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Tuesday 21 Nov 2017

निरंतर विकासमान यथार्थवाद के रचनाकार भीष्म साहनी


रमेश उपाध्याय
107, साक्षरा अपार्टमेंट्स,
ए-3, पश्चिम विहार, नयी दिल्ली-110063
मो. 09818244708

(साहित्य अकादमी के द्वारा आयोजित भीष्म साहनी जन्म शतवार्षिकी समारोह के अवसर पर 8 अगस्त, 2015 को दिया गया बीज वक्तव्य
ध्यक्ष महोदय, मंच पर विराजमान अन्य महानुभाव तथा सभागार में उपस्थित मित्रो,
सबसे पहले तो मैं भीष्म साहनी जी की स्मृति को प्रणाम करता हूँ, जिनकी जन्म शतवार्षिकी मनाने के लिए आज यहाँ हम सब एकत्र हुए हैं। फिर मैं साहित्य अकादमी को धन्यवाद देता हूँ, जिसने मुझे भीष्म साहनी पर विनिबंध लिखने का काम सौंपकर मुझे एक बार भीष्म जी को फिर से पढऩे का और यहाँ उनके बारे में कुछ कहने का अवसर दिया।
मित्रो,
   भीष्म जी मुझसे उम्र में सत्ताईस साल बड़े थे, और बड़े लेखक तो थे ही, फिर भी वे मेरे मित्र थे, अग्रज मित्र, बड़े भाई जैसे मित्र। हमारी मित्रता 1974 में शुरू हुई। उस समय हम दोनों दिल्ली विश्वविद्यालय के दो अलग-अलग कॉलेजों में पढ़ाते थे। भीष्म जी अंग्रेजी पढ़ाते थे, मैं हिंदी पढ़ाता था। मैं 1973 में नया-नया प्राध्यापक बना था, जबकि वे 1975 में रिटायर हो जाने वाले थे। लेकिन उम्र का इतना बड़ा फर्क होते हुए भी तब तक हमारी साहित्यिक स्थिति बहुत भिन्न नहीं थी। 1974 में जब हम व्यक्तिगत रूप से मिले, तब तक उनके भी तीन उपन्यास आये थे ('झरोखेÓ, 'कडिय़ाँÓ और 'तमसÓ) और मेरे भी तीन ही उपन्यास आये थे ('चक्रबद्धÓ, 'दंडद्वीपÓ और 'स्वप्नजीवीÓ)। उनके तब तक चार कहानी संग्रह आ चुके थे ('भाग्य-रेखाÓ, 'पहला पाठÓ, 'भटकती राखÓ और 'पटरियाँÓ), जबकि मेरे दो ही आ पाये थे ('जमी हुई झीलÓ और 'शेष इतिहासÓ)। लेकिन तब तक उन्होंने नाटक एक भी नहीं लिखा था, जबकि मेरे दो नाटक ('पेपरवेटÓ और 'भारत-भाग्य-विधाताÓ) मंचित और चर्चित हो चुके थे।
व्यक्तिगत परिचय होने से पहले ही हम लेखक और संपादक के रूप में एक-दूसरे से जुड़ चुके थे। हमें जोडऩे वाले थे हमारे एक कहानीकार मित्र डॉ. रामजी मिश्र। वे भीष्म जी वाले कॉलेज में हिंदी पढ़ाते थे और मेरे राणा प्रताप बाग वाले मकान से थोड़ी ही दूरी पर मलकागंज में रहते थे। वे अक्सर मुझसे मिलने मेरे घर आया करते थे और भीष्म जी के बारे में अक्सर बातें किया करते थे।
एक दिन उन्होंने बताया कि उनके कॉलेज की पत्रिका इस बार एक नयी योजना के साथ एक संकलन के रूप में निकलने जा रही है, जिसके मुख्य संपादक भीष्म साहनी होंगे। यह संकलन 'आधुनिक हिंदी उपन्यासÓ के नाम से पुस्तक रूप में प्रकाशित होगा। योजना यह है कि चुने गये उपन्यासों पर दो-दो लेख दिये जायेंगे। एक लेख उपन्यास की रचना से संबंधित संस्मरणात्मक लेख होगा, जो स्वयं उपन्यासकार द्वारा लिखा जायेगा और दूसरा लेख उस उपन्यास पर किसी दूसरे लेखक या आलोचक का होगा। मैं यह सुनकर चौंक गया कि उस संकलन में चर्चा के लिए जो उपन्यास चुने गये हैं, उनमें मेरा उपन्यास 'दंडद्वीपÓ भी है। मैंने मिश्र जी से पूछा, ''भीष्म जी ने मेरा उपन्यास पढ़ा है?