब मिल गया। उन्होंने जब उसको सगुण कहना चाहा तो उनको उसमें सगुण के लक्षण मिल गए और जब वे जब शास्त्र के तयशुदा नाप-जोख लेकर माधुर्य खोजने निकले तो उनको उसमें माधुर्य के लक्षण मिल गए। यही नहीं, निर्गुण खोजने वालों को भी मीरां ने निराश नहीं किया। बारीकी से खोजबीन करने वालों ने उसमें योग की गूढ़ और रूढ़ शब्दावली भी ढूंढ निकाली। कविता के शास्त्र विश्वासी लोगों के अपने सांचों-खांचों में भी मीरां की कविता की काटपीट खूब हुई। मीरां की कविता ने किसी को निराश नहीं किया। जाकी रही भावना जैसी प्रभु मूरत देखी तिन वैसी। सबको अपने विचारों और भावनाओं के अनुसार मीरां की कविता में कुछ न कुछ मिल गया। किसी ने इस तथ्य की ओर ध्यान नहीं दिया कि मीरां की भक्ति और कविता ली और दी गई नहीं, कमाई गई हैं। यह लोक के बीच, उसकी उठापटक और उजास में अर्जित की गई है इसीलिए यह किसी परंपरा, संप्रदाय और शास्त्र के सांचे-खांचे में नहीं है और एकदम अलग और नयी है।
मीरां जैसी मध्यकालीन कवयित्री पर अब नए सिरे से शोध की क्या जरूरत है?
केवल मीरां ही नहीं, मध्यकालीन सभी संत-भक्तों पर नए सिरे से शोध की जरूरत है। हमारी परंपरा और विरासत की पहचान उपनिवेशकाल में बनी। विडंबना यह है कि साम्राज्यवादी स्वार्थ के अधीन बनी यह पहचान अभी तक जारी है। हम अपने इतिहास में इसी का पिष्टपेषण कर रहे हैं। मीरां पढ़ते हुए लगा कि वह अलग है। उसमें वह सब नहीं है जो हम खोजना चाहते हैं और जो उसमें है वो हम खोज नहीं रहे हैं। बस, मैंने केवल जो उसमें है, उसी पर अपने को एकाग्र किया। यह किताब उसी का नतीजा है। शोध एक तरह की यात्रा है, जिसमें मंजिल पहले से तय नहीं होती। कुछ लोगों को इससे निराशा होगी, क्योंकि जो वे पहले तय करके बैठे हैं वह इस किताब में नहीं है। हमने अपनी परंपरा और विरासत की पहचान करते हुए अपने समाज के खास स्वभाव की बहुत अनदेखी की है। हम आधुनिक होने की हड़बड़ी में और कभी-कभी वामपंथी होने के जुनून में यह भी भूल गए कि हमारा समाज एकदम अलग समाज है। यह शास्त्र या किसी किताब से नहीं चलता। यहां कुछ हद तक लोक सर्वोपरि है। उसका अपना बहुत लचीला अनुशासन या चालचलगत है। मीरां लोक में बनती-बिगड़ती है, इसलिए मेरी कोशिश उसको उसी के बीच समझने की है। लोक की अपनी भाषा है, जिसमें जनश्रुतियां, मिथ, ओखाणे आदि हैं, जिनको युक्ति और तर्क की कसौटी पर नहीं कसा जा सकता। मैने मीरां को समझने के दौरान किसी को खारिज नहीं किया है। पचरंग चोला पहर सखी री में लोक, आख्यान, इतिहास, कविता आदि सभी ने गवाही दी है।
 क्या मीरां संत-भक्त थीं? उनकी ख्याति तो इसी रूप में है।
 मीरां पारंपरिक अर्थ में संत-भक्त नहीं थी। वह एक संसारी स्त्री थी और उसके जागतिक सरोकार बहुत व्यापक, मूर्त और सघन थे। संसार विरत संत-भक्तों से अलग उनकी कविता में इसीलिए मूर्त का आग्रह बहुत है। वैयक्तिक पहचान का आग्रह और सांसारिक संबंधों का द्वन्द्व और तनाव भी संत-भक्तों की कविता में प्राय: नहीं मिलता, लेकिन मीरां की कविता में यह ध्यानकर्षक ढंग से मौजूद है। संत-भक्त जन्मांतर व्यवस्था और कर्मफलवाद में विश्वास के कारण जागतिक व्यवस्था को सामंजस्यपूर्ण मानकर इससे असहमत नहीं होते, लेकिन मीरां की कविता में व्यवस्था का विरोध और उससे असंतोष चरम पर है। मीरां की अभिव्यक्ति और भाषा भी जैसी लोकसंपृक्त और स्त्री लैंगिक है, वैसी लोक विरत संत-भक्तों के यहां नहीं मिलती।
