Monthly Magzine
Friday 24 Nov 2017

मुक्ति!!... पर किसे ??

सुभाष रंजन
17/38, ऐडिसनरोड, दुर्गापुर-713205
मो. 09475379533
बेबसी की स्याह पुती सूर्य की अंतिम किरणें मानों सागर के लहरों पर तैर रही हों, बिखरी बिखरी सी लालिमा। काश यह सूर्योदय होता..!
उसने उसकी हथेलियों को अपने मु_ी में समा रखा था। वह बोला, 'नहीं!
कभी नहीं!!भूले से भी नहीं!!! शेखर जी आप तो मेरे मित्र हैं! अगर आप मेरे जानी दुश्मन भी होते तब भी मैं नहीं देता।
ऐसा भूल से भी सोचिएगा मत, मेरी क़सम!!Ó और वह फफक कर रो पड़ा।
उसकी आँखों के उजियारे में जो आँसू झिलमिला रहे थे वे ग़म के थे या ख़ुशी के, शेखर समझ न सका पर प्रकृति भी द्रवित हो उठी थी। ऐसा लगा मानो उसके अंदर का जमा हुआ दर्द पानी बनकर पिघलने लगा हो। उसकी आँखें भी सावन-भादों सी बरसने लगी थी!
तब शरत महज़ सत्रह अ_ारह वर्ष का रहा होगा जब पहली बार शेखर से उसकी मुलाकात हुई थी। घटना आज से बीस पच्चीस साल पहले की है। अभी अभी स्नातकोत्तर हो चुका शेखर बेकारी के खाते में नाम दर्ज करा चुका था तथा द्वारे-द्वारे बच्चों को ट्यूशन पढ़ाना एवं $खाली वक्त तिलक लाइब्रेरी में बैठकर पत्र-पत्रिकाएं पलटना उसकी दिनचर्या में शुमार हो चुका था।
कॉलेज के दिनों से ही साहित्य उसकी कमज़ोरी रही थी जो आज भी बदस्तूर जारी है। अमूमन वह अपने वर्ग की पीड़ा को बड़े बारीक ढंग से $िकस्से-कहानियों में उकेरा करता और अक्सर उसकी कहानियां पत्रिकाओं में छपा भी करती! कथाकार शेखर को आज रानीगंज पहचानने लगा था।
उस दिन शेखर तिलक लाइब्रेरी में साहित्य की पत्रिकाएं पढऩे में मश$गूल था। दोपहर बाद लाइब्रेरी $खाली रहा करती थी। इक्के-दुक्के लोग दिख रहे थे। सामने बैठा लड़का भी पत्रिकाएं पलट रहा था। उसकी न•ार शेखर पर पड़ते ही वह पूछा, 'आप शेखर जी हैं?Ó
शेखर ने हामी भरी। वह बोला, 'जी हां।Ó
'और आप?Ó अबकी बारी शेखर के पूछने की थी। सामने एक अपरिचित लड़के को देख वह उसे पहचानने की कोशिश करता रहा। पतला दुबला छरहरा सा लड़का, रंग गोरा, नाक लंबी, आकर्षक चेहरा और बोलती सी नीली आँखें। गजब का आकर्षण था उस लड़के में! उसे देखते ही शेखर के अंदर का साहित्यकार उसे शब्दों के सहारे का$ग•ा पर आँकने को छटपटा उठा। मानो वह उसके किसी कहानी का कोई सजीव पात्र हो।
वह बोला, 'जी, मेरा नाम शरत है। मैंने आपको पढ़ा है। आप अच्छा लिखते हैं।Ó उसने बात जोड़ी, 'दिनेश जी ने मुझे आपकी रचनाएं पढऩे को दी थी।Ó दिनेश शेखर का मित्र था।
बड़ी गर्मजोशी से मिला था वह। उसके हाथों की गुनगुनाहट शेखर महसूसता रहा। ख़ुशियां उसकी आँखों में उतर आई थी। वह बोला, 'मैं साहित्यकार तो नहीं पर साहित्य प्रेमी जरूर हूँ और साहित्यकारों के प्रति मेरे मन में अगाध श्रद्धा है।Ó
बाद के दिनों में भी शेखर से शरत की मुला$कात यहीं तिलक लाइब्रेरी के अहाते में होती रहती... साहित्य के इर्द गिर्द बात होती रहती।
उन दिनों तिलक लाइब्रेरी बहुत गुलजार हुआ करती थी। एक तो साहित्य प्रेमियों की गप-गोष्ठियां यहीं हुआ करती थीं और दूसरा यहां का माहौल हमउम्र लड़के-लड़कियों के आकर्षण का केन्द्र भी था। दूरदराज से आए टी.डी.बी. कॉलेज के विद्यार्थी परिसर को रंगीन बनाए रखते।... और शरत भी टी.डी.बी.कॉलेज के $फस्र्ट इयर का विद्यार्थी था।
दिनेश से कहीं बाजार में एक दिन शेखर की मुला$कात हुई। इधर-उधर की बातचीत के मध्य शरत का भी जिक्र  छिड़ा। शेखर ने ही बात छेड़ी।
वह बोला, 'अरे दिनेश, तुम्हारे शरत से परिचय हुआ।Ó
'हां, शरत ने बताया है।Ó दिनेश ने कहा और आगे बात जोड़ी, 'साहित्य पर अच्छी पकड़ है उसकी। अगर कभी तुम उसके घर पर जाओ तो पता चलेगा कि साहित्य के प्रति कितनी दीवानगी है उसमें। उसने तो अपने घर पर अच्छी ख़ासी लाइब्रेरी बना रखी है।Ó
'अच्छा...!Ó शेखर की आंखों में विस्मय था।
$खरीदकर साहित्य की पुस्तकें पढऩा शेखर के बूते से बाहर था। हां, कभी कभार वह पत्र-पत्रिकाएं $खरीद लेता। अवकाश प्राप्त पिता, बीमार मां, बिन ब्याही बहन एवं स्कूल जाते छोटे-छोटे भाइयों की जरूरतों के आगे शेखर को अपनी यह इच्छा विलासिता लगती। रानीगंज पेपर मिल के इर्द-गिर्द बसी झोपड़पट्टियों की यह आम कहानी थी। बेकारी, बदहाली, जहालत... और उनसे उपजी समस्याएं। यहां बसे लोगों को तिलक लाइब्रेरी सदस्यता नहीं देती थी। किन्तु शेखर की आत्मा इन पुस्तकों के मध्य ऐसे भटकती जैसे किसान की आत्मा क्यारियों के अगल-ब$गल भटका करती। दिनेश इस बात को अच्छी तरह समझता था। जान-पहचान वालों से रातभर के लिए पुस्तकें मांगना और सुबह सकारे वापिस करने की मजबूरी ने उसे 'मिलखासिंहÓ सा वेगवाही गति से पुस्तक पढऩा सिखा दिया था।
दिनेश की बातें सुन शेखर की वही अभिलाषा आंखों में जाग उठी थी। वह सोचता रहा, 'काश शरत से कुछ किताबें पढऩे को मिल पाती!!Ó अप्रत्याशित रूप से एक दिन शरत का स्कूटर शेखर की झोपड़पट्टी में आ पहुँचा। उसे देख शेखर की विस्मित आंखें सम्हाल में नहीं रही थी। कहां बैठाए, कहाँ उठाए की सी मुद्रा में वह उसे अपने कमरे तक ले आया।
शरत की न•ारें घर भर का मुआईना करती रही। छोटा सा कमरा, मुश्किल से एक मे•ा और एक कुर्सी रखने भर की जगह, पास ही लकड़ी का एक तख़्त, बिछावन नदारद! रोशनी का अभाव, सीलन भरी ठहरी-ठहरी हवाएं और इधर-उधर बिखरी हुई पत्र-पत्रिकाएं और अधपकी रचनाएँ।
उसने माहौल के साथ सामंजस्य बनाते हुए कहा, 'शेखर जी, मैं इधर से गु•ार रहा था, सोचा आपसे मिलता चलूं।Ó
