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Saturday 18 Nov 2017

आत्मकथा का रसायन

मधुरेश
372, छोटी बमनपुरी, बरेली-243003
मो. 093198-38309
प्रणव कुमार वत्योपाध्याय की 'विदा बंधु विदाÓ को यदि एक अपवाद के रूप में छोड़ दिया जाए, जो मात्र उल्लेख के लिए ही आत्मकथा के रूप में स्वीकृत एवं मान्य है तो आत्मकथा सामान्यत: एक पकी उम्र का ही उद्यम है। उम्र का बड़ा हिस्सा जी और गुजार चुकने के बाद ही कोई आत्मकथा की ओर प्रवृत्त होता है। पचास वर्ष की उम्र मोटे तौर पर उम्र का वह पड़ाव होता है जब आदमी बहिर्जगत एवं अंतर्जगत में कुछ परिवर्तन अनुभव करता है। पिछले कुछ समय से स्वास्थ्य एवं चिकित्सा संबंधी स्थितियों और जागरुकता ने आदमी की औसत आयु को भी प्रभावित किया है। इसका प्रभाव उसकी काम की स्थितियों पर भी दिखाई देता है। सेवानिवृत्ति की जो उम्र कभी पचपन वर्ष हुआ करती थी वह अब साठ और बासठ तक पहुंच गई है। कुछ जगह तो यह पैंसठ भी है। यह अकारण नहीं है कि इस घटित बदलाव के प्रसंग में अब 'साठ पार का जीवनÓ जैसा मुहावरा इस्तेमाल होता है। इस उम्र को केन्द्र में रखकर ही पिछले दिनों पर्याप्त लेखन हुआ है।
आंतरिक तौर बाहरी रूप में यह उम्र जहां अनेक समस्याओं की शुरूआत होती है, कठिन संघर्षशील जीवन से काफी कुछ मुक्त होकर आदमी अपने अतीत में झांकने लगता है। भूमंडलीकरण और पूंजी के जबर्दस्त फैलाव के कारण आदमी में पारिवारिक एवं सामाजिक संबंधों में घटित बदलाव के कारण गहरी असुरक्षा का भाव भी पैदा हुआ है। शास्त्रों में इस उम्र को ही 'वानप्रस्थÓ कहकर पहचाना गया है।
अपवादों की बात यदि छोड़ दी जाए, यह अकारण नहीं है कि दुनिया में किसी भी भाषा और साहित्य में आत्मकथा के लिए उम्र का यह पड़ाव ही एक स्वाभाविक काल माना जाता रहा है। लेखक ही नहीं एक सामान्य व्यक्ति भी दुनिया की भागदौड़ और आपाधापी से मुक्त होकर अपने और अपने अतीत की ओर मुड़ता है। इस मुडऩे में उसका जिया गया जीवन, जीवन को प्रभावित करने वाले घटना-प्रसंग, बचपन के संस्कार, व्यक्तियों आदि को वह पार करता है। जब-तब अपने जीवन में आए और उसे दिशा देने वाले व्यक्तियों को भी वह याद करता है। इससे एक ओर यदि उसकी अपनी हैसियत का बोध होता है उन व्यक्तियों के प्रति शायद उसका ऋण-शोध भी होता है। कभी-कभी बहुत स्थूल रूप में भी वह अपने परिजनों को याद करता है। इससे शायद उसे अपने शेष बचे जीवन की सुरक्षा का बोध भी होता है। अपने समय और जीवन के लिए निर्धारित किए जाने वाले लक्ष्यों के हिसाब से ही सामान्यत: व्यक्ति जीवन में आए इन व्यक्तियों को याद करता है। अपनी आत्मकथा में पंडित बनारसी दास चतुर्वेदी ने महात्मा गांधी के फिरोजाबाद जाने का उल्लेख किया है। पंडित जी तब कलकत्ता में थे। गांधीजी को एक पत्र लिखकर उन्होंने उनसे कुछ अनुरोध किया। परिहासपूर्ण और खिलंदड़े अंदा•ा में उन्होंने लिखा कि उनके शहर में, अपने भाषण में वे किसी न किसी रूप में उनका उल्लेख करें ताकि उनके