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Friday 17 Nov 2017

सई सांझ

 

(संदर्भ- इकलौते, परदेसी बेटे के मन में अपने गंवईं-परिवेश तथा बूढ़े माता-पिता की भावुक स्मृति)
सई सांझ,
अम्मां ने की होगी 'संझबातींÓ।

वृद्ध पिता,
दशरथी सोच में डूबे होंगे,
रोयी होगी-
बाबा तुलसी की चौपाई;
सूनी हुई अयोध्या-सी
मां की सुधियों में
उतरे होंगे
'परदेसीÓ 'सीता-रघुराईÓ।

वत्सलता
असीसती हुई रंभाती होगी,
'जीवें लाख बरीस पूत-
बहुवरि अहवाती।Ó

सिझी रसोईं छोड़,
अनमनी भूख पड़ी होगी,
टूटी 'खटियाÓ-
गहन उदासी की चादर ताने;
मेरी 'चिट्ठी-पत्रीÓ की बाबत
पूछा होगा-
द्वारे खड़ी 'नीमÓ ने,
पूरब वाले 'महुआÓ ने।
चिरई चारा लिए-
बसूरे लौटी होंगी,
सूने नीड़ मिली होगी
पीड़ा गहराती।