क्या मीरां साध्वी थीं? उनको चित्रित तो साध्वी के रूप में ही किया गया है।
मीरां भगवाधारी साध्वी या बैरागन नहीं थी जैसा कि लोकप्रिय साहित्य और अन्य माध्यमों में प्रचारित किया गया है। उसने तीर्थयात्राएं और देशाटन किया, वह साधुओं के साथ उठती-बैठती थीं, लेकिन साधु वेश उसने कभी धारण नहीं किया। मीरां के प्राचीन चित्रों से भी नहीं लगता कि कभी उसने बैरागन वेश धारण किया था। जोधपुर के इतिहासवेत्ता रामकर्ण आसोपा ने मीरां का एक रंगीन चित्र माधुरी में प्रकाशित करवाया था। यह जोधपुर के राजमहलों से लिया गया था और मोटाराजा उदयसिंह या सूरसिंह के समय, मीरां की मृत्यु के पचास वर्ष के भीतर ही चित्रित हुआ होगा। यह चित्र अत्यंत सुन्दर है और राजसी वस्त्राभूषण से युक्त है। नाभादास की भक्तमाल की प्रियादास की टीका सहित सत्रहवीं सदी की एक पांडुलिपि राजस्थान प्राच्यविद्या प्रतिष्ठान, उदयपुर में सुरक्षित है। इस पांडुलिपि में उपलब्ध मीरां का चित्र भी प्राचीन है। इस चित्र में भी मीरां साधुवेश में नहीं है। इसमें उसने सामान्य स्त्री वस्त्र और आभूषण पहन रखे हैं।
  आम तौर पर यह माना जाता है कि मीरांकालीन समाज जड़ और ठहरा हुआ है। क्या यह सही है?
 नहीं, यह सही नहीं है। कोई समाज कभी भी पूरी तरह ठहरा हुआ नहीं होता। समाज के ठहर जाने की बात खुद माक्र्स की अपनी स्थापनाओं के भी विरुद्ध है। इतिहास में एक-दो शताब्दियों का समय भी परिवर्तनों की पहचान के लिए कम होता है। इसे विस्तार में देखे तो मीरां का समाज भी न तो ठहरा हुआ था और न ही गतानुगतिक। यह वह समाज था, जिसने सदियों तक मीरां को स्वीकृति और सम्मान दिया। यह सम्मान और स्वीकृति इतनी व्यापक और गहरी थी कि इस समाज में मीरां का नाम जेनेरिक संज्ञा में बदल गया। अपनी शर्तों पर अपना जीवन गढऩे वाली मीरां को इस तरह सिर-आंखों पर उठा कर चलने वाला समाज ठहरा हुआ या ठंडा कैसे हो सकता है? यह पर्याप्त गतिशील और द्वंद्वात्मक समाज था, जिसकी निर्भरता केवल धर्म और शास्त्र के बजाय सदियों के अनुभव से बनती-बिगड़ती परंपराओं और मर्यादाओं पर थी। वर्ण व्यवस्था के ब्राह्मण आदर्श का यहां के दैनंदिन जीवन के यथार्थ से कोई सीधा संबंध नहीं था। यहां वर्णमिश्रण भी हुआ और जातियां भी बनीं और बिगड़ीं। यहां के दैनंदिन जीवन में पेशे का संबंध जाति से कम रहा। यहां ब्राह्मणों की सर्वोच्चता और वर्चस्व के जो अतिरंजित वर्णन मिलते हैं उनमें सच्चाई नहीं है। ये अधिकांश आदर्श वर्णन हैं जो केवल ब्राह्मण रचनाओं में मिलते हैं। यहां ब्राह्मणों की लौकिक हैसियत भी कमोबेश दूसरी द्विज जातियों जैसी ही थी। यहां के दैनंदिन जीवन की हकीकत वर्ण व्यवस्था को भारतीय समाज की शाश्वत सच्चाई माननेवालों की आंखें खोलने के लिए पर्याप्त है।
 घनानंद पर इमरै बंघा और कबीर पर जैसा काम पुरुषोत्तम अग्रवाल ने किया, क्या इस काम को भी उसी की कड़ी में देखना चाहिए?
