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Sunday 19 Nov 2017

एक ठंडी मौत


 सुबोध कुमार श्रीवास्तव
जी-1/102, फस्र्ट फ्लोर
गुलमोहर कालोनी ई-8
पंजाब नेशनल बैंक के पास
भोपाल-462039

एक भयानक चीख...
रुक-रुक कर भयावह चीखें...
ओ मेरी माई... मर जाऊंगी...
क्या कर रही है, डायन। अरे! कोई बचाओ...

ये चीखें सरकारी क्वार्टर की दीवारों और बंद खिड़कियों-दरवाजों को भेदती हुई सामने फैले मैदान तक पहुंचती रहीं। दिसम्बर माह की अंधेरी रात। शरीर को बर्फ कर देने वाली ठण्ड। शीत लहर का प्रकोप, आधी रात के बाद उठी इन चीखों ने वातावरण में डर व्याप्त कर दिया। मैदान में यहां-वहां लगे पेड़ों पर अपने-अपने घोंसलों में दुबके पक्षी बाहर निकल कर आसमान में फडफ़ड़ाने लगे। न मालूम कहां-कहां से निकल कर कुत्ते सम्मिलित स्वर में भौंकने लगे। किसी कुत्ते की रोने की आवाज दहशत उत्पन्न करने लगी।
मैदान के बीचों-बीच, एक पुराने पेड़ के चारों ओर बने चबूतरे पर, लेटे-बैठे पांच लोगों तक पहुंच कर ये चीखें ठहर सी गईं। चार लोग मोटे-मोटे कम्बल ओढ़े हुए लेटे थे और पांचवां व्यक्ति दोनों पैर नीचे लटकाए हुए बैठा था। चीखें उन तक पहुंची तो वे चौकन्ने हुए। लेटे हुए व्यक्ति उठ कर बैठ गए, बैठा हुआ व्यक्ति नीचे जमीन पर खड़ा हो गया। सभी की निगाहें सरकारी क्वार्टर की ओर टिक गईं। उनके पहनावे से तो यही लग रहा था कि वे किसी गांव से यहां लाए गए हैं। चारों व्यक्ति जब उठ कर बैठे थे, उन्होंने अपनी-अपनी पगडिय़ां अपने सिरों पर रख ली थीं। पांचवे व्यक्ति ने मंकी कैप से अपना चेहरा ढंक रखा था। शायद वह कुछ ऊंचे ओहदे पर रहा होगा। उसने पुराना कोट पहन रखा था जबकि शेष चारों ने खुद को कम्बल से लपेट रखा था। मंकी कैप वाले व्यक्ति के पास एक लाठी भी थी जो चबूतरे से टिकाकर रखी गई थी। उसने दाहिने हाथ में एक बड़ी टार्च पकड़ रखी थी जिसे बीच-बीच में वह जलाता-बुझाता रहता था।
चीखें बंद हुईं तो उन पांचों ने राहत की सांसें लीं। आसमान की ओर देख कर हाथ जोड़े हे भगवान, सब अच्छे से निपट जाए।
नया-नया जिला घोषित हुआ एक छोटे शहर का सरकारी अस्पताल जिसे बहुत छोटा तो नहीं कहा जा सकता। अस्पताल की मुख्य इमारत के पीछे बहुत बड़ा मैदान था। एक ओर चार सरकारी क्वार्टर थे। डॉक्टरों के लिए। इनके कुछ आगे सिविल सर्जन का बंगला था। यूं तो मैदान में दोनों ओर बिजली के खम्भे खड़े थे लेकिन इने-गिने खम्भों में लगे बल्ब ही टिमटिमा रहे थे। कुछ जल-बुझ रहे थे। यानि परिसर में रोशनी का नितांत अभाव था। अस्पताल के मेनगेट में अन्दर प्रवेश करते ही बायीं ओर साइकिल स्टैंड था जहां कुछ साइकिलें खड़ी थीं और एक ओर पड़ी बेंच पर कम्बल ओढ़े हुए एक आदमी सो रहा था। मुख्य इमारत के सामने एक बगीचा था जिसे बगीचा कहना बगीचे की तौहीन ही होगी। वहां तीन-चार ईटों की मदद से बनाए गए चूल्हों में जली हुई लकडिय़ों की राख बिखरी हुई थी और बयां कर रही थी कि सरकारी अस्पतालों में इलाज कराने अधिकतर गरीब बेसहारा ही पहुंचते हैं। एक ओर एल आकार में जनरल वार्ड थे, जहां से जब कभी कराहें उठतीं। दूसरी मंजिल पर चार-छ: प्राइवेट वार्ड थे जहां अपराधी किस्म के दो-एक व्यक्ति भरती रहते जो जेल जाने से बचने के लिए बीमार पड़ जाते या वे सरकारी कर्मचारी जिन्हें सरकार से मेडिकल बिल के नाम पर राशि ऐंठना होती।