पिता की अपने निठल्ले और नकारा पुत्र के बारे में राय बदले। उन्होंने यह भी लिखा कि अपनी आर्थिक स्थिति के कारण पिता समय पर मकान मालिक को किराया नहीं दे पाते हैं। उसे खुश रखने की रणनीति के तौर पर चतुर्वेदी जी ने गांधीजी से अनुरोध किया कि सभा में वे मकान मालिक का नाम लेकर उसकी प्रशंसा कर दें ताकि वह पिता को परेशान न करे। गांधीजी ने उनके इन दोनों अनुरोधों को पूरा किया और बाद में इसकी सूचना बनारसीदास चतुर्वेदी को दी।
यहां जिन तीन लेखकों की आत्मकथाओं को केन्द्र में रखकर बात की जा रही है वे सब सत्तर पार के लेखक हैं। महीपसिंह और हरदर्शन सहगल ऐसे लेखक हैं जिन्होंने देश-विभाजन की पीड़ा और विस्थापन को झेला है। उनका बचपन उन स्मृतियों से आक्रान्त रहा है। कवि अज्ञेय के कविता-संग्रह 'कितनी नावों में कितनी बारÓ की तर्ज पर महीप सिंह की आत्मकथा 'कितनी धूप में कितनी बारÓ (2013) उनके इस भटकाव और संघर्ष का संकेत देती है। अपनी इस आत्मकथा को वे अपने जीते और जानने की प्रक्रिया के रूप में प्रस्तुत करते हैं। हरदर्शन सहगल की आत्मकथा 'डगर डगर पर मगरÓ (2014) भी छूटे हुए की स्मृतियों और नई जगहों और व्यक्तियों के साथ जीवन को बहुत कुछ नए संघर्षों में गढऩे के उद्यम का प्रतिफल है। इस भटकन और बिखराव ने उनके जीवन को गहराई से प्रभावित किया। लेकिन हर जगह कुछ ऐसे लोग भी उन्हें अवश्य मिले जिन्होंने उनके जीवन को जीने और बनाने-संवारने में उनकी भरपूर सहायता की। अपनी इस आत्मकथा की प्रकृति पर लोगों की प्रतिक्रियाओं का उल्लेख करते हुए वे संकेत करते हैं, फिर उनका वही प्रश्न या आपत्ति। तब यह आत्मकथा हुई या चूं-चूं का मुरब्बा। जिसमें संस्मरणों जैसे अंश हैं। यात्रा-वृत्तांत हैं। कुछ पुश्तैनी दास्तां इतिहास मजाक के पुट, ढ्ढह्म्शठ्ठ4 शद्घ द्घड्डह्लद्ग (भाग्य की विडम्बनाएं) अपनों ने, अपनी जिंदगी ने जो हल किए- भाई हमने तो हिन्दुस्तान में ही जन्म लिया था, मगर वह पाकिस्तान बन गया, जैसी बातें। गोरों की दहशतगर्दी के साथ उनकी कुछ अच्छाइयां जैसे अनुशासन, वक्त की पाबंदी, इंसाफ, उपकार आदि-आदि सब कुछ ही शामिल कर लिया। ('थोड़ा यह भीÓ शीर्षक भूमिका, पृ. 7) आत्मकथा के इस प्रकृति-दर्शन में ही वस्तुत: वे सूत्र स्पष्ट हैं जो इसकी स्फीति और जहां-तहां पर्याप्त औपचारिक और स्थूल ब्यौरों की ओर भी संकेत करते हैं।
इन दोनों लेखकों की अपेक्षा रमेश उपाध्याय उम्र में छोटे तो हैं ही, उनके साथ विभाजन और साम्प्रदायिक हिंसा का वैसा कोई इतिहास भी जुड़ा नहीं है। अपने और अनेक समवयस्कों की तरह शताब्दी की इस भीषण त्रासदी को उन्होंने देखा और जाना जरूर है लेकिन उससे उनका कोई संबंध नहीं रहा। लेकिन इन लेखकों की तरह ही रमेश उपाध्याय का आरंभिक जीवन भी पर्याप्त कठिन और परिश्रमपूर्ण रहा है। अपने संघर्ष से ही उन्होंने सब कुछ पाया और प्राप्त किया है। लेकिन इस केन्द्रीय संघर्ष की समानता के बावजूद दोनों विस्थापित लेखकों और रमेश उपाध्याय के बीच एक