ÓÓ मिश्र जी ने बताया कि भीष्म जी को मेरा यह उपन्यास बहुत पसंद है और उन्होंने ही इसे संकलन में शामिल करने का सुझाव दिया है। यह सुनकर मैं रोमांचित-सा हो उठा। मेरे लिए यह बहुत बड़ी बात थी कि भीष्म जी मेरी रचनाएँ पढ़ते हैं और पसंद करते हैं।
उसी बातचीत के दौरान रामजी मिश्र ने मुझसे कहा, ''आप इस संकलन के लिए 'दंडद्वीपÓ पर अपना संस्मरणात्मक लेख तो लिखें ही, भीष्म जी के उपन्यास 'तमसÓ पर एक आलोचनात्मक लेख भी लिखें।ÓÓ मैंने कहा, ''मैं 'तमसÓ पर जरूर लिखना चाहूँगा, पर यह देख लीजिए कि इससे आपके संकलन में असंतुलन तो पैदा नहीं होगा? मेरे उपन्यास पर एक मेरा लेख, फिर उस पर एक आलोचक का लेख, और ऊपर से 'तमसÓ पर मेरा लेख ! क्या यह ठीक होगा?ÓÓ मिश्र जी ने कहा, ''इसकी चिंता आप मत कीजिए, आप दोनों लेख लिख दीजिए। कुछ लोगों के दो-दो लेख उस पुस्तक में रहेंगे। स्वयं भीष्म जी 'तमसÓ पर अपना संस्मरणात्मक लेख लिखने के अलावा इब्राहीम शरीफ  के उपन्यास 'अँधेरे के साथÓ पर लिख रहे हैं।ÓÓ
इस प्रकार भीष्म साहनी, रामजी मिश्र और भगवती प्रसाद निदारिया द्वारा संपादित पुस्तक 'आधुनिक हिंदी उपन्यासÓ में मेरे उपन्यास पर मेरा और राजकुमार शर्मा का तथा भीष्म जी के उपन्यास पर भीष्म जी का और मेरा लेख छपा। लगभग साढ़े पाँच सौ पृष्ठों की उस पुस्तक में प्रेमचंद से लेकर मेरी पीढ़ी तक के महत्त्वपूर्ण उपन्यासों पर दो-दो लेख दिये गये थे। पुस्तक 1974 में ही तैयार हो गयी थी, लेकिन प्रकाशित 1976 में हुई।
भीष्म जी से मेरा व्यक्तिगत परिचय 'तमसÓ पर लेख लिखने के बाद हुआ। किसी साहित्यिक आयोजन में हम मिले थे। मैंने उन्हें प्रणाम करते हुए अपना नाम बताया, तो उन्होंने आगे बढ़कर मुझे गले लगाया और मेरी पीठ थपथपाते हुए कहा, ''ताज्जुब है, हम पहले क्यों नहीं मिले!ÓÓ
1974 में ही मैंने आनंद प्रकाश और राजकुमार शर्मा के साथ 'युग-परिबोधÓ नामक साहित्यिक पत्रिका निकाली और उसके प्रवेशांक के लिए भीष्म जी से कहानी माँगने उनके पटेल नगर वाले घर गया। कहानी मिलने की उम्मीद कम ही थी। क्या इतना बड़ा लेखक यह जाने बिना कि पत्रिका कैसी निकलेगी, प्रवेशांक के लिए अपनी कहानी देगा? मैंने घंटी बजायी, तो भीष्म जी की पत्नी शीला साहनी ने दरवाजा खोला। मेरा नाम सुनते ही उन्होंने कहा, ''आइए-आइए, भीषम आपकी बड़ी तारीफ करते हैं। पहले आपकी कहानियाँ खुद पढ़ते हैं, फिर मुझे पढ़वाते हैं।