लेकिन पीछे की ओर के जिस क्वार्टर से किसी लड़की की जो चीखें गूंजी थीं, वह किसी गरीब की बेटी नहीं थी।
चीखों का सिलसिला जब बंद हुआ तो मंकी कैप पहने हुए व्यक्ति से कम्बल ओढ़े हुए व्यक्ति ने पूछा, 'पंच जी, चीखें तो बिन्ना की ही थीं। ओ मेरी माई... कह कर चीख रही थी। वह अपनी महतारी को माई ही कहती है। तुम जाकर पता करो कि सब ठीक तो है। अब तक कुछ हो गया होगा। तभी तो चीखना-चिल्लाना बंद है।Ó
पंच जी ने कोट के ऊपर के बटन को बंद करते हुए कहा, 'जब क्वार्टर से इशारा मिलेगा, तभी हम वहां जा सकेंगे। अपने मालिक ने यही कहा था। डॉक्टरनी से उनकी बात हुई थी, हमारी नहीं। तुम ज्यादा टर्र-टर्र मत करो और अपना मुंह बंद रखो। भूल जाओ कि तुम शहर में हो। रिश्तेदारी में किसी आन गांव में हो। अपना मुंह बंद रखने के लिए ही मालिक हमें झौआ भर रुपैया दे रहे हैं। बड़े लोगों की बातें, वे ही जानें। हमें तो भैये अपने काम से काम।Ó
पर एक व्यक्ति का मुंह खुल ही गया, 'सो तो तुम ठीक ही कह रहे हो, पंच जी। पर एक बात हमारे भेजा में नहीं घुस रही है कि सामने के घर से कलेजा चीर देने वाली चीखें आती रहीं लेकिन अगल-बगल के तीनों घरों से कोई आदमी बाहर नहीं निकला। क्या सबके सब बहरे हैं!Ó
इस बार पंचजी ने उसे नहीं झिड़का और अपना अनुभव परोसा, 'चारों सरकारी क्वार्टर हैं और इनमें डॉक्टर ही रहते होंगे। हो सकता है कि कभी-कभी इन घरों से भी ऐसी ही चीखें उठती हों। डॉक्टर इस तरह की चीखें सुनने के अभ्यस्त हो जाते हैं। यदि ये चीखें इनके कानों तक न पहुंचे तो शायद इन्हें नींद भी न आती होगी। सब गहरी नींद में सो रहे होंगे। इस कड़ाके की ठंड में बाहर निकलने की भूल कोई नहीं करेगा।Ó
तभी क्वार्टर की ओर से चबूतरे पर टॉर्च की रोशनी फेंकी गई। पंचजी सावधान की मुद्रा में आ गए और उस ओर बढ़े। एक हाथ में लाठी और दूसरे में टार्च। दो कुत्ते उनकी ओर बढ़े तो उन्हें लाठी से खदेड़ दिया। कूं...कंू करते हुए वे एक तरफ हो गए और भौंकने लगे। रात की नीरवता और अधिक गहरी और डरावनी हो गई।
क्वार्टर के दरवाजे के बीचों-बीच एक अधेड़ नर्स खड़ी थी। पंचजी उसके पास पहुंचे तो उसने कहा, 'अपने मालिक को यहां भेजो। तुम उनसे कहना कि डॉक्टर ने उन्हें याद किया है। जल्दी। अब तुम जाओ।Ó
'इस समय! हुआ क्या है? बिन्ना तो अच्छी है न?Ó पंचजी किसी बिजूके की तरह नर्स का मुंह तकने लगे।
'सब ठीक है। तुमसे जो कहा है, वही करो। अपने मालिक को यहां भेजो।Ó नर्स ने दरवाजे बंद कर लिए।
टार्च की रोशनी में पंचजी ने कलाई घड़ी में समय देखा। रात का तीन बज रहा था। ठंड से बचने के लिए अपनाए गए तमाम साधनों के बावजूद उनके शरीर में ठंडी सिहरन दौड़ रही थी। इस समय मालिक के पास जाना उन्हें सजा भुगतना जैसा लगा लेकिन एक बिके हुए गुलाम की औकात ही क्या!