'अच्छा किया!Ó शेखर भी खुश था, बहुत खुश।
उन दिन दोनों में घंटों बातें होती रही। शेखर ने अपनी कुछ अप्रकाशित नवीनतम रचनाएं दिखाई। शरत ने भी उन पर कुछ सुझाव दिए इस ताकीद के साथ कि, 'अंतिम बात तो लेखक ही कहता है पर मुझे लगता है कि ऐसा होता तो बेहतर होता।Ó
शेखर को उसके कुछ सुझाव अच्छे भी लगे पर कुछ पर चुप्पी साध ली। शरत ने जाते वक्त कहा, 'शेखर जी, कुदरत ने आपको साहित्य रचने की प्रतिभा दी है। आप से हम अच्छी रचनाओं की उम्मीद लगाए बैठे हैं। सच कहूं, आप नहीं जानते, आप क्या हैं! कभी फुर्सत में मेरे घर आइए, आपके जैसा मित्र पाकर मैं अपने को सौभाग्यशाली समझूंगा।Ó
शेखर ने कहा था, 'मुझे प्रशंसक नहीं आलोचक की आवश्यकता है, और शरत जी आप अच्छे आलोचक हैं।Ó
वास्तव में साहित्य के प्रति गहरी रुचि शेखर ने शरत के अंदर देखी थी। देशी-विदेशी ढेरों साहित्यकारों को उसने पढ़ रखा था। उसने अपने घर में एक छोटी लाइब्रेरी बना रखी थी, जहां एक से एक बेहतरीन पुस्तकों का संग्रह.... प्रेमचंद, शरतचंद, रेणु, चेखव, टाल्स्टाय, हरिवंश राय बच्चन, क्या नहीं था उसके पास!!! शेखर के लिए यह खुल जा सिम-सिम का सा दृश्य था।
उस दिन रविवार की सुबह तकरीबन दस साढ़े दस बजे शेखर शरत के घर जा  पहुंचा। मुख्य बाजार से सटा रानीगंज का पॉश इलाका, अत्याधुनिक फ्लैट्स, आभिजात्य को प्रदर्शित करती बहुमंजिली इमारतें, चौड़ी सड़कें, पार्क, क्लब, खेल का मैदान, क्या  नहीं था वहां! और इन्हीं के मध्य एक खूबसूरत पालकीनुमा मकान, सामने ही फूलों का बाग़ीचा, गुलाब के फूलों की ढेरों प्रजातियां, एक छोटे से तालाबनुमा जलाशय में कमल की मुस्काती पंखुडिय़ां! तख्त पर लिखी चेतावनी, कुत्ते से सावधान रहने की होशियारी, और साक्ष्य के रूप में चेन से बंधा काले रंग का डोबरमेन। शेखर समझ नहीं पा रहा था कि यह सपना है या हकीकत! मरीचिका का साम्राज्य, चमक-दमक से चुंधियाई आंखे और उसकी लालची नजरें सब कुछ निहारती रही!
अंदर जाते उसे बड़ी झिझक हो रही थी। पर शरत की मेहमाननवाजी देख वह अभिभूत था। गले से लिपट पड़ा था वह। कहां वह झोपड़पट्टी की तंग गलियों का रहने वाला और कहां शरत एक प्रसिद्ध व्यावसायिक प्रतिष्ठान का इकलौता वारिस! मन ही मन घबरा उठा था शेखर। तैरते मौन, अबोले शब्दों की भाषा को सम्हाले थी। परीक्षक सी शेखर की आंखें औचक निरीक्षण करती रही। बड़ा सा कमरा, हवादार बालकनी, पढऩे वाली मे•ा, किताबों का रैक और समीप ही संगमरमर की तराशी गई वागीश्वरी की मूर्ति। अभिजात्य में ही संस्कार का समागम! यही था शरत के रीडिंग रूम का नजारा!
आज भी सूत्रधार की भूमिका में शरत को आगे आना पड़ा और बातचीत का सिलसिला चल निकला। शेखर चाय की प्याली हाथों में लिए किताबों के आसपास टहलता रहा, बातचीत चलती रही।
प्रश्न बड़ा स्वाभाविक था। शेखर ने पूछा, 'शरत जी, आपने इन किताबों को पढ़ा है?Ó
'सब तो नहीं, पर कुछ तो पढ़ी है।Ó शरत ने कहा और आगे जोड़ा, 'किताब मेरी कम•ाोरी है। इनमें मेरे प्राण बसते हैं। जब भी मुझे अच्छी किताब दिखती है, खरीद लेता हूं। मन को बड़ा सकून मिलता है।Ó
शेखर मौन सर हिलाता रहा। उसकी इच्छा हो रही थी कि कुछ किताबें वह पढऩे के लिए शरत से मांगे पर अपनी इच्छा को वह अपने में जब्त किए सोफे पर आ बैठा।
शेखर को बैठते देख शरत बोला, 'आपके लिए मेरी सारी किताबें हाजिर हैं। आप बेहिचक जब चाहें, जैसे चाहें इन पुस्तकों का उपयोग कीजिए। शेखर जी आप मेरे साहित्यकार मीत हैं।Ó
बाद में दिनेश के द्वारा शेखर को पता चला था कि वह किसी को अपनी किताबें छूने तक भी नहीं देता है। हां यदा-कदा दिनेश लिया करता है और अब वह भी...।
उस दिन शेखर समझ नहीं पा रहा था कि किन किताबों को पढ़ा जाय और किसको छोड़ा जाय! मानो कारूं का खजाना दिख गया हो! टोटली कॅन्फ्यूज्ड!!
शरत के मशविरे पर शेखर ने पहली बार हरिवंश राय बच्चन का संग्रह 'क्या भूलूं क्या याद करूंÓ पढ़ा। पढ़ा क्या! सारी रात पढ़ते रहा। सुबह कोयल की कुहुक सुन उसकी तल्लीनता भंग हुई। उस दिन उसे मानना ही पड़ा कि शरत कोई मामूली पाठक नहीं है।
अब तो स्थिति ऐसी बन पड़ी थी कि शेखर क्या पढ़े इसका निर्णय भी शरत ही करता। विदेशी लेखकों में उसे क्या पढऩा है और क्या नहीं, वह उसे आगाह करते रहता। चेखव, टाल्स्टाय, ओ हेनरी, मोपासां,.... सबके सब उन दिनों उसके लिए अपरिचित नाम तो नहीं थे पर पढऩे का सौभाग्य नहीं के बराबर ही हुआ था।
कुछ एक दिन बाद, संभवत: यह उनकी चौथी मुलाक़ात थी। शेखर, शरत के रीडिंग रूम में पढ़ी गई किताबों को व्यवस्थित जगह पर रखने एवं नई किताबों को देखने में व्यस्त था। सामने टेबल पर मिठाई और नमकीन की प्लेट रखी हुई थी। वह कई बार शेखर से 'नाश्ता कीजिए-नाश्ता कीजिएÓ की रट लगा चुका था पर बेखबर शेखर मगन होकर किताबें उलटता पलटता रहा। उसका मनोयोग जब भंग हुआ उसने अनुभव किया कि शरत कुछ बेचैन है। वह कभी बैठता, कभी उठता, कभी चहलकदमी करता, कभी कमरे से बाहर जाता। वह एकाग्रचित्त नहीं था।
नाश्ते की प्लेट हाथों में लिए शेखर ने शरत से कहा, 'तुम भी खाओ।Ó
'मैं नहीं खा पाऊंगा।Ó शरत ने कहा।
'क्यों? तबियत खराब है क्या?Ó
'नहीं!Ó
'तो फिर! इतना सारा मैं अकेले खाऊं?... अरे! कुछ तो लो।...Ó
बहुत देर तक वह चुप्पी साधे रहा, मानो कहने के लिए कुछ शब्दों को मन ही मन जोड़ रहा हो। वह बोला, 'पेट में नहीं रह पाएगा।Ó
प्रश्न भरी निगाहों से शेखर देखता रहा!!