दोनों काम बहुत महत्त्वपूर्ण है। खास तौर पर पुरुषोत्तम अग्रवाल का कबीर संबंधी काम तो ऐतिहासिक महत्त्व का है। बहुत मनोयोग और परिश्रम लगा है इसमें। अपने समाज और अपनी परंपरा की पहचान और समझ बनाने में इस किताब ने मुझे अपनी कई अंतर्बाधाओं से बाहर आने में मदद की है। पचरंग चोला पहर सखी री में पहली बार मीरां की मध्यकालीन, उपनिवेशकालीन और हमारे समय की छवि निर्माण की प्रक्रियाओं को समझते हुए इनमें मीरां की मनुष्य यात्रा की तलाश की कोशिश है।
 मीरां की कविता की लोकप्रियता असंदिग्ध है। फिर क्या अंतर पड़ता है कि हम उनके जीवन से संबंधित कुछ तथ्यों को बदलकर देखें?
 बहुत फर्क पड़ता है। मीरां जिसे आज हम जानते हैं वह अपनी असल मीरां से बहुत दूर आ गई है। असल मीरां की तलाश तो होनी ही चाहिए। यह सही है कि मीरां बहुत लोकप्रिय है लेकिन उसके संबंध में ज्ञात कम, प्रचारित ज्यादा है। मीरां की कविता को सदियों तक लोक ने अपने सुख-दु:ख और भावनाओं की अभिव्यक्ति के माध्यम की तरह बरता इसलिए यह धीरे-धीरे ऐसी हो गई कि सभी को उसमें अपने लिए जगह और गुंजाइश नजर आने लगी और इससे सांचों-खांचों में काट-बांट कर अपनी-अपनी मीरांएं गढऩे का सिलसिला शुरू हो गया। धार्मिक आख्यानकार केवल उसकी भक्ति पर ठहर गए, जबकि उपनिवेशकालीन इतिहासकारों ने उसके जीवन को अपने हिसाब से प्रेम, रोमांस और रहस्य का आख्यान बना दिया। वामपंथियों ने केवल उसकी सत्ता से नाराजगी और विद्रोह को देखा, तो स्त्रीविमर्शकारों ने अपने को केवल उसके साहस और स्वेच्छाचार तक सीमित कर लिया। इस उठापटक और अपनी-अपनी मीरां गढऩे की कवायद में मीरां का वह स्त्री अनुभव और संघर्ष अनदेखा रह गया जो उसकी कविता में बहुत मुखर है और जिसके संकेत उससे संबंधित आख्यानों, लोक स्मृतियों और इतिहास में भी मौज़ूद  हैं। पचरंग चोला पहर सखी री में मीरां के छवि निर्माण की प्रक्रियाओं को समझने के साथ विभिन्न स्रोतों में उपलब्ध उसके स्त्री अनुभव और संघर्ष के संकेतों की पहचान और विस्तार का प्रयास है।
मीरां की वास्तविक छवि आपके अनुसार क्या होनी चाहिए?
