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Tuesday 21 Nov 2017

कम से कम एक बीज

सुरेश नारायण कुसुंबीवाल
रामेश्वर नगर,
 प्रोफेसर कॉलोनी
भुसावल-425201 जलगांव मो. 09922471855
कम से कम एक बीज
एक बीज
मतलब
एक पेड़
एक महावृक्ष

एक पेड़
मतलब
असंख्य शाखाएं
अनगिनत टहनियां
हरी-भरी पत्तियों से लदी-फदी

टहनियां, और शाखाएं
मतलब
घोंसले

घोंसले
मतलब
चहक, लहक, महक

चहक, लहक, महक
मतलब
सांसों की गुनगुन

रखो, बचाकर
कम से कम एक बीज
इस उठापटक, काटाकाटी वाले समय में
अपने भीतर

यह देह मेरी है

यह देह मेरी है
मिल्कियत नहीं है किसी की
उसने कहा था

एक बिजली सी थी उसकी आंखों में
टूट पडऩे को तत्पर
एक आग थी उसके शब्दों में
जला देने को तत्पर

मैं हूं
इसके कण-कण में
इसके भीतर भी, और इसके बाहर भी

यह मेरी है
शुरू से आखिर तक
आदि से अंत तक
यहां से वहां तक

नहीं है यह कोई खेत कि
कोई बोये, फसल काटे
फिर छोड़ दे उज्जड गाय-ढोरों, पशुओं के वास्ते

यह देह है मेरी
कोई अनारक्षित पेड़ नहीं कि
कोई लपक ले शाखों पर लटके फल
तोड़ ले कोई टहनियां, शाखें
खरोंच ले हरी-हरी कोमल किसलय

उसने कहा था
यह देह मेरी है
भले ही नश्वर हो तुम्हारी नजर में
माटी मोल हो
देह है मेरी / मुझे व्याख्यायित करती
किसी छुअन से परे,
किसी दाग से परे है यह

मेरी है यह देह
पूरी तरह, फिर भी
सिर्फ देह नहीं हूं मैं
यह भी उतना ही सच है

सलाम
कुछ सोच लो
सलाम करने के पहले
किसी को भी
उसने कहा था

सोचो कहीं
तुम्हारे सलाम से
कांटों के जंगल तो बढऩे नहीं लगेंगे
कहीं तुम झंडाबरदार तो नहीं हो रहे हो
नुकीले दांतों के

तुम शायद सोचते होगे कि
क्या बिगड़ेगा तुम्हारे सलाम करने से
सलाम तो सिर्फ सलाम ही है
लेकिन तुम नहीं जानते कि
तुम्हारे सलाम से
तुम भी गिन लिये जाओगे
बिना रीढ़ वालों की पंक्ति में
 
सोचो
कहीं तुम्हारा सलाम
पसीने के खिलाफ तो नहीं जा रहा है
कहीं तुम्हारा सलाम
मिट्टी की खुशबू और रोटी की सौंधी
महक के विरुद्ध तो नहीं जा रहा है
कहीं तुम्हारा सलाम तुम्हें खड़ा तो नहीं कर
रहा है खरगोश के विरुद्ध
फिर भी अगर तुम सलाम करना चाहो तो
चीटीं को सलाम करो
जो अपने साथ सभी का पेट पालती हैं
सलाम गरीब बकरी को करो
जो खूंखार शेर से लड़ नहीं सकती
लेकिन भूखे को दूध देकर बचा सकती है

सलाम का अर्थ ही होता है
तुम्हारी जय हो, तुम सलामत रहो
तुम मुझे प्रिय हो

सोचो, कुछ देर ठहरकर
सलाम करने के पहले
उसने कहा था

कोई तो है

कोई तो है जो / फिकर करता है हमारी
सूरज के मुंह फेरने पर
जला देता है नन्हे-नन्हे दीये आकाश में / प्रकाश के लिए

हमारी भूख से होता है परेशान, और
भर देता है खेतों को लबालब
देता है लाद फलों से शाखों और टहनियां को

कोई तो है
जो जानता है हमारी थकान, हमारी टूटन, और
रख देता है कंधों पर हाथ विश्वास का

भेज देता है अक्सर किसी न किसी को
हाथ लगाने, रास्ता पार कराने/अनजान शहरों में भी

कोई तो है कि
जलती बुझती दुपहरी में
पिला देता है पानी
प्याऊ खोलकर

कोई तो है
कुछ हिला देता है भीतर, और
सोचने लगता है आदमी नफा-नुकसान से बाहर

कोई तो है
कहीं भी हो
क्या फर्क पड़ता है