ÓÓ मुझे बैठक में बिठाकर उन्होंने भीष्म जी को पुकारा। भीष्म जी अंदर से निकलकर आये। मैंने नमस्कार करने के लिए हाथ जोड़े, पर उन्होंने हाथ मिलाया और खींचकर अपने पास बिठा लिया। शीला जी चाय बनाने के लिए उठने लगीं, तो भीष्म जी ने उनसे पंजाबी में कहा, ''तू इनसे बातें कर, चाय मैं बनाकर लाता हूँ।ÓÓ और जब तक भीष्म जी चाय बनाकर लाये, शीला जी मुझसे मेरे घर-परिवार के बारे में पूछती रहीं। मुझे लगा ही नहीं कि मैं उनसे पहली बार मिल रहा हूँ। चाय पीते समय मैंने 'युग-परिबोधÓ की योजना बतायी और भीष्म जी से उसके लिए कहानी माँगी। जब उन्होंने ''हाँ-हाँ, जरूरÓÓ कहा, तो मुझे विश्वास नहीं हुआ। लेकिन कुछ ही दिन बाद डाक से उनकी कहानी आ गयी। वह कहानी थी 'खँडहरÓ, जो 'युग-परिबोधÓ के प्रवेशांक में छपी।
इसी प्रकार 1980 में मैंने अपनी द्वैमासिक पत्रिका 'कथनÓ के प्रवेशांक के लिए भीष्म जी से कहानी माँगी। इस बार भी उन्होंने मुझे निराश नहीं किया और 'सड़क परÓ शीर्षक उनकी कहानी 'कथनÓ के प्रवेशांक (जुलाई-अगस्त, 1980) में छपी। कहानी के साथ जो पत्र उन्होंने भेजा था, उसमें 'कथनÓ के प्रकाशन पर खुशी जाहिर करते हुए उन्होंने लिखा था, ''मेरी हार्दिक शुभकामनाएँ। हाँ, पत्रिका सामान्य पाठक के लिए प्रेरणापूर्ण हो, बोझिल और किताबी न हो।ÓÓ मैं स्वयं भी यही चाहता था, इसलिए मुझे उनकी बात से बल मिला और मैंने उनकी यह बात हमेशा के लिए गाँठ बाँध ली।
वैचारिक स्तर पर हम एक-दूसरे के साथी थे, किंतु लेखक संगठनों के स्तर पर हम भिन्न थे। मैं कभी किसी पार्टी का सदस्य नहीं रहा, लेकिन जनवादी लेखक संघ का संस्थापक सदस्य होने के साथ-साथ उसकी केंद्रीय कार्यकारिणी का सदस्य भी था। उधर भीष्म जी बाकायदा भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के सदस्य थे और प्रगतिशील लेखक महासंघ के महासचिव। इसी नाते उन्होंने इमरजेंसी का समर्थन किया था, जबकि मैंने उसका विरोध किया था। एक बार इस पर हम दोनों के बीच एक तीखी बहस भी हुई थी। लेकिन इससे हमारे व्यक्तिगत संबंधों पर कोई आँच नहीं आयी। भीष्म जी मुझसे जब भी मिलते, पहले जैसे प्रेम से ही मिलते। कनॉट प्लेस के कॉफी हाउस में अक्सर उनसे मेरी भेंट और बातचीत हो जाती थी, जहाँ वे अक्सर शीला जी के साथ आया करते थे।
यहाँ रवींद्र भवन में भी, साहित्य अकादमी की लाइब्रेरी में भी वे अक्सर मुझे मिल जाते थे। मिलते ही हम दोनों लाइब्रेरी से निकल आते। बाहर खड़े-खड़े एक-एक सिगरेट पीते, एक-दूसरे का हालचाल पूछते, कुछ गपशप करते, तब वापस लाइब्रेरी में जाते।