 मीरां एक सामंत की विधवा थी, उसकी हैसियत एक जागीरदार की थी और उसके पास आर्थिक स्वावलंबन के साधन थे। वह संपन्न थी और इतनी संपन्न थी कि साधु-संतों को आतिथ्य सत्कार में मुहरें देती थीं। वल्लभ संप्रदाय के प्रामाणिक माने जाने वाले वार्ता ग्रंथों में इसके साक्ष्य हैं। मीरां पर आजीवन शोध करने वाले हरिनारायण पुरोहित के अनुसार उसने कभी भगवा नहीं पहने। उसके पितृपक्ष के एक वंशज और इतिहासकार गोपालसिंह मेड़तिया के अनुसार यह कहना गलत है कि मीरांबाई हाथ में वीणा लेकर जगह-जगह साध्वी की तरह घूमती थी। महाराणा सांगा ने अपनी युवराज पुत्रवधू को पुर और मांडल के परगने हाथ खर्च के लिए प्रदान किए थे। उसको कुछ हद तक जीवन की भी स्वतंत्रता थी। आवागमन की स्वतंत्रता और सुविधा के कारण ही वह पुष्कर, द्वारिका, वृंदावन आदि स्थानों पर गई। उसकी तत्कालीन सत्ता संघर्ष में भी निर्णायक भूमिका है। उसने भक्ति को भी इसमें हथियार की तरह इस्तेमाल किया। विडंबना यह है कि अपनी तयशुदा धारणाओं के प्रतिकूल होने के कारण इन तथ्यों को विमर्शकारों ने अनदेखा कर दिया। उसकी भक्ति भी अलग है। यह सांचों-खांचों की भक्ति नहीं है। यह अर्जित भक्ति है। इसकी किसी से तुलना नहीं हो सकती। इसका ढंग और मुहावरा एकदम अलग है। यह धारणा गलत है कि विवाह से पूर्व मीरां भावुकतापूर्ण ईश्वर भक्ति में लीन युवती थी। यदि ऐसा होता, तो राणा सांगा अपने उत्तराधिकारी पुत्र के लिए उसका चुनाव कभी नहीं करता। राणा सांगा अपने समय में उत्तर भारत के सबसे बड़े साम्राज्य का स्वामी यों ही नहीं था। वह योद्धा होने के साथ चतुर और कूटनीतिज्ञ भी था। निरंतर विपरीत परिस्थितियों में रहने के कारण उसे लोगों के अच्छे-बुरे होने की पहचान और समझ थी। कलह, षड्यंत्र और दुरभिसंधियों के माहौल में वह मेवाड़ के भावी शासक के लिए केवल भक्ति भाव में डूबी रहने वाली पगली-दीवानी युवती का चयन कैसे कर सकता था? मीरां की शिक्षा योद्धा राव दूदा की देखरेख में जयमल के साथ हुई। इस शिक्षा ने उसे स्वतंत्र सोच प्रदान की और आत्म स्वावलंबी भी बनाया। उसे अपने समय की राजनीति और मर्यादाओं और आदर्शों की भी अच्छी जानकारी रही होगी। यही सब देखकर सांगा ने उसको अपनी बहू बनाने का निर्णय लिया होगा। सभी ऐतिहासिक और पारिस्थिक साक्ष्य यह सिद्ध करते हैं कि मीरां एक आत्मसचेत और स्वावलंबी स्त्री थी।
  मीरां से संबंधित आपके निष्कर्ष कुछ स्थापित और लोकप्रिय धारणाओं के विपरीत हैं। आप इस संबंध में क्या कहते हैं?
