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Wednesday 22 Nov 2017

एक ही भूल


 अंजली मुखर्जी
11, विवेकानंद नगर, रायपुर
(छत्तीसगढ़) 492001
मो. 09977826282
देखते देखते देविका इतनी बड़ी हो गई पता ही नहीं चला। इसी साल उसने सेकेन्डरी बोर्ड की परीक्षा दी है। पढऩे में एकदम तेज, सभी कामों में सबसे अव्वल, विभिन्न भाषाओं को सीखने का बड़ा शौक है उसे। मिशिगन में अपने माता-पिता के साथ रहती है। इकलौती संतान है गुहा परिवार की। अंग्रेजी, फ्रेंच, जर्मन में जैसा कमाण्ड है ठीक उसी प्रकार हिन्दी और मातृभाषा बंगाली में भी पूर्ण दखल रखती है।
रंग ऐसा, मानो कच्चे दूध में आल्ता घोल दिया हो, तिस पर लंबे काले बाल और बड़ी कजरारी आंखें। अपनी मां से एक बार पूछा था, मां मैं न तो तुम्हारे समान दिखती हूं, न ही बाबा के समान। तो परिवार में और कौन है जिससे मेरा चेहरा मिलता है। थोड़ा सहम कर मां ने जवाब दिया था तुम्हारी एक बुआ थीं, उन्हीं से तुम्हारा चेहरा मिलता है। तुम जब बहुत छोटी थी तभी उनका देहावसान हो गया इसलिए तुम्हें उनकी याद नहीं है।
जब यह बात रेबा गुहा ने पड़ोस की अपनी सहेली शीना बरुआ से कही तो शीना ने तुरंत कहा था, रेबा अब समय आ गया है, तुम्हें देविका से सब कुछ सच-सच बतला देना चाहिए। क्योंकि यदि बातों ही बातों में किसी तरह उसे अपने जन्म की बात का पता चलेगा तो वह तुम लोगों से किस तरह पेश आएगी नहीं मालूम। उसे तुम्हीं अच्छी तरह समझकर सब कुछ बतला दो जिससे मानसिक रूप से वह तैयार रहे। रेबा एकदम से तुनक गई थी ये क्या बोल रही हो शीना? कहीं तुम्हीं उससे कुछ कह मत देना। बड़ी मुश्किल से हमें एक बच्ची मिली है और उसे हम किसी भी तरह खोना नहीं चाहते।
मिशिगन के एक छोटे से क्षेत्र में मानो पूरा भारत बसा था। भारत के हर राज्य के लोग यहां मिल जाएंगे। खासतौर पर बंगाल, गुजरात और पंजाब के अधिकतर वासी यहां बसे हुए हैं। आपस में काफी घनिष्ठता है। भारत के हर तीज त्यौहार को लोग यहां धूमधाम से मनाते हैं। यहां की सबसे खास बात यह है कि हर घर के बच्चे अंग्रेजी के अलावा हिन्दी और अपनी मातृभाषा का पूरा ज्ञान रखते थे।
गुहा परिवार और बरुआ परिवार सालों से एक-दूसरे के पड़ोसी हैं और भारत के पश्चिम बंगाल से हैं। दोनों ही परिवारों ने कोलकाता के दमदम में एक-एक फ्लैट ले लिया है जिससे साल में या दो साल में एक बार कोलकाता का प्रवास हो जाता है। इस तरह कोलकाता में भी दोनों एक-दूसरे के पड़ोसी हैं।