भीष्म जी बहुत ही सहज और सरल स्वभाव के व्यक्ति थे। बहुत आत्मीयतापूर्ण, स्नेहशील, हँसमुख और मिलनसार। लेकिन प्रेम प्रकट करने का उनका अपना एक खास नाटकीय अंदाज था। मसलन, मैं उनसे हाथ मिलाने के हाथ आगे बढ़ाता, तो वे सीधे अपना हाथ आगे बढ़ाने के बजाय हाथ को पीछे ले जाकर एक वर्तुल बनाते हुए नीचे लाकर बड़े नाटकीय ढंग से हाथ मिलाते। या सिगरेट पीने के लिए जब हम दोनों अपनी-अपनी जेब से सिगरेट-माचिस निकालते, तो भीष्म जी मेरी वाली सिगरेट पीते और अपनी वाली मुझे पिलाते। वे हमेशा गंभीर बातें ही नहीं करते थे, किस्से और चुटकुले भी सुनाते थे। हँसते थे और हँसाते भी थे। वे उम्र का भेद भुलाकर हमेशा बराबरी के स्तर पर बात करते थे, कभी अपना बड़प्पन नहीं जताते थे।
'कथनÓ को भीष्म जी का सहयोग बराबर मिलता रहा। बीस अंक निकालने के बाद कुछ अपरिहार्य कारणों से मुझे 'कथनÓ का प्रकाशन स्थगित करना पड़ा था। लेकिन भीष्म जी ने यह जानते हुए भी कि बीसवें अंक के बाद 'कथनÓ का प्रकाशन स्थगित होने जा रहा है, उन्नीसवें अंक (जुलाई-सितंबर, 1983) के लिए अपनी कहानी 'संभल के बाबूÓ दी, जो बहुत चर्चित हुई और उनकी श्रेष्ठ कहानियों में गिनी जाती है।
'कथनÓ का प्रकाशन पंद्रह वर्षों तक स्थगित रहा, लेकिन भीष्म जी और शीला जी से मेरा मिलना-जुलना बदस्तूर जारी रहा। मेरी कोई नयी पुस्तक आती या कहीं कोई रचना छपती, तो मैं उस पर भीष्म जी की राय के साथ-साथ शीला जी की राय भी चाहता, क्योंकि भीष्म जी तो अपने साधु स्वभाव के कारण मिठबोले ही बने रहते, पर शीला जी अपनी राय बेधड़क व्यक्त करतीं। 'कथनÓ का पुनप्र्रकाशन शुरू होने पर उसके इक्कीसवें अंक का लोकार्पण करने के लिए मैंने भीष्म जी को बुलाया। भीष्म जी ने पहले 'हाँÓ कर दी थी, जिसके आधार पर हमने निमंत्रण पत्र में उनका नाम छाप दिया था। लेकिन कार्यक्रम के एक दिन पहले उनका फोन आया कि शीला जी अस्वस्थ हैं, इसलिए वे नहीं आ सकेंगे। हम लोग बड़े दुखी हुए। लेकिन थोड़ी देर बाद ही शीला जी का फोन आया। बोलीं, ''भीषम ने मना तो कर दिया, पर अब बड़े उदास बैठे हैं। मैंने इनसे कहा है कि हमें जरूर चलना चाहिए। आप इनसे बात कर लीजिए।ÓÓ और भीष्म जी ने कहा कि वे आयेंगे। इस प्रकार भीष्म जी तो आये ही, अस्वस्थता के बावजूद शीला जी भी उस कार्यक्रम में आयीं।
मेरे और भीष्म जी के स्नेह सूत्र को अटूट बनाये रखने में शीला जी का भी बड़ा हाथ था। उनका भी मुझे भरपूर स्नेह मिला। आज मैं उन दोनों का स्नेह-पात्र होने के कारण बहुत धन्य और गौरवान्वित महसूस करता हूँ।
मित्रो,
    कई दिनों से मैं सोच रहा था कि भीष्म जी की जन्मशतवार्षिकी मनाने का सबसे अच्छा तरीका क्या हो सकता है। मैं जानता हूँ कि इस अवसर पर हम लोग उन्हें याद करेंगे, उनके व्यक्तित्व और कृतित्व की चर्चा करेंगे, उनकी कृतियों का मूल्यांकन तथा पुनर्मूल्यांकन करेंगे। लेकिन मुझे लगता है कि हमें ऐसा भी कुछ करना चाहिए, जिससे यह आयोजन एक औपचारिकता, एक रस्म-अदायगी बनकर न रह जाये। सोचते-सोचते अचानक मुझे भीष्म जी के कुछ शब्द याद आये, जो उन्होंने अपनी आत्मकथा 'आज के अतीतÓ में लिखे हैं। उन्होंने लिखा है:
''हमारे यहाँ, हमारे देश की सांस्कृतिक विरासत में, किसी व्यक्ति की महानता को आँकने की एक कसौटी है, जो मेरी नजर में बड़ी विलक्षण है। हम किसी व्यक्ति की विलक्षणता को इस आधार पर नहीं आँकते कि वह जीवन में क्या बन पाया, परंतु इस आधार पर कि वह क्या दे पाया। जिन लोगों को हम याद करते हैं, वास्तव में हम उनकी देन को याद करते हैं, उनकी देन के परिप्रेक्ष्य में उन्हें बड़ा मानते हैं। शायद इसीलिए हमारी 'सम्मान तालिकाÓ में पराक्रमी राजा-महाराजा, बड़े-बड़े धनकुबेर न होकर कवि-संत, पीर-फकीर अधिक होते हैं। और हम उनके प्रति श्रद्धानत होते हैं।ÓÓ  
उनके इन शब्दों को याद करते हुए मैं सोचता हूँ: भीष्म जी की देन क्या है? उन्होंने हमें क्या दिया? हमारे साहित्य को क्या दिया?
भीष्म जी ने हमारे साहित्य को बहुत दिया है-कहानियों के रूप में, उपन्यासों के रूप में, नाटकों के रूप में। इतना ही नहीं, अपने बहुमुखी व्यक्तित्व के कारण उन्होंने हमारे साहित्य के साथ-साथ हमारी संस्कृति को भी समृद्ध किया है-'इप्टाÓ के रंगमंच पर सक्रिय रहकर जन-नाटकों और जन-गीतों के जरिये जन-चेतना जगाते हुए। प्रगतिशील लेखक संघ में सक्रिय रहकर राष्ट्रीय स्तर पर लेखकों को संगठित करते हुए, प्रगतिशील साहित्य के आंदोलन को आगे बढ़ाते हुए। अफ्रो-एशियाई लेखक संघ में सक्रिय रहकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर साहित्य के जरिये शांति, सद्भाव और विश्वबंधुत्व की भावनाएँ जगाते हुए। और अंतत: फिल्म अभिनेता के रूप में हिंदी सिनेमा में भी अपना महत्त्वपूर्ण योगदान करते हुए। लेकिन उनका मुख्य कार्य-क्षेत्र साहित्य-सृजन ही था और एक प्रगतिशील साहित्यकार के रूप में उन्होंने अपनी रचनाओं के साथ-साथ अपने व्याख्यानों, वक्तव्यों, साक्षात्कारों आदि के जरिये एक नये ढंग की साहित्यिक समझदारी भी पैदा की।
भीष्म साहनी जिस तरह अपने लेखन में यथार्थवादी थे, उसी तरह अपने जीवन में भी यथार्थवादी थे। वे यथार्थवाद और रूमानीपन का अंतर भली भाँति समझते थे। रूमानी व्यक्ति भावुक होता है, वह क्रांतिकारी राजनीति की तरफ  बड़े जोश के साथ आता है, लेकिन तनिक-सा झटका लगते ही उसका मोहभंग हो जाता है। अगर वह झटका सोवियत संघ के विघटन जैसा बड़ा झटका हो, तब तो कहना ही क्या! भीष्म जी इस मामले में कैसे और कितने यथार्थवादी थे, इसका बड़ा विचारोत्तेजक विवेचन प्रसिद्ध समाजशास्त्री पूरन चंद जोशी ने अपनी पुस्तक 'यादों से रची यात्राÓ में किया है। भीष्म जी ने 'उद्भावनाÓ पत्रिका के कैफी आजमी विशेषांक के लिए एक लेख लिखा था 'कैफी आजमी की याद मेंÓ। जोशी जी ने उसे विस्तार से उद्धृत करते हुए लिखा है:
''प्रश्न उठता है भीष्म जी सोवियत क्रांति से पैदा हुई सोवियत व्यवस्था के विघटन और विलोप की स्थिति से किस प्रकार वैचारिक और भावनात्मक स्तर पर जूझने की कोशिश करते हैं। क्या समाजवाद के मूल स्वप्न, लक्ष्य और विचार से ही उनका उसी प्रकार मोहभंग हो गया, जैसे उनके घनिष्ठ मित्र और किसी जमाने के कम्युनिस्ट साथी निर्मल वर्मा का हो गया था? स्मरण रहे, सोवियत व्यवस्था के विघटन से पहले ही पूर्वी यूरोप प्रवास के दौरान इस व्यवस्था की कुछ गंभीर विकृतियों के अनुभव ने निर्मल वर्मा को इस रूसी प्रयोग और व्यवस्था की भयावह विकृतियों का आलोचक ही नहीं बनाया, समाजवाद के मूल स्वप्न और विचार का ही विरोधी बना दिया था। पूँजीवाद के विकल्प के रूप में समाजवाद की सार्थकता और प्रासंगिकता में उनके विश्वास को एकदम ध्वस्त कर दिया था। वे कम्युनिज्म की विकृतियों और ज्यादतियों के ही आलोचक नहीं बने, वे संपूर्ण कम्युनिस्ट विचारधारा और आदर्शों के ही कट्टर प्रतिरोधी बनकर उभरे यूरोप के उन बुद्धिजीवियों की तरह, जो 'सोवियत कम्युनिज्म, द गॉड दैट फेल्डÓ की एकदम कम्युनिस्ट विरोधी विचारधारा के भारत में अग्रणी प्रवर्तक बन गये थे। निर्मल वर्मा भारतीय लेखकों में इस कम्युनिस्ट विरोधी अभियान के अग्रिम प्रतिनिधियों में गिने जाने लगे। वैचारिक द्वंद्व और मतभेद के फलस्वरूप भीष्म जी की निर्मल से जैसे बरसों की घनिष्ठता ही खंडित हो गयी। किंतु विश्व इतिहास में सोवियत क्रांति की युगांतरकारी सामाजिक भूमिका और विशेषकर एशियाई, अफ्रीकी देशों के लिए नये समाज के स्वप्न को साकार करने के प्रयासों और प्रयोगों के लिए सोवियत प्रयोग की असफलता के बावजूद उसके आदर्शों की सार्थकता में भीष्म जी का विश्वास अखंडित और अपरिवर्तित रहा।ÓÓ
भीष्म जी यह मानते थे कि साहित्यकार राजनीति से बच नहीं सकता और उसे बचना भी नहीं चाहिए, बल्कि खूब सोच-समझकर अपने लिए ऐसी राजनीति चुननी चाहिए, जो साहित्य के शाश्वत मूल्यों से मेल खाती हो-जैसे मानवीयता, शांति, समता, सद्भाव, सहानुभूति आदि-लेकिन उसे यह समझना चाहिए कि वह कोई छुटभैया राजनीतिक नेता या पिछलग्गू कार्यकर्ता नहीं है। साहित्यकार का क्षेत्र साहित्य है, राजनीति नहीं। ऐसी राजनीति तो हरगिज नहीं, जो उसे संकीर्णता और कट्टरता की ओर ले जाये। साहित्यकार अपनी राजनीतिक लड़ाई मूल्यों के स्तर पर लड़ता है। उन मानवीय मूल्यों के स्तर पर, जो उसे हृदय और दृष्टि की विशालता देते हैं तथा बेहतर दुनिया के भविष्य का स्वप्न देखने में समर्थ बनाते हैं। लेकिन यह लड़ाई हवा में नहीं, यथार्थ की ठोस जमीन पर लड़ी जाती है; अतीत के अनुभवों की रोशनी में वर्तमान को जाँचते-परखते हुए, देश और दुनिया के भविष्य को सँवारने के लिए लड़ी जाती है।