शरत चुप था। वह बोलना चाहता था पर झिझक हो रही थी। उसके ओंठ थरथरा रहे थे। कंठ ने शब्दों को जकड़ रखा था। डगमगाता हुआ सा वह बोला, 'शेखर जी बुरा मत मानिएगा। दरअसल मैं... एक... नशा... लेता हूं।Ó
क्या? कौन सा नशा? शेखर की आंखों में प्रश्नों का सैलाब उमडऩे-घुमडऩे लगा।
-हेरोइन
'क्या!Ó शेखर का मुंह खुला रह गया।
नाम तो उसने भी सुन रखा था पर पहली बार आंखों से देख रहा था। चुटकी भर स$फेद पाउडर, सिगरेट के पन्नी पर रखकर वह उसे नीचे से गर्म करता रहा और उठ रहे धुएं को एक का$ग•ा के पाइप से खींचता रहा। दस पंद्रह मिनटों तक निढाल पड़ा रहा। प्रतिक्रिया विहीन, अद्र्धमूच्र्छित। धीरे-धीरे उसकी तंद्रा लौट रही थी। वह हिल डुल रहा था। बोल रहा था।
शेखर ने कल्पना में भी नहीं सोचा था कि यहां ऐसा भी दृश्य दिखेगा। वह मौन साधे सब कुछ देखता रहा। चांद का काला पक्ष आंखों के सामने था।
शेखर को चंदन का चेहरा स्मरण आ रहा था। अभी पिछले महीने ही तो...। कुदरत के $कहर का शिकार था चंदन!! ब्लड कैंसर से ग्रस्त, अंतिम क्षणों तक मौत से लड़ता हुआ, अपने अनमोल जीवन को बचाए रखने की प्रचेष्टा! उसकी मौत जीवन के प्रति शेखर में सिहरन बढ़ा गई थी। हर महीने ब्लड लेने को मजबूर पर चेहरे पर जीवन के प्रति उछाह, मासूम मुस्कान!!... चंदन ने एक दिन शेखर से कहा था, 'शेखर जी... जीवित रहना अर्थात मौत के विरुद्ध लड़ाई अर्थात रु$ख पर खड़े होने का प्रयत्न!! मैं मौत से नहीं डरता पर जिंदगी से प्यार करता हूं।Ó चंदन में जीवन जीने की ललक साफ दिखती थी। आयु कम थी पर जीवटदार था चंदन!! सकारात्मक सोच से ओतप्रोत।
पर शरत तो खुद के लिए मौत खरीद रहा है!!.. क्यों खरीद रहा है वह मौत!!! क्या $गम है उसे? भरा-पूरा घर है, ममतामयी मां है, बरगद सी छांह बिखेरते पिता हैं। प्यारी सी बहन है... न बेकारी की चिंता, न भूख का डर!... और इतना उत्कृष्ट साहित्य भी तो उसके साथ मौजूद है, फिर भी?? रह रहकर यह प्रश्न शेखर का आज भी पीछा करते रहता है।
एक लंबे अंतराल के बाद शरत बोला, 'लत लग गई है। छूटती नहीं है, चेष्टा कर रहा हूं।Ó उसके बोलने में जो दर्द था, जो पीड़ा थी, शेखर के मन को झकझोर गई।
शरत बोला, 'नहीं लेने पर शरीर टूटने लगता है। बेचैन हो उठता हूं।Ó शेखर एकटक उसे देखता रहा।
शांत, अविचल, गंभीर, अकेला पड़ा शरत $खामोश बना रहा। छलनी हुआ अंतस, उदासी की लंबी रेखा उकेर रहा था। अब अधिक देर रुकना शेखर के लिए असह्य हो उठा। उठने से पहले उसने शरत को सांत्वना भरे दो बोल बोले।
वह बोला, 'हारना •जिंदगी  नहीं, जीतने का नाम •जिंदगी  है। तुम जीतोगे! जरूर जीतोगे!!Ó
शेखर का हाथ उसके कंधे को सहलाता रहा, इस नैसर्गिक स्पर्श ने उसकी आंखों से आंसू छलका दिए।  
शरत बोला, 'मैं बुरा हूं न!Ó उसकी आंखों में आंसू छलक उठे।
'तुम नहीं, तुम्हारी यह आदत बुरी है। प्रयास करो, छूट जाएगी।Ó शेखर बोला।
'हां, करूंगा, छोडऩे का प्रयास करूंगा। पापा ने डॉक्टरों से बात कर रखी है। मैं कलकत्ता जाने वाला हूं।Ó
संवेदनाओं का शब्दकोष मुस्कुराहट और आंसुओं के मध्य अठखेलियां करता रहा।
एक आशाभरी मुस्कुराहट पहली बार उसकी आंखों में आंसुओं के मध्य झिलमिला उठी।
उस दिन थके $कदमों से, क्लांत, लस्त-पस्त, हारा हुआ सिपाही सा डग-दर-डग भरता शेखर वापिस लौटा। ओंठों पर सिगरेट और सिगरेट की $िफल्टर की लहरों पर बनती-बिगड़ती चित्रकारी वह मन के कैनवास पर देखता रहा। गिरे तिनके, अस्त-व्यस्त घोंसले, स्तब्ध आसमान, सहमा वक्त, छलनी अंतस...!!!
इस घटना के चार एक दिन बाद फिर से वह शरत के द्वार पर था। आज (उस रोज) पुस्तक नहीं, शरत से मिलने को उसका मन छटपटा रहा था। दरवाजे पर ही शरत के पिता से मुलाकात हो गई। उन्होंने मौन अभिवादन स्वीकारा। उनकी आंखों में प्रश्नों का सैलाब उमड़ता हुआ दिख रहा था। ...और जब तक वह उनके सामने बना रहा तब तक उनकी न•ारों पर उसका चेहरा टहलता रहा। असमंजस की स्थिति, उलझन भरा माहौल, भयभीत मन, क्या करूं, क्या न करूं की-सी स्थिति लिए उसने घर के अंदर प्रवेश किया।
अपेक्षाकृत तनाव रहित था शरत उस रोज! मृदु मुस्कान चेहरे को घेर रखी थी। देखकर शेखर को अच्छा लगा। उसने उसकी मुस्कान का प्रत्युत्तर भी दिया। खिल उठा मन। दोनों का। तनाव छंट सा गया।
'मैं जानता था आप जरूर आएंगे।Ó मानो वह कई दिनों से उसका इंतजार करता रहा हो। यह उसके हृदय की पुकार थी।
'आने में देर कर दी, मुझे और पहले आना चाहिए था।Ó सफाई में दिया गया वक्तव्य था शेखर का। उसकी दृष्टि कहीं दूर टिकी हुई थी। शायद वह महसूस रहा था कल तक 'शरतÓ उसकी जरूरत थी पर आज 'वहÓ शरत की जरूरत बन चुका है।
उसकी आंखों में आंसू छलक उठे। सुनकर शरत गंभीर हो उठा। कुछ देर मौन रहकर बोला 'आप आते हैं तो मन को बड़ा सुकून मिलता है।Ó
'मुझे भी तुम से मिलना अच्छा लगता है।Ó दूरियां सिमट सी गई। समवेत खुशी छलक पड़ी। तभी शरत की मां की पुकार ने उनके आलाप में एक छोटा-सा अंतराल डाला। संभवत: उन्हें शरत से कुछ जरूरी काम आन पड़ा था।
शेखर कमरे में तनहा बैठा विगत दिनों की बातों में उलझा रहा। ऐन वक्त पर एक गुडिय़ा सी लड़की कुछ खोजती हुई सी कमरे में आई। शेखर की नजर पड़ते ही अपने को सम्हालती हुई सी बोली, 'आप शेखर भाई जी हैं न!Ó उत्तर की प्रतीक्षा किए बिना ही 'नमस्तेÓ कहा। शेखर का अनुमान सही था। वह शरत की बहन संध्या थी। •िाक्र तो शरत बातों बातों में किया ही करता था पर मुलाकात पहली बार हो रही थी।