बुनियादी अंतर है। विभाजन की स्मृतियों से आक्रान्त होने के कारण महीप सिंह और हरदर्शन सहगल जहां पंजाब से विस्थापित लाखों लोगों की तरह गांधी और दूसरे नेताओं के प्रति पर्याप्त कटु होने के साथ ही मुसलमानों को अपने कष्टों एवं संतापों का मूल कारक मानने की भावना से स्वयं को बचा नहीं पाते, रमेश उपाध्याय के साथ ऐसा कुछ नहीं है। स्वाधीनता और स्वाधीन देश की राजनीति से उनके असंतोष और विक्षोभ के कारण अधिक व्यापक और तार्किक हैं। इन तीनों में एक समान सूत्र यह भी लक्षित किया जा सकता है कि कठिन और विरोधी समय में परिवार की ऊष्मा और सहयोग ने ही उन्हें सहारा दिया है और बहुत सी कटुताओं एवं विषमताओं से उबारा है।
महीप सिंह का जन्म पंजाब के जेहलम जिले में एक गांव सराय आलमगीर-सराई में हुआ था। 1943 में अपने बड़े भाई किशन सिंह के विवाह में पहली और आखिरी बार वे वहां गए। सिखों में दुआवटी विवाह का चलन आम था। एक लड़का लो, एक लड़का दो। लड़का लेकर लड़की देना, पंजाब में पुण्य का संबंध समझा जाता था। पंजाब में लड़कियों का अनुपात कम होना ही वस्तुत:, कहीं न कहीं इस प्रथा के मूल में था। होने वाली भाभी कस्बा अलीबे$ग की थीं, जो जम्मू-कश्मीर राज्य में आता था। महीप सिंह उन सिखों में से हैं जो अविभाजित पंजाब में जन्म लेकर बाद में कभी खंडित पंजाब से समझौता नहीं कर सके। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और अन्य हिन्दुत्ववादी नेताओं के प्रति उनका स्वाभाविक झुकाव भी रहा। गुरु गोविंदसिंह और शिवाजी के प्रसंग में वे गुरुजी- माधवराव गोलवलकर से हुई अपनी बातचीत में उनके व्यवहार की आलोचना करते हैं। उस भेंट पर अपनी प्रतिक्रिया देते हुए उनकी टिप्पणी है, 'मैं उस समय बी.ए. का विद्यार्थी था। यह बात मुझे उसी समय लगी थी, जब किसी व्यक्ति का व्यक्तित्व बहुत महिमामंडित हो जाता है, लोग उसके हर शब्द को ब्रह्म शब्द मानकर स्वीकार करने लगते हैं, उसके अनुयायी उसके अंधभक्त हो जाते हैं, तो उसमें अहंकार और अहमन्यता का आ जाना स्वाभाविक है। गुरुजी इसके अपवाद नहीं है।Ó (कितनी धूप में कितनी बार, पृ. 25)
बाद में पंडित दीनदयाल उपाध्याय के सुझाव पर उन्होंने इस प्रसंग में एक पत्र भी गुरुजी को लिखा क्योंकि उन्होंने ही उन्हें गुरुजी से मिलवाया था। महीप सिंह ने लिखा है कि अगले वर्ष कानपुर आते पर एकान्त में बुलाकार गुरुजी ने महीप सिंह की बात को स्वीकार किया। इसी प्रकार 1984 में इंदिरा गांधी की हत्या के बाद, इंदिरा गांधी की प्रशंसा में सिख विरोधी दंगों को जनता का स्वाभाविक ज्वार बताए जाने पर महीप सिंह ने नानाजी देशमुख से अपना मतभेद प्रकट किया। पंजाब की भाषा नीति, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का 'हिन्दुत्वÓ, बाबरी-ध्वंस आदि मुद्दों पर वे संघ के नेताओं से अपने मतभेदों की चर्चा अवश्य करते हैं। लेकिन संघ और जनसंघ से अपने संबंधों को छिपाने का ढोंग वे नहीं करते। इस संबंध से राजनीतिक लाभ उठाने की बात भी वे स्वीकार करते हैं।