भीष्म जी ने साहित्य के मोर्चे पर यह लड़ाई लड़ी और इसमें उनका सबसे बड़ा हथियार था यथार्थवाद। उन्होंने अपनी रचनाओं से यथार्थवादी साहित्य की परंपरा को आगे बढ़ाया और उस परंपरा को आगे बढ़ाते हुए उसमें कुछ नया भी जोड़ा। उनके साहित्य के संदर्भ में विद्वानों द्वारा निकाला गया यह निष्कर्ष बिलकुल सही है कि भीष्म साहनी प्रेमचंद की परंपरा के लेखक हैं। प्रेमचंद की परंपरा का अर्थ है यथार्थवादी साहित्य की परंपरा और भीष्म साहनी निस्संदेह यथार्थवादी लेखक हैं। लेकिन प्रेमचंद की परंपरा का होने का अर्थ प्रेमचंद का अनुगामी होना या उनकी नकल करना नहीं, बल्कि यथार्थवादी साहित्य की परंपरा को अपनाकर आगे बढ़ाना है। भीष्म साहनी इसी अर्थ में प्रेमचंद की परंपरा के लेखक हैं।
प्रेमचंद स्वयं अपने यथार्थवाद को 'आदर्शोन्मुख यथार्थवादÓ कहते हैं। लेकिन भीष्म जी ने प्रेमचंद के 'आदर्शोन्मुख यथार्थवादÓ की जगह अपना एक अलग यथार्थवाद विकसित किया, जिसे वे 'समाजोन्मुख यथार्थवादÓ कहते थे। इसलिए प्रेमचंद के यथार्थवाद से भीष्म साहनी के यथार्थवाद की भिन्नता पर ध्यान देना और उनके साहित्य में पाये जाने वाले यथार्थवाद पर विचार करना आवश्यक है। इसके साथ-साथ यह देखना भी आवश्यक है कि भीष्म जी अपने 'समाजोन्मुख यथार्थवादÓ तक कैसे पहुँचे और वहाँ से आगे बढ़े या नहीं बढ़े? और यदि बढ़े, तो किस दिशा में आगे बढ़े?
भीष्म जी अंग्रेजी साहित्य के पठन-पाठन के चलते एक तरफ यथार्थवाद-विरोधी आधुनिकतावाद से प्रभावित थे, तो दूसरी तरफ  अपनी माक्र्सवादी विचारधारा के चलते यूरोपीय साहित्य चिंतन से आयी आलोचनात्मक यथार्थवाद की अवधारणा से भी प्रभावित थे। तीसरी तरफ वे 'नयी कहानीÓ आंदोलन में शामिल होने के कारण ''लेखक के जिये-भोगे यथार्थÓÓ के चित्रण को ही यथार्थवाद समझने वाले अनुभववाद से प्रभावित थे, तो चौथी तरफ प्रगतिशील साहित्य के आंदोलन में शामिल होने, रूसी भाषा और साहित्य से भली भाँति परिचित होने तथा वर्षों तक सोवियत संघ में रहने के अपने अनुभवों के आधार पर वे समाजवादी यथार्थवाद की खूबियों और खामियों से भी परिचित थे। इसलिए वे इन विभिन्न प्रकार के साहित्य सिद्धांतों के बीच वैचारिक तथा कलात्मक स्तर पर संघर्ष करते हुए अपने समाजोन्मुख यथार्थवाद तक पहुँचे थे।
लेकिन वे उसी तक पहुँचकर रुक नहीं गये थे। उन्होंने अपने यथार्थवाद को निरंतर विकसित किया। यद्यपि सांप्रदायिकता की समस्या उनकी चिंता का विषय अंत तक बनी रही, जिसके चलते उन्होंने भारत-विभाजन के समय के सांप्रदायिक दंगों पर तो लिखा ही, दिल्ली के सिख-विरोधी और गुजरात के मुस्लिम-विरोधी दंगों पर भी लिखा, तथापि सामाजिक विषमता और उस पर आधारित भेदभाव उनकी मुख्य चिंता थी। विषमता के मूल कारणों तक पहुँचने की उनकी रचनात्मक कोशिश बराबर जारी रही। अंतत: वे दो मूल कारणों तक पहुँचे-पितृसत्ता और पूँजीवाद। इस नयी यथार्थवादी समझ के साथ उन्होंने प्राचीन काल से चली आ रही पितृसत्ता के विरुद्ध 'माधवीÓ नाटक लिखा और ब्रिटिश साम्राज्यवाद के साथ भारत में पैर पसारते पूँजीवाद पर 'मय्यादास की माड़ीÓ उपन्यास लिखा।  