वह बोली, 'भैया जी, आपकी लिखी कहानियां घर पर सभी ने पढ़ा है। आप सभी को पसंद हैं।Ó
शेखर पूछा, 'क्या तुमने भी पढ़ी हैं?Ó
'नहीं, भैया कहते हैं... पापा भी कहते हैं।Ó शेखर को समझ आ चुका था कि शरत ने घर भर में उसकी छवि एक साहित्यकार के रूप में खींच रखी है। अर्थात उसका वह डर कि कहीं उसके पापा उसे भी ड्रग एडिक्टेड न समझें....गलत साबित हुआ।
उस दिन भी वे बाहर लॉन में जा बैठे। गुनगुनी धूप और सर्द हवाओं का समवेत स्नेहिल स्पर्श माहौल को खुशनुमा बनाए था। शेखर दर्द को नहीं कुरेदना चाहता था अत: इधर उधर की बातें करता रहा पर शरत उसी दर्द को कुरेदकर अपने मन का बोझ हल्का करने को आतुर था।
वह बोला, 'शेखर जी, साल भर पहले की बात है। मैं बड़ा उत्साहित था। मनचाहे कॉलेज में प्रवेश मिल चुका था। सभी कॉलेजों की तरह शुरूआती दिनों में यहां भी रैगिंग का दौर चला। सीनियर्स सिगरेट पीते, हमें भी कश लगाना पड़ता। मैं इन्हें रैगिंग का खेल समझता रहा।
सीनियर्स के मध्य मेरी अमीरी की चर्चा तो पहले से ही थी। बात-बात पर सौ-दो सौ खर्च करना मेरे बाएं हाथ का खेल था। मेरी नजदीकियां कुछ हमउम्र लड़के-लड़कियों के साथ बढऩे लगी। हम हुड़दंग मचाते, धमाल करते। एक बंधनहीन मुक्ति का अहसास हमारे अंदर घर करता गया।
बेफिक्र, बेलौस हॉस्टल की पार्टियों में शरीक होने लगे। वहां शराब का दौर चलता, चिलम खींची जाती पर यकीन मानिए मैं अपने को इन सब से महफूज रखता।... पर सिगरेट पीना मुझे सुकून भरा लगने लगा था। खासकर उनके द्वारा दी जाने वाली सिगरेट का तो मैं दीवाना हो चला था। आह, क्या स्वाद, क्या अहसास!! जिस दिन सिगरेट नहीं मिलती, मैं परेशान हो उठता। मुझे कहां पता था जिसे मैं पुरुषत्व की अभिव्यक्ति मान बैठा हूं, वह एक धोखा है... एक छलावा।Ó
उसने बात जोड़ी, 'शेखर जी, बहुत देर हो चुकी थी। मैं उस सांचे में डाला जा चुका था जहां प्रवेश के रास्ते तो थे पर निकासी का मार्गअवरूद्ध था। अजानते ही मैं हेरोईन का...।Ó
समाधि की तरह शेखर नि:शब्द सब कुछ सुनता रहा। पहली बार उसने उसे उसकी आंखों से देखा। दिल का कोना लरज गया। गहरी आंतरिकता से होने वाली भीतरी बातचीत उसके दिल में हलचल मचा रही थी।
उसने चुप्पी तोड़ी। वह बोला, 'इतिहास, वर्तमान को संवारता है। तुम्हारा भविष्य सुरक्षित है। तुम कर सकोगे! हिम्मत मत हारो।Ó
शरत सुनकर मुस्काता रहा। यह एक दर्द घुली मुस्कान थी। शेखर महसूसता रहा, 'शरत की हंसी से अपराधबोध छलकता है पर चंदन नैसर्गिक हंसी हंसता था।Ó
शेखर को ख्याल हो आया, उस पर भी एक बार दबाव आया था। आर्थिक तंगी से जूझ रहे परिवार को सम्हाले रखना उन दिनों उसके लिए दूभर हो उठा था। बड़ी मुश्किल से दिन गुजर रहे थे। रिटायर हो चुके पिता का भार अब उसके कंधों पर आ पड़ा था। अनायास एक दिन गौतम का उसके घर आगमन हुआ। गौतम कभी शेखर के साथ पढ़ा करता था। विज्ञान स्नातक, अतीवभद्र। कभी शेखर ने उससे अपने लिए कुछ ट्यूशन जुगाड़ करने की बात कही थी। दो एक ट्यूशन गौतम ने विगत में दिए भी थे शेखर को।
पर उस दिन उसका प्रस्ताव सुन वह दंग था। वह बोला, 'शेखर काम बहुत आसान है। मैं तुम्हें रुपये दूंगा। तुम उसे चला दोगे।Ó रुपये चलाने की बात उसके पाले नहीं पड़ रही थी। पर बाद में पता चला कि वह जाली नोट चलाने की बात कर रहा था।
.....आज तक शेखर न तो इस बात को भूल पाया है और न ही गौतम को कभी माफ कर पाया है, पर यह शरत! शरत की आंखों में उस दिन भी अपने उन मित्रों के प्रति नफरत नहीं थी जिन्होंने उसे उस दलदल तक खींचा था।
शरत का जवाब सुन शेखर दंग रह गया था। वह बोला, 'शेखर जी, मेरे उन दोस्तों को भी कहां पता था कि वे मौत बेच रहे हैं? वे भी तो मस्ती के लिए नशा करते थे। उन्हें भी किसी ने कभी मस्ती के नाम पर नशा धराया होगा! काश कि हम सही वक्त पर....Ó
'मैं उनका टार्गेट बना क्योंकि मैं संपन्न परिवार से था। पर हमारे कुछ मित्र हैं जिन्हें इस नशे ने चोर बना डाला है। नशे के लिये जब पैसे कम पड़ते हैं तब मां-बहनों के गहने भी... यकीन मानिये चोरी वे नहीं करते, नशा उनसे करवाती है चोरी।Ó
शेखर को याद आया अभी कुछ रोज पहले उन्हीं की बस्ती से पुलिस ने एक चौदह वर्ष के लड़के को चोरी के अपराध में पकड़ा है। उसने बाजार के किसी दुकान का ताला तोड़कर चोरी की थी। चोरी की गई सामग्रियों में सिगरेट, गुटखे, चाकलेट तथा डेन्डराईट पाए गए थे जबकि वहां इससे कहीं अधिक कीमत की वस्तुएं पड़ी हुई थी। उस दिन पहली बार शेखर को पता चला कि डेन्डराईट भी.....।
दूसरी घटना तो इतनी हृदय-विदारक थी कि मन को विश्वास दिलाना मुश्किल हो उठा था। सिटी सेंटर जैसे पॉश इलाके में एक लड़के ने अपनी मां को नशा के लिये पैसा देने से इंकार करने पर कत्ल कर डाला। आई.आई.टी. खडग़पुर से पासआउट लड़का आज भी जेल में सड़ रहा है।
शेखर को इल्म था नशे के गर्भ से जन्म लेता है अपराध! चोरी, डकैती, हत्या, राहजनी एवं यौन अपराध को जन्म देता है नशा। कभी नशे के लिए अपराध तो कभी अपराध को चलाए रखने के लिए नशा। वह यह सोचकर परेशान था कि नशे की धुन में कहीं शरत भी कोई अपराध न कर बैठे!
