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Wednesday 22 Nov 2017

सर्वतोभद्र कामना

डॉ. राधेश्याम
392, एम.जी.ए.,
हिसार-125001
(हरियाणा)
मो. 094666-40106
सर्वतोभद्र कामना

सोन चिरैया,
हर दरवाजे , मंगल गाये।

खिली गुनगनी धूप,
मही-मां का मन परसे;
ताती नरम बयार,
सघन हरियाली बरसे;

गंगाजल, तुलसीदल
घर-घर गैया-बछरू,
कुंकुम, बिन्दी, मेहंदी संग
महावर सरसे।

हर्षित पिता असीसें
अम्मा सगुन मनाये।

जगे रंगोली-सा दिन,
रात निरापद सोये,
काग मुंडेरे, सुगना पिंजरे,
खुशबू बोये;

बूढ़ी उमर संजोये धागा ,
हर जुड़ाव का,
और दन्तुरित हंसी
उत्सवी सुमन पिरोये,

'तीरथÓ बनी गिरस्ती
'बारह कुंभÓ नहाये।

मछुवारे बस करें,
सियासी जाल समेटें,
पच्छिम की जानिब,
उड़ते मस्तूल लपेटें।

आकाशी आंधियां थमें,
धरती सुस्ताए,
'दिल्लीÓ बने 'द्वारकाÓ
'कृष्णा-सुदामाÓ भेंटे,
'तन्त्रÓ,
'लोकÓ के रहने लायक देश बनायें।

सूरज चुके हुए

दिन के कंधे,
बोझ बने हैं,
सूरज चुके हुए।

लेकर शोर;
सुबह की आंखें,
उतरी अंधी धूप;
देख हवा का रुख
मौसम ने,
बदले कितने रूप।

कुहरों के,
जलसे- जुलूस में,
'रस्तेÓ रुके हुए।

पथराये अहसास
हवाएं ढीठ हुईं
निर्बन्ध;
जंगल होने लगीं
बस्तियां,
फैले मूल्य-कबन्ध।

लगे कटाने हाथ,
वक्त के तेवर,
झुके हुए।

 पूत नहीं बहुरे
(इकलौते, परदेसी पूत के गंवई माता-पिता की व्यथा कथा)
अम्मां धरें रोज 'सगुनौटीÓ,
पूत नहीं बहुरे;
शहरी व्याप गई उजरौटी,
पूत नहीं बहुरे।

धुंधलाए 'सनेसÓ,
आंखों में सांझ उतर आई;
झूठे 'गौरि-गनेसÓ
उदास ओसारा-अंगनाई।

मारे गांव-जवार,
सपूती कोख सहे ताने;
'चन्नी-बर्द-दुवारÓ
'गिरस्तीÓ के अब क्या माने?

ममता हारी,
मान मनौती,
पूत नहीं बहुरे।
जाल फंसे छौने,
जेबों में सपनों की पूंजी;
'तुतले एक खिलौनेÓ को
तरसे मां-बाबू जी।

चुभता 'फर्जÓ-
कभी बनकर जो आता 'मनीआर्डरÓ;
वक्त वसूले कर्ज,
बना 'पटवारी-गिरदावरÓ।

कितनी करे, 'गुहारÓ,
बुढ़ौती
पूत नहीं बहुरे।
शहरी व्याप गई,
उजरौटी,
पूत नहीं बहुरे।