बहुत पहले, शीना, अपने माता-पिता और भाई के साथ मिशिगन में आकर बस गई थी। माता-पिता के देहावसान के बाद भाई भी अपने परिवार के साथ जर्मनी चला गया। शीना ने विवाह नहीं किया था और एक ग्लास फैक्टरी में मैनेजर पद पर पदस्थ थी। उमर भी 40-45 के बीच थी, अत: अब विवाह का कोई इरादा भी नहीं था। गुहा परिवार बरुआ परिवार के काफी बाद आकर बसे थे। डॉ. बसंत गुहा वैज्ञानिक थे, उनकी शिक्षा-दीक्षा विदेश में ही हुई थी, पर शादी उन्होंने बंगाल की बाला से की और तभी से मिशीगन आ गए थे। अब तो दोनों की उम्र 52-54 के लगभग थी।
शीना और गुहा परिवार एक साथ ही कोलकाता आते थे, कुछ महीने रुककर फिर एक साथ ही मिशिगन लौट आते थे। देविका की परीक्षा खत्म होने के बाद दोनों परिवार दमदम के अपने-अपने फ्लैट में विराजमान थे। उस दिन काफी बरसात हो रही थी। सब अपने-अपने घर में ही थे। गुहा परिवार के फ्लैट से लगा, मणिरत्नम का फ्लैट था। मणिरत्नम जी का बेटा राजू देविका का हमउम्र था। राजू की दो बहनें, देविका और राजू मणिरत्नम के फ्लैट में ही कैरम खेल रहे थे। खेल-खेल में ही अचानक आपस में तू-तू मैं-मैं हो गई। गुस्से में राजू ने कह दिया, अरि हो तो विदेशी, बंगाली खून होता तो कभी ऐसा नहीं करती।
सुनकर, दो मिनट के लिए, देविका स्तब्ध खड़ी रही फिर फनफनाते हुए घर पहुंची और सीधे अपनी मां के सामने खड़ी हो गई। राजू ने आज ऐसा क्यों कहा बतलाओ। मैं कौन हूं और बंगाली खून नहीं है का क्या मतलब है? रेबा और बसंत की हालत तो ऐसी हो गई, कि काटो तो खून नहीं। रेबा ने बहुत समझाया कि ऐसी कोई बात नहीं है राजू ने ऐसे ही कह दिया होगा। थोड़ी देर में राजू की मां भी पहुंच गई और टूटी-फूटी बांग्ला भाषा में माफी मांगते हुए देविका को समझाने लगी।
देविका पर तो, मानों किसी बात का कोई असर ही नहीं हो रहा था। एक ही रट लगाए जा रही थी, राजू ने ऐसा क्यों कहा? मैं कौन हूं? क्या है मेरा परिचय? रेबा ने तो जोर जोर से रोना शुरू कर दिया। हड़बड़ाकर डॉ. बसंत, शीना को बुला लाए। शीना ने आकर देखा, कमरे के एक ओर रेबा रोये जा रही है, राजू की मां उसे सांत्वना दे रही है, और दूसरी ओर देविका अपने लंबे, काले बालों को खोलकर, पागलों जैसी चिल्ला रही है, बतलाओ, मेरे मां-बाबा कौन है? तुम लोग मेरे कौन हो? यदि बंगाली खून नहीं है, तो मैं कौन हूं?
डॉ. बसंत और शीना ने, आपस में सलाह-मशविरा किया और शीना, किसी तरह, देविका को अपने फ्लैट में लेकर आ गई। उसने बड़े धैर्य से, आहिस्ता-आहिस्ता देविका को, उसके जन्म की कहानी बतलाई। मिशिगन में ही एक दिन, अचानक, कुछ शोर सुनकर, रेबा घर के बाहर निकली, देखा, सड़क के किनारे, एक सुन्दर सी टोकनीनुमा किसी ची•ा को घेरकर, लोग खड़े हैं और आपस में कुछ चर्चा कर रहे हैं। उत्सुकतावश, रेबा भी वहां पहुंची और देखा, एक नवजात कन्या, उस टोकनीनुमा ची•ा पर, निस्तेज पड़ी हुई थी। इतनी सुन्दर और कोमल बच्ची को, किस निर्दयी ने यहां लाकर रख दिया?