अस्पताल के बाहर सड़क के दूसरी ओर कुछ दूरी पर दो होटलें थीं जो उस छोटे शहर के हिसाब से ठीक-ठाक ही थीं। एक होटल में मालिक ठहरे थे। अनमने से पंचजी बाहर सड़क पर आ गए। एक दवा की दुकान को छोड़ कर सभी दूकानें बंद थीं। पूरे शहर में जैसे अंधकार पसर गया हो। दो-चार बल्ब जुगनू का सा प्रकाश बांट रहे थे। पंचजी के पास टार्च का सहारा था। उन्हें नमक की कीमत चुकानी थी। मालिक की डायरी में विश्वासपात्र नम्बर एक की जगह पर अपना नाम अंकित कराना था। दो-चार कुत्तों को दुत्कारते हुए होटल तक पहुंचे।
मालिक शायद अपने वफादार की प्रतीक्षा ही कर रहे थे। वे जाग रहे थे। नींद आती भी कैसे!
'सब कुशल तो है न? कुछ बतलाया उसने? कुछ कहा?Ó मालिक ने बेसब्री से पूछा।
'नर्स बाहर आई थी? कह तो यही रही थी कि सब ठीक है लेकिन मालिक कुछ गड़बड़ है। बिन्ना की चीखें...Ó
मालिक ने पंचजी को वाक्य पूरा नहीं करने दिया और बीच में ही टोक दिया, 'बिन्ना का नाम मत लो मेरे सामने। उसके कारण ही तो मुझे इतना कुछ झेलना पड़ रहा है... ठीक है, मैं चल रहा हूं।Ó
वे पहले से ही तैयार बैठे थे। बदन पर ओव्हर कोट था, गले में पड़े मफलर से कान ढंके। मोजे पहने हुए थे। पैरों में पम्प शू डाले। कमरे में ताला लगाया और होटल से बाहर निकले। तभी लाठी की ठक-ठक आवाज के साथ किसी चौकीदार की आवाज कानों में पड़ी- 'जागते रहो...Ó
पंचजी के साथ मालिक अस्पताल के परिसर में घुसे। रास्ते में पंचजी टार्च की रोशनी बिखरते रहे। जब वे चबूतरे के पास पहुंचे तो वहां बैठे चारों व्यक्ति नीचे जमीन पर खड़े हो गए और अपने पालनहार का अभिवादन किया, 'पांव लागी मालिक...Ó वे उनकी चरणरज लेने आगे बढ़े लेकिन उन्हें अनदेखा करते हुए मालिक क्वार्टर की ओर बढ़ गए। अवसर ही ऐसा था अन्यथा चार लोगों से अपने पैर छुलाते हुए उन्हें खुशी होती।
हल्की सी दस्तक देने पर दरवाजा खुल गया और नर्स बाहर निकली। वह मालिक को लेकर अंदर चली गई। पंचजी वापस चबूतरे आ गए। अपने सहयोगियों के पास।
किसी एक ने पूछा, 'पंचजी तुम तो चिमा गए हो। बिन्ना की तबियत कैसी है? लड़की हुई है या लड़का? हमें तो लगता है कि बिटिया हुई होगी। लड़की के जन्म के समय महतारी को खूब दर्द होता है। किस तरह चीख रही थी, बिन्ना, भैये, हमारे तो रूएं खड़े हो गए थे।Ó
पंचजी ने कोई उत्सुकता नहीं दर्शाई। बेरुखी से बोले, 'तुम इतने उतावले क्यों हो रहे हो? अभी थोड़ी देर में सब मालूम हो जाएगा। लगता है कि कुछ गड़बड़ है... नर्स का मुंह उतरा हुआ था।Ó फिर कुछ याद आ जाने पर कहा, 'यहां तो तुमने इतना कुछ बोल लिया लेकिन गांव पहुंचने पर तुम सब को अपने मुंह पर ताला लगाना होगा। एक शब्द भी बाहर निकला तो मालिक हम सब की... उन्हें तो तुम लोग जानते ही हो।Ó
इस चेतावनी को सुनकर चारों व्यक्तियों को कंपकंपी छूटी और वे अपनी-अपनी जगह लेट गए, कम्बलों में छुप गए। पंंचजी पहले की तरह चबूतरे पर नीचे पैर लटका कर बैठ गए और समय बिताने के लिए लाठी से जमीन पर ठक..ठक... करते रहे।
सजी-संवरी बैठक में एक सोफे पर मालिक बैठ गए। उनके ठीक सामने के सोफे पर डॉक्टर बैठ गई। अन्दर की ओर खुलने वाले दरवाजे की दहलीज पर नर्स खड़ी रही। कुछ देर तक कमरे में सन्नाटा ही रहा। बात शुरु करने की पहल कौन करे! मौन चुभने लगा तो मालिक ने पूछा, 'डॉक्टर आप तो खामोश हैं। क्या हुआ? कोई परेशानी तो नहीं?Ó