महीप सिंह की आत्मकथा उनके उस संघर्ष को सामने लाती है, जो पंजाब से उखड़कर उन्होंने अपनी पढ़ाई और नौकरी के लिए किया। जीवन के विविध अनुभव वस्तुत: उनके इस संघर्ष का ही प्रतिफल थे। नेताओं और राजनीतिक व्यक्तियों से उनका सम्पर्क, विदेश यात्राएं, व्याख्यान-मालाएं और सिख समाज में उनकी स्वीकृति और हैसियत वस्तुत: इसी का परिणाम है। साहित्य में महीप सिंह का प्रादुर्भाव नई कहानी आंदोलन के दौर में हुआ। उसमें समुचित स्वीकृति के अभाव में, प्रतिरोध स्वरूप उन्होंने सचेतन कहानी आंदोलन की शुरूआत की। पहले 'आधारÓ का सचेतन कहानी विशेषांक और फिर 'संचेतनाÓ नामक पत्रिका द्वारा उन्होंने इस आंदोलन को एक व्यापक मंच देने की कोशिश की। इस बीच लिखा उन्होंने पर्याप्त और प्राय: निरंतर, लेकिन सारे प्रयासों के बावजूद साहित्य में उन्हें वैसी स्वीकृति कभी नहीं मिली जैसी नई कहानी या उसके बाद उन्हीं के अनेक समकालीनों को मिली।
महीप सिंह की यह आत्मकथा उनके यात्रा-वृत्तान्तों का संग्रह भी है। जापान, दक्षिण अफ्रीका, कनाडा, ब्रिटेन, अमेरिका, सूरीनाम, मारिशस, स्वीडन आदि विभिन्न देशों की उनकी यात्राएं अधिकतर उनके राजनीतिक संपर्कों का ही परिणाम थीं। विश्व हिन्दी सम्मेलन या इसी प्रकार के अन्य आयोजनों में सरकारी प्रतिनिधिमंडल के एक सदस्य के रूप में इन यात्राओं के अनुभवों को वे प्राय: बहुत सपाट रूप में अंकित करते हैं।
अपने दाम्पत्य और पारिवारिक जीवन की सुरक्षा की दृष्टि से एक आम तरीका यह है कि विवाहेतर संबंधों की स्वीकृति एवं अंकन से भरसक बचा जाए। महीप सिंह अपने समकालीन राजकमल चौधरी वाले इस सूत्र को खारिज करते हैं कि असफल जीवन ही वस्तुत: सफल रचना का आधार होता है। अपने बम्बई प्रवास पर टिप्पणी करते हुए वे लिखते हैं, 'वहां मुझे बहुत मित्र और मित्रणियां मिल गए थे...Ó (वही, पृ. 155) लेकिन इन स्त्री मित्रों की चर्चा हमेशा वे अपने पारिवारिक एवं दाम्पत्य संबंधों की दृष्टि से एक सुरक्षित दूरी से करते हैं। जितने मुक्त भाव से वे दूसरों पर टिप्पणी करते हैं, स्वयं पर नहीं करते। चाहे स्वीडन की पुरुष जैसी शोध छात्रा विदुअस हो या जापान में कानपुर के दिनों के उनके मित्र रमेश माथुर, वे पर्याप्त मुखर दिखाई देते हैं। रमेश माथुर ने ही वस्तुत: उनके जापान भिजवाने की व्यवस्था की थी। तीस वर्ष का वह युवक जापान में अकेला रह रहा था जबकि उसकी पत्नी नीता दिल्ली में थी। इन सारी विषम और विपरीत स्थितियों को महीप सिंह नास्टेल्जिया की ढाल पर जीते दिखाई देते हैं। इसी तरह लक्ष्मीधर मालवीय के 'सुकृत्यों और विकृतियों के अद्भुत संयोगÓ की चर्चा वे पर्याप्त मुखरभाव से करते हैं कि अपनी सारी वैष्णव पृष्ठभूमि के साथ कैसे वे जापान में एक नितांत वर्जनामुक्त जीवन जी रहे थे।