जैसा कि अपेक्षित था, जल्द ही शरत को कोलकाता के साल्टलेक इलाके के किसी नशा मुक्ति केन्द्र में ले जाया गया। शेखर के साथ दिनेश भी उस रोज उसे स्टेशन तक छोडऩे आया था।
प्लेटफॉर्म का वह दृश्य भुलाए नहीं भूलता। संध्या भी अपनी मां के साथ भैया को सीऑफ करने आई थी। गाड़ी प्लेटफॉर्म से सरकने लगी थी। साथ आए लोग लौटने की प्रस्तुति में थे। पर संध्या के डग गाड़ी की दिशा में बढ़ते रहे, दोनों के हाथ हिलते रहे, तब तक जब तक कि दोनों का अक्स दोनों की आंखों में उभरता रहा। जब तक शरत सामने था, वह अपने को काबू में रखे हुए थी पर अब सब्र का बांध टूट चुका था। निष्प्रभ सी असहाय मां, नितांत अकेली, पत्थर की मूर्ति बनी सब कुछ देखती रही। शेखर सोचता रहा, 'आंसू हंै तभी तो आंखों में धुंधलका छा पाता है, प्रकाश रास्ता रोके खड़ा हो पाता है, दृश्य ओझल हो पाते हैं। आंसू न होते तो पथरा जाती आंखें, धड़कने से इन्कार कर देता हृदय।Ó
शेखर और दिनेश भी उसी दृश्य में आप्लावित थे। और 'डॉगीÓ! जो शरद की डांट तथा संध्या का लाड़ पाने को क्या कुछ नहीं करता! आज वह भी... प्रतिक्रिया विहीन....। कूपे में चढ़ते वक्त वह शरत के पैरों पर लोट पड़ा। शरत के लाड़ पर भी...बड़ी मुश्किल से संध्या उसे वहां से हटाई। वापसी पर कई दिनों तक अन्न नहीं छुआ।
तकरीबन दो ढाई महीनों तक वह वहीं कोलकाता में रहा। पर कोलकाता जाने से पहले एक अप्रत्याशित घटना घटी। कुछ मवाली लड़कों के साथ तिलक लाइबे्ररी के इर्द-गिर्द मध्य रात्रि के बाद लगभग डेढ़ दो बजे पुलिस ने शरत को भी पकड़ा। यह खबर आग की लपटों की तरह फैलती हुई दिनेश तक जा पहुंची थी। गनीमत थी कि पुलिस को ड्रग नहीं मिली थी अन्यथा..। बहुप्रतिष्ठित व्यवसायी पुत्र शरत को पुलिस उसके घर तक छोड़ आई थी पर...।
शेखर भी दिनेश के संदेह के घेरे में था। वजह भी बनती थी। अजीब ऊहापोह की स्थिति में था वह। एक तरफ शरत की मनाही और दूसरी तरफ उससे नजदीकियां। दिनेश को, शेखर ने नहीं, किसी दूसरे ने बताया था।
एक दिन वह लगभग घसीटते हुए शेखर को यह कहकर कि, 'साले को करने दो नशा! रईस का बेटा है, वह चाहे हेरोईन पिए या स्मेक, हमें क्या!... हम क्यों इसके चक्कर में पड़े!!Ó वहां से ले गया। बाद में शेखर ने दिनेश को सारी बातें बताई। दिनेश भी उस दिन के अपने व्यवहार पर लज्जित था।
आहत तो शरत भी हुआ था। लगातार उसके मित्रों की संख्या घटती जा रही थी। पास पड़ोस एवं पारिवारिक मित्र भी, भनक मिलते ही, कन्नी काटने लगे थे। इन परिस्थितियों में ड्रग्स भी उसका सहारा बनता और उस दिन भी... संध्या बता रही थी।
एक रोज उसने शेखर से पूछा 'शरत ठीक हो पाएगा?
शेखर बोला, 'उसे ठीक होना ही है। बड़ी संभावनाएं हैं उसमें।
दिनेश ने कहीं पढ़ा था, 'प्रतिभाएं अपने साथ घुन भी लाती हैं।Ó आज आंखों के सामने यही उदाहरण बनकर खड़ा था। दिनेश की जिज्ञासा रह-रहकर प्रश्न बनकर शेखर के सामने उभरा करती। आज भी वह शेखर से पूछा, 'अच्छा शेखर तुम बता सकते हो, लोग नशा क्यों करते हैं?Ó
शेखर ने कभी पढ़ा था,जीवन एक पेंडुलम के मानिंद भूत-भविष्य एवं वर्तमान के मध्य डोलता रहता है। अक्सर भूतकाल का किया कराया उसके भविष्यत काल को डराए रखता है अत: वह अपने वर्तमान को नहीं जी पाता। और इसी वर्तमान को जीने की ललक उसे नशे की ओर खींच ले जाती है।..... पर शरत का न तो भूतकाल ऊबड़-खाबड़ था और न ही भविष्य ही परेशानी भरा रहने वाला था फिर भी वह....
वह बोला,'दिनेश यह प्रश्न मेरे मन को भी कुरेदा करता है। सच कहूं तो मैं भी उलझन में हूं क्योंकि मैंने देखा है, कुछ पाने की खुशी, कुछ खोने का $गम और खोने-पाने से मुक्त सपाट जीवन भी नशा करने को प्रेरित करता है।Ó
'मैं समझा नहीं, शेखर तुम कहना क्या चाहते हो?Ó
'मैं नहीं जानता मैं सही हूं या गलत पर मुझे लगता है अजानते ही हम नशे के बाहुपाश में बंधे जा रहे हैं। आज हमारे संस्कार में घर कर चुका है नशा! युवाओं को यह फीलगुड सा लगने लगा है। कुछ तो महज इसलिए नशा करते हैं कि उन्हें जिज्ञासा रहती है इसमें है क्या!!Ó
दिनेश बोला, 'शायद तुम जायज कह रहे हो!Ó दिनेश के चेहरे पर अंतद्र्वंद्व साफ दिख रहा था। उसने कहा, 'ऊबाउ जिंदगी भी नशा कराती है और स्वच्छंद जिंदगी भी! कोई जिंदगी की समस्याओं से भाग कर नशे का आश्रय लेता है तो कोई जिंदगी से लडऩे के लिये!Ó
'... और मीडिया भी...।Ó शेखर बोला
... दिनेश का बोलना जारी था, 'सिर्फ मीडिया... नहीं, साहित्य भी। आज 'ग्लोरी साहित्यÓ शराब, शोहरत और अवैध संबंधों के इर्द-गिर्द रचा जाता है। फिल्मों में रेव पार्टी आम दृश्य हो चला है। सुनियोजित तरीके से नशे के प्रति लोगों में एक ललक पैदा की जा रही है।Ó
'एक मजबूत प्रलोभन का अंतरजाल सभी को अपने गिरफ्त में लिए हुए है। मुझे भी और तुम्हें भी!! नशे का एक विस्तृत बाजार है।Ó कहकर शेखर ने अपने सिगरेट का एक लंबा कश लिया और अंतिम हिस्से को तब तक रगड़ता रहा जब तक कि सिगरेट का टुकड़ा धुंआ उगलना बंद नहीं कर दिया।... और उस दिन के बाद शेखर ने सिगरेट को कभी हाथ नहीं लगाया।
आज चार माह बाद वे मिले। मिलते ही कुशलक्षेम का आदान-प्रदान हुआ, दोनों मित्र घंटों रमे रहे। इधर-उधर की बातचीत होती रही। पर आदतन शेखर ने जान-बूझकर उसके इलाज की बाबत बात नहीं छेड़ी, न ही शरत ने जिक्र किया। पर बातचीत के दरम्यान शेखर ने अपने इंटरव्यू का जिक्र जरूर छेड़ा। पिछले दिनों वह एक इंटरव्यू के सिलसिले में आसाम गया हुआ था। सुनकर शरत ने कहा, 'अरे शेखर जी आप दिल के सच्चे हैं। अच्छे साहित्यकार हैं। आपकी नौकरी कोई नहीं काट सकता है... आज न कल आप को नौकरी मिलेगी और अच्छी नौकरी मिलेगी। आप घबराइए मत।Ó
और सच में अप्रत्याशित रूप से अगले ही महीने शेखर की नौकरी रानीगंज पेपर मिल में लग गई। शरत ने कहा, 'शेखर जी धीरज रखिए, इससे भी अच्छी नौकरी आपकी प्रतीक्षा कर रही है। आपने ब्रह्मपुत्र के जल का आचमन किया है। वह आपको जरूर बुलाएगी।Ó सुनकर शेखर भी मुस्काया।
इस खुशी के मौके पर शेखर उस रोज अपने साथ सोहन पापड़ी का एक पैकेट लाया था। शरत ने उसकी खुशी में शामिल होने की खातिर एक टुकड़ा मुंह में डाला। पर पांच एक मिनट गुजरते न गुजरते वह ओ-ओ करता हुआ कमरे से बाहर हो लिया। सब कुछ उल्टी कर चुकने के बाद जब वह कमरे में वापस आया, उसका चेहरा लाल हो चुका था।
वह बोला, 'शेखर जी, कमबख्त यह ड्रग्स हमें क्षणभर के लिए भी चैन लेने नहीं देता! खुशी में भी खलल डालती है। शायद मेरी मौत...Ó
उसके आंखों के कोरों पर मोती सा आंसू झिलमिला उठा।
इतने दिनों में पहली बार शेखर को लगा कि शरत कहीं अंदर से टूट रहा है। सांत्वना देना भी उसे आज ढकोसला सा लग रहा था पर हाथ तो बढ़े ही थे सांत्वना देने को!! वह बोला, 'शेखर का मीत इतना कमजोर नहीं हो सकताÓ और हरिवंश राय बच्चन की वह पंक्ति कह सुनाई.. 'है ंअंधेरी रात पर दीया जलाना कब मना हैÓ.. शरत यह कहते हुए हंस पड़ा कि 'तीर पर कैसे रुकूं मैं आज लहरों में निमंत्रण....Ó और शेखर अपने को सम्हालने की खातिर उसके स्वर में स्वर मिलाता रहा पर अंतिम बंद आते-आते उसके गले का कंपन रुदन में तब्दील हो चुका था।... शरत मौन था!