'बेटा हुआ है। जिन्दा है। लड़की की तबियत अच्छी है। उसे नींद का इंजेक्शन दे दिया है।Ó डॉक्टर ने मालिक की ओर देखा।
'यह क्या कह रही हैं आप! डॉक्टर, मैंने यह तो नहीं चाहा था। जीवित शिशु! क्या करूंगा मैं उसका?Ó मालिक ने दोनों हथेलियों में अपना माथा जकड़ लिया।
'सात माह से अधिक का गर्भ था। इतने समय में जीव में प्राण आ जाते हैं, उसके अंग विकसित हो जाते हैं। भैयाजी, आपने भी सुना होगा कि अमुक बच्चा सतमासा है।Ó जिन्हें गांव के लोग मालिक कहते थे, वे डॉक्टर के लिए भैयाजी थे।
'देखिये डॉक्टर आपके और हमारे बीच सारी बातें पहले ही तय हो चुकी थीं। आपको मुंहमांगा रुपया दिया है। मुझे जीवित बच्चा नहीं चाहिए? आप कुछ भी कीजिए।Ó लगभग गिड़गिड़ाने लगे भैयाजी, 'पहले भी दो बार मैं आपके पास आ चुका हूं और आपने ही मुझे मुसीबत से छुटकारा दिलाया। लेकिन इस बार तो...Ó
डॉक्टर ने भैयाजी को वाक्य पूरा नहीं करने दिया और बीच में ही बोल पड़ी, 'देखिए भैयाजी यह बात सही है कि आप पहले भी दो बार, इसी तरह के मामलों को लेकर, मेरे पास आए थे। पर तब की बात अलग थी। वे महिलाएं अच्छी उम्र की थीं और गर्भ भी दो-अढ़ाई माह के ही थे। लेकिन इस बार आपने यहां आने में बड़ी देर कर दी। लड़की की उम्र भी कम है। अठारह की भी नहीं होगी।Ó
भैयाजी की आवाज कुछ ऊंची हो गई, 'डॉक्टर यह समय पुरानी बातों की जुगाली करने का नहीं है। वे दोनों औरतें मेरी रखैलें थीं। बाजारू। दोनों ने समय रहते जानकारी दे दी तो बात बिगड़ी नहीं। लेकिन इस बार तो लड़की...Ó वे आगे कुछ बोल नहीं सके। सोचने लगे कि सत्य का उद्घाटन करें या नहीं। नर्स ने उनके हाथ में पानी का गिलास थमा दिया। पानी पीकर वे कुछ सम्भले, 'डॉक्टर, यह लड़की मेरी बेटी है। एक हरामजादे ने मेरी मासूम बेटी को बहका लिया। जब तक वह छिपा सकती थी, इस राज को छिपाये रही फिर अपनी मां को जानकारी दी। ऐसे मामलों में गांवों के इज्जतदार घरानों में जैसा होता है, पहले घरेलू नुस्खे आजमाए गए। दाई की खातिरदारी की गई, उसकी सेवाएं ली गईं। दो माह इसी में बेकार चले गए। हार-थक कर आपकी शरण में आया हूं। कुछ कीजिए। जिन्दगी भर आपका अहसान मानूंगा।Ó उन्होंने डॉक्टर के आगे दोनों हाथ जोड़ दिए।
डॉक्टर मन ही मन मुस्कुराईं और सोचने लगीं कि ऊंट अब पूरी तरह पहाड़ के नीचे आ चुका है। फिर भी उन्होंने भैयाजी को एक नेक सलाह दी, 'आप अपनी बेटी की शादी उस लड़के से क्यों नहीं कर देते जिससे वह प्रेम करती है? मां-बाप को बेटा और आपको नाती मिल जाएगा।Ó
भैयाजी का पारा चढ़ गया, 'मुझे आपकी सलाह की जरूरत नहीं है। आप जो कह रही हैं, वह असम्भव है। धर्म के प्रति मेरी पूरी आस्था है। अपनी संस्कृति और हजारों सालों से चले आ रहे रीति-रिवाजों के खिलाफ मैं नहीं जा सकता। मैं सामाजिक प्राणी हूं और मुझे इस समाज में ही रहना है। शादी-ब्याह के रिश्ते यूं ही तय नहीं हो जाते। कई बातों पर विचार करना होता है- धर्म, सम्प्रदाय, वर्ण, वर्ग, जाति, कुल, गोत्र और यहां तक कि उपजाति और वर तथा उसके परिवार की सामाजिक-आर्थिक हैसियत। वह लड़का किसी भी लिहाज से मेरी बेटी और मेरे खानदान के लायक नहीं था। उसने मेरे घर की इज्जत पर डाका डाला था। डॉक्टर, उस हरामी को तो मैंने निपटा दिया।