महीप सिंह की यह आत्मकथा एक ऐसे व्यक्ति की आत्मकथा है जो युवा दौर का संघर्ष समाप्त करके अपने ढंग से एक संतुष्ट और सुखी जीवन जी रहा है- अपनी सारी भौतिक उपलब्धियों के बीच। नेताओं और राजनीतिक व्यक्तियों के सम्पर्क का लाभ तो वे लेते ही हैं, सिख धर्म की अपनी पहचान और पृष्ठभूमि का समुचित लाभ भी वे लेते हैं। काफी कुछ आत्ममुग्ध भाव से अपनी साफ-सुथरी और बेदा$ग छवि का आकलन ही यहां वे करते हैं। इस सबके बीच अपनी साहित्यिक उपलब्धियां, ग्रंथावली और अपने साहित्य पर हुआ कार्य। रचना और जीवन के लिए कैसे भी दुर्धर्ष संघर्ष एवं तनाव की अपेक्षा इसमें सिद्धावस्था की उपलब्धियां ही अधिक महत्वपूर्ण हैं।
महीप सिंह की तरह हरदर्शन सहगल की पैदाइश भी भारत के उस क्षेत्र की है जो अब पाकिस्तान में है। उनके पिता रेलवे में नौकर थे और एक चचेरे भाई चरणजीत सहगल $फौज में थे। 6 अगस्त सन् 1945 को जब अमेरिकी एटम बम हिरोशिमा पर गिराया गया, वह जापान में ही थे। वह 48 के अंत या 49 के शुरू में लौटे थे। पिता जेसूलाल सहगल की उर्दू डायरी में दर्ज सूचना के अनुसार हरदर्शन का जन्म 26 फरवरी 1935 को कुइंया जिला मियांवाली में हुआ। जब देश का बंटवारा हुआ हरदर्शन की उम्र कोई बारह वर्ष की थी। उनका मूल निवास करोड़ लालीसन जिला मुजफ्फरगढ़ था।
एक आत्मकथा के तौर पर 'डगर डगर पर मगरÓ बहुत ढीली-ढाली गठरी की तरह है जिसे पाठकों के साथ स्वयं लेखक को उठाने का अहसास भी शुरू से आखिर तक बना रहता है। इस अकारण स्फीति और अनावश्यक विस्तार के सूत्र भी, कहीं न कहीं लेखक की रचना प्रक्रिया में ही आसानी से मिल जाते हैं, 'मैंÓ बार-बार अपने को रोककर, अपने आपको बिल्कुल अपने बचपन से ही अभिव्यक्त करना चाहता हूं। पर करूं क्या, इस आयु तक पहुंचते-पहुंचते मेरे पास स्मृतियों का भंडार आ जमा हुआ है जो एक-दूसरे को पीछे धकेल-धकेलकर खुद आगे आना चाहता है। मेरी यादें, जब से मैंने होश संभाला मेरे तन-मन में किसी चित्र की भांति अंकित हैं...Ó (डगर डगर में मगर, संस्करण 2014, पृ. 30) जैसा कि हरदर्शन सहगल ने जहां-तहां संकेत किया है, उनकी अच्छी याददाश्त भी संकट पैदा करती है। अपने साथ घटित और अपनी लंबी जीवनावधि में संपर्क में आए व्यक्तियों में से बहुत कुछ को वे भुला नहीं सके हैं। वह सब गडमड होकर उनके लिए चुनाव और अभिव्यक्ति का संकट पैदा करते हैं। एक लेखक के रूप में उनका मुख्य संकट संग्रह और त्याग का है। बहुत सी छूटी जगहों को वे भावुक प्रलाप की शैली में भरने और पूरने की कोशिश करते हैं, 'बातें आगे दौड़ती हैं। मैं फिर वापस लौटता हूं। हाय मेरे किला शेखुपुरा। मैं फिर तुझे देखने को तरसता हूं। विभाजन के बाद फिर तुझे देख न पाया। वहां की गलियां, वहां के कूचे, वहां के छोटे-बड़े बाजार, हमारे मकान के सामने का बड़ा चौक। वहां पर बना अखरोट-बादामों के छिलकों से बनते बटनों का कारखाना। बड़े-बड़े कड़ाहों में साबुत प्याज, आलुओं, बैगनों के तलते पकौड़े, वैसे फिर कभी न देख पाया ओह, वहां की हिरण मिनार। और किला?Ó (वही पृ. 60)
