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Tuesday 21 Nov 2017

रुको, ठहरकर देखो,बादल इन खेतों से रूठे हैं,

 

चन्द्रदेव यादव
हिन्दी विभाग,
जामिया मिल्लिया इस्लामिया
नई दिल्ली-110025,
मो. 9818158745
1.
रुको, ठहरकर देखो
बादल इन खेतों से रूठे हैं,
काल बली है, छली महाजन
इनके भाग ही फूटे हैं।

सूखे होंठ, उदासी आंखें
मन आकुल-व्याकुल है,
मरे डाभ चिपके खेतों से
रात बड़ी बोझिल है,
ओस चाटकर कौन जिया है?
सब वादे झूठे हैं।

रात चांदनी जले खेत पर
धुएं-सी पसरी है,
सुबह ओस पीकर भी प्यासी
सहमी और डरी है।
गांवों के सपने सदियों से
इसी तरह टूटे हैं।

राजनीति की गर्म हवाएं
यहां सर्द हो जातीं,
मरुथल के बुझते चिराग को
थोड़ा-सा भभकातीं।
पल भर को यह दलित दूब
लगती गुल-बूटे हैं।

2

उजालों के लिए
खिड़की-झरोखे खोल के रखना,
$खुशी के पानियों में
नेह का रंग घोल के रखना।

चट्टानें चाट न जाएं
हरापन दूब का एक दिन,
नैन-जल सूख न जाए
पराई पीर छुए बिन।
किसी दिन दर्द ना कम हो
जरा-सा मोल ले रखना।

डाभ पर मोतियां सजती रहें
नभ रोज मुस्काये,
क्षितिज के राग-केसर से
धरा की मांग भर जाये।
पानियों को नहीं सकते कभी हम बांट
सबको बोल के रखना।

बया के घोंसले में सिसकियां ना हों
बा रोयें,
किलक करके सभी मासूम
घर में नींद भर सोयें।
मनुजता के तराजू पर
सभी को तोल के रखना।

3
आइए, देखिए, अपना घर है-
कह सकूं, शहर में सपना घर है।

 जिंदगी  कट ही जाएगी
किराए के मकानों में,
रेत पर घर बने केवल
ख़्वाब या कि फसानों में।
छोटा, मध्यम, बड़ा
औ$कात का नपना घर है।

मरकती $फर्श पर रखते हुए
ये खुरदुरे-से पांव
लग रहा डर, कोई कह न दे-
चल हट, यह शहर, ना गांव।
स्वप्न में, जागरण में
नाम का जपना घर है।

घर की बुनियाद मोहब्बत यारो
दरो-दीवार ममता से विनिर्मित,
$कदम रखते मिले सुकूं, घर में
चुहल हो और हो सबमें सम्मति।
भले हो फूस का
कहने को तो अपना घर है।

4
फूट उठे हैं टूंसे
पेड़ों की टहनी पर
पोर-पोर से
पतझड़ के दिन बीत गए हैं
जीवन के दुख रीत गए हैं।

नील गगन की ओर उंगलियां
काली-काली तनी हुई हैं,
जैसे गीली मिट्टी का सूरज गढ़ते
ललछौंही माटी से सनी हुई हैं।
नई धूप है, हवा नई है
मौसम के ये मीत नये हैं।
धूसर अंगुलियों से गांछें
किरनों के धागे से बुनतीं
लाल-गुलाबी नये झिंगोले,
पल्लव के गालों को छूकर
गौरेया चहचहा के बोले-
आदिम युग से संचित
ममता के ये मेरे गीत नये हैं।

किस अबूझ भाषा में मौसम
गीत लिख रहा, हवा बांचती,
किस अबूझ लय पर, तानों पर
सुध-बुध खोकर सृष्टि नाचती?
मधुर राग में, ललित फाग में
डूबा अग-जग चहक रहा है,
बिरिछ दु:ख से लड़ते-लड़ते
फिर से, फिर
 से जीत गए हैं।