Ó उनकी आंखों में लालिमा उभर आई। चेहरा कुछ विकृत सा हो गया। वे घूर-घूर कर डॉक्टर को देखने लगे। भैयाजी के मुंह से निकले आखिरी वाक्य-'डॉक्टर उस हरामी को तो मैंने निपटा दियाÓ- सुनकर डॉक्टर और नर्स के शरीर में एक सिहरन सी दौड़ गई। किसी के मुंह से एक शब्द भी न निकला। कुछ देर के मौन के बाद भैयाजी ने कहा, 'मेरी बात गौर से सुनिए डॉक्टर। मैं नहीं चाहता कि मेरी इज्जत पर किसी तरह की आंच आए। गांव में और आसपास के इलाकों में मेरी प्रतिष्ठा है। धाक है। पुराना जमींदार हूं। मरा हुआ हाथी भी लाखों का होता है। जिले की राजनीति में भी दखल रखता हूं। अभी जनपद उपाध्यक्ष हूं और अगला चुनाव विधायक का लड़ूंगा। मुझे इस लफड़े से मुक्ति चाहिए और यह चमत्कार आप ही करेंगी।Ó वे झटके के साथ सोफे से उठे। कोट की जेब से नोटों का बंडल निकाल कर टेबिल पर रखा और क्वार्टर से बाहर निकल गए।
भैयाजी के जाने के बाद डॉक्टर और नर्स  एक-दूसरे का चेहरा देखती रहीं। कुछ तो करना ही होगा और जो भी करना है, वह भी शीघ्र करना है। सुबह का चार बज चुका था। डॉक्टर ने आंखों से कुछ इशारा किया जिसे नर्स ने समझ लिया। अप्रत्यक्ष धमकी और प्रत्यक्ष लालच के गठजोड़ ने उन्हें एक नई सूझ दे दी।
क्वार्टर के अन्दर की ओर के आंगन में प्लास्टिक का एक टब रखा गया। उसमें ठण्डा पानी भरा गया। यूं भी आसमान से ओस बरस रही थी। नवजात शिशु को गोद में लेकर नर्स आंगन में आई। बच्चा नंगा था। तभी डॉक्टर भी वहां आ गई। नर्स और डॉक्टर पूरी तरह ऊनी कपड़ों से लदी हुई थीं जबकि शिशु के बदन पर उस ठण्डी रात को एक झबला भी नहीं था। डॉक्टर के संकेत पर नर्स ने शिशु को ठण्डे पानी के टब में डुबो दिया।
शिशु कुनमुनाया। डेढ़-दो घंटे की उम्र का नन्हा इन्सान चीख तो सकता नहीं। वह सिर्फ रिरिया सकता है। अभी तो वह हाथ-पैर चलाने की शक्ति भी संचित नहीं कर सका था। वह रिरियाता रहा। पानी में बुलबुले उठते रहे। उसका रिरियाना सिर्फ डॉक्टर और नर्स ने ही सुना। उसे उसी स्थिति में छोड़ कर दोनों बैठक  में चली गईं और एक-दूसरे से न•ारें चुराने लगीं। रुपयों की गड्डी अभी भी टेबिल पर रखी थी। कुछ देर बाद दोनों फिर आंगन में गईं। टब के पानी में बुलबुले नहीं उठ रहे थे। शिशु पानी की तरह ही ठण्डा हो चुका था। उसके शरीर में कोई हरकत नहीं थी। गुड्डे सा शरीर नीला पड़ चुका था। दो घंटे पहले वह जिस दुनिया से इस पृथ्वी पर आया था, शायद उसे उसी दुनिया में वापस भेज दिया गया। सुबह हो चुकी थी लेकिन यह ऐसी खुशहाल सुबह नहीं थी जिसकी प्रतीक्षा एक आम इन्सान करता है। डॉक्टर के क्वार्टर से चीखें नहीं, सिसकियां बाहर आ रही थीं। पंचजी की गोद में सफेद कपड़े में लिपटा नवजात शिशु का शव था। बिन्ना ने मृत बच्चे को जन्म दिया था।
शव को लेकर पंचजी चबूतरे तक आए तो साथ के चार व्यक्ति भी उनके पीछे लग गए। शवयात्रा मरघट की ओर बढऩे लगी लेकिन किसी के मुंह से 'राम नाम सत्य हैÓ नहीं निकला।