जिस उम्र में हरदर्शन सहगल ने विभाजन और विस्थापन की त्रासदी को भोगा, जीवन भर उसका प्रभाव बना रहना स्वाभाविक था। 22 जुलाई सन् 47 को तबादले के कारण उनके पिता ने मुलतान जाकर चार्ज लिया। 9 सितंबर को पाकिस्तान की नौकरी से मुक्त होकर उन्हें सपरिवार भारत जाना था। लेकिन सुरक्षित गाड़ी की व्यवस्था में समय लगा। बच्चों को लेकर मुलतान से अमृतसर तक आठ घंटे का सफर चार दिन में पूरा हुआ। इसी भटकन और समुचित ठिए की तलाश में अपनी किशोरावस्था का बड़ा हिस्सा हरदर्शन का बरेली में भी बीता। बरेली के गली-कूचे, रेलवे कालोनी, स्कूल और पड़ोस के संगी-साथी हरदर्शन सहगल की आत्मकथा में एक बड़ी जगह छेंकते हैं। विभाजन के अपने अनुभवों एवं इसी दौर की स्मृतियों को आधार बनाकर उन्होंने 'टूटी हुई जमीनÓ शीर्षक से एक उपन्यास भी लिखा। उनके इस उपन्यास में उन्हीं की उम्र के एक किशोर द्वारा इस समूचे घटनाक्रम को देखा गया- विषाद, विपदाओं और विषम परिस्थितियों के बीच परिवार को संघर्ष करते हुए। विभाजन की इस केन्द्रीय घटना को यदि छोड़ दिया जाए तो उपन्यास अपने कथ्य और संवेदना में काफी कुछ भीष्म साहनी के 'झरोखेÓ (1966) के निकट है। लेकिन जितनी सहजता एवं संवेदनाजन्य सघनता के साथ 'झरोखेÓ की कथा कही गई है 'टूटी हुई जमीनÓ में वैसा नहीं हो सका है। स्मृति की सांद्रता और अनुभव की सघनता को घुलाकर हरदर्शन सहगल वह रसायन तैयार नहीं कर सके हैं, जिसके रचाव से ही रचना जीवंत और प्राणवान बनती है। हरदर्शन सहगल की यह आत्मकथा, आत्मकथा के ढांचे से बाहर जाकर विभिन्न विधाओं के एक कोलॉज के रूप में सामने आती है। इसमें लेखकों के संस्मरण हैं, यात्रा-वृत्तांत हैं, समकालीन रचनात्मक परिदृश्य पर उनकी टिप्पणियां हैं- पर्याप्त मुखर, स्पष्ट और बेबाक। बिना किसी लाग-लपेट के उन्होंने व्यक्तियों और रचनाओं पर अपना अभिमत प्रकट किया है, जिसमें एक टटकापन भी लक्षित किया जा सकता है। से.रा.यात्री के प्रसंग में उनकी इस टिप्पणी को देखा जा सकता है, '...मेरा निष्कर्ष यही है कि कोई अगर चाहे भी तो दूसरे की तरह नहीं बन सकता। यात्री जी दो महीनों तक अश्क जी के पास इलाहाबाद कसौली वगैरह रह आते थे। बम्बई की साहित्यिक यात्राएं, लखनऊ, कानपुर, बरेली, भोपाल और न जाने कहां-कहां की गोष्ठियों, समारोहों में पैसे की तंगी के बावजूद जा पहुंचते थे। शिमला, गिरिराज किशोर के यहां आदि। फिर विभूति नारायण जहां-जहां, यात्री जी वहां-वहां। कोई जगह नहीं छोड़ी। अपनी-अपनी आदत, सोच की बात है...Ó (वही पृ. 316) लेकिन इस सबकी तुलना में जब वे विस्तारपूर्वक अपने वैसा कुछ न करने का प्रगल्भ उदाहरण स्वयं देने लगते हैं, उसका सारा रंग उतर जाता है।
