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Tuesday 21 Nov 2017

शोक सभाएं करते हैं हत्यारे

यश मालवीय
'रामेश्वरम्Ó, ए-111, मेंहदौरी कॉलोनी
इलाहाबाद-211004 (उ.प्र.)
मो. 019839792402
 शोक सभाएं करते हैं हत्यारे

पहले लेते जान
और फिर करते वारे न्यारे
कैसा दफ़्तर
शोक सभाएं करते हैं हत्यारे

विगत हुए कर्मी की
कर्मठता की चर्चा करते
बजते सिक्के से शब्दों को
खुलकर खर्चा करते

उनको दुनिया ऊपर कहते
जो हैं स्वर्ग सिधारे

कम्पल्सरी रिटायर चेहरे
या सच बंद मिलों का
रखकर मौन समझ पाए कब
हाहाकार दिलों का

अनुकम्पा नियुक्ति कब देते
ग्रह नक्षत्र सितारे

लोहे के फाटक पर
बैठाते हैं फर्जी प्यादा
कार्यालय को कारागार
बनाने पर आमादा

सुख के सूट और टाई पर
सजते हैं दुखियारे

अहं बहुत ऊंचा है लेकिन
सिर नीचा कर लेते
अभिनेता हैं सिद्ध, शुष्क सी
आंखों को भर लेते

वक़्त जरूरत बन जाते हैं
आंसू के हरकारे
 बहुत सूना लग रहा है

बहुत सूना लग रहा है
इक अंधेरा,
कुछ उजाले की तरह से
जग रहा है
बहुत सूना लग रहा है
अब नहीं कबिरा, नहीं
गन्धर्व जो दीखें गली में
लग रही है ये सदी
सारी की सारी बेकली में
कौन ठगवा है, नगरिया लूटकर
फिर ठग रहा है
एक तुरपन और फिर तुरपन
कि फिर तुरपन समय की
एक्सरे में आ रही, तस्वीर
धुंधले से हृदय की
फटी कथरी में, चकत्ते सा
सितारा तग रहा है
बहुत मीठे से तआल्लुक भी
न मीठे रह गए हैं
हो गया गुड़ धुआं सारा
सि$र्फ चींटे रह गए हैं
चाशनी में एक कड़वापन
सुबह से पग रहा है

मछलियां बोलती हैं
पानीदार अंधेरे में
मछलियां बोलती हैं
उजियारा हो जाता है
जब आंख खोलती हैं

सतह कांप जाती है
थिर तालाब जागता है
लहरों पर तिरता सा
कोई ख़्वाब जागता है
कभी तैरती हैं, तो केवल
कभी डोलती हैं

जाल काटती हैं
सारा शैवाल काटती हैं
चुप रहकर सोते
पानी को जरा डांटती हैं

किरन किरन बन
घनी नींद में सुबह घोलती हैं

साहिल को चौकन्नी
आंखों से सहलाती हैं
धार चीरकर, धाराओं
का मन बहलाती हैं

अपनी $खातिर नई मुसीबत
रोज मोलती हैं।

 नन्हीं पेन्सिल...

नन्हीं पेन्सिल,
घर का कोना कोना बोल रहा
दीवारें पर भी
बच्चे का होना बोल रहा

गौरैया है इधर,
उधर है चाभी वाला बंदर
सजे हुए हैं रंग-बिरंगे
तुतलाते से अक्षर

बीच इसी के, खिल खिल हंसना
रोना बोल रहा

ए बी सी डी, क ख ग घ
गिनती और पहाड़े
खेल खिलौनों से हारे हैं
सारे गर्मी जाड़े

दूध भात से, मीठा सा
मुंह धोना बोल रहा

मां के ओवरकोट और
दादी के कम्बल में
जैसे कोई हिरन
चौकड़ी भरता जंगल में

पल छिन जगना, पल छिन में ही
सोना बोल रहा।