कलकत्ता से इलाज शुरू हुए तकरीबन एक साल गुजर चुका था। दौड़-धूप जारी थी। खर्च होते शरत को निहारना मुश्किल हो चला था। कहीं से भी एक आशा की बारीक किरण दिखती, उसके पापा दौड़ पड़ते....कभी कलकत्ता तो कभी बंबई।
एक मनुष्य कर भी क्या सकता है जब उम्मीद का हर द्वार बंद सा दिखता हो, अलावा इसके कि वह अपने को उस परम पिता के सामने समर्पण करे! झूठा ही सही पर उस क्षण उन हैरान, परेशान, निराश मनुष्यों को एक उम्मीद की धुंधली किरण तो वहीं दिखती है। और इसी प्रत्याशा में शरत के माता-पिता उसे लेकर तीर्थयात्रा पर निकल पड़े। वे महीनों उत्तर भारत के भिन्न-भिन्न तीर्थस्थानों पर घूमते रहे। बद्रीनाथ, वैष्णोदेवी... और न जाने कहां-कहां मत्था टेकते रहे।
उसके वापसी की सूचना पाकर शेखर उससे उसी दिन मिलने पहुंचा। उसकी अंगुलियों में पत्थर जड़ी अंगूठियां थी तथा माथे पर रोली चंदन का तिलक लगा था। बातचीत के दरम्यान उसने पारे का बना शिवलिंग भी दिखाया और बोला, 'शेखर जी, पापा कहते हैं बहुत फलदायी होता है पारे का शिवलिंग!! आप हाथ पर रखकर देखिए, यह छलक पड़ेगा।Ó और सच में शेखर नहीं सम्हाल पा रहा था उस शिवलिंग को। शरत ने ही सम्हाला!
शेखर को इन सब बातों पर कभी आस्था नहीं थी पर उस दिन वह अपने शरत के लिए उस भगवान से प्रार्थना करता रहा जिस पर शरत की आशाएं बंधी थी। काश भगवान उसकी इच्छाएं सुन पाते! उनके हिस्से से कुछ उम्र उसके हिस्से में जोड़ पाते!!
उस दिन पहली बार वह बोला, 'नशा छूट नहीं पा रहा। दो दिन बाद ही बेचैनी बढऩे लगी है।Ó...  'डॉक्टर के निर्देशानुसार अभी दवा, प्राणायाम, योगा सब कुछ कर रहा हूं। पर...Ó
शब्द की सत्ता रंगझरी तस्वीर उभारती रही, अर्थ की आत्मा टुकड़ों में बिखरती रही। एकाग्र चित्त होकर वह सुनता रहा, हताश चेहरे मुस्कान को पीछे धकेलती हुई सी, दीपक की आखिरी लौ की तरह, हवा से लड़ती, लहराती....उसे देखकर शेखर की अन्तरात्मा कचोट उठी। ज्यों-ज्यों वक्त गुजरता रहा, शरत में कुछ-कुछ बदलाव दिखने लगे। खाने की इच्छा जाती रही, वजन घटता गया, जब भी खाने को बैठता, वमन की इच्छा जाग जाती। रात में नींद नहीं आती, और दिन में झपकियां लेता रहता। शेखर और दिनेश का आना-जाना पूर्ववत बना रहा पर वे अब वहां अधिक देर ठहर नहीं पाते। पलकों पर अतिरिक्त बल लगाता हुआ शरत उन्हें खोले रखने का भरसक प्रयास करता पर बोझिल पलकों को अधिक देर तक खोले रखना उसके वश में नहीं रहता। मंथर गति से साँसें लेता देख उनमें घबराहट होती। कभी-कभी वे शरत की हृदय गति को टक बांधे निहारा करते। सांसों के फूलने और पिचकने की गति इतनी धीमी होती कि डर के मारे घिघ्घी बंध जाती। यदा-कदा उसके शरीर में कंपन सा दिखता, मानो रह-रहकर उसके अंदर कहीं भू चाल सा आता रहा हो।
इन्हीं परिस्थितियों में एक दिन फिर से शरत को कलकत्ता ले जाना पड़ा। शेखर और दिनेश भी साथ थे। चार बोतल खून चढऩे के बाद शरत के मुरझाए चेहरे पर रौनक लौटी। वे चार दिनों तक शरत के साथ वहां बने रहे। इसी दरम्यान नशामुक्ति केन्द्र का दृश्य उनकी आंखों में दर्द भरे छाले उभार रहा था। हर तरफ नशाग्रस्त तरुण-तरुणियों का हुजूम। हैरान, परेशान एवं निराश आंखें! मानसिक रूप से विध्वस्त, दर्द को अपने में समेटे हुए!!
एच.आई.वी./ एड्स तथा हेपेटाइटिस के दर्जनों शिकार, किसी को निमोनिया तो किसी को हृदय का रोग। कुछ के लीवर, किडनी, लंग्स में समस्या उत्पन्न हो रखी थी तो किसी ने सुनने की क्षमता खो रखी थी। कहीं ब्लड चढ़ रहा था तो कहीं स्लाईन। भिन्न-भिन्न तरह का सपोर्ट सिस्टम, कहीं मानीटर पर हार्टबीट देखी जा रही थी तो कहीं प्रेशर!