कभी-कभी अपने समकालीनों पर की गई ये टिप्पणियां उनसे अधिक स्वयं लेखक को खोलती है। मन्नू भंडारी की आत्मकथा 'एक कहानी यह भीÓ पर हरदर्शन सहगल की टिप्पणी है, 'इन दिनों मन्नू भंडारी जी की निहायत सादगी से लिखी खूबसूरत जीवनी पढ़ रहा हूं पर उसमें साहित्य की ही भरमार है। मुझ जैसे अनाड़ी को यह सोच जरूर आती है कि क्या यह मात्र लेखकों के लिए उनके भोड़ेपन या उनके कुछ अच्छे सरोकारों पर ही केन्द्रित होकर नहीं रह गई। दुनिया में अलेखकों की संख्या ही ज्यादा होती है। उनके दुख-दर्द प्रताडऩाएं आदि को क्या साहित्यकार जैसा श्रेष्ठ दर्जा पाने वाला अनदेखा कर सकता है। क्या सारी की सारी दुनिया मात्र लेखकों की दुनिया है। उनके ही अभावों, उनकी ही उठापटक के सरकसों में रमे रहने वालों की दुनिया...Ó (वही पृष्ठ 423/424) हरदर्शन सहगल की यह टिप्पणी मन्नू भंडारी की 'एक कहानी यह भीÓ की वास्तविक पृष्ठभूमि और प्रयोजन से तो अपनी अनभिज्ञता प्रकट करती ही है जाने-अनजाने वह लेखक की अपनी आत्मकथा का सूत्र भी हमें पकड़ा देती है। परिवार का बचाव और संरक्षण रचना के लिए बेहद जरूरी है लेकिन परिवार और परिजनों की भावनात्मक सफलता ही कैसे भी स्थूल और प्रत्यक्ष उल्लेख के बिना भी अपनी उपस्थिति से किसी रचना को रस-रूप और गति देती है। इसी तरह जब वे लेखकीय स्वाभिमान के नाम पर किसी विचारधारा के पास न जाने की बात करते हैं तब प्राय: ही अदृश्य रूप से उनका झुकाव हिन्दुत्ववादी शक्तियों के प्रति उतना मुखर न होने पर भी वामपंथी विचार और सोच से बचाव का अवश्य रहता है।
रमेश उपाध्याय इन दोनों से भिन्न घोषित रुप से माक्र्सवादी लेखक हैं। अपनी आत्मकथा 'मेरा मुझमें कुछ नहींÓ को वे आत्मकथात्मक और साहित्यिक विमर्श के रूप में प्रस्तुत करते हैं। इसकी परिकल्पना उक्त दोनों आत्मकथाओं के आधारभूत बिखराव के बावजूद किसी व्यवस्थित रूप में लिखित एवं परिकल्पित आत्मकथा का नहीं है। इसके अध्यायों को स्वतंत्र लेखों के रूप में भी पढ़ा जा सकता है। परिवार और परिजन रमेश उपाध्याय के लिए भी कम महत्व नहीं रखते। उन्होंने अपने संघर्ष के बीच पौड़े और पनपे प्रेम और फिर पत्नी की भूमिका का भी स्पष्ट उल्लेख किया है। जैसा कि उनकी इस आत्मकथा के शीर्षक से ही ध्वनित है वे बहुत विनम्रतापूर्वक अपने निर्माण एवं विकास में दूसरों की दृश्य-अदृश्य भूमिका को स्वीकार करते हैं। परिवार का रचनात्मक, संघर्षपूर्ण और जनतांत्रिक स्वरूप कैसे व्यक्ति से अधिक सामूहिक विकास की जमीन तैयार करता है रमेश उपाध्याय की इस आत्मकथा को पढ़कर इसे भी समझा जा सकता है।
रमेश उपाध्याय के निर्माण एवं विकास में अजमेर की एक विशिष्ट भूमिका रही है। पारिवारिक परिस्थितियों के कारण उत्तरप्रदेश में एटा-हाथरस में अपनी पढ़ाई अधूरी छोड़कर वहीं उन्होंने प्रेस में पहली नौकरी की जिसने उनके आगे लेखक के रूप में पहचान की राह बनाई। अजमेर में बहुत कुछ ऐसा है जो विभिन्न कारणों से लोगों को आकृष्ट करता है। शहर से अपने भावनात्मक लगाव का सूत्र देते हुए रमेश उपाध्याय लिखते हैं- कोई शहर अपनी खूबसूरत जगहों के कारण नहीं, बल्कि इस कारण खूबसूरत लगता है कि आप अपने ढंग से उसमें कोई नई खूबसूरती खोज निकालते हैं। (मेरा मुझमें कुछ नहीं, संस्करण 2013, पृ. 20)।