रेबा ने तुरंत, उस बच्ची को, अपनी गोद में ले लिया। नि:संतान रेबा को ऐसा लगा, मानो ईश्वर ने उसके लिए ही, यह उपहार भेजा हो। तब तक वहां डॉ. बसंत भी आ गए थे। रेबा ने कातर होकर अपने पति से कहा, जो करना है करो, पर कानूनन हम इस बच्ची को गोद लेंगे और आप सबसे मैं प्रार्थना करती हूं, कि इस घटना का जिक्र किसी से न करें जिससे बड़ी होने पर इस बच्ची को पता न चले कि वह किस प्रकार एक गोद ली गई बच्ची है। सारी कानूनी कार्रवाई के बाद, गुहा परिवार को बच्ची सौंप दी गई। तब से गुहा परिवार ने, बिल्कुल अपनी बच्ची की तरह ही, उस नवजात को पाला। देविका, वह नवजात बच्ची और कोई नहीं, तुम ही थीं। यदि गुहा परिवार ने तुम्हें गोद न लिया होता, तो पता नहीं, तुम्हारा भविष्य क्या होता? देविका, स्तब्ध होकर, पूरी कहानी सुन रही थी। शीना आंटी ने जैसे ही कहा, वह नवजात बच्ची तुम थीं, देविका का ध्यान भंग हुआ। आंखों में आंसू भरकर, उसने, शीना से भी वही सवाल किया, पर मेरे माता-पिता का पता क्यूं नहीं लगवाया गया और मेरे जन्म की कहानी, राजू को कैसे पता चली।
शीना ने कहा, देविका, तुम्हारा प्रश्न, बिल्कुल जायज है, पर तुम्हारे माता-पिता कौन हैं, यह आज तक अनुत्तरित है। पुलिस ने भी इस कार्य में पूरा सहयोग दिया, पर बच्ची को कौन, और कब वहां रख गया, किसी को पता ही नहीं चल पाया और राजू के जानने की बात पूछ रही हो, तो देविका ऐसी बातें, दबी नहीं रहतीं। हालांकि यह घटना मिशिगन की है, पर किसी न किसी प्रकार से राजू के माता-पिता को इस बात की जानकारी मिली होगी। राजू की मां ने अपने बच्चों से इस बात का जिक्र किया होगा। किसी को मत बतलाना, किसी को मत बतलाना, कहते कहते, सभी को इस खबर की भनक लग गई होगी। हां, आश्चर्य मुझे भी हो रहा है, क्योंकि राजू की मां ने आज तक, मुझसे भी कभी इस बारे में कोई बात नहीं की, खैर! अब खबर को कुरेदने की कोई आवश्यकता नहीं है। एक न एक दिन, तो तुम्हें यह जानना ही था।
मिशिगन में ही मैंने तुम्हारी मां से कहा था, कि देविका को पूरी बातों से अवगत करवा दो, पर रेबा शायद उचित मौके की तलाश में थी।
सिसकते हुए, देविका ने कहा, आंटी, यदि मिसेस गुहा, मुझे सब कुछ बतला देती तो शायद मुझे इतना बुरा नहीं लगता, पर यह बात मैंने कोलकाता के पड़ोसी से सुनी, मैं तो बिल्कुल भी सहन नहीं कर पा रही हूं। शीना ने समझाते हुए कहा, देविका, मैं समझ सकती हूं, तुम्हारे दिल में भयंकर चोट पहुंची है, पर तुम अपने माता-पिता की तरफ से भी तो सोचो। तुम्हें तो गुहा परिवार का शुक्रगुजार होना चाहिए, जो उन्होंने तुम्हें बेहतर जिन्दगी दी। तुम्हें इतना लाड़-प्यार करते हैं और अपनी जान से भी ज्यादा चाहते हैं। ये जो तुमने अपनी मां के लिए, मिससे गुहा, संबोधन किया, यह क्या, तुम जैसी सुसंस्कृत बेटी को शोभा देता है?
पर इसके बाद से, देविका ने कभी मां-बाबा नहीं कहा? मिस्टर, मिसेस गुहा कहकर ही संबोधित करती थी। मिशिगन लौटने के बाद, भारत प्रवास उनका नहीं के बराबर हो गया और अब तो शायद, दमदम का वह फ्लैट भी उन्होंने बेच दिया। देविका ने अपनी पढ़ाई पर खूब ध्यान दिया। कानून की पढ़ाई की। कानून में ही डॉक्टरेट की उपाधि ली और वर्तमान में मैड्रिड (स्पेन) की एक नामी कंपनी में कानूनी सलाहकार बन गई है। मिशिगन बहुत ही कम आना होता है। घर आती है, पर आज भी मां-बाबा को मिस्टर, मिसेस गुहा ही संबोधित करती है। बेचारे गुहा दंपती, इस वृद्धावस्था में कितना मानसिक आघात सह रहे हैं।
शीना सोचती है, भूल किसकी है? क्या गुहा परिवार की, जिसने नवजात बच्ची को गोद तो लिया, पर कभी बच्ची को बतला नहीं पाये, कि वह गोद ली हुई संतान है, या राजू की मां, जिसने अपने बच्चों को देविका के जन्म की कहानी सुनाई या स्वयं देविका की, जो आज तक अपने पालनहारों के प्रति कृतघ्न बनी हुई है, और इस वृद्धावस्था में अपने पालनहार को सिर्फ इस बात की सजा दे रही है कि उन्होंने देविका के जन्म का रहस्य उससे छिपाया।
पाठक ही निर्णय करें कि आखिर भूल किसकी है?