सब के सब युवा, पर सभी की आंखों से जिंदगी के हसीन सपने गायब। इन चार दिनों में ऐसे ऐसे दृश्य से रूबरू होना पड़ा था, जिन्हें देखते रूह कांप जाती थी। सभी सजायाफ़्ता, सभी क़सूरवार! गुनाह एक सा, सभी ड्रग्स के आदी...।
शरत की स्थिति में सुधार देखते हुए वे आज वापिस जा रहे थे। जाने से पहले दोनों शरत से विदा लेने आए। शेखर सामने पड़े स्टूल पर तथा दिनेश बेड पर टेक लगाकर उसकी हथेलियों को सहलाता रहा। लडख़ड़ाते मुस्कुराते बातचीत चलती रही। दिल से जाने की इच्छा तो नहीं थी पर मजबूरी...। शरत ने ही कहा, 'अब देर हो रही है, जाइए।Ó
और उसने बात जोड़ी, 'जाते वक्त मेरा एक काम कर दीजिएगा, संध्या के  लिए स्टेशन परिसर से कुछ अमरूद और सफेदा लेते जाइएगाÓ और पैसा देने लगा। शरत जब भी कलकत्ता आता, संध्या अवश्यंभावी रूप से इन्हीं चीजों का अनुरोध किया करती और आज भी...। शरत से पैसा लेने की इच्छा न होने के बावजूद शेखर ने पैसा लिया, वह महसूस रहा था यह दूर बैठे उस भाई का, जो जिंदगी और मौत से लड़ रहा हो, अपनी छोटी बहन के प्रति प्रेषित किया जा रहा प्यार एवं कर्तव्यबोध का समवेत स्नेहिल पैग़ाम है, जिसमें कतई वह बाधक बनना नहीं चाहता था।
वे नियत समय से बहुत पहले हावड़ा स्टेशन के लिए निकल पड़े क्योंकि उन्हें भी ज्ञात था कि टिकट खिड़की पर शाम के वक्तबेतहाशा भीड़ उमड़ा करती है। और वहां अनायास काउंटर पर तुषार से मुलाकात हो गई। वह भी रानीगंज जा रहा था। उन दिनों वह कलकत्ता मेडिकल कॉलेज से मेडिसिन में एम.डी. कर रहा था। रानीगंज टी.डी.बी.कॉलेज के तीनों पुरातन विद्यार्थी, कभी वे मित्र हुआ करते थे पर अब तो मिलना ही नहीं हो पाता। पुरानी यादें हिलोरें मारने लगी।
अभी गाड़ी आने में काफी वक्त था। पुरानी यादों को ताजा करने पास ही तीनों हुगली नदी के घाट पर जा बैठे। अपेक्षाकृत शांत वातावरण, भीड़- भाड़ से दूर, आते-जाते स्टीमरों पर चढ़ते उतरते लोगों का रेला दूर से दिख रहा था। ठंडी हवाएं चल रही थी। समीप ही हावड़ा ब्रिज पर बत्तियां झिलमिलाने लगी थी।
परिंदों सा मनुष्य भी झुंड के झुंड अपने-अपने आशियानों में वापिस लौटने को बेताब दिख रहे थे। कुछ युवा जोड़े भी एकांत के तलाश में इधर- उधर भटकते दिख रहे थे। दृश्य मन को बांधे हुए था। कुछ पल के लिए उन्हें स्मरण ही नहीं रहा कि वे यहां क्यों बैठे हैं पर तुषार ने बात छेड़ी। उन दोनों से कलकत्ता आने का सबब पूछा।
कभी दिनेश तो कभी शेखर ने शरत से संबंधित आज तक की आपबीती कह सुनाई। तुषार एकाग्रचित्त होकर सुनता रहा। अब बोलने की बारी तुषार की थी। वह बोला, 'जहां तक मैं समझ रहा हूं मामला हद से आगे बढ़ चुका है।Ó
शेखर देखता रहा, तुषार बोला, 'अक्सर हम भ्रांति पाले रहते हैं कि नशा करना और न करना हमारे मु_ी में होता है पर सच्चाई कुछ अलग ही कहानी कहती है।Ó दिनेश दूर झिलमिलाती बत्तियों पर नजऱ गड़ाए था।
'ड्रग्स में ऐसा क्या है कि लोग मुक्त नहीं हो पाते?Ó शेखर की जिज्ञासा छलक पड़ी।
'इस प्रश्न का उत्तर दूं इससे पहले यह समझना जरूरी है कि नशा या लत क्या है?Ó कुछ सोचते हुए वह बोला...'मैं पूछ तो रहा हूं पर सच कहूं तो लत को परिभाषित करना बड़ा कठिन है। पर इतना कह सकता  हूं कि अपने आप पर नियंत्रण खो देना ही नशा है।Ó उसने बात जोड़ी, 'किसी चीज के प्रति एडिक्शन या नशे का अर्थ यह होता है कि हम चाह कर भी उस वस्तु से अपने को अलग नहीं कर पाते और अलग कर भी लें तो शरीर एवं मन पर विरूप प्रतिक्रिया दिखती है।Ó
'इच्छा शौकमें तब्दील होती है और शौक लत में। शौक जब जरूरत बन जाए, नशा कहलाता है और नशा जब न छूटे तो लत। समझता हूं पर प्रश्न यह है कि शरत तो बहुत ही समझदार और सुलझा हुआ इंसान है। वह अपने को नियंत्रित क्यों नहीं कर पा रहा!!Ó व्यग्रता दिनेश के चेहरे पर झलक उठी।
'शरत ड्रग्स लेता है अगर किसी को चाय, कॉफी या सिगरेट की लत लग गई हो, उससे मुक्त होना भी मुश्किल हो जाता है। प्यार मुहब्बत में लोग आत्महत्या क्यों करते हैं, पता है? यह भी एक तरह का एडिक्शन है।Ó जवाब तुषार का था।
'यदि कोई ड्रग ले रहा हो और वह निश्चय करे कि आगे से वह ड्रग नहीं लेगा तो क्या वह इसे नहीं छोड़ पाएगा?Ó उत्तेजना शेखर के चेहरे को भी व्यापने लगी थी।
'हां छोड़ पाएगा पर वास्तव में यह इतना आसान भी नहीं होता है। किसी नशे के चंगुल में फंसने के लिए चंद महीने ही काफी होते हैं पर मुक्त होना एक लंबी और कष्टदायी प्रकिया होती है। दूसरे शब्दों में नशे से मुक्त होना तो आसान होता है पर उस पर अधिक दिन तक टिके रहना मुश्किल!Ó शांतचित्त तुषार बोलता रहा।
'ऐसा क्यों होता है?Ó दिनेश की आवाज उभरी।
'नशा एक कॉज (कारण) है जो शरीर पर इफेक्ट (प्रभाव) पैदा करता है। नशे के कारण एडिक्शन होता है और इससे मुक्ति की चाहत वीड्रल सिम्टम्स पैदा करती है।Ó तुषार बोला।
अब गाड़ी का समय हो चला था। वे साथ-साथ स्टेशन आए। बातचीत चलती रही। तुषार एक-एक प्रश्न का जवाब देता रहा।
उस दिन शरत भी कुछ ऐसा ही जिक्र कर रहा था पर शेखर के समझ से बाहर था कि दरअसल यह वीड्रल सिम्टम्स क्या है और क्यों होता है? स्मरण है शरत ने कहा था, 'शेखर जी, हम हरिद्वार जा रहे थे। अचानक मेरी तबियत खराब होने लगी। दस्त पर दस्त होने लगा।
मुझे निढाल देखकर पापा घबरा उठे। पूरी की पूरी गाड़ी, इस प्रांत से उस प्रांत तक, छान मारी तब जाकर सौभाग्यवश एक डॉक्टर मिला। पापा के आग्रह पर उन्होंने आकर मुझे देखा। देखते ही उनका पहला प्रश्न था, 'यह क्या कुछ नशा वगैरह लेता है?Ó पापा की स्वीकारोक्ति पर उन्होंने कहा, 'इसे वीड्रल सिम्टम्स हो रखा है। जितना जल्दी हो सके इसे कुछ न कुछ नशे का सब्सटिच्युट देना ही होगा।Ó
'पापा मुझे लेकर नजदीकी स्टेशन पर उतर गए। विश्वास कीजिए जिन्होंने चाय से ज्यादा कभी छुआ तक न हो, उस रोज वे खुद मेरे नशे के लिए शहर भर घूमते रहे। हेरोइन तो उन्हें नहीं मिली पर कहीं से अ$फीम मिल गया। अ$फीम मेरे लिए उस वक्त संजीवनी थी।
मुझे दो ढेला अ$फीम लेना पड़ा जबकि साधारणतया एक बड़ा से बड़ा अ$फीमची भी एक ढेला (एक ढेला अर्थात एक छोटे मटर का दाना) में ही वश बोल जाता है।Ó