 शोध किसी के समर्थन या विरोध के लिए नहीं होता। यह सांचों-खांचों को ध्यान में रखकर नहीं किया जाता। यदि ऐसा होता है, तो फिर यह सही मायने में शोध नहीं है। आपकी दृष्टि वस्तुपरक और तटस्थ होनी चाहिए। यही कोशिश इस काम में है। हमारे कुछ जड़ माक्र्सवादियों की मुश्किल यह है कि वे कमोबेश उसी तरह से सोचते हैं, जिस तरह से उपनिवेशवादी सोचते थे। पहले यूरोपीय उपनिवेशवादी और बाद में जड़ वामपंथी सोच ने हमारे बुद्धिजीवी वर्ग के मन में कई अंतर्बाधाएं खड़ी कर रखी हैं। विडंबना यह है अभी तक हम न तो चेतना के उपनिवेशीकरण से मुक्त हो पा रहे हैं और न जड़ वामपंथी अंतर्बाधाओं से उबर पा रहे हैं। इन अंतर्बाधाओं के चलते अपनी परंपरा और विरासत की ठीक पहचान नहीं हो पा रही है और इसका लाभ पुनरुत्थानवादी उठा रहे हैं। वे इसकी मनमानी व्याख्याएं कर रहे हैं। अपने देश भाषा स्रोतों के लिए हमारे ज्यादतर बुद्धिजीवियों में हिकारत का भाव है, जब कि उनके बिना हम अपने समाज को अच्छी तरह से नहीं समझ सकते। हमारा समाज अलग तरह का है। यहां सांस्कृतिक वैविध्य और गतिशीलता बहुत है। सार्वदेशिक और सार्वकालिक सांचों-खांचों में इसकी पहचान हो ही नहीं सकती। आप जिसे सामंतवाद कहते हैं, उसके भी हमारे यहां कई रूप हैं और ये निरंतर बदलते भी रहे हैं। आप सबको एक लाठी से नही हांक सकते, जबकि लोग अभी तक भी यही करते आ रहे हैं।
 आपके निष्कर्ष स्त्री विमर्शकारों की धारणाओं समर्थन नहीं करते। आप उनकी धारणाओं कैसे लेते हैं?
हमारे स्त्री विमर्श का रवैया तो और भी विचित्र है। उसमें मीरां का महिमा मंडन तो हो रहा है, लेकिन इसके लिए उसमें उसके समाज की लानत-मलामत का रिवाज बन गया है। कोई समाज किसी नवाचार को एक ही समय में, एक साथ कभी स्वीकृति नहीं देता। उसमें आत्मसातीकरण और प्रतिरोध की प्रक्रियाएं एक साथ और लंबे समय तक निरंतर चलती हैं। दरअसल किसी समाज में न तो प्रतिरोध स्थायी होता और न ही सभी हिस्सों में एक साथ और तत्काल आत्मसातीकरण होता है। केवल कुछ हिस्सों के सामयिक प्रतिरोध को आधार बनाकर किसी संपूर्ण समाज पर ठहरे हुए होने की तोहमत लगाना युक्तिसंगत नहीं है। मीरां के अपनी शर्तों पर जीवनयापन के ढंग की समाज के कुछ हिस्सों में सराहना हुई, जबकि कुछ में यह दुराचरण की तरह प्रचारित हुआ। प्रतिरोध भी स्थायी नहीं था। आगे चलकर धीरे-धीरे मीरां कुछ हद तक समाज के उन हिस्सों में भी मान्य हो गई, जो विरोध कर रहे थे। ज्यादातर स्त्रीविमर्शकार सामयिक और तात्कालिक प्रतिरोध को पकड़ कर बैठ जाते हैं। इसके आगे-पीछे के बारे में वे विचार नहीं करते, क्योंकि यह उनकी तयशुदा धारणाओं से मेल नहीं खाता। फिर समाज के बारे उनकी निर्भरता निर्देशात्मक ब्राह्मण ग्रंथों पर है, जिनका हमारे दैनंदिन जीवन से कोई दूर-दराज का संबध नहीं है। नतीजा यह है कि स्त्री विमर्श का हल्ला-गुल्ला तो बहुत है, लेकिन उसमें काम की बातें कम, हवा-हवाई ज्यादा है।