Monthly Magzine
Monday 20 Nov 2017

दहकती आवाज़ें

 

 विजय लक्ष्मी
उरिपोक निङथौखोङजम लैकाई
इम्फाल 795001, मणिपुर
मो.09856138333
दहकती आवाज़ें
दूर जंगलों से आ रही हैं
जलती दहकती आवाजें
आदमी की,

उन्हें पारिभाषित मत करो
बारूद के धमाकों की
पराजित बोलियों से,

पहचानो
उन आवाजों से बाहर आती
भूख की गर्मी को
भाषा की व्याकुल चीख को
विचार की हथेलियों पर
दम तोड़ती बेचैनी को
और मौत के सामने
चुनौती बनकर खड़े
बच्चे के दिल में उठती
पहचान की जरूरत को,

तुम्हारी राइफल की बटों की
सारी हदें सूख जाती हैं जहाँ
वहीं से शुरू होती है
उस आदमी की आवाज
जिसका पीछा करते हुए
लाँघ आए हो तुम
एक पूरी सदी,

मुड़कर देखो पीछे
बड़ी तेजी से
ग़ायब हो रहे हंै तुम्हारे पैर
और लगातार बढ़ रही है
दूर जंगल से आती
आदमी की आवाज़।
सियारों की भीड़
शहर का धुआँ
सूँघ आए
सियारों की भीड़ है यह

एकता की
मिसाल नहीं मिलती
इस भीड़ में शामिल
सियारों जैसी,

मौका तलाशकर
हुआँ-हुआँ करते हैंं एक स्वर में
नाखून और दाँत
आपस में घिसकर
हमला करते हैं एक साथ

हड्डियाँ चबाने की
योजना पर
विचार-विमर्श करते हंै साथ-साथ
बहस भी करते हंै कुछ मसलों पर सियार
मगर इनकी सारी बहसें
दम तोड़ती हैं अंधेरी एकता में,

बौद्धिक जुगाली की सड़क पर
एडिय़ाँ रगड़ते हुए
दिन-रात दौड़ते हैं सियार
गले में लटके
भारी-भरकम नारों के कनस्तर
बजाते हुए
दिशाहीन, दिशा भ्रष्ट
धूल के गुबार की तरह

कभी-कभी
एक-दूसरे को
काटते हैं ये सियार
मगर वैसा तभी होता है
जब इनके सामने
अचानक आ गिरते हैं
शेर के मुँह से
छिटके हुए माँस के टुकड़े
जिन्हें देखते ही
विदूषक की तरह
हँसते हैं एक-दूसरे पर
फिर दाँत गढ़ा देते हंै
एक-दूसरे की पीठ में
एकता के बोल
तब भी निकलते रहते हैं
इनके मुँह से,

सियारों की भीड़ है यह
शहर से जंगल के बीच
जीवन की भीख माँगती हुई
उन हवाओं से
कि जिनके
जीवन की धड़कन
बची ही नहीं
कि जिनके निकट
मिट्टी और हरियाली का
अहसास तक शेष नहीं
कि जिनके हिस्से
मृत्यु की भाषा है,

भीख माँग रही है
सियारों की भीड़
उन्हीं हवाओं से
इस मुद्दे पर भी
एक ही रस्सी में
बंधी है
सियारों की यह भीड़।
        
लपटों में कुन्दन

दुनिया जो जल रही है
अपनी ही लगाई आग की
भयानक लपटों में।
                    
जो सफर कर रही है
अंतहीन रेगिस्तान में
कंधों पर लादे
निरन्तर दहकती प्यास के बवण्डर
जिसके लिए अपना अर्थ
खो चुके हैं
अहिंसा
सहअस्तित्व और
स्वाधीनता जैसे शब्द
इस दुनिया को जरूरत है
सभ्यता को सही आकार देने वाले
कारीगरों की।
    
एक बात साफ  है
कि जिन्दगी को
परोसा नहीं जा सकता
सारहीन लम्बे भाषणों में
अर्थहीन बुलन्द नारों में।
        
हमारे इस भयानक
समय को जरूरत है
एक दधिचि की
जो समझा सके मूल्यों का अर्थ
याद कराए लुकाठी लिए
नंगे पैरों से
ज़मीन की धड़कन महसूसने वाले
उस फकीर की
कि जिसने
चरखे की धुन पर
बदल दी थी
समय और इतिहास की गति।
        
जरूरत है उस आवाज़ की
जो क्रांति का मंत्र फूँके
और बहकने से
रोकने की कोशिश कर सके
पूरी पीढ़ी को।
        
जो जगा सके
आदमी के भीतर सोई
इच्छाशक्ति को
रोक सके उसे आत्महत्या के
मार्ग पर जाने से
और सिखा सके
चुनौतियों से भिडऩा
और सिखाए
रूढि़वाद की ज़हरीली दीवारों से टकराना।
ताकि उग सके प्रगति का सूर्य
अलस भोर में
तभी खिल उठेंगे घर-आंगन
और उज्ज्वल होकर
झूम उठेंगे पेड़-पौधे
और हरे होकर
मन में होगा वास उल्लास का
जन-जन होगा स्मित-वदन
तब आएगी ऐसी पीढ़ी
चुनौतियों में
कुन्दन सी निखरी।