गाड़ी प्लेटफार्म पर आ चुकी थी। वे चढ़े। गाड़ी खुली, तीनों एक ही कूपे में आमने-सामने बैठे। तुषार ने फिर से बात छेड़ी। शायद उसके अंदर भी बहुत कुछ उमडऩे-घुमडऩे लगा था।
वह बोला, 'मैं यह सब बातें डॉक्टरी पढ़ते वक्त जान पाया हूं। सच आज समझ पा रहा हूं बड़ी भयावह चीज है नशा!! पैसा खर्च करने के बावजूद कितने छोड़ पाते हैं नशा!!!Ó
तुषार की आवाज सुन शेखर सोचता रहा, उस दिन भी बात शेखर के समझ से बाहर थी और आज भी। पर आज वह सच्चाई की तह तक जाना चाहता था अत: पूछा, 'तुषार बता सकते हो, ऐडिक्शन क्यों होता है और वीड्रल सिम्टम्स क्यों पैदा होते हंै यह अब भी मेरे समझ से बाहर है?Ó
तुषार बोला, 'विज्ञान की भाषा में या यों कहें कि डॉक्टरी भाषा में इसे हम इस तरह परिभाषित कर सकते हैं कि ऐडिक्शन एक क्रॉनिक (लाइलाज बीमारी) है, इसे रिलेप्सिंग डिजिज भी कहा जाता है। यह मस्तिष्क में न्यूरो केमिकल तथा मोलिकुलर चेन्ज लाता है। अर्थात ड्रग मस्तिष्क में एक स्थाई बदलाव लाता है। इसे हम पुनस्र्थापित नहीं कर पाते। स्मरण रहे मस्तिष्क शरीर का आमोद प्रधान केन्द्र है और ड्रग इसे (स्टुमलट)उत्तेजित करता है। जैसे-जैसे हम ज़्यादा से ज़्यादा ड्रग लेते हैं, शरीर में उस ड्रग के प्रति आसक्ति उत्पन्न होती जाती है और कुछ समय बाद यही शरीर की जरूरत बन जाती है। जब शरीर को ड्रग नहीं मिलता है तब शरीर पर विरूप प्रतिक्रिया उत्पन्न होने लगती है। इसे ही वीड्रल सिम्टम कहते हैं।Ó
कुछ ठहर कर वह बोला, 'यह जानलेवा भी हो सकता है और आत्महत्या के लिए भी प्रेरित कर सकता है। वीड्रल सिम्टम के दरम्यान शरीर शिथिल पड़ता जाता है, मांस-पेशियों एवं हड्डियों में असहनीय पीड़ा होती है। नींद नहीं आती, उल्टी होती है, डाईरिया का प्रकोप दिखता है।Ó दिनेश कुछ पूछना चाहता था पर तुषार बिना रुके बोलता रहा, 'तुम्हारे शरत के केस में एक तरफ उसका शरीर हेरोईन का आदी हो चुका है और दूसरी तरफ छोडऩे पर वीड्रल सिम्टम उसे दबोच रहा है। अत: चाहकर भी वह इसके चंगुल से मुक्त नहीं हो पा रहा। छोडऩे पर शरीर में इतना दर्द होता होगा इतनी बेचैनी होती होगी कि उस दर्द से मुक्ति पाने के लिए वह फिर से नशे की ओर कूद पड़ता होगा यह जानते हुए भी कि यह हानिकारक है।Ó
जैसा कि अमूमन होता आया था, शरत के वापिस आते ही शेखर उसके घर जा पहुंचा। जब से उसकी तबियत बिगडऩे लगी थी प्राय: शेखर और दिनेश साथ ही यहां आते जाते थे पर आज दिनेश कहीं बाहर गया हुआ था अत: वह अकेला था। उस दिन उसके कमरे से छन-छन कर मध्यम प्रकाश और $ग•ाल की हलकी धुन बाहर आ रही थी। शरत कमरे में तनहा लेटा था। वह वहीं उसके कमरे के समीप होकर $ग•ाल सुनता रहा, एक दर्द भरी आवाज रह-रहकर कान से टकराती रही-
न किसी की आंख का नूर हूं/न किसी के दिल का करार हूं।
शेखर बेसुध दरवाजे के बाहर अब भी खड़ा था। गजल समाप्त हो चुकी थी। बाहर उसकी परछार्इं को देख शरत की तंद्रा भंग हुई। उसकी सुगबुगाहट ने शेखर को वर्तमान में ला पटका। कुछ क्षणों तक मौन-मौन को आलापता रहा।
शरत के अंतर्मन में एक हलचल सी मची हुई थी। बगैर औपचारिक बातचीत किए वह बोला, 'शेखर जी, बहुत दिनों से आपसे एक बात कहने की इच्छा हो रही थी।Ó..... और अपनी किताबों की आलमारियों की ओर इशारा करते हुए कहा, 'इन किताबों को आप यहां से ले जाइए।Ó शेखर को असमंजस में पड़ा देख वह बोला, 'आप तो जानते हैं कि इन्हीं किताबों में मेरा.... मेरे बाद क्या पापा इन किताबों को बर्दाश्त कर पाएंगे!!... जला डालेंगे। कुरेद-कुरेद कर निकाल बाहर करेंगे मेरी यादों को!Ó
'मुझे बचाना किसी के हाथों में नहीं है पर मेरी किताबों को तो आप जिंदगी दे ही सकते हैं।... शेखर जी, ये किताबें रहेंगी तो मेरी यादें आपको आती रहेगी। मैं आपकी यादों में आता रहूंगा।.. मैं जिंदा रहना चाहता हूं....Ó और भरी आंखों से शेखर को उस दिन कुछ किताबें रखनी पड़ी थी।
इहलाम तो कलकत्ता से वापस आते वक्त ही शेखर और दिनेश को हो चुका था कि यह धागा अब टूटेगा,..... इंत जा र था तो उस लम्हे का! तमाशबीन मौन घनीभूत होता रहा, बोझिल आह प्रतीक्षा करती रही। घड़ी के कांटे वक्त ढोते रहे... पर एक न एक दिन तो उस घड़ी थकना ही था... और मह•ा तेईस साल की उम्र में शेखर और दिनेश ने उसे हमउम्र साथियों के साथ कंधा दिया! उसने कभी कहा था, 'शेखर जी शरीर नहीं अर्थी वजनदार होती है! मरते शरीर को अपना किया अच्छा बुरा सब कुछ ढोकर ले जाना पड़ता है।Ó आज अर्थी ढोते वक्त वही सब बातें याद आ रही थी।
घर वालों को भी शायद उसकी पार्थिव परिणति का आभास हो चला था। ज्यों-ज्यों समय गुजरता जा रहा था, शरत की स्थिति बिगड़ती जा रही थी। शरत वेंटिलेटर पर था। ब्रेनडेथ हो चुकी थी। उपस्थित लोगों को पता था, वेंटिलेटर हटाते ही उसकी सांसें दम तोडऩे वाली हंै। महज बाईस-तेईस वर्ष के युवा के जिस्म से वेंटिलेटर हटाते डॉक्टरों की रूह कांप उठी थी। आईसीयू में कार्यरत नर्सों की आंखें लाल हो चली थीं।
डॉक्टर शरत के पिता को अपने कक्ष तक साथ लाए। शेखर उनके साथ हो लिया। डॉक्टर बोले, 'आपने शरत के लिए जितना हो सकता है, किया है, पर हर चीज की एक लिमिटेशन होती है। सच कहूं तो उसकी •जिंदगी  मौत से बदतर हो चुकी है। उसे अब मुक्त कीजिए जिंदगी  और मौत से तो हम रोज  खेलते हैं पर नशे की आहुति चढ़ते इन युवाओं को देख $खौ$फ होता है।Ó और एक का$गज उनकी ओर बढ़ा कर दस्त$खत करने की दरख्वास्त की। एक बांड पेपर था, वेंटिलेटर खोलने का अनुमति पत्र....!
दस्तख़त करते उनके हाथ थरथरा रहे थे। कलम आड़ी-तिरछी चल रही थी। डॉक्टर ने बांड पेपर वापिस लेते 'सॉरीÓ कहा। उसके पिता की आंखें झिलमिला उठी।... तकरीबन तीन साढ़े तीन घंटे बाद डेथ सर्टि$िफकेट सौंपते डॉक्टर ने कहा, 'काश हम भगवान होते!Ó
एक अजीब तरीके का भाव उनके चेहरे पर उभर आया। डेथ सर्टिफिकेट हाथों में लेकर वे कहीं दूर देखते हुए बोल पड़े, 'मुक्ति मिली!Ó उनकी बातों को सुन शेखर चौंक पड़ा। वह सोचता रहा, 'मुक्ति!!... पर किसे??
आज वर्षों बाद भी जब कभी जगजीत सिंह की ग ज ल शेखर के कानों से टकराती है, वह शरत की यादों में डूबने उतरने लगता है और आज भी वही ग ज ल बज रही थी, चिट्ठी न कोई संदेश, जाने वो कौन सा देश जहां तुम चले गए...Ó