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Monday 20 Nov 2017

अक्षर पर्व का जुलाई अंक सामने है। ललित जी की प्रस्तावना पहली बार पढ़ी तो सटाक से निकल गई। विचार करने हेतु द्वितीय-तृतीय पाठ किया। कौंध सी उठी कि आप की बात कदाचित् समाप्त नहीं, यहीं से शुरू होती है।

डा.श्यामबाबू शर्मा, शिलांग

अक्षर पर्व का जुलाई अंक सामने है। ललित जी की प्रस्तावना पहली बार पढ़ी तो सटाक से निकल गई। विचार करने हेतु द्वितीय-तृतीय पाठ किया। कौंध सी उठी कि आप की बात कदाचित् समाप्त नहीं, यहीं से शुरू होती है। साहित्यकार यदि बहुरुपिया हो जाय तो जनमानस के आभ्यंातरिक भावों का विश्लेषण तो सोचा ही नहीं जा सकता। आपने कलमकारों को आईना भेंट किया है । छिनभर अपने मुखारबिन्दु का दर्शन तो करें ! अपना चेहरा किसे सुंदर नहीं लगता ! पल्लवग्राही अध्ययन तथा आत्ममुग्धता से लबरेज स्वनामधन्य व्यासों, तुलसीयों के चिंतन का समय है, यह। ईटार में आयोजित कार्यक्रम प्रायोजित न्यासियों, मठों और मठाधीशों तथा रीढ़ विहीन पहरुओं की कोरी लफ्फाजी से कोसों दूर बिना किसी को खारिज किए साहित्यिक मर्यादा के भीतर साहित्य सृजन है। इस सृजन में आप की प्रस्तावना के पश्चात् अध्याय पर अध्याय रचे जायेंगे इस विश्वास के साथ।