तब अजमेर से निकलने वाली नवलेखन की पत्रिका 'लहरÓ की एक खास पहचान थी। उसकी संपादिका मनमोहिनी स्वयं कवयित्री थीं। राजनीति में वे और प्रकाश जैन, लोहियावादी थे। रमेश बक्षी, राजकमल चौधरी आदि लेखकों से 'लहरÓ के पारिवारिक संबंध थे। रमेश उपाध्याय का भी 'लहरÓ और उसके परिवार से जुडऩा स्वाभाविक था। लेकिन जोधपुर में तैयार उनके कविता संग्रह 'अनिश्चित यात्राएंÓ के साथ घटित हादसा उनके युवकोचित उत्साह पर अंगार वर्षा जैसा था। इस संपादक-दम्पति के संसर्ग में आकर ही वस्तुत: उन्हें पुस्तकों की सुविधा और सलीका मिला था। मनमोहिनी के प्रति वे अपने कैशोर्य सम्मोहन को भी छिपाते नहीं हैं। नेहरू की मृत्यु पर नेहरू-युग की समाप्ति के साथ ही रमेश उपाध्याय का अजमेर-युग भी समाप्त होता है।
पत्रकारिता और साहित्य के अपने दीर्घ और सघन अनुभव को रमेश उपाध्याय, काफी कुछ उसी तरह अपने पाठकों के लिए प्रस्तुत करते हैं जैसे कभी उपेन्द्रनाथ अश्क ने युवा लेखकों के लिए 'कभी... कुछ दूसरों के लिएÓ लिखी थी। पत्रिका के संपादन के प्रसंग में, अभ्यास के तौर पर घर को ही वे सर्वश्रेष्ठ क्षेत्र मानते हैं। 'कथनÓ और 'युग-बोधÓ को वे इसके उदाहरण के रूप में प्रस्तुत करते हैं। उनके संरक्षण एवं निर्देशन में 'कथनÓ आज भी एक नियमित और विशिष्ट पहचान वाली पत्रिका है। साहित्य रचनात्मक हो या आलोचनात्मक, रमेश उपाध्याय की दृष्टि में सामान्य पाठकों को ही संबोधित होता है। राजनीति और साहित्य, साहित्य की दलगत पक्षधरता, प्रेमचंद की परम्परा और आज के लेखक के लिए उसका अर्थ आदि सवालों पर वे सीधी सरल भाषा में अपना अभिमत प्रकट करते हैं। चूंकि पिछले चालीस से भी अधिक वर्षों से वे रचना और आलोचना दोनों में समान रूप से सक्रिय हैं, आलोचना से वे कुछ अपेक्षाएं रखते हैं और अपने प्रसंग में भरसक व स्वयं उन पर अमल की कोशिश करते हैं। ऐसी ही एक अपेक्षा का उल्लेख करते हुए वे लिखते हैं, 'मैं अच्छा आलोचक उसे मानता हूं जो रचना की किसी ऐसी खूबसूरती पर ऊंगली रख सके जिसे साधारण पाठक गूंगे के गुड़ की तरह महसूस तो करते हैं पर लिख-बोलकर बता न सकते हों। जो आलोचक यह काम कर सकता है, वह रचना में लाखों कमियां बता सकने वाले आलोचक से बड़ा आलोचक है। ऐसा आलोचक लेखकों को लिखना और पाठकों को पढऩा भी सिखा सकता है...Ó (वही पृ. 52)
रमेश उपाध्याय की आत्मकथा 'मेरा मुझमें कुछ नहींÓ महीप सिंह और हरदर्शन सहगल की आत्मकथाओं की तरह वैसी व्यवस्थित आत्मकथा के रूप में लिखित नहीं है। इसमें स्मृतियों और अनुभव की भूमिका है, घर-परिवार, प्रेम और विवाह के साथ आसपास की दुनिया भी है। अपने अनुभव और विचार के आधार पर रमेश उपाध्याय सब कहीं हस्तक्षेप करते हैं। वे अपने ढंग से अपना तर्क देते हैं, आरोपण और फतवे से भरसक बचते हुए। कैसी भी आत्ममुग्धता से वे अपने को बचाते हैं। एक जनतांत्रिक समाज में साहित्य और कला की भूमिकाओं को स्पष्ट करते हुए वे उसमें जनता के स्वरूप और स्थिति को भी परिभाषित करते हैं। भूमंडलीकरण और सर्वग्रासी पूंजीवाद के इस दौर में साहित्य और विचार में ही उन्हें मनुष्य और उसके भविष्य की संभावनाएं दिखाई देती है।