'मय्यादास की माड़ीÓ को कुछ आलोचकों ने मार्खेज के उपन्यास 'वन हंडे्रड इयर्स ऑफ सॉलिट्यूडÓ से प्रेरित-प्रभावित बताया है और इसे जादुई यथार्थवाद का उपन्यास कहा है। संभव है कि इन दो बातों में से पहली बात सही हो, लेकिन दूसरी बात, कि यह जादुई यथार्थवाद का उपन्यास है, सही नहीं है। इस उपन्यास का यथार्थवाद भीष्म जी का अपना समाजोन्मुख यथार्थवाद तो है ही, सामंतवाद और साम्राज्यवाद की आलोचना करने वाला आलोचनात्मक यथार्थवाद भी है। लेकिन साथ-साथ इसमें एक नये यथार्थवाद की आहट भी सुनायी पड़ती है, जो आज के हिंदी कथासाहित्य में भूमंडलीय यथार्थवाद के रूप में दिखायी पड़ रहा है।  
भीष्म साहनी का यथार्थवाद एक निरंतर विकासमान यथार्थवाद है, जो अपने समय और समाज की समस्याओं से जूझते हुए और एक बेहतर दुनिया का स्वप्न देखते हुए विकसित हुआ है। भीष्म जी का यह विकासमान यथार्थवाद एक तरफ उन्हें कबीर के निकट ले जाता है, तो दूसरी तरफ अपने समकालीनों में हरिशंकर परसाई के निकट। भीष्म जी की रचनाओं पर प्राय: उनके कथ्य के संदर्भ में ही बात होती रही है, इसलिए कबीर से उनकी निकटता पर तो ध्यान दिया गया है, लेकिन उनकी रचनाओं के रूप, शिल्प, भाषा और शैली पर अपेक्षित ध्यान न दिये जाने के कारण हरिशंकर परसाई से उनकी निकटता पर ध्यान नहीं दिया गया है। यदि उनकी रचनाओं के कला पक्ष पर ध्यान दिया जाये, तो पता चलेगा कि भीष्म साहनी बहुत बड़े व्यंग्यकार हैं। उनके नाटकों में तो उनका व्यंग्यकार मुखर होकर बोलता ही है, उनकी कहानियों और उपन्यासों में भी वह जगह-जगह अपनी प्रभावपूर्ण उपस्थिति दर्ज कराता है।
मित्रो, भीष्म साहनी की जन्म शतवार्षिकी मनाने का सबसे अच्छा तरीका यही हो सकता है कि हम उनके साहित्य पर पुनर्विचार करते हुए यह देखें कि साहित्य को भीष्म साहनी की मुख्य देन क्या है। मेरे विचार से उनकी मुख्य देन है निरंतर विकासमान यथार्थवाद और उसे विकसित करने के लिए वैचारिक और कलात्मक दोनों स्तरों पर किया गया सतत सर्जनात्मक संघर्ष। उनकी इस देन को ध्यान में रखते हुए हमें उनकी जन्म शतवार्षिकी यथार्थवादी साहित्य की प्रकृति और परंपरा पर एक राष्ट्रीय बहस चलाकर मनानी चाहिए।
आज हमारे देश में और बाकी दुनिया में भी मानवीय विवेक पर अविवेक की, मानवीय मूल्यों पर मूल्यहीनता की, प्रगतिशीलता पर प्रतिगामिता की और जनतांत्रिकता पर विभिन्न प्रकार की कट्टरतावादी शक्तियां हावी हैं। साहित्यकारों के रूप में इन शक्तियों के विरुद्ध सतत सर्जनात्मक संघर्ष करने में एक सतत विकासमान यथार्थवाद ही हमारा सबसे कारगर हथियार हो सकता है। भीष्म साहनी ने यथार्थवादी साहित्य की जिस परंपरा को अपनाया और आगे बढ़ाया, उसी परंपरा को अपनाने और आगे बढ़ाने के जरिये ही हम भीष्म जी को सच्ची श्रद्धांजलि दे सकते हैं।